अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६
अष्टाङ्गहृदय
शीर्णवृन्तं तु सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ॥१०॥ रोचनं दीपनं हृद्यमष्ठीलाऽऽताहनुल्लघु ।
शीर्णवृन्त-फलशाक—शीर्णवृन्त ( जो शाकफल अपने डण्डल से अलग हो गया हो ) शाक कुस खरापन, पित्तकारक, कफद्रोष तथा वातद्रोष का विनाशक, रुचिकारक, जठराग्निदीपक तथा हृदय के लिए हितकर होता है। यह वाताष्ठीला तथा आनाह ( अफरा ) रोगों का विनाशक एवं लघु होता है ॥१०॥
वक्तव्य—यहाँ 'शीर्णवृन्त' शब्द से भलीभाँति पके हुए फल का ग्रहण करना चाहिए। जैसा कि मुभूत ने कहा है—'शुक्लं लघुणं सक्षारं दीपनं बस्तिशोधनम्' ( मु.सू. ४६।२१३ ) श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में कहते हैं—'शीर्णवृन्त' = कर्कूरम्।
शीर्णवृन्त—यहाँ इस नाम से एक शाक-विशेष का वर्णन किया गया है। 'वृन्त' शब्द का प्रयोग—फल तथा वृक्ष या लता से जुटे हुए भाग को डण्डा या डण्डल कहते हैं। शीर्ण का अर्थ है—गला हुआ। प्रायः सब फलों के वृन्त पकने पर गल या झड़ जाते हैं, किन्तु लाल कुम्हड़ा या सीताफल या कद्दू नाम का एक लताफल ऐसा होता है, जिसका वृन्त पकने पर भी अलग नहीं होता। इसे अंग्रेजी में Red gourd कहते हैं, इसका अर्थ लाल कुम्हड़ा होता है। वामभट ने श्लोक ८८ में जिस कृष्माण्ड का वर्णन किया है, वह 'पेठ की मिठाई' वाला है।
मृणालबिसशातूककुमुदोत्पलकन्दकम् ॥११॥
नन्दीमाषककेलूटभृङ्गटककसेरकम्। क्रीञ्चादनं कलोड्यं च रूक्षं ग्राहि हिमं गुरु ॥१२॥
मृणाल आदि का वर्णन—मृणाल ( कमलनाल ), बिस ( कमल की जड़ = भर्सीडा ), शातूक ( कमलकन्द ), कुमुद ( कुई ) एवं उत्पल के कन्द, नन्दी ( तुण्डिकेरी ), माषक ( वास्तुल ), केलूट ( किसक नामक उदुम्बर भेद ), भृंगटक ( सिंधाड़ा ), कसेरु, क्रीञ्चादन ( मृणाल, पिपली, घेञ्जुलक, चिञ्चोटक ) और कलोड्य ( पद्मबीज )—ये सभी द्रव्य रूक्ष, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), शीतवीर्य एवं गुरु ( देर से पचने वाले ) होते हैं ॥११-१२॥
कलम्बनालिकामार्पकुटिञ्जरकुतुम्बकम्। चिल्लीलङ्काकलोणीकाकुरुटकगवेधुकम् ॥१३॥
जीवन्तसुञ्जवेडगजयवशाकसुवर्चलाः। आलुकानि च सर्वाणि तथा सूर्यानि लक्ष्मणम् ॥१४॥
स्वादु रूक्षं सलवणं वातस्लेष्मकरं गुरु। शीतलं सूष्टविष्णूम्रं प्रायो विष्टम्ब्य जीर्यति ॥१५॥
स्विस्रं निष्पीडितरसं स्नेहादृष्टं नातिदोषलम्।
कलम्ब आदि का वर्णन—कलम्ब ( कदम्ब या करमू ), नालिका ( नालीशाक ), मार्प ( मरसा ), कुटिञ्जर ( ताम्रमूलक या तन्दुलक ), कुतुम्बक ( द्रोणपुष्पी—गूमा ), चिल्ली ( क्षारपत्रक शाक, लाल बधुआ ), लट्वाक ( गुग्गुलशाक ), लोणीका ( लोणार, सलूनक, कुलफा ), कुरुटक ( स्थितिवारक, शितिवारी ), गवेधुक ( तुणधान्य ), जीवन्त ( जीवन्ती ), सुञ्जु ( चुञ्चू ), ऐडगज ( चक्रवड ), यवशाक ( छोटे पत्तों वाली चिल्ली या जी के कोमल पत्ते ), सुवर्चल ( हलहल ), सभी प्रकार के आलू, सभी प्रकार के वे अन्न जिनकी दाने बनायी जाती हैं ( जैसे—चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर, कुलथी आदि ) और लक्ष्मण ( मुलेठी के पत्ते )—उपर्युक्त सभी शाक स्वाद में मधुर, रूक्ष, लवणरस युक्त, वात तथा कफ कारक, देर में पचने वाले, शीतवीर्य, मल-मूत्र निकालने वाले और प्रायः ये देर से पचते हैं। यदि इन्हें उबाल कर इनका रस निचोड़ कर या या तेल में भलीभाँति भूँज लिया जाता है, तो ये दोषकारक नहीं होते ॥१३-१५॥
लघुपत्रा तु या चिल्ली सा वास्तुकसमा मता ॥१६॥
चिल्लीशाक का वर्णन—चिल्ली नामक शाक दो प्रकार का होता है—१. बड़े पत्तों वाला तथा २. छोटे पत्तों वाला। इनमें से दूसरे के गुण-धर्म बधुआ के समान होते हैं ॥१६॥