अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य —करीर या करील को 'क्रकरीपत्र' भी कहा गया है। यह अन्य वृक्षों की भाँति बहुत पत्तों वाला नहीं होता, तथापि इसकी नवीन शाखाओं में विरल पत्ते होते हैं। निषण्टुकारों ने इसे 'मरुभूरुह' कहा है। इसकी कली तथा फलों का अचार भी बनता है। औषधीय उपयोग में इसकी कली, फल एवं झाल लिये जाते हैं। मुञ्जातक —एक कन्द-विशेष का नाम है, इसके गुण राजनिषण्टु में देखें। इसके अभाव में तालमञ्जा का प्रयोग किया जाता है। सु.सू. ३९।९ में कफनाशक द्रव्यों में इसका भी परिगणन किया गया है।
विदारी वातपित्तध्नी मूत्रला स्वादुशीतला ॥ ८५ ॥
जीवनी बृंहणी कण्ठचा गुर्वी वृष्या रसायनम्।
विदारी ( बिलाई ) कन्द —यह वात-पित्तनाशक, मल-मूत्र को निकालने वाला, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, जीवनीय शक्ति को देने वाला, स्वास्थ्यवर्धक, कण्ठ के लिए हितकर, पाचन में गुरु, वीर्यवर्धक तथा रसायन होता है। ८५ ॥
वक्तव्य —इसकी सुदीर्घ लताएँ होती हैं, उनकी जड़ों में गाँठ के रूप में यह कन्द पाया जाता है। छिलका उतारने पर दूध जैसा सफेद द्रव इसमें से निकलता है। यह खाने में आरम्भ में अत्यन्त मधुर किन्तु अन्त में कुछ कसैलापन इसमें पाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह जाड़े का मेवा है। वर्षभर के बाद इनका स्वाद वैसा नहीं रह जाता।
चक्षुष्या सर्वदोषध्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ८६ ॥
जीवन्ती का शाक —यह दृष्टि के लिए हितकर, त्रिदोषनाशक, मधुर तथा शीतवीर्य है। ८६ ॥
कृष्माण्डतुम्बकालिङ्गककाँवरितिण्डिशम्। तथा त्रपुसचीनाकचिर्भट कफवातकुत्त ॥ ८७ ॥
भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरसं गुरु।
कृष्माण्ड आदि का वर्णन —कृष्माण्ड ( कोहड़ा, पेठा ), तुम्ब ( जिसकी साधु लोग तुम्बी या कमण्डलु बनाते हैं ), कालिंग ( तरबूज ), कर्कारि ( खरबूजा ), उर्वरि ( ककड़ी या खीरा ), तिण्डिश ( टिंटे ), त्रपुस ( बड़ा खीरा ), चीनाक ( चीना ककड़ी ) और चिर्भट ( फूट )—ये सभी कफकारक, वातकारक, मलभेदक, विष्टम्भी, अभिष्यन्दी, विपाक तथा रस में मधुर एवं गुरु होते हैं। ८७ ॥
वल्लीफलानां प्रवरं कृष्माण्डं वातपित्तजित् ॥ ८८ ॥
बस्तिशुद्धिकरं वृष्यम्—
कृष्माण्ड ( कोहड़ा ) के गुण —लताओं में फलने वाले उक्त सभी फलों में कृष्माण्ड उत्तम माना गया है। यह वात तथा पित्त विकार का शमन करता है, बस्ति ( मूत्राशय ) को शुद्ध करता है और वीर्य को बढ़ाता है। ८८ ॥
—त्रपुसं त्वतिमूत्रलम्।
त्रपुस का वर्णन —त्रपुस ( बड़ा खीरा ) कृष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रकारक होता है।
तुम्बं रुक्षतरं ग्राहि कालिङ्गैर्वारिचिर्भटम् ॥ ८९ ॥
बालं पित्तहरं शीतं विद्यात्यक्वमतोऽन्यथा।
तुम्ब या तुम्बा ( गोल लौआ या लौकी ) —तरबूज, ककड़ी, फूट ये सब अत्यन्त रुक्ष तथा मल को बाँधने वाले होते हैं। ऊपर कहे गये फल जब तक बाल ( मुलायम ) रहते हैं तब तक इनका गुण पित्तनाशक होता है और ये शीतवीर्य होते हैं। जब ये पक जाते हैं, तब पित्तकारक एवं उष्णवीर्य हो जाते हैं। ८९ ॥