भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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काकमाची का वर्णन—काकमाची ( मकोय की पत्तियों ) का शाक तीनों दोषों का शमन करने वाला, कुष्ठरोग का विनाशक, वीर्यवर्धक, कुछ उष्णवीर्य, रसायन गुणों से युक्त, सर ( मल को सरकाने वाला ) तथा स्वरयन्त्र के लिए हितकर होता है।

—चाङ्क्यैर्यस्माऽग्निदीपनी ॥ ७४ ॥

ग्रहण्यशौडनिलश्लेष्महितोष्णा ग्राहिणी लघुः ।

चांगेरी ( तिपतिया ) का शाक—यह स्वाद में अम्ल, अप्रिवर्धक, ग्रहणीरोग, अशौरीरोग, वातविकार तथा कफविकार नाशक होता है। यह उष्णवीर्य, मल को बाँधने वाला और लघु ( शीघ्र पचने वाला ) होता है ॥ ७४ ॥

बक्तव्य—सुनिषण्णक और चांगेरी के आकार में क्रमशः चार पात और तीन पात का अन्तर है, वे दोनों पत्रशाक हैं।

पटोलसप्तलारिष्टशाङ्गुष्ठाबलुजाऽमृताः ॥ ७५ ॥

वेत्राग्रबृहतीवासकुतिलीतिलपर्णिकाः । मण्डूकपर्णीककौटकारवेल्कपर्यताः ॥ ७६ ॥

नाडीकलयागोजिह्वावार्तिकं वनतिक्तकम् । करीरं कुल्कं नन्दी कुचैला शकुलादनी ॥ ७७ ॥

कटिलं केम्बुकं शीतं सकोशातककर्कशम् । तिक्तं पाके कटु ग्राहिं वातलं कफपित्तजित् ॥ ७८ ॥

पटोल आदि शाक—पटोल ( परबल ), सप्तला ( सातला ), अरिष्ट ( नीम ), शाङ्गुष्ठा ( काकतिक्ता —चक्रपाणि ), अबलुजा ( बाकुची के पत्ते, फलियाँ तथा बीज ), अमृता ( गिल्लेय या गुरुच के पत्ते ), वेत्राग्र ( बेंत के नये अंकुर ), बृहती ( वनभण्टा ), वासा ( अडूसा ), कुन्तली ( छोटा तिल-विशेष का पौधा ), तिलपर्णिका, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मीभेद के पत्ते ), कर्काट ( ककोड़ा का फल ), कारवेल्क ( करेला ), पर्यट ( पित्तापड़ा ), नाडी ( नाडीशाक ), कलया ( मटर ), गोजिह्वा ( गाजवाँ ), वार्तिक ( गैंगन ), वनतिक्तक ( पथ्यसुन्दर अर्थात् हरीतिकी—चक्र.टी.च.सू. २७।१५ ), करीर ( कैर के फल या बीस के अंकुर ), कुल्क ( छोटा जंगली करेला ), नन्दी ( पारसपीपल के पत्ते ), कुचैला ( काली पाठा ), शकुलादनी ( कुटकी ), कटिल ( दीर्घपत्रा पुनर्ना ), केम्बुक ( करमू ), कोशातक ( कुतबेधन तरोई ) और कर्कश ( स्वरूपककोटकः—चक्र. कबीला के पत्र )—ये द्रव्य शीतवीर्य, स्वाद में तिक्त, पाक में कटु हैं, मल को बाँधने वाले हैं, वातकारक, कफ तथा पित्त दोषशामक हैं ॥ ७५-७८ ॥

बक्तव्य—ऊपर जिन २८ शाकों के नाम गिनाये गये हैं, उनमें अनेक परिचय की दृष्टि से विवादास्पद हैं, अतएव कोई टीकाकार किसी द्रव्य का कोई पर्याय दे रहा है तो कोई कुछ। यह विवाद औषधद्रव्य-विशेषज्ञों के सामूहिक निर्णय की अपेक्षा रहता है। विशेषज्ञ भी वे हैं जो पूर्वाग्रह या दुर्ग्राह से ग्रस्त न हों, क्योंकि विगृह्यसम्भाषा से निर्णीत विषय सिद्धान्त रूप में परिणत नहीं हो पाते। ऐसा ही एक द्रव्य है—वनतिक्तकम्। आचार्य चक्रपाणि इसे पथ्यसुन्दरम्, श्री अरुणदत्त बत्सकः, श्री हेमाद्रि किराततिक्तम्, शब्दमाला—हरीतकी, वैद्यकनि—लोघ्रवृक्ष तथा रत्नमाला—वनतिक्तायां, पाठायाम्। इसी प्रकार अन्य अनेक द्रव्य हैं।

हृद्यं पटोलं कुमिनुत्वादुपाकं रुचिप्रदम्।

परबल का शाक—यह हृदय के लिए हितकारक, क्रिमिनाशक, पाक में मधुर तथा भोजन के प्रति रुचि ( इच्छा ) को उत्पन्न करता है।

पित्तलं दीपनं भेदि वातन्नं बृहतीद्वयम् ॥ ७९ ॥

बृहतीद्वय का वर्णन—वनभण्टा तथा कण्टकारी के फलों का शाक पित्तवर्धक, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, मलभेदक तथा वातनाशक होता है ॥ ७९ ॥

वृषं तु वमिकासन्धं रक्तपित्तहरं परम्।