अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
अहूसा का वर्णन—अहूसा के पत्तों का शाक वमन, कास ( खाँसी ) तथा रक्तपित्तरोग का नाश करने में उत्तम होता है।
कारवेलें सकटुकं दीपनं कफजित्यरम् ॥८०॥
करेला का शाक—यह कुछ कटु ( तित्तरस युक्त ), अग्निदीपक तथा कफनाशक द्रव्यों में उत्तम है ॥८०॥
बक्तव्य—लोलिम्बराज ने करेला का आलंकारिक वर्णन किया है। देखें—वैद्यावतंस।
वार्ताकं कटुं तित्तलोष्णं मधुरं कफवातजित्। सक्षारमग्निजननं हृदं रूच्यमपित्तलम् ॥८१॥
बैगन का शाक—यह दो प्रकार का होता है—१. कटु तथा तित्त, २. मधुर। दोनों प्रकार के बैगन उष्णवीर्य, कफ तथा वात नाशक होते हैं। इनमें कुछ क्षार अंश भी होता है। ये जठराग्नि को बढ़ाने वाले, हृदय के लिए हितकर, रक्तकारक तथा कुछ पित्तकारक भी होते हैं ॥८१॥
बक्तव्य—‘अपित्तलम्’—यहाँ पित्त शब्द के साथ जो नज्रसमास किया गया है, वह ‘ईषत्’ अर्थ में है, ऐसा समझना चाहिए। श्रीहेमाद्रि कहते हैं—‘अपित्तलत्वं बालपक्वव्यतिरेकेण’। यहाँ श्रीहेमाद्रि ने सुश्रुतसम्मत व्याख्यान किया है। देखें—‘जीर्ण सक्षारपित्तलम्’। ( सु.सू. ४६।२६९ )
करीरमाध्मानकरं कषायं स्वादुं तित्तकम्।
करीर का शाक—यह आध्मान ( अफरा ) कारक होता है, रस में कषाय, मधुर तथा तित्त होता है।
कोशातकाबल्यजकौ भेदिनावग्निदीपनौ ॥८२॥
तोरई तथा बाकुची का शाक—ये दोनों बंधे हुए मल का भेदन करने वाले तथा अग्निदीपक होते हैं ॥८२॥
तण्डुलीयो हिमो रूक्षः स्वादुपाकरसो लघुः। मदापेतविषाघ्नः—
तण्डुलीय ( चीलाई ) का शाक—यह शीतवीर्य, रूक्ष, रस तथा पाक में मधुर एवं लघु होता है। यह मदविकार ( मदात्यय ), पित्तविकार, विषविकार तथा रक्तविकार ( विशेषकर रक्तप्रदर ) का विनाश करता है।
—मुञ्जातं वातपित्तजित् ॥८३॥
स्निग्धं शीतं गुरुं स्वादुं बृंहणं शुक्रकृत्परम्।
मुञ्जातक ( कन्द-विशेष ) का शाक—यह वात तथा पित्तविकारों का नाशक होता है; स्निग्ध, शीत, गुरु, स्वाद में मधुर, शरीर को पुष्ट करने वाला तथा शुक्रवर्धक होता है ॥८३॥
गुर्वी सरा तु पालङ्ग्या—
पालक का शाक—यह गुरु होने के कारण देर में पचता है तथा मलभेदक होता है। देशभेद से इसका स्वादभेद भी देखा जाता है।
—मदघ्नी चाप्युपोदिका ॥८४॥
उपोदिका ( पोई ) का शाक—यह भी गुरु एवं सर गुणों से युक्त होती है तथा मद का नाश भी करती है ॥८४॥
पालङ्ग्यावत्स्मृतश्चञ्चुः स तु सङ्ग्रहणात्मकः।
चञ्चु का शाक—इसके सामान्य गुण पालक के समान होते हैं। इसका विशेष गुण है—ग्राही होना।