अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
रसाला, शीखण्ड, शिखरिणी या सिखरन—पाकक्रियाकुशल भीमसेन ने इसका निर्माण करके श्रीकृष्ण को खिलाया था, ऐसी चर्चा महाभारत में आई है। हम यहाँ उसी निर्माण-विधि का निर्देश कर रहे हैं—मलाई सहित उत्तम दही को एक स्वच्छ वस्त्र बाँधकर लटका दें। उसका जलीय तत्त्व निकल जाने पर उस दही को एक पात्र में निकाल लें, फिर किसी चौड़े बर्तन के मुख पर मोटा कपड़ा बाँधकर उस दही में चीनी मिलाकर उस कपड़ा के ऊपर रखकर उसे हाथ से रगड़ें। वह दही उस कपड़े से छनकर जब सब उस पात्र में आ जाये, तब उसमें उचित मात्रा में कालीमिर्च, जावित्रों, केशर, इलायची आदि मिलाकर रख दिया जाता है, यह रसाला है। इसके भेद-उपभेदों का विस्तृत वर्णन देखें—'क्षेमकुतूहल' नामक ग्रन्थ में।
श्रमशुतूट्कलमहरं पानकं प्रीणनं गुरु॥ ३५॥
विष्टस्मि मूत्रलं हृद्यं यथाद्रव्यगुणं च तत्।
पानक ( शीतल पेय ) गुण—यह शारीरिक थकावट, भूल, प्यास तथा मानसिक सुस्ती को हटाता है, तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। यह विष्टम्भकारक ( मलावरोधक ), मूत्र को निकाल देने वाला, रुचिकर होता है। विशेष करके यह जिस प्रकार के द्रव्यों से बनाया जाता है, तदनुसार गुणों वाला होता है॥ ३५॥
वक्तव्य—यह एक प्रकार का पेय है, जो पकाये हुए कच्चे आम, पकी हुई इमली आदि के गूदे में पानी, नमक, मिर्च आदि मिलाकर तैयार किया जाता है; इसे 'पना' भी कहते हैं। इसके अन्य अनेक प्रकार हैं—फालमा, आलूबुखारा, काफल ( नैनीताल, अल्मोड़ा में सुलभ जंगली फल )—इनमें से किसी एक का उक्त विधि से पानक बनाया जाता है। बादाम, पोस्तादाना, भाँग के बीज, कददु, खरबूजा आदि के बीजों को एक साथ पानी डालकर पीस लें, फिर इसे कपड़े में डालकर छान लें। इसमें चीनी या उत्तम शहद डालकर पीया जाता है, यह भी एक समृद्ध पानक है। ग्रीष्मऋतु का यह उत्तम पौष्टिक पेय है। कुछ शौकीन लोग इसमें गुलकन्द भी मिलते हैं। यह सोने में सुगन्ध है।
लाजास्तुदृष्ट्यतीसारमेहमेदःकफच्छिदः ॥ ३६॥
कासपित्तोपशमना दीपना लघवो हिमाः।
लाजा ( लावा, खील )—ये तुष्णा ( प्यास ), वमन, अतिसार, प्रमेह, मेदोवृद्धि तथा कफद्रोष का विनाश करते हैं; काम एवं पित्तविकार को शान्त करते हैं, जठराग्नि को प्रदीप्त करते हैं, लघुपाकी, शीतल तथा शीतवीर्य होते हैं॥ ३६॥
वक्तव्य—'भृष्टं सुपुष्यितं धान्यं लाजेति परिकीर्तितम्'। अर्थात् धान्यों को भाड़ में भूँजकर जो फूल जैसा खिल जाता है, उसे 'लावा' कहते हैं। ये लाजा अन्य धान्यों के भी बनाये जाते हैं। लावा शब्द संस्कृत में पुल्लिंग एवं नित्य बहुवचनान्त है।
पृथुका गुरवो बल्याः कफविष्टम्भकारिणः॥ ३७॥
पृथुक ( च्यूड़ा )—ये पाचन में गुरु, बलवर्धक, कफकारक तथा विष्टम्भकारक ( मल को बाँधने वाले ) होते हैं॥ ३७॥
वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त का कथन है कि हरे धान्यों को भूँजकर मुशूल से कूटकर चिपटे जो बनाये जाते हैं, उन्हें 'पृथुक' कहते हैं। यही मत श्रीहेमाद्रि तथा उल्लेख का भी है। किन्तु आजकल सूखे धान्यों को भिगाकर भूनकर तब कूटकर च्यूड़ा बनाया जाता है।
उक्त आचार्यों द्वारा कथित विधि से बनाया गया च्यूड़ा शुद्ध एवं उत्तम होता है।
धाना विष्टस्मिन्नी रूक्षा तर्पणी लेखनी गुरुः।
धाना ( भूने हुए जौ या चावल )—यह विष्टम्भकारक, रूक्ष ( स्नेह रहित ), तृप्तिकारक, लेखन करने वाली तथा पचने में गुरु होती है।