अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्ररूपविज्ञानाधिधायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११
वक्तव्य —केवाँच की सेम जब पक जाती है, तो उसके रोम झड़ने लगते हैं। बन्दर उस सेम को बने के लिए जाते हैं तो वे रोम उनके शरीर पर गिरते हैं, वे दिनभर खुजलाते रहते हैं। इस दृष्टि से केवाँच को संस्कृत में 'कपिकन्धु' कहते हैं। इसके बीज अत्यन्त पौष्टिक होते हैं। इन्हें घिसकर गोंद का बी काम लिया जाता है। उष्णकटिबन्ध में इसकी लताएँ होती हैं, यह शारदीय फल है। सुकोमल केवाँच की फलियों की सन्नी सेम की भाँति बनायी जाती है। केवाँच के बीजों की खीर अत्यन्त पौष्टिक एवं बौद्धवर्धक होती है।
उष्णत्वच्यो हिमः स्पर्शे केशयो बल्यस्तिलो गुरुः। अल्पमूत्रः कटुः पाके मेधाऽग्रिकफपित्तकृत ॥
तिल का वर्णन —तिल उष्णवीर्य, त्वचा के लिए हितकर, स्पर्श में शीत, बालों के लिए हितकर, कल्मषवर्धक, गुरुपाकी, मूत्र को घटाने वाला, विपाक में कटु, बुद्धिवर्धक, अग्निवर्धक, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं ॥ २३ ॥
वक्तव्य —'त्वच्यः' तथा 'केशयः' तिलों के ये दो विशेषण प्रायः इनके तेल के हैं। तिलों को पीसकर इनका उबटन भी लगाया जाता है, तेल की मालिश भी की जाती है, अतः इन दोनों प्रकारों से यह त्वच्य है। 'केशयः' केवल तेल के कारण है। अल्पमूत्रः —जाड़ों में बुड़जनों को बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता है, अतएव इन दिनों तिलकूट, तिलवट, तिलवा, गजक आदि भक्ष्यपदार्थ तिल को भूँजकर कूटकर सूध या चीनी मिलाकर बनाये जाते हैं। इनका सेवन करने से मूत्र की मात्रा कम हो जाती है। यही वाग्भट का सन्देश है।
स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा कफपित्तकरी गुरुः। दूकशुक्रहृदहृदः पाके, तद्रूदबीजं कुसुम्भजम् ॥
अतसी एवं कुसुम्भबीज —उमा (अलसी, तीसी या अतसी) स्निग्ध (तेल से युक्त), स्वाद में नमुर, कुछ तिक्त, उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, गुरुपाकी, दृष्टिनाशक, शुक्रनाशक और विपाक में बूढ़ होती है। कुसुम्भ (बेर) के बीज भी अतसी के समान गुण-कर्म वाले होते हैं ॥ २४ ॥
वक्तव्य —तिल, अतसी तथा कुसुम्भबीज ये तीनों द्रव्य तिलहन में गिने जाते हैं, यहाँ इनका परिगणन शिम्बीधान्य के रूप में किया गया है। यह भी तो है कि एक द्रव्य अपने गुण-धर्मों से अनेक से सम्बन्धित रहता है।
मापोऽत्र सर्वैष्ववरो, यवकः शूकजेषु च।
माष एवं यवक वर्णन —शिम्बीधान्यों में माष (उड़द) उक्त सभी धान्यों में अवर (निकुष्ट) होता है और शूकधान्यों में यवक (जई) अधम होता है।
वक्तव्य —'माषाः शमीधान्यानाम् अपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति'। (च.सू. २५।३९) शमीधान्यों में माष अपथ्यतम होते हैं। यहाँ शूकधान्यों में यवक को जो पुनः अपथ्य कहा है, इससे ऐसा लगता है कि शास्त्रकार का यह वचन 'द्विबद्धं सुबद्धं भवति' वाली सूक्ति है अर्थात् दो बार बौधी हुई गाँठ जल्दी कुटती नहीं। इसके पहले शूकधान्यवर्ग में 'पूर्वं पूर्वं च निन्दिताः' पदार्थ द्वारा यवक के गुणों की निन्दा की जा चुकी है, अस्तु। 'माषाः श्लेष्मपित्तजननानां श्रेष्ठाः'। (च.सू. २५।४०) इस वचन से अब आप किसी द्रव्य को महत्ता उत्तम, मध्यम, अधम नहीं कह सकते, उसके लिए पूर्वोपर की संगति अपेक्षित होती है। यही स्थिति 'यवक' की भी है।
वक्तव्य —चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि ने जिन द्रव्यों के जो नाम दिये हैं, देशभेद के कारण वे नाम बदल भी जाते हैं। इसलिए शूक, शमी, कुधान्य आदि को वहाँ-वहाँ के किसानों से, पशु-पक्षियों के नामों को व्याधों या शिकारियों से, कन्द-मूल-फलों के नामों को वनवासियों से, पकाये व्यञ्जनों के नामों को रसोइयों से, औषधद्रव्यों के नामों को औषधसंग्रह करके बाजारों में बेचने वालों (अतारों) से पूर्व और प्रयोग करके उन-उन के गुण-धर्मों से मिलाकर प्रयोग में लाये।