अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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विलेपी ग्राहिणी हृद्या तृष्णाघ्नी दीपनी हित्वा ॥ २९ ॥ ब्रणाक्षिरोगतंशुद्धुर्बलस्नेहापयिनाम् ।
विलेपी का वर्णन—इसमें मल को बाँधने की शक्ति होती है, अतः यह अतिसाररोग को नष्ट करती है, हृदय को बल देती है, प्यास को शांत करती है, मन्द अग्नि को प्रदीप्त करती है, सभी स्थितियों में हितकर है। यह ब्रण ( घाव ), नेत्ररोग, वमन-विरचन आदि द्वारा शुद्ध शरीर वाले दुर्बल व्यक्तियों तथा स्नेहपान करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए लाभदायक होती है ॥ २९ ॥
सुधौतः प्रसृतः स्वित्त्रोऽत्यक्तोष्मा चैदनो लघुः ॥ ३० ॥
यश्चाग्रेयोपधक्वाथसाधितो भृष्टतण्डुलः । विपरीतो गुरुः क्षीरमांसाद्यैर्यश्च साधितः ॥ ३१ ॥
ओदन का वर्णन—जो भात चावलों को भलीभाँति धोकर पकाया जाता है, पकने पर जिसमें से मीठ निकाल लिया गया हो ( स्वाद की दृष्टि से नये चावलों का मीठ प्रायः नहीं निकाला जाता, तभी वह स्वादिष्ट एवं गुरु होता है ), जिसमें अभी तक गर्मी बनी हुई हो, ऐसा भात लघु ( मुपच ) होता है। जो भात चित्रक ( चीता ) के अथवा सोंठ के क्वाथ में बनाया जाता है या चावलों को भूजकर बनाया जाता है, वह भी लघु होता है। इसके विपरीत अर्थात् दूध में पकाये हुए चावलों की क्षीर, मांसरस में पकाये हुए चावलों का भात या बिना मीठ निकाला हुआ भात ये सब गुरु ( देर में पचने वाले ) होते हैं ॥ ३०-३१ ॥
इति द्रव्यक्रियायोगमानाचैः सर्वमादिशेत् ।
संक्षिप्त निर्देश—इस प्रकार द्रव्य ( जिससे जो पदार्थ बनाया गया हो ), कर्म ( निर्माणविधि के भेद-उपभेद ), योग ( सहयोगी द्रव्यों का संयोग ) तथा उनके मान ( नाप-तौल ), आदि शब्द से देश, काल का ग्रहण करके सभी प्रकार के आहारद्रव्यों के लघुत्व, गुरुत्व आदि गुण-दोषों का स्वयं भी विचार कर लेना चाहिए और दूसरों को उसका निर्देश देना चाहिए।
बृंहणः प्रीणनो वृष्यश्चक्षुष्यो ब्रणहा रसः ॥ ३२ ॥
मांसरस के गुण—यह धातुओं को पुष्ट करने वाला, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर ( नेत्र-ज्योतिर्वर्धक ) तथा ब्रणनाशक ( घाव को शीघ्र भरने वाला ) होता है ॥ ३२ ॥
मौद्रस्तु पथ्यः संशुद्ध्रणकण्ठाक्षिरोगिणाम् ।
मूंग का पूष—यह वमन-विरचन आदि क्रियाओं से शुद्ध शरीर वालों के लिए, ब्रण, कण्ठ तथा नेत्ररोगियों के लिए पथ्य ( हितकर ) होता है।
वातानुलोमी कौलत्यो गुल्मतीप्रतूनजित् ॥ ३३ ॥
कुलथी का पूष—यह वातदोष को अनुलोम ( अनुकूल ) करता है, गुल्मरोग, तूनी तथा प्रतूनी नामक वातरोगों का विनाशक है ॥ ३३ ॥
तिलपिण्याकविकृतिः शुष्कशाकं विरुद्धकम् । शाण्डाकीवटकं दूग्धं दोषलं ग्लपनं गुरु ॥ ३४ ॥
तिल, पिण्याक आदि—तिल की खली से बने हुए भोज्य पदार्थ, चना एवं सरसों के पत्तों को मुखाकर बनाये गये शाक, विरुद्धक ( अंकुर निकले हुए चना, मोठ, मूंग आदि ) तथा काँची में डाले गये बड़े—ये सब पदार्थ दृष्टिनाशक, वात आदि दोषकारक, मलानिकारक तथा गुरु होते हैं ॥ ३४ ॥
रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्य़ा रुचिप्रदा ।
रसाला के गुण—रसाला ( श्रीखण्ड या शिखरन )—रस-रक्त आदि धातुओं को बढ़ाने वाली, वीर्यवर्धक, स्निग्ध ( स्नेहयुक्त ), बलवर्धक तथा रुचि को बढ़ाने वाली होती है।