भारतकोश
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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

रसाला, शीखण्ड, शिखरिणी या सिखरन—पाकक्रियाकुशल भीमसेन ने इसका निर्माण करके श्रीकृष्ण को खिलाया था, ऐसी चर्चा महाभारत में आई है। हम यहाँ उसी निर्माण-विधि का निर्देश कर रहे हैं—मलाई सहित उत्तम दही को एक स्वच्छ वस्त्र बाँधकर लटका दें। उसका जलीय तत्त्व निकल जाने पर उस दही को एक पात्र में निकाल लें, फिर किसी चौड़े बर्तन के मुख पर मोटा कपड़ा बाँधकर उस दही में चीनी मिलाकर उस कपड़ा के ऊपर रखकर उसे हाथ से रगड़ें। वह दही उस कपड़े से छनकर जब सब उस पात्र में आ जाये, तब उसमें उचित मात्रा में कालीमिर्च, जावित्रों, केशर, इलायची आदि मिलाकर रख दिया जाता है, यह रसाला है। इसके भेद-उपभेदों का विस्तृत वर्णन देखें—'क्षेमकुतूहल' नामक ग्रन्थ में।

श्रमशुतूट्कलमहरं पानकं प्रीणनं गुरु॥ ३५॥

विष्टस्मि मूत्रलं हृद्यं यथाद्रव्यगुणं च तत्।

पानक ( शीतल पेय ) गुण—यह शारीरिक थकावट, भूल, प्यास तथा मानसिक सुस्ती को हटाता है, तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। यह विष्टम्भकारक ( मलावरोधक ), मूत्र को निकाल देने वाला, रुचिकर होता है। विशेष करके यह जिस प्रकार के द्रव्यों से बनाया जाता है, तदनुसार गुणों वाला होता है॥ ३५॥

वक्तव्य—यह एक प्रकार का पेय है, जो पकाये हुए कच्चे आम, पकी हुई इमली आदि के गूदे में पानी, नमक, मिर्च आदि मिलाकर तैयार किया जाता है; इसे 'पना' भी कहते हैं। इसके अन्य अनेक प्रकार हैं—फालमा, आलूबुखारा, काफल ( नैनीताल, अल्मोड़ा में सुलभ जंगली फल )—इनमें से किसी एक का उक्त विधि से पानक बनाया जाता है। बादाम, पोस्तादाना, भाँग के बीज, कददु, खरबूजा आदि के बीजों को एक साथ पानी डालकर पीस लें, फिर इसे कपड़े में डालकर छान लें। इसमें चीनी या उत्तम शहद डालकर पीया जाता है, यह भी एक समृद्ध पानक है। ग्रीष्मऋतु का यह उत्तम पौष्टिक पेय है। कुछ शौकीन लोग इसमें गुलकन्द भी मिलते हैं। यह सोने में सुगन्ध है।

लाजास्तुदृष्ट्यतीसारमेहमेदःकफच्छिदः ॥ ३६॥

कासपित्तोपशमना दीपना लघवो हिमाः।

लाजा ( लावा, खील )—ये तुष्णा ( प्यास ), वमन, अतिसार, प्रमेह, मेदोवृद्धि तथा कफद्रोष का विनाश करते हैं; काम एवं पित्तविकार को शान्त करते हैं, जठराग्नि को प्रदीप्त करते हैं, लघुपाकी, शीतल तथा शीतवीर्य होते हैं॥ ३६॥

वक्तव्य—'भृष्टं सुपुष्यितं धान्यं लाजेति परिकीर्तितम्'। अर्थात् धान्यों को भाड़ में भूँजकर जो फूल जैसा खिल जाता है, उसे 'लावा' कहते हैं। ये लाजा अन्य धान्यों के भी बनाये जाते हैं। लावा शब्द संस्कृत में पुल्लिंग एवं नित्य बहुवचनान्त है।

पृथुका गुरवो बल्याः कफविष्टम्भकारिणः॥ ३७॥

पृथुक ( च्यूड़ा )—ये पाचन में गुरु, बलवर्धक, कफकारक तथा विष्टम्भकारक ( मल को बाँधने वाले ) होते हैं॥ ३७॥

वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त का कथन है कि हरे धान्यों को भूँजकर मुशूल से कूटकर चिपटे जो बनाये जाते हैं, उन्हें 'पृथुक' कहते हैं। यही मत श्रीहेमाद्रि तथा उल्लेख का भी है। किन्तु आजकल सूखे धान्यों को भिगाकर भूनकर तब कूटकर च्यूड़ा बनाया जाता है।

उक्त आचार्यों द्वारा कथित विधि से बनाया गया च्यूड़ा शुद्ध एवं उत्तम होता है।

धाना विष्टस्मिन्नी रूक्षा तर्पणी लेखनी गुरुः।

धाना ( भूने हुए जौ या चावल )—यह विष्टम्भकारक, रूक्ष ( स्नेह रहित ), तृप्तिकारक, लेखन करने वाली तथा पचने में गुरु होती है।

कर्मसहस्रविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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वक्तव्य —वाग्भट ने उक्त 'धाना' को 'गुरु' कहा है, सुश्रुत का मत इसके विपरीत है—'धानोऽलुम्बास्तु वक्तव्यः कफमेदोविशेषणाः' । (सु.सू. ४६।४१०) अर्थात् धाना तथा उलुम्बा (होलक) ये लघु होते हैं, बल एवं मेदोधातु को सुखाते हैं। ऐसा क्यों ?

समाधान —'सुश्रुत' के मत में ये द्रव्य पाक में लघु हैं और गुणों में गुरु होते हैं। 'उलुम्बा' को हिन्दी में 'होरहा' भी कहते हैं।

सक्तवो लघवः क्षुतृश्रमनेत्रामयव्रणान् ॥ ३८ ॥

धन्ति सन्तर्पणाः पानात्सद्य एव बलप्रवाः । नोदकान्तरितान् द्विन्न निशायान् न केवलान् ॥ ३९ ॥

न भुक्त्वा न द्विजैशिल्वत्वा सक्तूनद्यान्न वा बहून् ।

सत्तुओं का वर्णन —प्रायः सभी प्रकार के सत्तु लघु होते हैं। ये भूख, प्यास, थकावट, नेत्ररोग आदि त्रणों को नष्ट करते हैं। ये पीने से तत्काल तृप्तिकारक तथा बल (शक्ति) कारक होते हैं। सत्तु वाले समय बीच-बीच में पानी नहीं पीना चाहिए। दिनभर में दो बार सत्तु का सेवन न करें, इसे रात में नहीं खाना चाहिए। केवल (बिना नमक या गुड़ मिलाये) सत्तु नहीं खाने चाहिए। भोजन कर लेने के बाद भी सत्तु का सेवन न करें। आटा की भाँति सानकर दंतों से काट-काट या चबा-चबा कर इनका सेवन न करें और अधिक मात्रा में भी सत्तु न खाये ॥ ३८-३९ ॥

वक्तव्य —अन्य प्रकार के भोजनों के बीच-बीच में जिस प्रकार लोग पानी पीते हैं, वैसा सत्तुओं के साथ न करें। 'न केवलान्' का अर्थ श्री अरुणदत्त तथा हेमाद्रि ने किया है—'उदकादिरहितात्' । इसमें यदि पद से नमक या गुड़ या मिश्री समझना चाहिए। कुछ लोग इसकी रुक्षता कम करने के लिए इसमें मिला लेते हैं। घी मिलाने की सलाह संग्रहकार की भी है। सत्तुओं को घोलकर पीना यही उचित है। आटा जैसा सानकर खाना उचित नहीं है।

सत्तु-निर्माण —जौ, जना, मसूर, बेर आदि को भूँजकर पीस लिया जाता है, इस प्रकार जो आटा बनाया जाता है, उसे 'सत्तु' कहते हैं। इसका प्रचार पूर्वी उत्तरप्रदेश में अधिक है। इधर इसके 'होरल' भी देखे जाते हैं, उनका नाम होता है—'तुरन्ता भोजनालय' ।

पिण्याको रल्पनो रुक्षो विष्टम्भो दृष्टिदूषणः ॥ ४० ॥

पिण्याक-वर्णन —पिण्याक (तिल या सरसों की खली) ग्लानिकारक, रुक्षताकारक, विष्टम्भ (मल जो रोकने वाला), दृष्टि को दूषित करने वाला होता है ॥ ४० ॥

वक्तव्य —पिण्याक का सेवन रात्रि में नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह रुक्ष होने के कारण विष्टम्भ करता है। उसके बाद यह विदाह करता है, फिर मन में ग्लानि को करता है।

वेसवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ।

वेसवार-वर्णन —यह गुरु, स्निग्ध (चिकना), बलवर्धक तथा शरीर को स्थूल बनाता है ।

वक्तव्य —वेसवार का परिचय श्रीचक्रपाणि ने च.सू. २७।२६९ की टीका में इस प्रकार दिया है—'मांसं निरस्य सुस्निग्धं पुनर्दृषादि पेषितम् । पिप्पलीशुण्डिमरिचगुडमर्पिः समन्वितम् । ऐकध्वं विपचेत् सम्यग्वेशवार इति स्मृतः' । (सुदशास्त्र) अर्थात् अस्थिरहित मांस के छोटे-छोटे टुकड़ों को पकाकर उन्हें फिर सिल पर पीसकर नीमल, मोठ, मरिच, गुड़, घी मिलाकर फिर से एक साथ पकायें, इसे वेसवार कहते हैं। इसी का अविकल पाद सुश्रुत में देखें—सु.सू. ४६।३६४-३६५। यह मांसाहारियों का 'वेसवार' है। शाकाहारियों का 'वेसवार' आगे कहा जायेगा।

मुद्गादिजास्तु गुरवो यथाद्रव्यगुणानुगाः ॥ ४१ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

मूंग आदि के वेसवार—मूंग, उड़द आदि वेसवार भी गुरु होते हैं, जिन घटकों द्वारा वे बनाये जाते हैं, उन्हीं के समान उन वेसवारों के गुण तथा कर्म भी होते हैं ॥४॥

बक्तव्य—‘सिद्धसार’ में कहा गया है—‘अत्युष्ण मण्डकाः पथ्याः शीतला गुरवो मताः’। अर्थात् उक्त मूंग आदि द्वारा निर्मित मण्डक गरमागरम यदि खाये जाते हैं, तो हितकर होते हैं और वे शीतल हो जाने पर गुरु हो जाते हैं अर्थात् ढेर में पचते हैं।

वेशवार—जीरा, मरिच, सोंठ, पीपलामूल, धनियाँ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली तथा सफेद मरिच—यह सब वेशवारगण हैं। देखें—राज० मिश्रकर्म २२।६२। इन मसालों को डालकर जो मूंग आदि दालों के मण्डक (पकोड़े, बड़े आदि) बनाये जाते हैं, उनके गुण-धर्मों का ऊपर वर्णन किया गया है। यह शब्द तालव्य अथवा दन्त्य सकार मध्य भी देखा जाता है।

कुकूलकपिरप्राष्ट्रकन्दुङ्गरविपाचितान् । एकयोर्नौलघून्विद्यादपूणानुतरोत्तरम् ॥४२॥

इति कृताश्रवर्गः ।

अपूर्वों का वर्णन—कुकूल (भूसा की आग), कपिर या खपिर अर्थात् फूटे हुए घड़े का टुकड़ा, प्राष्ट्र (भाड़), कन्दुक (गोल आकार वाली कड़ाही) तथा जलते हुए कोयलों को अंगार कहते हैं। इनमें पकाये गये गेहूँ आदि किसी एक ही जाति के आटा के अपूर्व उत्तरोत्तर हलके होते हैं ॥४२॥

बक्तव्य—‘अपूर्’ शब्द सामान्यतया गेहूँ के आटे को घोलकर चीनी डालकर पकाये हुए मालपुआ के लिए प्रयुक्त होता है। यहाँ ‘अपूर्’ की निर्माण-विधि से ‘लिट्टी’ या ‘बाटी’ का बोध हो रहा है, विशेषकर ‘कुकूलपाचितान्’ तथा ‘अङ्गारपाचितान्’ को देखकर। ‘कपिरप्राष्ट्रकन्दुपाचितान्’ को देखकर रोटी का आभास हो रहा है। कपिर या खपिर का अर्थ है फूटे घड़े के खप्पर का तवा; प्राष्ट्र का अर्थ है—भड़भूजे की भाड़ या भड़साँय या भड़साई अथवा तन्दूर; कन्दु का अर्थ है—लोहे का तवा या कड़ाही। अब आप तवा या कड़ाही में जो भी बनायें किन्तु ऊपर के साधनों में अपूर्व का बनना या बनाना सम्भव नहीं है। इस प्रकार यहाँ अपूर्व का अर्थ—लिट्टी, बाटी, रोटी, फुलका, चिलड़ा, पराठा तथा मालपुआ भी हो सकता है। यद्यपि इसमें पकाये जाने वाले पदार्थ के लिए यहाँ घी-चीनी का उल्लेख नहीं किया है, फिर भी अन्न, पकाने वाले पात्र तथा अग्नि का उल्लेख तो किया ही गया है। अतः यहाँ ‘एकदेशविकृत-स्यानन्यत्वात्’ इस नियम से सभी का ग्रहण कर लिया जायेगा।

‘कपिर’ शब्द का अर्थ है—घड़े का ‘ठीकरा’। संस्कृत-साहित्य में एक आचार्य हुए हैं, जिनका नाम था ‘वटकपिर’। ये यमकालेकार की रचना में अपने काल में अद्वितीय थे। इनकी एक गर्वक्ति है—‘जीयेय येन कविना यमकैः परेण, तस्मै वहेयमुदकं घटकपिरेण’। यहाँ भी कपिर या खपिर शब्द का वही अर्थ है।

इस प्रकरण का नाम ‘कृताश्रवर्ग’ है। इसका अर्थ है—किये (पकाये) गये अन्नों (भक्ष्यपदार्थों) का वर्ग। ‘कृत’ का अर्थ संस्कृत भी होता है, इसका तात्पर्य है—मसाले आदि डालकर भलीभाँति पकाये गये और उसके बाद घी-तेल से छौंके गये। इस दृष्टि से सभी प्रकार के भक्ष्य पदार्थ कृत-अकृत भेद से दो प्रकार से बनाये जाते हैं। देखें—‘त्रेयाः कृताऽकृतास्ते तु स्नेहादियुतबर्जिताः’। (अ.सं.सू. ७।५१) अर्थात् कृत (संस्कृत) अथवा अकृत (असंस्कृत)।

अथ मांसवर्गः

हरिगैणकुर्ङ्क्षीर्गोकर्णमृगमातुकाः । शशशम्बरचारुष्कशरभाद्या मृगाः स्मृताः ॥४३॥

मृग-परिचय—हरिण, एण, कुरंग, गोकर्ण, मृगमातुका, शश, शम्बर (सौंभर—बारहसिंगा), चारुष्क तथा शरभ आदि ‘मृग’ कहे जाते हैं ॥४३॥

अक्षररूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।६७-६८ में मुर्गों की गणना इस प्रकार की गयी है—हरिण, एण, कुरंग, कृष्ण, गोकर्ण ( नीलगाय ), मुग्गामातुका, कालपुच्छक, चारुक्क, वरपोत, शशक, उरण, श्वदंष्ट्र, राम, शरभ ( यह मुग काश्मीर में पाया जाता है, इसके आठ पैर होते हैं ), लोहकारक, शम्बर ( सींभर ), कंगल ( कस्तूरीमृग ), कृतमाल तथा पुषत ( बिन्दुओं से युक्त त्वचा वाला )। चरक ने 'मृग जाङ्गल्लचारिणः' ( ज.सू. २७।५५ ) कहा है अर्थात् ये जंगल में विचरण करते रहते हैं। शिकारी इन्हे दूदते हैं, अतएव इन्हे मृग कहा जाता है।

लाववार्तीकवर्तीरक्तवर्त्मककुक्कुभाः । कपिञ्जलोपचक्राश्वचकोरकुशवाहवः ॥ ४४ ॥

वर्तको वर्तिका चैव तित्तिरः क्रकरः शिखी । ताम्रचूडाश्वबकरगोनर्दगिरिवर्तिकाः ॥ ४५ ॥

तथा शारपदेन्द्राभवरटाद्याश्व विष्किराः ।

विष्किर-परिचय—लाव ( लवा ), वर्तक ( बटेर ), रक्तवर्त्मक, कुक्कुभ, कपिञ्जल, उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तीतर, क्रकर, मोर, ताम्रचूड ( मुर्गा ), बकर, गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरट नामक पक्षी विष्किर कहे जाते हैं ॥ ४४-४५ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।६९-७१ ) में विष्किर पक्षियों की गणना इस प्रकार की गयी है—लाव, वर्तक, वातीर, रक्तवर्त्मक ( गौरिया—गुहचटक ), कुक्कुभ ( जंगली मुर्गा ), कपिञ्जल ( जंगली गौरिया ), उपचक्र ( चक्का ), चकोर, कुरुबाह, वर्तक ( बत्तख ), वर्तिका, तित्तिर, क्रकर ( बया ), मोर, मुर्गा, वरक ( बगुला ), गोनर्द, गिरिवर्तिका, शारपद, इन्द्राभ तथा वरटा ( हंस की स्त्री )—ये सभी पक्षी विष्किर कहे जाते हैं।

विष्किर शब्द का अर्थ—पहले दानों के ढेर को पंजों से बिखेर कर बाद में एक-एक दाना चुनकर खाने वाले पक्षियों को 'विष्किर' कहते हैं।

जीवजीवकदात्युहभृङ्गाहशुकसारिकाः ॥ ४६ ॥

लङ्काकोकिलहारीतकपोतचटकादयः । प्रतुदाः—

प्रतुद-परिचय—जीवजीवक, दात्युह, भृंग या भुंगराज, शुक्, सारिका ( मैना ), लङ्का, कोकिल ( कोयल ), हारीत, कपोत ( कबूतर ) तथा चटक ( गौरिया ) आदि पक्षी प्रतुद कहे जाते हैं ॥ ४६ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह सू. ७।७२-७५ में प्रतुद पक्षियों की गणना इस प्रकार है—शतपत्र ( कठफोड़वा ), भुंगराज, कोयण्डि ( जलमुर्गा ), जीवजीवक, खंजरीट ( खंजन पक्षी ); हारीत ( हरियल ), दुर्गामारि ( उल्लू ), कुशगुह, लङ्का, लङ्घक, वटहा, गोक्षवेड, डिण्डिमाणक, जटी ( जटायु ), दुन्दुभि, पार्कार, लोहपुष्क, कलिंगक, सारिका, शुक्, शाङ्ग ( सारंग ), चिरीटीक, कुयण्टिक, मञ्जरीयक, दात्युह, गोपापुत्र, प्रियात्मज, कलविक, कोयल, कबूतर, अंगारचूड़क, पारावत ( पेरवा वा जंगली कबूतर ) तथा पाणविक—ये पक्षी 'प्रतुद' कहे जाते हैं। चाँच मारकर दाना चुगने वाले पक्षियों की 'प्रतुद' संज्ञा है।

विष्किर तथा प्रतुद वर्ग के पक्षी यद्यपि ऊपर अलग-अलग गिनाये गये हैं तथापि दोनों में प्रतुद धर्म समान ही होता है। सम्प्रति ये पक्षी उक्त नामों से अपरिचित से हो चले हैं, इनका परिचय बहेलियों ( चिड़ीमारों ) से प्राप्त कर लेना चाहिए।

—भेकगोधाहिष्भाविदाद्या बिलेशयाः ॥ ४७ ॥

बिलेशय-परिचय—भेक ( मेढक ), गोह, सर्प तथा साही आदि प्राणी 'बिलेशय' कहे जाते हैं ॥ ४७ ॥

वक्तव्य—बिलेशय अर्थात् बिल में रहने वाले। मेढक मिट्टी के भीतर, गोह तथा सर्प का बिल होता ही है, साही के पूरे शरीर पर काँटे रहते हैं, यह बिल बना लेता है अथवा किसी गुफा को अपने लिए दूँड लेता है। इसके काँटे धार्मिक कृत्य तथा कृत्या प्रयोग में लिए जाते हैं।

७ अ० ह०

९८ अष्टाड्रहदये

अष्टांगसंग्रह ( सू. ७।७६ ) में बिलेशय प्राणियों की गणना इस प्रकार है---श्वेत, श्याम, रंग-बिरंगी

पीठ वाला तथा कालक नामक प्राणी मेढक, चिल्लट, कूचीक, गोह, शल्लक, शण्डक ( साँडा ), वृष ( जंगली

बिलाव ), साँप, कदली ( पौण्ड्देश में पाया जाने वाला प्राणी ), श्वाविध ( बड़ा साही ) तथा नेवला---ये

बिलेशय प्राणी हैं।

गोखराश्वतरोष्ट्राश्वद्वीपिसिंहर्क्षवानरा: । मार्जारमूषकव्याप्रवृकबश्चरुतरक्षवः || ४८ ||

लोपाकजम्बुकश्येनचाषवान्तादववायसा:।_ शशघ्नीभासकुररग॒ध्नोलककुलिड्भका:। ।। ४९ ॥

धूमिका मधुहा चेति प्रसहा मृगपक्षिण:।

प्रसह मग---गाय, गधा, खच्चर, ऊँट, घोड़ा, द्वीपि ( चीता ), सिंह, भालू, बिलाव, चूहा, बाघ,

व॒क ( भेड़िया ), नेवला, तरक्षु ( लकड़बग्घा ), लोमड़ी तथा सियार | पक्षी---श्येन ( बाज ), चाष ( नीलकण्ठ ),

वान्ताद ( कुत्ता ), कौआ, चील, भास, कुरर, गिद्ध, उल्लू, कुलिंगक, धूमिक तथा मधुहा नामक पक्षी

प्रसह कहे जाते हैं।। ४८-४९॥

वक्तव्य---ऊपर ४८वें श्लोक का यह उत्तरार्ध चाषवान्तादवायसाः कुछ खटक रहा है, क्योंकि

यहाँ पक्षियों के बीच' में कुत्ता का समावेश कर दिया है। यही स्थिति अ.सं.सू. ७।७८ की भी है। वास्तव

में वान्‍्ताद की गणना अन्वयविधि से कर भी ली जाती तो यहाँ सम्पूर्ण पंक्ति ही समस्त है, अस्तु। भीड़

में मनुष्य भी इधर-उधर भटक जाते हैं, पशु-पक्षियों का तो कहना ही क्‍या है ?

वराहमहिषन्यड्कुरुरुरोहितवारणाः ॥ ५०॥।

सुमरश्चमरः: खड़गो गवयश्व महामृगाः।

महामृग-परिचय---सूअर, भैंसा, न्‍्यंकु (बारहसिंगा का भेद ), रुर, रोहित, हाथी, समर ( हरिण

भेद ), चमर, गैंडा तथा गवय ( जंगली गाय )--ये महामृग कहे जाते हैं।। ५० ॥

हंससारसकादम्बबककारण्डवप्लवाः ॥ ५१॥

बलाकोत्क्रोशचक्राह्मद्ुक़रौड्चादयो 5प्चरा: ।

जलचर पक्षी--हंस, सारस, कादम्ब, बक ( बगुला ), कारण्डव, प्लव, बलाका, उत्क्रोश, चकवा,

मद्गु ( जलकौआ ), क्रौज्च आदि पक्षी 'जलचर' कहे जाते हैं।। ५१ ॥

मत्या. रोहितपाठीनकूर्मकुम्भीरकर्कटा: | ५२॥

शुक्तिशड्डरेद्रशम्बूकशफरीवर्मिचन्द्रिका-। . चुल॒कीनक्रमकरशिशुमारतिमिड्धिला: | ५३॥

राजीचिलिचिमाद्या श्व---

मत्स्य-परिचय---रोहू, पाठीन, कछुआ, कुम्भीर, केकड़ा, शुक्ति ( सीपी ) का क्रिमि, शंख का क्रिमि,

उद्र ( जलबिलाव ), शम्बूक ( घोंघा ), शफरी (छोटी जाति की मछली ), वर्मी, चन्द्रिका, चुलुकी, नक्र

( घड़ियाल ), मकर, शिशुमार, तिमिंगिल ( हल मछली ), राजी तथा चिलचिम आदि मत्स्यवर्ग में परिगणित

हैं। ५२-५३॥

--मांसमित्याहरष्टधा।

( मृग्यं वेष्किरिक किज्च प्रातुद॑ च बिलेशयम्‌।

प्रासह च महामग्यमप्चर मात्स्यमष्टधा | १॥ )

आठ प्रकार के मांस---१. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद, ४. बिलेशय, ५. प्रसह, ६. महामृग; ७. जलचर

पक्षी तथा ८. मत्स्यवर्ग ॥ १॥

वक्तव्य---यहाँ 'जलचर' नाम से कुछ पक्षियों का वर्णन किया गया है, उसके बाद “मत्स्यमांस'

का उल्लेख है। मछलियाँ जलज, जलेचर तथा जलेशय होती हैं; किन्तु इनमें 'चिलचिम' नामक मछली

ब्रह्मरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१९

का वर्णन करके ने इस प्रकार दिया है—'स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः उग्रो भूमौ चरति' । ( च.सू. २६।८३ ) यह इसकी आकृति का परिचय है और यह प्रायः भूमि में चरती है अर्थात् पानी से हटकर भी जीवित रहती है, यह इसकी विलक्षणता है।

योनिष्वजावी व्यामिश्रगोचरत्वादनिश्चिते ॥५४॥

बकरी-भेड़ का वर्णन—बकरी तथा भेड़ की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) के सम्बन्ध में निश्चित रूप में यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों जांगल तथा आनूप देश में विचरण करती रहती हैं ॥५४॥

आद्यान्या जाङ्गलानूपा मध्ये साधारणो स्मृतौ ।

शेष प्राणियों का निर्णय—शेष मांसयोनियों का निश्चय इस प्रकार है—प्रारम्भ के तीन वर्ग ( १. मृग, २. विष्किर, ३. प्रतुद ) जांगल देश के और अन्तिम तीन वर्ग ( १. महामृग, २. जलचर पक्षी तथा मत्स्य ) आनूप देश के कहे जाते हैं तथा मध्यम दो वर्ग ( १. बिलेशय तथा २. प्रसह ) वाले दोनों लक्षणों से युक्त साधारण देश के माने जाते हैं।

तत्र बद्धमलाः शीता लघवो जाङ्गला हिताः ॥५५॥

पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ।

मांसों का वर्णन—उक्त मांसों में जांगल देश के प्राणियों के मांस मल को बांधते हैं, शीतवीर्य, पित्त में लघु तथा हितकर होते हैं। ये पित्त-प्रधान, मध्यम वात एवं हीन कफ वाले सन्निपात में हितकारक होते हैं ॥५५॥

दीपनः कटुकः पाके ग्राही रूक्षो हिमः शशः ॥५६॥

शशकमांस के गुण—खरोंश का मांस जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, विपाक में कटु, ग्राही मल को बांधने वाला ), रूक्ष तथा शीतवीर्य होता है ॥५६॥

ईषदुष्णगुरुस्निग्धा बृहणा वर्तकादयः । तितिरिस्तेष्वपि वरो मेधाग्निबलशुक्रकृत् ॥५७॥

ग्राही वष्योंऽनिलोद्भिरुत्सन्निपातहरः परम् ।

वर्तक आदि के मांस—ये कुछ उष्णवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध तथा पुष्टिकारक होते हैं। इन मांसों में तीतर का मांस उत्तम होता है, क्योंकि यह घ्राण करने की शक्ति वाली बुद्धि, बल तथा शुक्र ( वीर्य ) को बढ़ाता है एवं मल को बांधता है, मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है और वातदोष-प्रधान सन्निपात का विनाशक है ॥५७॥

नातिपथ्यः शिखी पथ्यः श्रोत्रस्वरवयोदृशम् ॥५८॥

मोर का मांस—मोर का मांस अधिक पथ्यकारक नहीं होता, तथापि कर्णन्द्रिय, स्वरवाही प्रोत्स, वृत्त तथा दृष्टि को स्थिरता प्रदान करता है ॥५८॥

तद्वच्च कुक्कुटो वृष्यः—

कुक्कुट का मांस—कुक्कुट का मांस भी मोर के मांस के समान गुण वाला होता है और यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) भी होता है।

—ग्राम्यस्तु श्लेष्मलो गुरुः ।

पालतू मूर्गा का मांस—ग्राम्य ( पालतू ) मूर्गा का मांस वन में होने वाले मूर्गा के मांस से कफकारक तथा गुरु होता है।

मेधाऽनलकरा हृद्याः क्रकराः सोपचक्रकाः ॥५९॥

१००

अष्टाङ्गहृदय

क्रकर तथा उपचक्रक के मांस—ये मेधा (धारणाशक्ति) को बढ़ाने वाले, जठराग्नि को तेज करने वाले तथा हृदय के लिए हितकारक होते हैं ॥ ५९ ॥

गुरुः सलवणः काणकपोतः सर्वदोषकृत् ।

काणकपोतक का मांस—जंगली कबूतर का मांस पाचन में गुरु, कुछ नमकीन रस वाला तथा वात आदि तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है।

चटकाः श्लेष्मलाः स्निग्धा वातघ्नाः शुक्रलाः परम् ॥ ६० ॥

चटक का मांस—यह मांस कफकारक, चिकना, वातदोषनाशक तथा शुक्र को अत्यन्त बढ़ाने वाला होता है ॥ ६० ॥

गुरुष्णस्निग्धमधुरा वर्गाश्चातो थ्योत्तरम् । मूत्रशुक्रकृतो बल्या वातघ्नाः कफपित्तलाः ॥ ६१ ॥

आठों मांसों का वर्णन—उक्त आठों मांस अपने क्रम से उत्तरोत्तर गुरु, उष्ण, चिकने तथा मधुर होते हैं। ये मूत्रवर्धक, शुक्रवर्धक, बलवर्धक, वातनाशक एवं कफ-पित्तकारक होते हैं ॥ ६१ ॥

शीता महामृगास्तेषु क्रव्यादप्रसहाः पुनः । लवणानुरसाः पाके कटुका मांसवर्धनाः ॥ ६२ ॥

जीर्णार्शोग्रहणीदोषशोषार्तानां परं हिताः ।

महामृगों के मांस—उनमें भी महामृगों के मांस शीतवीर्य होते हैं। क्रव्यादों (कच्चा मांस बनने वाले प्राणियों) के तथा प्रसहों (जो दूसरे से लूटकर खा जाते हैं, उन) के मांस कुछ नमकीन स्वाद वाले, विपाक में कटु तथा मांस को बढ़ाने वाले होते हैं। ये पुराने अशरिरों, ग्रहणीरोग तथा शोष (राजयक्ष्मा) रोग से पीड़ितों के लिए अत्यन्त हितकारक होते हैं ॥ ६२ ॥

नातिशीतगुरुस्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६३ ॥

शरीरधातुसामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् ।

बकरा का मांस—यह मांस समशीतोष्ण होता है, अतएव कहा गया है कि यह अतिशीत नहीं होता, अतिगुरु एवं अतिसनिग्ध भी नहीं होता; इसीलिए यह किसी दोष-विशेष को नहीं बढ़ाता। यह मनुष्य के शरीर की रस आदि धातुओं के समान होने के कारण अभिष्यन्दी भी नहीं है। यह सभी धातुओं को बढ़ाता है ॥ ६३ ॥

विपरीतमतो ज्ञेयमाविकं बृंहणं तु तत् ॥ ६४ ॥

भेड़ का मांस—भेड़ का मांस बकरे के मांस के गुणों से विपरीत गुणों वाला होता है, किन्तु इस भी शरीर की धातुओं को बढ़ाता है ॥ ६४ ॥

शुष्ककासश्रमाल्यप्रिविषमज्वरपीनसान् । काश्यं केवलवातांश्च गोमांसं सत्रियच्छति ॥ ६५ ॥

गाय का मांस—गाय के मांस का सेवन करने से सूखी खांसी, श्रम (थकावट), अत्यग्नि (भस्मरोग), विषमज्वर, पीनस, कृशता तथा केवल (शुद्ध) वातरोगों का विनाशक होता है ॥ ६५ ॥

वक्तव्यं—सुश्रुत ने गोमांस के गुणों में एक गुण 'पवित्र' भी दिया है, जो विचारणीय है। देखें—सू. न. ४६।८९। चरक ने भी प्रायः उक्त गुणों का ही वर्णन किया है। देखें—च.सू. २।७।७९। किन्तु इन्होंने 'गोमांसं मृगमांसानाम्' (च.सू. २।५।३९) कहकर सभी मृगमांसों में इसे अधिक अप्यर्थ कहा है और वाग्भट ने भी 'निन्दितो गोः' (अ.सं.सू. ७।१०८) कहकर अपना अभिप्राय प्रकट किया है।

उष्णो गरीयान्महिषः स्वप्नदाडर्घबृहत्स्वकृत् ।

भैंसा का मांस—यह अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त गुरु, पर्याप्त नींद लाने वाला, शरीर को दृढ़ करने वाला तथा पुष्टिकारक होता है।

ब्रह्मवैवर्तविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१०१

तद्वद्वराहः श्रमहा रुचिशुक्लबलप्रदः ॥ ६६ ॥

सूअर का मांस—सूअर का मांस भी भैंसे के मांस के समान गुण-धर्म वाला होता है। यह शारीरिक बलप्रद का दूर करता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है, वीर्यवर्धक तथा बलप्रद होता है ॥ ६६ ॥

मत्स्याः परं कफकारः—

मत्स्य का मांस—सभी प्रकार की मछलियों का मांस अत्यन्त कफकारक होता है।

—चिलिचीमस्त्रिदोषकृत ।

चिलिचिममत्स्य का मांस—चिलिचिम नामक मछली का मांस त्रिदोषकारक होता है।

बक्त्य—पक्षियों में चमगादड़ और मछलियों में चिलिचिम जब जिधर मौका लगता है, उधर के गे बाते हैं। चमगादड़ पंख होने के कारण पक्षियों में और दांत होने के कारण मुग आदि पशुओं में सम्मिलित हो जाता है। इसी प्रकार चिलिचिम जलचर तथा थलचरों में सम्मिलित हो जाता है। ऐसे लोगों के चरित्र का गुण-धर्म दूषित होते ही हैं।

लावरोहितगोघैणाः स्वे स्वे वर्गे वराः परम् ॥ ६७ ॥

लाव आदि का वर्णन—अपने-अपने वर्ग में इन प्राणियों के मांस उत्तम माने गये हैं, होते भी हैं। यथा—विष्किर वर्ग में 'लाव' पक्षी का मांस, मत्स्य वर्ग में 'रोहित मछली' का मांस, बिलेशय वर्ग में गोधा (गोह) का मांस और मृगवर्ग में 'एण' (हरिण) का मांस ॥ ६७ ॥

बक्त्य—अनूप देशवासी अथवा नदियों के तटवर्ती वे लोग जो सदा अन्न के स्थान पर मछलियों का ही आहार करते हैं। वे अपने को मांसाहारी स्वीकार नहीं करते। वे इन्हें फल या शाक के रूप में नकार करते हैं और मछलियों को वे 'जलतोरेई' संज्ञा देते हैं।

मांसं सद्योहृतं शुद्धं वयःस्थं च भजेत्—

भक्ष्य मांस-वर्णन—तत्काल मारे गये, जवान प्राणी के शुद्ध (साफ किये गये) मांस का सेवन करना चाहिए।

—त्यजेत् । मृतं कृशं भूशं मेघं व्याधिवारिविर्घैर्हतम् ॥ ६८ ॥

अभक्ष्य मांस-वर्णन—स्वयं मरे हुए, अत्यन्त कृश हो, जो मृत प्राणी अधिक मेदस्वी हो या रोग-विशेष के कारण मरा हुआ हो, जल में डूबने से मरे प्राणी के अथवा विष के कारण जो मरा हो, ऐसे प्राणियों का मांस न मांसने का सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ६८ ॥

बक्त्य—गाय के मांस को बेचने वाला बूचड़ तथा अन्य सभी प्रकार के मांसों को बेचने वाला कहा जाता है। अथवा ये दोनों ही कसाई हैं। ये भक्ष्य (हितकर), अभक्ष्य (अहितकर) दोनों प्रकार के मांसों को बेचते हैं। अतः मांसभक्षण करने वाले सावधान रहें। रोगी प्राणियों का मांस खा लेने से बचने वाले व्यक्ति को वे सभी रोग हो जाते हैं जिनके कारण उस प्राणी की मृत्यु हुई थी। प्रायः ये अन्विष्टता बीमार पशुओं को सस्ते दामों में खरीद कर उन्हें मारकर उनका मांस बेच दिया करते हैं।

पुंस्त्रियोः पूर्वपश्चाद् गुरुणी, गर्भिणी गुरुः । लघुयोरपिचतुष्पात्सु, विहङ्गेषु पुनः पुमान् ॥ ६९ ॥

शिरःस्कन्धोरूपुष्टस्य कटघाः सक्श्नोश्च गौरवम् । तथाऽऽमपक्वाशययोर्यापूर्व विनिर्दिशेत् ॥

शोणितप्रभृतीनां च धातूनामृतरोत्तरम् । मांसाद्वरीयो वृषणमेद्वृक्कयकुदुदम् ॥ ७१ ॥

इति मांसवर्गः ।

विशिष्ट अवयवों के मांस—पुरुषों के शरीर के पूर्वाधं भाग का और स्त्रियों के शरीर के उत्तरार्ध का मांस गुरु होता है। गर्भिणी स्त्री का मांस भी गुरु होता है। चौपायों में पुरुष प्राणी की तुलना

१०२

अष्टाङ्गहृदये

में स्त्रियों का मांस अधिक गुरु होता है। इसके विपरीत पक्षियों में स्त्री से पुरुष पक्षी का मांस अधिक गुरु होता है। यहाँ तक स्त्री-पुरुष के शरीर के अवयवों के मांस की गुरु-लाघव चर्चा हो गयी।

अब शरीर के अवयवों की चर्चा प्रस्तुत है। सिर, कन्धे, ऊरुओं, पीठ, कमर, टाँगों, आमाशय तथा पक्वाशय का मांस पूर्व-पूर्व अर्थात् अन्तिम से पहला, फिर उससे पहला—इस क्रम से गुरु होता है और रक्त आदि धातु भी उत्तरोत्तर गुरु होते हैं। यथा रक्त से मांस गुरु होता है। मांस से भी अधिक गुरु वृष (अण्डकोष), मेद (पुरुष की मूत्रेन्द्रिय), वृक्क (गुरदे), यकृत तथा गुदभाग का मांस उत्तरोत्तर गुरु होता है ॥ ६९-७१ ॥

वक्तव्य —इस वर्ग में मांसधातु के गुण-दोषों का विवेचन किया गया है। यह सम्पूर्ण सूष्ठि गुण-दोषमय है। 'मांसात्मांसं प्रबद्धते' अर्थात् मांस खाने से मांस बढ़ता है। ऐसा देखा भी जाता है, यह शास्त्रवचन भी है। ऐसा भी नहीं कि मांस खाने वाले ही हृष्ट-पुष्ट होते हों, शाकाहारी भी स्वस्थ, हृष्ट तथा प्रसन्न रहते ही हैं। मांसभक्षण सिंह आदि प्राणियों का धर्म है। प्राणियों में सद्भावना रखने के क्षेत्र में अहिंसा का प्रमुख स्थान है, अस्तु। मांसभक्षण जिह्वा के स्वाद का 'मिथ्यायोग' है। इन्द्रियों का वशीभूत मानव सत्-असत् सभी कर्मों को करता है। वास्तव में यह आयुर्वेद किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष का न होकर मानव मात्र को स्वास्थ्य-सन्देश देने वाला एक प्रमुख शास्त्र है।

अथ शाकवर्गः

शाकं पाठाशठीसूषासुनिषण्णसतीनजम्। त्रिदोषध्नं लघु ग्राहि सराजक्षववास्तुकम् ॥ ७२ ॥

शाकों का वर्णन —अब यहाँ से कतिपय शाकों का वर्णन किया जा रहा है—पाठा, शठी (कचूर), सूषा (कासमर्द या कसौर्दों), सुनिषण्ण (चौपतिया), सतीनज (तीनी), राजक्षव (नकछिकनी) तथा बथुआ—ये सभी शाक त्रिदोषनाशक, लघु एवं ग्राही होते हैं ॥ ७२ ॥

वक्तव्य —ऊपर संक्षेप से कतिपय शाकों का वर्णन किया गया है, इसके आगे प्रायः उन्हीं का स्वतन्त्र रूप में विस्तार से वर्णन किया है। शाकभेद —१. पत्र, २. पुष्प, ३. फल, ४. नाल, ५. कन्द और ६. संखेदज—इस प्रकार शाकों के छः भेद होते हैं। ये उत्तरोत्तर एक-दूसरे से गुरु होते हैं, शास्त्रों में शाकों की निन्दा लिखी है। यथा—'शक्निन रोगा वर्धन्ते' (चा. नीति) और यह भी कहा है—ये त्रिष्टम्भी, गृहपाकी, रूक्ष आदि भी होते हैं। फिर भी ये प्रतिदिन खाये जाते हैं, अतः इन्हें सामान्य वचन समझना चाहिए अर्थात् इनका अधिक सेवन न करें।

सुनिषण्णोऽश्रिकृद्वृष्यस्तेषु—

सुनिषण्णक का वर्णन —सुनिषण्णक (चौपतिया) का शाक उक्त सभी शाकों में अग्रि्वर्धक तथा वीर्यवर्धक होता है।

वक्तव्य —इस शाकवर्ग में कहे गये सभी शाकों के पर्याय निषण्टु-ग्रन्थों में देखें।

—राजक्षवः परम्। ग्रहण्यशौविकारज्ः—

राजक्षव का वर्णन —राजक्षव (नकछिकनी) का शाक ग्रहणीरोग तथा अशौरोग का नाश करने वाले शाकों में उत्तम होता है।

—वर्चोर्भेदि तु वास्तुकम् ॥ ७३ ॥

वास्तुक का वर्णन —वास्तुक (बथुआ) का शाक बंधे हुए मल का भेदन कर निकालने में उत्तम होता है ॥ ७३ ॥

हन्ति दोषत्रयं कुष्ठं वृष्या सोष्णा रसायनी। काकमाची सरा स्वर्षा—

अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१०२

काकमाची का वर्णन—काकमाची ( मकोय की पत्तियों ) का शाक तीनों दोषों का शमन करने वाला, कुष्ठरोग का विनाशक, वीर्यवर्धक, कुछ उष्णवीर्य, रसायन गुणों से युक्त, सर ( मल को सरकाने वाला ) तथा स्वरयन्त्र के लिए हितकर होता है।

—चाङ्क्यैर्यस्माऽग्निदीपनी ॥ ७४ ॥

ग्रहण्यशौडनिलश्लेष्महितोष्णा ग्राहिणी लघुः ।

चांगेरी ( तिपतिया ) का शाक—यह स्वाद में अम्ल, अप्रिवर्धक, ग्रहणीरोग, अशौरीरोग, वातविकार तथा कफविकार नाशक होता है। यह उष्णवीर्य, मल को बाँधने वाला और लघु ( शीघ्र पचने वाला ) होता है ॥ ७४ ॥

बक्तव्य—सुनिषण्णक और चांगेरी के आकार में क्रमशः चार पात और तीन पात का अन्तर है, वे दोनों पत्रशाक हैं।

पटोलसप्तलारिष्टशाङ्गुष्ठाबलुजाऽमृताः ॥ ७५ ॥

वेत्राग्रबृहतीवासकुतिलीतिलपर्णिकाः । मण्डूकपर्णीककौटकारवेल्कपर्यताः ॥ ७६ ॥

नाडीकलयागोजिह्वावार्तिकं वनतिक्तकम् । करीरं कुल्कं नन्दी कुचैला शकुलादनी ॥ ७७ ॥

कटिलं केम्बुकं शीतं सकोशातककर्कशम् । तिक्तं पाके कटु ग्राहिं वातलं कफपित्तजित् ॥ ७८ ॥

पटोल आदि शाक—पटोल ( परबल ), सप्तला ( सातला ), अरिष्ट ( नीम ), शाङ्गुष्ठा ( काकतिक्ता —चक्रपाणि ), अबलुजा ( बाकुची के पत्ते, फलियाँ तथा बीज ), अमृता ( गिल्लेय या गुरुच के पत्ते ), वेत्राग्र ( बेंत के नये अंकुर ), बृहती ( वनभण्टा ), वासा ( अडूसा ), कुन्तली ( छोटा तिल-विशेष का पौधा ), तिलपर्णिका, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मीभेद के पत्ते ), कर्काट ( ककोड़ा का फल ), कारवेल्क ( करेला ), पर्यट ( पित्तापड़ा ), नाडी ( नाडीशाक ), कलया ( मटर ), गोजिह्वा ( गाजवाँ ), वार्तिक ( गैंगन ), वनतिक्तक ( पथ्यसुन्दर अर्थात् हरीतिकी—चक्र.टी.च.सू. २७।१५ ), करीर ( कैर के फल या बीस के अंकुर ), कुल्क ( छोटा जंगली करेला ), नन्दी ( पारसपीपल के पत्ते ), कुचैला ( काली पाठा ), शकुलादनी ( कुटकी ), कटिल ( दीर्घपत्रा पुनर्ना ), केम्बुक ( करमू ), कोशातक ( कुतबेधन तरोई ) और कर्कश ( स्वरूपककोटकः—चक्र. कबीला के पत्र )—ये द्रव्य शीतवीर्य, स्वाद में तिक्त, पाक में कटु हैं, मल को बाँधने वाले हैं, वातकारक, कफ तथा पित्त दोषशामक हैं ॥ ७५-७८ ॥

बक्तव्य—ऊपर जिन २८ शाकों के नाम गिनाये गये हैं, उनमें अनेक परिचय की दृष्टि से विवादास्पद हैं, अतएव कोई टीकाकार किसी द्रव्य का कोई पर्याय दे रहा है तो कोई कुछ। यह विवाद औषधद्रव्य-विशेषज्ञों के सामूहिक निर्णय की अपेक्षा रहता है। विशेषज्ञ भी वे हैं जो पूर्वाग्रह या दुर्ग्राह से ग्रस्त न हों, क्योंकि विगृह्यसम्भाषा से निर्णीत विषय सिद्धान्त रूप में परिणत नहीं हो पाते। ऐसा ही एक द्रव्य है—वनतिक्तकम्। आचार्य चक्रपाणि इसे पथ्यसुन्दरम्, श्री अरुणदत्त बत्सकः, श्री हेमाद्रि किराततिक्तम्, शब्दमाला—हरीतकी, वैद्यकनि—लोघ्रवृक्ष तथा रत्नमाला—वनतिक्तायां, पाठायाम्। इसी प्रकार अन्य अनेक द्रव्य हैं।

हृद्यं पटोलं कुमिनुत्वादुपाकं रुचिप्रदम्।

परबल का शाक—यह हृदय के लिए हितकारक, क्रिमिनाशक, पाक में मधुर तथा भोजन के प्रति रुचि ( इच्छा ) को उत्पन्न करता है।

पित्तलं दीपनं भेदि वातन्नं बृहतीद्वयम् ॥ ७९ ॥

बृहतीद्वय का वर्णन—वनभण्टा तथा कण्टकारी के फलों का शाक पित्तवर्धक, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, मलभेदक तथा वातनाशक होता है ॥ ७९ ॥

वृषं तु वमिकासन्धं रक्तपित्तहरं परम्।

१०४

अष्टाङ्गहृदये

अहूसा का वर्णन—अहूसा के पत्तों का शाक वमन, कास ( खाँसी ) तथा रक्तपित्तरोग का नाश करने में उत्तम होता है।

कारवेलें सकटुकं दीपनं कफजित्यरम् ॥८०॥

करेला का शाक—यह कुछ कटु ( तित्तरस युक्त ), अग्निदीपक तथा कफनाशक द्रव्यों में उत्तम है ॥८०॥

बक्तव्य—लोलिम्बराज ने करेला का आलंकारिक वर्णन किया है। देखें—वैद्यावतंस।

वार्ताकं कटुं तित्तलोष्णं मधुरं कफवातजित्। सक्षारमग्निजननं हृदं रूच्यमपित्तलम् ॥८१॥

बैगन का शाक—यह दो प्रकार का होता है—१. कटु तथा तित्त, २. मधुर। दोनों प्रकार के बैगन उष्णवीर्य, कफ तथा वात नाशक होते हैं। इनमें कुछ क्षार अंश भी होता है। ये जठराग्नि को बढ़ाने वाले, हृदय के लिए हितकर, रक्तकारक तथा कुछ पित्तकारक भी होते हैं ॥८१॥

बक्तव्य—‘अपित्तलम्’—यहाँ पित्त शब्द के साथ जो नज्रसमास किया गया है, वह ‘ईषत्’ अर्थ में है, ऐसा समझना चाहिए। श्रीहेमाद्रि कहते हैं—‘अपित्तलत्वं बालपक्वव्यतिरेकेण’। यहाँ श्रीहेमाद्रि ने सुश्रुतसम्मत व्याख्यान किया है। देखें—‘जीर्ण सक्षारपित्तलम्’। ( सु.सू. ४६।२६९ )

करीरमाध्मानकरं कषायं स्वादुं तित्तकम्।

करीर का शाक—यह आध्मान ( अफरा ) कारक होता है, रस में कषाय, मधुर तथा तित्त होता है।

कोशातकाबल्यजकौ भेदिनावग्निदीपनौ ॥८२॥

तोरई तथा बाकुची का शाक—ये दोनों बंधे हुए मल का भेदन करने वाले तथा अग्निदीपक होते हैं ॥८२॥

तण्डुलीयो हिमो रूक्षः स्वादुपाकरसो लघुः। मदापेतविषाघ्नः—

तण्डुलीय ( चीलाई ) का शाक—यह शीतवीर्य, रूक्ष, रस तथा पाक में मधुर एवं लघु होता है। यह मदविकार ( मदात्यय ), पित्तविकार, विषविकार तथा रक्तविकार ( विशेषकर रक्तप्रदर ) का विनाश करता है।

—मुञ्जातं वातपित्तजित् ॥८३॥

स्निग्धं शीतं गुरुं स्वादुं बृंहणं शुक्रकृत्परम्।

मुञ्जातक ( कन्द-विशेष ) का शाक—यह वात तथा पित्तविकारों का नाशक होता है; स्निग्ध, शीत, गुरु, स्वाद में मधुर, शरीर को पुष्ट करने वाला तथा शुक्रवर्धक होता है ॥८३॥

गुर्वी सरा तु पालङ्ग्या—

पालक का शाक—यह गुरु होने के कारण देर में पचता है तथा मलभेदक होता है। देशभेद से इसका स्वादभेद भी देखा जाता है।

—मदघ्नी चाप्युपोदिका ॥८४॥

उपोदिका ( पोई ) का शाक—यह भी गुरु एवं सर गुणों से युक्त होती है तथा मद का नाश भी करती है ॥८४॥

पालङ्ग्यावत्स्मृतश्चञ्चुः स तु सङ्ग्रहणात्मकः।

चञ्चु का शाक—इसके सामान्य गुण पालक के समान होते हैं। इसका विशेष गुण है—ग्राही होना।

अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१०५

वक्तव्य —करीर या करील को 'क्रकरीपत्र' भी कहा गया है। यह अन्य वृक्षों की भाँति बहुत पत्तों वाला नहीं होता, तथापि इसकी नवीन शाखाओं में विरल पत्ते होते हैं। निषण्टुकारों ने इसे 'मरुभूरुह' कहा है। इसकी कली तथा फलों का अचार भी बनता है। औषधीय उपयोग में इसकी कली, फल एवं झाल लिये जाते हैं। मुञ्जातक —एक कन्द-विशेष का नाम है, इसके गुण राजनिषण्टु में देखें। इसके अभाव में तालमञ्जा का प्रयोग किया जाता है। सु.सू. ३९।९ में कफनाशक द्रव्यों में इसका भी परिगणन किया गया है।

विदारी वातपित्तध्नी मूत्रला स्वादुशीतला ॥ ८५ ॥

जीवनी बृंहणी कण्ठचा गुर्वी वृष्या रसायनम्।

विदारी ( बिलाई ) कन्द —यह वात-पित्तनाशक, मल-मूत्र को निकालने वाला, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, जीवनीय शक्ति को देने वाला, स्वास्थ्यवर्धक, कण्ठ के लिए हितकर, पाचन में गुरु, वीर्यवर्धक तथा रसायन होता है। ८५ ॥

वक्तव्य —इसकी सुदीर्घ लताएँ होती हैं, उनकी जड़ों में गाँठ के रूप में यह कन्द पाया जाता है। छिलका उतारने पर दूध जैसा सफेद द्रव इसमें से निकलता है। यह खाने में आरम्भ में अत्यन्त मधुर किन्तु अन्त में कुछ कसैलापन इसमें पाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह जाड़े का मेवा है। वर्षभर के बाद इनका स्वाद वैसा नहीं रह जाता।

चक्षुष्या सर्वदोषध्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ८६ ॥

जीवन्ती का शाक —यह दृष्टि के लिए हितकर, त्रिदोषनाशक, मधुर तथा शीतवीर्य है। ८६ ॥

कृष्माण्डतुम्बकालिङ्गककाँवरितिण्डिशम्। तथा त्रपुसचीनाकचिर्भट कफवातकुत्त ॥ ८७ ॥

भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरसं गुरु।

कृष्माण्ड आदि का वर्णन —कृष्माण्ड ( कोहड़ा, पेठा ), तुम्ब ( जिसकी साधु लोग तुम्बी या कमण्डलु बनाते हैं ), कालिंग ( तरबूज ), कर्कारि ( खरबूजा ), उर्वरि ( ककड़ी या खीरा ), तिण्डिश ( टिंटे ), त्रपुस ( बड़ा खीरा ), चीनाक ( चीना ककड़ी ) और चिर्भट ( फूट )—ये सभी कफकारक, वातकारक, मलभेदक, विष्टम्भी, अभिष्यन्दी, विपाक तथा रस में मधुर एवं गुरु होते हैं। ८७ ॥

वल्लीफलानां प्रवरं कृष्माण्डं वातपित्तजित् ॥ ८८ ॥

बस्तिशुद्धिकरं वृष्यम्—

कृष्माण्ड ( कोहड़ा ) के गुण —लताओं में फलने वाले उक्त सभी फलों में कृष्माण्ड उत्तम माना गया है। यह वात तथा पित्त विकार का शमन करता है, बस्ति ( मूत्राशय ) को शुद्ध करता है और वीर्य को बढ़ाता है। ८८ ॥

—त्रपुसं त्वतिमूत्रलम्।

त्रपुस का वर्णन —त्रपुस ( बड़ा खीरा ) कृष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रकारक होता है।

तुम्बं रुक्षतरं ग्राहि कालिङ्गैर्वारिचिर्भटम् ॥ ८९ ॥

बालं पित्तहरं शीतं विद्यात्यक्वमतोऽन्यथा।

तुम्ब या तुम्बा ( गोल लौआ या लौकी ) —तरबूज, ककड़ी, फूट ये सब अत्यन्त रुक्ष तथा मल को बाँधने वाले होते हैं। ऊपर कहे गये फल जब तक बाल ( मुलायम ) रहते हैं तब तक इनका गुण पित्तनाशक होता है और ये शीतवीर्य होते हैं। जब ये पक जाते हैं, तब पित्तकारक एवं उष्णवीर्य हो जाते हैं। ८९ ॥

१०६

अष्टाङ्गहृदय

शीर्णवृन्तं तु सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ॥१०॥ रोचनं दीपनं हृद्यमष्ठीलाऽऽताहनुल्लघु ।

शीर्णवृन्त-फलशाक—शीर्णवृन्त ( जो शाकफल अपने डण्डल से अलग हो गया हो ) शाक कुस खरापन, पित्तकारक, कफद्रोष तथा वातद्रोष का विनाशक, रुचिकारक, जठराग्निदीपक तथा हृदय के लिए हितकर होता है। यह वाताष्ठीला तथा आनाह ( अफरा ) रोगों का विनाशक एवं लघु होता है ॥१०॥

वक्तव्य—यहाँ 'शीर्णवृन्त' शब्द से भलीभाँति पके हुए फल का ग्रहण करना चाहिए। जैसा कि मुभूत ने कहा है—'शुक्लं लघुणं सक्षारं दीपनं बस्तिशोधनम्' ( मु.सू. ४६।२१३ ) श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में कहते हैं—'शीर्णवृन्त' = कर्कूरम्।

शीर्णवृन्त—यहाँ इस नाम से एक शाक-विशेष का वर्णन किया गया है। 'वृन्त' शब्द का प्रयोग—फल तथा वृक्ष या लता से जुटे हुए भाग को डण्डा या डण्डल कहते हैं। शीर्ण का अर्थ है—गला हुआ। प्रायः सब फलों के वृन्त पकने पर गल या झड़ जाते हैं, किन्तु लाल कुम्हड़ा या सीताफल या कद्दू नाम का एक लताफल ऐसा होता है, जिसका वृन्त पकने पर भी अलग नहीं होता। इसे अंग्रेजी में Red gourd कहते हैं, इसका अर्थ लाल कुम्हड़ा होता है। वामभट ने श्लोक ८८ में जिस कृष्माण्ड का वर्णन किया है, वह 'पेठ की मिठाई' वाला है।

मृणालबिसशातूककुमुदोत्पलकन्दकम् ॥११॥

नन्दीमाषककेलूटभृङ्गटककसेरकम्। क्रीञ्चादनं कलोड्यं च रूक्षं ग्राहि हिमं गुरु ॥१२॥

मृणाल आदि का वर्णन—मृणाल ( कमलनाल ), बिस ( कमल की जड़ = भर्सीडा ), शातूक ( कमलकन्द ), कुमुद ( कुई ) एवं उत्पल के कन्द, नन्दी ( तुण्डिकेरी ), माषक ( वास्तुल ), केलूट ( किसक नामक उदुम्बर भेद ), भृंगटक ( सिंधाड़ा ), कसेरु, क्रीञ्चादन ( मृणाल, पिपली, घेञ्जुलक, चिञ्चोटक ) और कलोड्य ( पद्मबीज )—ये सभी द्रव्य रूक्ष, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), शीतवीर्य एवं गुरु ( देर से पचने वाले ) होते हैं ॥११-१२॥

कलम्बनालिकामार्पकुटिञ्जरकुतुम्बकम्। चिल्लीलङ्काकलोणीकाकुरुटकगवेधुकम् ॥१३॥

जीवन्तसुञ्जवेडगजयवशाकसुवर्चलाः। आलुकानि च सर्वाणि तथा सूर्यानि लक्ष्मणम् ॥१४॥

स्वादु रूक्षं सलवणं वातस्लेष्मकरं गुरु। शीतलं सूष्टविष्णूम्रं प्रायो विष्टम्ब्य जीर्यति ॥१५॥

स्विस्रं निष्पीडितरसं स्नेहादृष्टं नातिदोषलम्।

कलम्ब आदि का वर्णन—कलम्ब ( कदम्ब या करमू ), नालिका ( नालीशाक ), मार्प ( मरसा ), कुटिञ्जर ( ताम्रमूलक या तन्दुलक ), कुतुम्बक ( द्रोणपुष्पी—गूमा ), चिल्ली ( क्षारपत्रक शाक, लाल बधुआ ), लट्वाक ( गुग्गुलशाक ), लोणीका ( लोणार, सलूनक, कुलफा ), कुरुटक ( स्थितिवारक, शितिवारी ), गवेधुक ( तुणधान्य ), जीवन्त ( जीवन्ती ), सुञ्जु ( चुञ्चू ), ऐडगज ( चक्रवड ), यवशाक ( छोटे पत्तों वाली चिल्ली या जी के कोमल पत्ते ), सुवर्चल ( हलहल ), सभी प्रकार के आलू, सभी प्रकार के वे अन्न जिनकी दाने बनायी जाती हैं ( जैसे—चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर, कुलथी आदि ) और लक्ष्मण ( मुलेठी के पत्ते )—उपर्युक्त सभी शाक स्वाद में मधुर, रूक्ष, लवणरस युक्त, वात तथा कफ कारक, देर में पचने वाले, शीतवीर्य, मल-मूत्र निकालने वाले और प्रायः ये देर से पचते हैं। यदि इन्हें उबाल कर इनका रस निचोड़ कर या या तेल में भलीभाँति भूँज लिया जाता है, तो ये दोषकारक नहीं होते ॥१३-१५॥

लघुपत्रा तु या चिल्ली सा वास्तुकसमा मता ॥१६॥

चिल्लीशाक का वर्णन—चिल्ली नामक शाक दो प्रकार का होता है—१. बड़े पत्तों वाला तथा २. छोटे पत्तों वाला। इनमें से दूसरे के गुण-धर्म बधुआ के समान होते हैं ॥१६॥

अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१०७

तर्कारिवरणं स्वादु सतिक्तं कफवातजित्।

तर्कारी आदि शाक का वर्णन—तर्कारी ( अरणी ) तथा वरणा के कोमल पत्तों एवं फलों का शाक स्वाद में मधुर, कुछ तीतापन युक्त होता है। ये दोनों कफदोष तथा वातदोष नाशक होते हैं।

वर्षाभौ कालशाकं च सक्षारं कटुतिक्तकम् ॥१७॥

दीपनं भेदनं हन्ति गरशोफकफानिलात्।

पुनर्नवा एवं कालशाक—दोनों प्रकार की ( छोटी तथा बड़ी ) पुनर्नवाओं का तथा कालशाक ( काला मरसा का शाक ) कुछ खारा, स्वाद में कुछ कटु एवं कुछ तिक्त रस वाला होता है। ये दोनों शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करते ( सुलगते ) हैं, मल का भेद करके उसे निकालते हैं। दूषीविष, शोफ ( सूजन ), कफदोष तथा वातदोष का विनाश करते हैं ॥ १७ ॥

दीपनाः कफवातघ्नाश्चिरिबिल्ववाङ्कुराः सराः ॥१८॥

करंज का शाक—करंज के कोमल पत्तों या अंकुरों का शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला कफ एवं वात नाशक होता है और मल की रूकावट को दूर करता है ॥ १८ ॥

शतावर्षइंकुरास्तित्का वृष्या दोषत्रयपहाः।

शतावरी के अंकुरों का शाक—यह स्वाद में हल्का तिक्तरस वाला, वीर्यवर्धक तथा तीनों दोषों का विनाशक होता है।

बक्तव्य—शतावरी या शतावर वृष्य ( वीर्यवर्धक ) औषधों में उत्तम है। नैनीताल तथा अलमोडा आदि पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्याप्त रूप में पायी जाती है। इसके अंकुरों को पर्वतीय भाषा में 'कैरुआ' कहा जाता है। ये चैत्रमास के अन्तिम दिनों से आषाढ़ तक अधिक मात्रा में निकलते रहते हैं। आरम्भ में ये दो-चार दिनों तक सुकोमल होते हैं। इनका संग्रह कर छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सब्जी बना ली जाती है। इसे रोटी के साथ खाया जाता है। यह पौष्टिक तथा रुचिवर्धक होती है। यह अंकुरशाक है।

रुक्षो वंशकरीरस्तु विदाही वातपित्तलः ॥१९॥

वंशकरीर का शाक—बाँस के नये अंकुर का शाक—शतावरी के अंकुरों की भाँति बाँस के भी अंकुर निकलते हैं, इनका भी शाक, आचार तथा मुरब्बा बनाया जाता है। नेपाल में इसके आचार का अत्यन्त प्रचार है, वहाँ इसे 'तामा' कहते हैं। इसके गुण—यह रुक्ष, विदाहकारक तथा वातपित्तकारक होता है ॥ १९ ॥

पत्तुरो दीपनस्तितकः प्लीहार्शःकफवातजित्।

पत्तुर ( मछेछी ) का शाक—यह अग्निदीपक, स्वाद में तिक्त, कफ तथा वात दोष का नाशक है। यह प्लीहाविकार तथा अशोरीग को शान्त करता है।

कृमिकासकफोत्तलेदान् कासमर्दो ज्येत्तरः ॥१००॥

कासमर्द ( कर्तादी ) का शाक—यह क्रिमिरोग, कासरोग, कफज विकार तथा उत्कल्लेद ( शरीर में उत्पन्न गोलिपन ) को जीत लेता है। यह मलभेदक है ॥ १०० ॥

रुक्षोष्णमस्लं कौसुम्भं गुरु पित्तकरं सरम्।

कुसुम्भ का शाक—कुसुम्भ ( कुसुम ) के पत्तों का शाक रुक्ष, उष्णवीर्य, अम्ल, गुरु ( देर से पचने वाला ), पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है।

गुरुष्णं सारप्यं बद्धविष्णूत्रं सर्वदोषकृत् ॥१०१॥

सरसों के पत्तों का शाक—यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, स्वाद में कुछ अम्ल, पाचन में गुरु, मल-मूत्र की प्रवृत्ति में रूकावट डालने वाला तथा त्रिदोषकारक होता है ॥ १०१ ॥

१०८

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य —साहित्यदर्पणकार श्रीविश्वनाथ ने भी सर्पपशाक की प्रशंसा की है, परन्तु यह भी कह दिया है कि इसे ग्राम्य लोग बड़े चाव से खाते हैं—‘तरुणं सर्पपशाकं’ इत्यादि। इसे पंजाब में बड़े आदर के साथ खाया जाता है, अन्यत्र भी लोग खाते ही हैं।

यद्वालमव्यक्तसरं किञ्चित्क्षारं सतिक्तकम्। तन्मूलकं दोषहरं लघु सोष्णं नियच्छति ॥ १०२ ॥ गुल्मकासक्षयश्वासव्रणतेत्रगलामयान्। स्वराग्निसादोदावतीपीनसांश्च—

बालमूली का शाक —जो मूली कच्ची (रूढ़ न हुई हो) वह अव्यक्त रस वाली या कुछ खारापन तथा तीतापन लिये होती है। वह तीनों दोषों का नाश करती है, लघु तथा कुछ उष्णवीर्य वाली होती है। मूली गुल्म, कास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्रविकार, कण्ठविकार (स्वरभेद आदि), ज्वररोग, अग्रिमान्द्य, उदावर्त तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ १०२ ॥

—महत्पुनः ॥ १०३ ॥

रसे पाके च कटुकमृणवीर्यं त्रिदोषकृत्। गर्वभिष्यन्दि च—

वृद्धमूली का शाक —बड़ी मूली रस एवं विपाक में कटु, उष्णवीर्य, त्रिदोषकारक, देर में पचने वाली तथा अभिष्यन्दी होती है ॥ १०३ ॥

—स्निग्धसिद्धं तदपि वातजित् ॥ १०४ ॥

स्नेहसिद्ध मूली का शाक —यदि बड़ी मूली को घी में भलीभाँति पका लिया जाय तो यह वातनाशक होती है ॥ १०४ ॥

बक्तव्य —आकृतिभेद से मूली दो प्रकार की होती है—१. गोल तथा २. लम्बी। लम्बी मूली भी छोटी-बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है—१. लघुमूलक और २. नेपालमूलक। ये भी नयी एवं पुरानी भेद से पुनः दो प्रकार की होती है। गर्मियों में मिलने वाली मूली स्वाद में कटु होती है, जाड़ों में होने वाली मूली मधुर होती है। इसे नमक-मिरच लगाकर खाया जाता है। कच्ची मूली का शाक भी बनाया जाता है और सलाद के रूप में कच्चा भी खाया जाता है। इसी के भेद हैं—गाजर, चुकन्दर, सलजम आदि।

मौसम में मूली को काट कर सुखा लिया जाता है। बाद में पानी में भिगाकर इसका भी शाक के लिए प्रयोग होता है। यह सब वर्णन किसी भी जाति की बालमूली का है। जब यह रूढ़ हो जाती है, इसके भीतर जाली पड़ जाती है और बाहर का भाग कड़ा हो जाता है तब यह अग्राह्य हो जाती है। इसके विशेष गुण-धर्मों के लिए देखें—सु.सू. ४६।२४०-२४३। सुखाये सभी शाक विष्टम्भी तथा वातकारक होते हैं, केवल सुखाए हुए मूली के शाक को छोड़कर।

वातश्चलेष्महरं शुष्कं सर्वम्—

सूखी मूली का शाक —सुखायी गयी सभी प्रकार की मूलियाँ वात एवं कफ नाशक होती हैं।

—आमं तु दोषलम्।

कच्ची मूली का शाक —सभी प्रकार की कच्ची मूलियाँ वात आदि दोषकारक होती हैं।

कटूष्णो वातकफहा पिण्डालुः पित्तवर्धनः ॥ १०५ ॥

पिण्डालु नामक कन्द का शाक —यह कुछ कटु, उष्णवीर्य तथा पित्त को बढ़ाने वाला है ॥ १०५ ॥

बक्तव्य —सुश्रुत ने पिण्डालु का जो वर्णन किया है, वह उक्त बाभटोक्त गुण-धर्मों के विपरीत है। देखें—‘पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम्’। (सु.सू. ४६।३०४)

भक्तस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१०९

आयुर्वेद में 'आलुक' नाम से अनेक कन्दों का ग्रहण होता है। जैसे—१. काष्ठालुक ( कटालू )। २. शंखालुक—यह सफेदी लिये होता है, ऐसा लगता है कि बाजारों में बिकने वाला यही शंखालू ही आलू है। ३. हस्त्यालुक—बड़े-से-बड़े आकार का आलू, इसके दर्शन प्रदर्शनियों में किये जा सकते हैं। ४. पिण्डालुक—हमारी मान्यता के अनुसार यह वही है, जिसका विवेचन हमने इसी प्रकारण में आगे किया है। जो इसे 'सुथनी' मानते हैं, उन्हें इसका समावेश 'मध्वालुक' में अथवा 'रक्तालुक' में करना चाहिए, क्योंकि यह लाल तथा सफेद भेद से दो प्रकार का पाया जाता है। ५. मध्वालुक—यह आकृति से दो प्रकार का होता है—१. छोटा और २. बड़ा। इनमें छोटा छीलने पर भीतर से सफेद और बड़ा छीलने पर रक्ताभ होता है। हिन्दी में इन्हें छोटी सुथनी तथा बड़ी सुथनी कहते हैं। ६. रक्तालुक—यह भी वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। १. जंगली सफेद और २. घर में लगाया हुआ लाल रंग का। जंगली अधिक-से-अधिक १ या २ इंच गोलाई में मोटा, घरेलू ५ या ६ इंच मोटा या इससे भी अधिक। इसे तरूड़ या रतालू भी कहते हैं। इन्हीं कन्दों में एक शकरकन्द भी है। यह शक्कर की भाँति खाने में मीठा होता है, अतएव इसे 'शकरकन्द' कहते हैं।

नैनीताल तथा अलमोड़ा आदि जिलों में 'पिण्डालू' नाम से सुप्रसिद्ध एक कन्द मिलता है, जिसका शाक क्षेत्रीय लोगों को अतिप्रिय है। वहाँ इसकी खेती भी होती है। मैदानी स्थानों में इसे 'अरूई' या 'घुइयाँ' कहते हैं। ये पिण्डालू या पिनालू के उपकन्द हैं। पिण्डालू के जिस मूल अवयव को यहाँ बण्डा कहा जाता है, उसे पर्वतीय क्षेत्रों में 'गडेरी' कहते हैं। हमारे विचार से सुश्रुत ने जिस 'पिण्डालू' के गुण-धर्मों का वर्णन किया है, वह यही 'पिण्डालू' कन्द है।

कुठेरशिग्रसुरससमुखासुरिभूस्तुणम्। फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति ग्रहि शालनम्॥ १०६॥ विदाहि कटु रूक्षोष्णं हृदयं दीपनरोचनम्। वृक्षशुक्रकृमिहृतीक्ष्णं दोषोत्प्लेशकरं लघु॥ १०७॥

कुठेरक आदि शाक—कुठेरक ( बनतुलसी—बवई ), शिग्रु ( सहजन की फली ), सुरस ( काली तुलसी ), समुखा ( तुलसीभेद ), आसुरि ( राई के पत्ते ), भूस्तुण, फणिज्जक, अजक, जम्बीर आदि के पत्तों के शाक ग्राही ( मल को बांधने वाले ) तथा उत्तम होते हैं। यह विदाहकारी, स्वाद में कटु, रूक्ष, उष्णवीर्य, हृदय के लिए हितकारी, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा रुचिकारक होते हैं। ये दूषितनाशक, शुक्र तथा क्रिमि नाशक होते हैं। ये गुणों में तीक्ष्ण, वात आदि दोषों को उन्माडने वाले तथा पाचन में लघु होते हैं॥ १०६-१०७॥

वक्तव्य—'फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति' इस 'प्रभृति' शब्द से अष्टांगसंग्रह अध्याय ७ में कहे गये—धान्य, तुम्बूर, शैलये, यवानी, भुंगवेर, पण्णाश, गुंजन, अजाजी, कण्डीर, जलपिप्ली, खराशवा, काल्मालिका, दीप्यक, क्षक्कृत, द्वीपि और वस्तगन्धा का ग्रहण कर लेना चाहिए। अष्टांगहृदय में उक्त द्रव्यों को 'हरितकवर्ग' में गिना है।

हिध्माकासविषश्वासपार्थरूपृतिगन्धहा। सुरसः—

सुरसा का शाक—हिचकी, कास, विषविकार, श्वास, पार्श्वशूल ( पसलियों में पीड़ा का होना ) तथा सुख की दुर्गन्ध का विनाश करता है।

—सुमुखो नातिविदाही गरशोफहा॥ १०८॥

सुमुख नामक तुलसी का शाक—यह अधिक विदाहकारक नहीं होता है। दूषीविष तथा शोथरोग का विनाश करता है॥ १०८॥

आर्द्रिका तित्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत।

हरा धनिया का शाक—यह थोड़ा तीता तथा मधुर होता है। मूत्रल तथा पित्तकारक नहीं होता।

११०

अष्टाङ्गहृदये

लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः ॥ १०९ ॥

हृद्यः केशयो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः । भयसन्धानकृद्दुल्यो रक्तपित्तप्रदूषणः ॥ ११० ॥ किलासकुच्छगुल्माशौमेहक्रिमिकफानिलान् । स हिधमापीनसम्भासकासान् हन्ति रसायनम् ॥

लशुनकन्द का शाक—इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य होता है। इसका विपाक कटु होता है। यह सर है, हृदय के लिए तथा केशों के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभ्रम को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है। यह किलास ( श्वित्र ), कुच्छ, गुल्म, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और काम रोग का विनाश करता है। यह रसायन है ॥ १०९-१११ ॥

बक्तव्य—यहाँ लहसुन के केवल कन्द के गुण दिये गये हैं। प्रसंगवश उसके अन्य अंगों का वर्णन भी प्रस्तुत है—इसके पत्र खारे तथा मधुर होते हैं और इसका मध्यभाग अधिक मधुर एवं पिच्छिल होता है। कभी-कभी इसके मध्यभाग में भी लशुनकन्द पाये जाते हैं, औषध में इनका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। अष्टाङ्गहृदय-उत्तरस्थान ( ३९।१११-१२९ ) में इसकी विस्तृत रसायनविधि देखें। इसके अतिरिक्त 'काश्यपसंहिता' में भी इसके विविध कल्पों का अवलोकन करें।

पलाण्डुस्तदुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः ।

पलाण्डु ( प्याज ) का शाक—यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है। यह कफकारक है तथा पित्तकारक कम होता है।

कफवातार्शसां पथ्यः स्वेदेऽभव्यवहृतौ तथा ॥ ११२ ॥

तीक्ष्णो गुञ्जनको ग्राही पित्तान् हितकृत्त सः ।

गुञ्जनका शाक—यह कफविकार, वातविकार तथा अशरिग में हितकर होता है। ब्रणशोथ आदि पर इसका लेप कर के स्वेदन किया जाता है एवं शाक बनाकर इसे खाया भी जाता है। गाजर का शाक तीक्ष्ण गुणवाला, मल को बाँधने वाला तथा यह पित्तविकार वालों के लिए हितकर नहीं है ॥ ११२ ॥

बक्तव्य—वास्तव में उक्त ११२वें पद्य को 'पलाण्डु....तथा'। इस प्रकार दो पंक्तियों में पूरा होना चाहिए था। ऐसा मत श्री अरुणदत्त एवं श्रीचन्द्रनन्दन का था, किन्तु श्रीहेमद्रि का कथन है कि ये गुण-धर्म पलाण्डु के नहीं अपितु 'गुञ्जन' के हैं। अतः उक्त दो पंक्तियों को यहाँ एक साथ रखा है। वास्तव में स्वेदन के लिए 'पलाण्डु' तथा गुञ्जन दोनों का ही प्रयोग होता है। देखें—ब.सू. २७।१७४।

दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ ११३ ॥

विशेषादर्शसां पथ्यः—

सूरण का शाक—यह अग्निदीपक, हविकारक, कफनाशक, विशद ( पिच्छिलतानाशक ), लघु ( शीघ्र पचने वाला ), विशेष करके यह अशरिगियों के लिए हितकर होता है ॥ ११३ ॥

बक्तव्य—अशौनाशक 'शूरणमोदक' योग, देखें—शैषज्जरत्नावली-अशौरोगाधिकार में—१. स्वल्प-शूरणमोदक, २. बृहत्शूरणमोदक तथा अन्य अनेक योग। सूरण-परिचय—यह दो प्रकार का होता है—एक वह जिसे खा लेने से मुख तथा गले में काँटे जैसे चुभते-से प्रतीत होते हैं, दूसरा वह जो पहले की तुलना में कम कष्टकारक होता है। पाककर्मकुशल व्यक्ति दोनों की सच्ची सूखी अथवा रसेदार बनाते हैं, बड़े शौक से खायी भी जाती है। वे इसके टुकड़ों को इमली ( किसी प्रकार के अम्ल में ), चूना या फिटकिरी आदि में डालकर उबाल कर घी में भलीभाँति तलकर इसका पाक किया करते हैं। कुछ टीकाकारों ने 'सूरण' को ही भूकन्द माना है। 'कन्द' शब्द की दृष्टि से उनका सोचना उचित ही है, किन्तु 'सूरण' के उक्त गुणों के बाद उसे 'अतिदोषज' कहना कहीं तक युक्तिसंगत होगा ?

अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१११

—भूकन्दस्तत्त्वतिदोषलः ।

भूकन्द का शाक—यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है।

वक्तव्य—भूकन्द के सम्बन्ध में विद्वानों के मतभेद—कोई इसे 'जिमीकन्द', दूसरे विद्वान इसे 'मृस्रोटा' इत्यः प्रावृद्धे उद्भवः' अर्थात् यह संवेद शाक है। हिन्दी में इसे—भुईछता, खुमी आदि कहते हैं। अंग्रेजी में 'Mushroom' कहते हैं। यह वर्षाकाल में जोरदार वर्षा होने पर सहसा पैदा हो जाता है। इसका आकार छता का जैसा होता है, रंग सफेद या बादामी सफेद होता है। यह भक्ष्य (खाने योग्य) तथा अभक्ष्य (जहरीला) भेद से दो प्रकार का होता है।

पत्रे पुष्पे फले नाले कन्दे च गुरुता क्रमात् ॥ ११४ ॥

शाकों में उत्तरोत्तर गुरुता—पत्रशाकों से पुष्पशाक गुरु, इनसे अधिक गुरु फलशाक, फलशाकों में भी अधिक गुरु नालशाक (सरसों के नाल = गन्दल), इनसे भी अधिक गुरु कन्दशाक होते हैं ॥ ११४ ॥

वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि उक्त श्लोक का क्रम 'पुष्पे पत्रे' इस प्रकार चाहते हैं, क्योंकि सुश्रुत ने एक तो 'नालशाक' का ग्रहण नहीं किया है और दूसरा जहाँ श्रीहेमाद्रि 'लघवः' पाठ को उद्धृत करते हैं, वहाँ सुश्रुत ने 'गुरुवः' पाठ दिया है, जो सर्वथा युक्तियुक्त है। देखें—सु.सू. ४६।१४२। 'गुरुवः' के स्थान पर 'लघवः' शब्द का छप जाना सम्पादकीय प्रमाद प्रतीत होता है।

वरा शाकेषु जीवन्ती सारपं त्ववरं परम्।

इति शाकवर्गः ।

उत्तम-अधम-निर्णय—शाकवर्ग में परिगणित शाकों में जीवन्ती (डोड़ी) शाक उत्तम तथा सरसों की पत्तियों एवं नाल का शाक अधम माना गया है।

वक्तव्य—शाकवर्ग के आरम्भ में छः प्रकार के शाकों का परिगणन किया गया था। तदनुसार यहाँ कहा गया 'भूकन्द' संवेदज शाकों में गिना जाता है। संक्षेप में शाक-परिचय—१. पत्रशाक—बथुआ, पोई, मरसा, चौलाई आदि। २. पुष्पशाक—गोभी, अगस्तिया के फूल, केले के फूल, सेमल के फूल आदि। ३. फलशाक—पेठा, लौकी, करेला, बैगन, परवल, टिण्डा आदि। ४. नालशाक—सरसों, राई आदि के नाल। ५. कन्दशाक—मूली, सूरण (जिमीकन्द), आलू, पिण्डालू, रक्तालू, वाराहीकन्द, गेठी, तरुड़ आदि। ६. संवेदज शाक—छत्रक, खूब आदि। आचार्य खरनाद ने कहा है कि भोजन कर लेने के बाद फलों का सेवन करना चाहिए, अतः अब इसके बाद यहाँ फलवर्ग का प्रस्ताव है।

अथ फलवर्गः

द्राक्षा फलोत्तमा वृष्या चक्षुष्या सुष्टमूत्रविद ॥ ११५ ॥

स्वादुपाकरसा स्निग्धा सकपाया हिमा गुरुः। निहन्त्यनिलेपिताम्रतित्कास्यत्वमदात्ययान् ॥ तुष्णाकासश्चमध्वासस्वरभेदक्षतक्षयान् ।

द्राक्षा-परिचय—द्राक्षा (दाब या मुनकका) सब फलों में उत्तम है। यह वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर, मल-मूत्र को सुचारू रूप से निकालती है। विपाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, कुछ कपाय रसयुक्त, शीतवीर्य तथा देर में पचने वाली है। यह वात, पित्त तथा रक्त विकारों का विनाश करती है। मुख का तीतापन, मदाल्यरोग, तुष्णा (प्यास का अधिक लगना), कास, थम (थकावट), श्वास, स्वरभेद, क्षत (उरःक्षत) एवं क्षय इन रोगों का विनाश करती है ॥ ११५-११६ ॥

वक्तव्य—अंगूर आकार-भेद से दो प्रकार के होते हैं—१. छोटे, जिनके किसमिस बनाये जाते हैं और २. बड़े, जो आकार में लम्बे होते हैं, इनके मुनबके बनाये जाते हैं। फिर ये बीज वाले तथा बीज-

११२

अष्टाङ्गहृदये

रहित भेद से भी दो प्रकार के होते हैं। स्वाद-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. खट्टे और २. मीठे। वर्ण-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. काले तथा २. सफेद या हरिताभ सफेद। मुनक्का या किसमिन् बनाने के लिए इन्हें थोड़ा पकाना पड़ता है, नहीं तो ये जल्दी सुखते नहीं अपितु सड़ जाते हैं।

उद्विकृत्पित्ताज्ययति त्रीन्दोषान्स्वादु दाडिमम् ॥ ११७ ॥

पित्ताविरोधि नात्युष्णमस्मं वातकफापहम्। सर्वं हृद्यं लघु स्निग्धं ग्राहि रोचनदीपनम् ॥ ११८ ॥

दाडिम-फल का वर्णन—यह स्वादभेद से दो प्रकार का होता है—१. मधुर और २. अम्ल ( खट्टा )। मधुर दाडिम के गुण—इसी को 'अनार' कहते हैं। यह पित्त-प्रधान तीनों दोषों को शास्त करता है। खट्टा दाडिम—यह खट्टा होने पर पित्तदोष को प्रकुपित नहीं करता। यह अधिक उष्ण भी नहीं होता है। यह वात तथा कफ दोष का विनाशक होता है।

सभी प्रकार के दाडिम हृदय के लिए हितकर, शीघ्र पचने वाले, स्निग्ध, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), रुचि तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं ॥ ११७-११८ ॥

बक्तव्य—पर्वतीय क्षेत्रों में दाडिम के वृक्ष पर्याप्त रूप में पाये जाते हैं। इसके वृक्ष चिरायु होते हैं। स्थानीय लोग खट्टे तथा मीठे दाडिमों की चटनी बनाकर रख लेते हैं। इसे 'काली चटनी' कहते हैं। यह लाल, सफेद वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। इसके छिलकों को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लिया जाता है। यह चूर्ण पित्तातिसार, प्रवाहिका, काम, बालको के दांत निकलने तथा टाउन्सिल में प्रयोग किया जाता है। यद्यपि सभी अम्ल पदार्थ पित्तवर्धक तथा उष्णवीर्य होते हैं, तथापि अनार एवं आँवला फल इसके अपवाद हैं।

मोचखजूरपनसनारिकेलपुरुषकम्। आम्रतातालकाशमर्यराजादनमधूकजम् ॥ ११९ ॥

सौवीरबदराङ्गुल्लफलगुश्लेष्मातकोद्भवम्। वातामाभिपुकाओडमुकूलकनिकोचकम् ॥ १२० ॥

उरुमाणं प्रियालं च बृंहणं गुरु शीतलम्। दाहक्षतक्षयहर् रक्तपित्तप्रसादनम् ॥ १२१ ॥

स्वादुपाकरसं स्निग्धं विष्टम्भि कफशुक्रकृतं।

केला आदि फलों का वर्णन—मोच ( केले का फल ), खजूर ( खजूर या छुहारा ), पनस ( कटहल ), नारियल, पुरुषक ( फालसा ), आम्रत ( आमड़ा ), तालफल, काशमर्य ( गम्भारी का फल ), राजादन ( खिरनी ), महूआ का फल, सौवीर ( बड़ा बेर का फल ), बेर का फल, अंकोल, फलु ( गुलर ), श्लेष्मातक ( लिसोड़ा ), बादाम, अभिपुका ( पिस्ता ), अखरोट, मुकूलक ( यह भी पिस्ता की जाति है ), निकोचक ( चिलगोजा—बीज का बीज ), उरुमाण ( खुमानी या खुरमानी ) और प्रियाल ( चिरौंजी )—ये सभी फल बृंहण ( शरीर को बढ़ाने वाले ), गुरु ( देर में पचने वाले ) तथा शीतवीर्य होते हैं। दाह, क्षत ( उरु:क्षत ) तथा अन्य स्थानों में लगे घावों का शमन करते हैं। रक्त तथा पित्त को शुद्ध करते हैं। ये सभी विपाक में मधुर हैं, स्निग्ध, विष्टभकारक ( मलावरोधक ), कफ एवं शुक्रधातु को बढ़ाते हैं ॥ ११९-१२१ ॥

फलं तु पित्तलं तालं सरं काशमर्यजं हिमम् ॥ १२२ ॥

शक्रुन्मूत्रविबन्धच्छं केश्यं मेध्यं रसायनम्। वातामाशुण्णवीर्यं तु कफपित्तकरं सरम् ॥ १२३ ॥

परं वातहर् स्निग्धमनुष्णं तु प्रियालजम्। प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः ॥ १२४ ॥

कोलमज्जा गुणैस्तद्भुट्टुर्द्विः कासजिच्च सः।

ताल आदि फलों का वर्णन—ताल ( ताड़ ) का फल पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है। गम्भार का फल शीतवीर्य, मल तथा मूत्र की रूखावट को दूर करता है, बालों एवं मेधा ( धारणाशक्ति ) के लिए हितकर, रसायन गुणों से युक्त होता है। बादाम आदि फलों के गुण—ये उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, सर, वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ठ तथा स्निग्ध होते हैं, किन्तु प्रियाल ( चिरौंजी ) उष्णवीर्य नहीं होता। प्रियालमज्जा के गुण—चिरौंजी की गिरी मधुर, वीर्यवर्धक, पित्त तथा वातविकार का नाश करती

अक्षरस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

११३

है। बेर की मज्जा के गुण—इसके गुण भी प्रायः प्रियात्मज्जा के समान होते हैं, किन्तु यह तुष्णा तथा कास का विनाश करती है॥ १२२-१२४॥

वक्तव्य —'वातामादि'—यहाँ आदि शब्द से अभिप्रेत ( पिस्ता ), अखरोट, मकूलक, निकोचक ( चिलगोजा ) और उरुमाण ( खुमानी ) तक के द्रव्यों को लेना चाहिए। उरुमाण फल पर्वतीय प्रदेशों ( नैनीताल, अलमोड़ा, शिमला, मंसूरी, काश्मीर आदि ) में होता है। इसका बाहरी गूदा भी और भीतर की गिरी भी खायी जाती है, जो बादाम के आकार की तथा स्वाद में मधुर होती है। यह आकार-भेद से दो प्रकार की होती है—छोटी तथा बड़ी। बड़ी खुमानी के भीतर से निकलने वाली गिरी के ये गुण हैं।

पक्वं सुवर्जं बिल्वं दोषलं पूतिमास्तम्॥ १२५॥

दीपनं कफवातघ्नं बालं, ग्राह्यभ्यं च तत्।

बिल्ब का पका फल —पका हुआ बेल का फल बड़ी कठिनता से पचता है, दोषकारक होता है तथा इसका सेवन करने से अपानवायु दुर्गन्धयुक्त निकलता है। कच्चा बेल का फल अग्नि प्रदीप्त करता है, कफ तथा वात दोष का नाश करता है। ये दोनों प्रकार के बेल ग्राही ( मल को बांधने वाले ) होते हैं।

कपित्यमामं कण्ठघ्नं दोषलं, दोषयाति तु॥ १२६॥

पक्वं हिंश्चावमथुजित्, सर्वं ग्राहि विषापहम्।

कैथ का कच्चा फल —यह कण्ठ ( स्वरयन्त्र ) को हानि पहुँचाता है, दोषकारक होता है। कैथ का पका फल दोषशामक, हिचकी तथा वमन का विनाश करता है। दोनों प्रकार के कैथ ग्राही होते हैं और विषविकार को नष्ट करते हैं॥ १२६॥

जाम्बवं गुरु विष्टिम्भि शीतलं भुशवातलम्॥ १२७॥

सङ्ग्राहि मूत्रशकृतोरकण्ठचं कफपित्तजित्।

जामुन का फल —यह गुरु ( देर में पचने वाला ), विष्टम्भी, शीतवीर्य, वातविकार को अत्यन्त बढ़ाने वाला, मल-मूत्र को रोकने वाला, स्वरयन्त्र के लिए अहितकर, कफ तथा पित्त विकार को जीतने वाला होता है॥ १२७॥

वक्तव्य —राजजम्बू को संस्कृत में 'फलेन्द्रा' तथा हिन्दी में 'फरेना' कहते हैं। इसके अतिरिक्त जामुन के ये भेद पाये जाते हैं—शुद्रजम्बू, काकजम्बू, भूमिजम्बू तथा जलजम्बू। 'राजजम्बू का ही वर्णन महाकवि कालिदास ने मेघदूत में इस प्रकार किया है—'श्यामजम्बूवनान्ताः'। ( पूर्वमेघ )

वातपित्ताम्रकृद्वालं, बद्धास्थि कफपित्तकृत्॥ १२८॥

गुर्वाग्रं वातजित्यक्वं स्वाद्वस्तं कफशुक्रकृत्।

आम का वर्णन —जिसमें अभी गुठली नहीं पड़ी हो ऐसा बाल ( छोटा ) आम वातकारक, पित्तकारक तथा रक्तधातु को दूषित करता है। गुठली पड़ जाने पर अर्थात् कुछ बड़ा होने पर वह कफकारक तथा पित्तकारक होता है। पका हुआ आम पाक में गुरु, वातनाशक, स्वाद में मधुर होता है। पका हुआ खट्टा आम कफकारक तथा शुक्रवर्धक होता है॥ १२८॥

वृक्षाम्भं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्च्लेष्महरं लघु॥ १२९॥

वृक्षाम्भ का वर्णन —वृक्षाम्भ ( विषाविल, कोकम ) का फल ग्राही, रूक्ष, उष्णवीर्य, वात तथा कफदोष नाशक तथा पाचन में लघु होता है॥ १२९॥

वक्तव्य —इसकी उत्पत्ति कोकण, कनारा आदि दक्षिणी प्रान्तों में होती है। बीज निकाल कर सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहते हैं। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है। इसे कोकम का घी या तेल कहते हैं। यह तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण होता है। इसके छिलकों की चटनी बनायी जाती है।

८ अ० ह०