अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य —साहित्यदर्पणकार श्रीविश्वनाथ ने भी सर्पपशाक की प्रशंसा की है, परन्तु यह भी कह दिया है कि इसे ग्राम्य लोग बड़े चाव से खाते हैं—‘तरुणं सर्पपशाकं’ इत्यादि। इसे पंजाब में बड़े आदर के साथ खाया जाता है, अन्यत्र भी लोग खाते ही हैं।
यद्वालमव्यक्तसरं किञ्चित्क्षारं सतिक्तकम्। तन्मूलकं दोषहरं लघु सोष्णं नियच्छति ॥ १०२ ॥ गुल्मकासक्षयश्वासव्रणतेत्रगलामयान्। स्वराग्निसादोदावतीपीनसांश्च—
बालमूली का शाक —जो मूली कच्ची (रूढ़ न हुई हो) वह अव्यक्त रस वाली या कुछ खारापन तथा तीतापन लिये होती है। वह तीनों दोषों का नाश करती है, लघु तथा कुछ उष्णवीर्य वाली होती है। मूली गुल्म, कास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्रविकार, कण्ठविकार (स्वरभेद आदि), ज्वररोग, अग्रिमान्द्य, उदावर्त तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ १०२ ॥
—महत्पुनः ॥ १०३ ॥
रसे पाके च कटुकमृणवीर्यं त्रिदोषकृत्। गर्वभिष्यन्दि च—
वृद्धमूली का शाक —बड़ी मूली रस एवं विपाक में कटु, उष्णवीर्य, त्रिदोषकारक, देर में पचने वाली तथा अभिष्यन्दी होती है ॥ १०३ ॥
—स्निग्धसिद्धं तदपि वातजित् ॥ १०४ ॥
स्नेहसिद्ध मूली का शाक —यदि बड़ी मूली को घी में भलीभाँति पका लिया जाय तो यह वातनाशक होती है ॥ १०४ ॥
बक्तव्य —आकृतिभेद से मूली दो प्रकार की होती है—१. गोल तथा २. लम्बी। लम्बी मूली भी छोटी-बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है—१. लघुमूलक और २. नेपालमूलक। ये भी नयी एवं पुरानी भेद से पुनः दो प्रकार की होती है। गर्मियों में मिलने वाली मूली स्वाद में कटु होती है, जाड़ों में होने वाली मूली मधुर होती है। इसे नमक-मिरच लगाकर खाया जाता है। कच्ची मूली का शाक भी बनाया जाता है और सलाद के रूप में कच्चा भी खाया जाता है। इसी के भेद हैं—गाजर, चुकन्दर, सलजम आदि।
मौसम में मूली को काट कर सुखा लिया जाता है। बाद में पानी में भिगाकर इसका भी शाक के लिए प्रयोग होता है। यह सब वर्णन किसी भी जाति की बालमूली का है। जब यह रूढ़ हो जाती है, इसके भीतर जाली पड़ जाती है और बाहर का भाग कड़ा हो जाता है तब यह अग्राह्य हो जाती है। इसके विशेष गुण-धर्मों के लिए देखें—सु.सू. ४६।२४०-२४३। सुखाये सभी शाक विष्टम्भी तथा वातकारक होते हैं, केवल सुखाए हुए मूली के शाक को छोड़कर।
वातश्चलेष्महरं शुष्कं सर्वम्—
सूखी मूली का शाक —सुखायी गयी सभी प्रकार की मूलियाँ वात एवं कफ नाशक होती हैं।
—आमं तु दोषलम्।
कच्ची मूली का शाक —सभी प्रकार की कच्ची मूलियाँ वात आदि दोषकारक होती हैं।
कटूष्णो वातकफहा पिण्डालुः पित्तवर्धनः ॥ १०५ ॥
पिण्डालु नामक कन्द का शाक —यह कुछ कटु, उष्णवीर्य तथा पित्त को बढ़ाने वाला है ॥ १०५ ॥
बक्तव्य —सुश्रुत ने पिण्डालु का जो वर्णन किया है, वह उक्त बाभटोक्त गुण-धर्मों के विपरीत है। देखें—‘पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम्’। (सु.सू. ४६।३०४)