अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
नवं धान्यमभिष्यन्दि, लघु संवत्सरोपितम् ॥ २५ ॥
शीघ्रजन्म तथा सूर्यं निस्तुषं युक्तिभर्जितम्।
इति शिम्बोधान्यवर्गः।
धान्य-विवेचन —उक्त दोनों प्रकार के ( शुक्र तथा शिम्बो ) धान्य नयी अवस्था में अभिष्यन्दी ( कफकारक ) होते हैं और वे ही सालभर पुराने होने पर लघु ( शीघ्र पचने वाले ) हो जाते हैं, जो धान्य शीघ्र पक जाते हैं। जैसे साठी आदि तथा छिलका उतारी हुई घी-तेल आदि में भूँजी हुई दालें भी लघु होती हैं ॥ २५ ॥
वक्तव्य —खारणादि ने कहा है—एक साल पुराना हो जाने पर सभी प्रकार के धान्य अपनी गूहता छोड़ देते हैं, किन्तु वे अपना वीर्य नहीं छोड़ते अर्थात् वे शक्तिहीन नहीं होते। शीघ्रजन्म —साठी आदि जो धान्य जितने शीघ्र पकते हैं वे उतने ही लघु होते हैं, इसके विपरीत देर में पकने वाले गेहूँ आदि धान्य स्वभावतः गुरु होते हैं। सूर्य —दाल के उपयोग में आने वाले मूँग, माष आदि। निस्तुष —छिलका उतारी हुई दालें, इन्हीं को वितुष भी कहते हैं। युक्तिभर्जितम् —ये दालें भइभूँजे से भी भूँजवायी जाती हैं या घरों में घी-तेल में भूँजकर खायी जाती हैं, बिना घी-तेल के भूँजी हुई लघु होती है, शेष गुरु।
अथ कृतान्नवर्गः
मण्डपेया विलेपीनामोदनस्य च लाघवम् ॥ २६ ॥
यथापूर्वं शिवस्तत्र मण्डो वातानुलोमनः। तृङ्गलानिदोषपेशेष्वनः पाचनो धातुसाम्यकृतम् ॥ २७ ॥
स्रोतोमार्दवकृत्स्वेदौ सन्धुभ्यति चानलम्।
पकाये गये अन्नों का वर्णन —मण्ड ( माँड ), पेया, विलेपी तथा ओदन ( भात )—ये क्रमशः अपने पूर्ववर्ती पदार्थ से लघुपाकी होते हैं। मण्ड-परिचय —यह शिव ( कल्याणकारक ) होता है, वातदोष का अनुलोमन करता है, तुषा ( प्यास ), ग्लानि ( हर्षक्षय ), वमन, विरेचन आदि से शोधन कराने के बाद बचे हुए दोष का विनाशक है, पाचनकारक एवं धातुसाम्यकारक हैं, स्रोतों को मुलायम बना देता है, पसीना लाता है और यह जठराग्नि को विधिवत् सुलगाता ( तेज करता ) है ॥ २६-२७ ॥
वक्तव्य —मण्ड—चावलों से चौदह गुना अधिक जल डालकर पकाये गये और मित्र्य ( भात ) के अंश को निकाल कर जो पेय द्रवद्रव्य शेष बचता है, उसे 'मण्ड' या 'माँड' कहते हैं। इसमें सोंठ और संधानमक भी मिला लिया जाता है, तो यह दीपन-पाचन हो जाता है। इसके भेद—१. यवमण्ड तथा २. लजमण्ड आदि।
पेया —आहारद्रव्य से चौदह गुना जल में बनायी गयी अत्यन्त पतली तथा थोड़ी-सी सीठी से युक्त वस्तु को पाकविशेषज्ञ 'पातुं योग्या पेया' अर्थात् पीने योग्य कहते हैं।
विलेपी —आहारद्रव्य से चौगुने पानी में डालकर तैयार की हुई, जिसमें सीठी का अंश विशेष हो, उसे विलेपी ( लपसी ) कहते हैं।
ओदन —चार पल ( १६ तोला ) चावलों को चौदह गुना जल में पकायें। चावलों के भलीभाँति गल जाने पर माँड को निकाल दें, इसे ओदन ( भात ) कहते हैं।
क्षुतृष्णागलानिदोर्बल्यकुक्षिरोगज्वरापहा ॥ २८ ॥
मलानुलोमनी पथ्या पेया दीपनपाचनी।
पेया का वर्णन —यह भूख तथा प्यास को शान्त करती है, ग्लानि ( उत्साहहीनता ), दुर्बलता, उदररोगों एवं ज्वर का विनाश करती है। पुरीष आदि मलों का अनुलोमन करती है, रोगी तथा नीरोग दोनों के लिए हितकर है। यह दीपन और पाचन है ॥ २८ ॥