अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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तर्कारिवरणं स्वादु सतिक्तं कफवातजित्।
तर्कारी आदि शाक का वर्णन—तर्कारी ( अरणी ) तथा वरणा के कोमल पत्तों एवं फलों का शाक स्वाद में मधुर, कुछ तीतापन युक्त होता है। ये दोनों कफदोष तथा वातदोष नाशक होते हैं।
वर्षाभौ कालशाकं च सक्षारं कटुतिक्तकम् ॥१७॥
दीपनं भेदनं हन्ति गरशोफकफानिलात्।
पुनर्नवा एवं कालशाक—दोनों प्रकार की ( छोटी तथा बड़ी ) पुनर्नवाओं का तथा कालशाक ( काला मरसा का शाक ) कुछ खारा, स्वाद में कुछ कटु एवं कुछ तिक्त रस वाला होता है। ये दोनों शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करते ( सुलगते ) हैं, मल का भेद करके उसे निकालते हैं। दूषीविष, शोफ ( सूजन ), कफदोष तथा वातदोष का विनाश करते हैं ॥ १७ ॥
दीपनाः कफवातघ्नाश्चिरिबिल्ववाङ्कुराः सराः ॥१८॥
करंज का शाक—करंज के कोमल पत्तों या अंकुरों का शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला कफ एवं वात नाशक होता है और मल की रूकावट को दूर करता है ॥ १८ ॥
शतावर्षइंकुरास्तित्का वृष्या दोषत्रयपहाः।
शतावरी के अंकुरों का शाक—यह स्वाद में हल्का तिक्तरस वाला, वीर्यवर्धक तथा तीनों दोषों का विनाशक होता है।
बक्तव्य—शतावरी या शतावर वृष्य ( वीर्यवर्धक ) औषधों में उत्तम है। नैनीताल तथा अलमोडा आदि पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्याप्त रूप में पायी जाती है। इसके अंकुरों को पर्वतीय भाषा में 'कैरुआ' कहा जाता है। ये चैत्रमास के अन्तिम दिनों से आषाढ़ तक अधिक मात्रा में निकलते रहते हैं। आरम्भ में ये दो-चार दिनों तक सुकोमल होते हैं। इनका संग्रह कर छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सब्जी बना ली जाती है। इसे रोटी के साथ खाया जाता है। यह पौष्टिक तथा रुचिवर्धक होती है। यह अंकुरशाक है।
रुक्षो वंशकरीरस्तु विदाही वातपित्तलः ॥१९॥
वंशकरीर का शाक—बाँस के नये अंकुर का शाक—शतावरी के अंकुरों की भाँति बाँस के भी अंकुर निकलते हैं, इनका भी शाक, आचार तथा मुरब्बा बनाया जाता है। नेपाल में इसके आचार का अत्यन्त प्रचार है, वहाँ इसे 'तामा' कहते हैं। इसके गुण—यह रुक्ष, विदाहकारक तथा वातपित्तकारक होता है ॥ १९ ॥
पत्तुरो दीपनस्तितकः प्लीहार्शःकफवातजित्।
पत्तुर ( मछेछी ) का शाक—यह अग्निदीपक, स्वाद में तिक्त, कफ तथा वात दोष का नाशक है। यह प्लीहाविकार तथा अशोरीग को शान्त करता है।
कृमिकासकफोत्तलेदान् कासमर्दो ज्येत्तरः ॥१००॥
कासमर्द ( कर्तादी ) का शाक—यह क्रिमिरोग, कासरोग, कफज विकार तथा उत्कल्लेद ( शरीर में उत्पन्न गोलिपन ) को जीत लेता है। यह मलभेदक है ॥ १०० ॥
रुक्षोष्णमस्लं कौसुम्भं गुरु पित्तकरं सरम्।
कुसुम्भ का शाक—कुसुम्भ ( कुसुम ) के पत्तों का शाक रुक्ष, उष्णवीर्य, अम्ल, गुरु ( देर से पचने वाला ), पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है।
गुरुष्णं सारप्यं बद्धविष्णूत्रं सर्वदोषकृत् ॥१०१॥
सरसों के पत्तों का शाक—यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, स्वाद में कुछ अम्ल, पाचन में गुरु, मल-मूत्र की प्रवृत्ति में रूकावट डालने वाला तथा त्रिदोषकारक होता है ॥ १०१ ॥