भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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भक्तस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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आयुर्वेद में 'आलुक' नाम से अनेक कन्दों का ग्रहण होता है। जैसे—१. काष्ठालुक ( कटालू )। २. शंखालुक—यह सफेदी लिये होता है, ऐसा लगता है कि बाजारों में बिकने वाला यही शंखालू ही आलू है। ३. हस्त्यालुक—बड़े-से-बड़े आकार का आलू, इसके दर्शन प्रदर्शनियों में किये जा सकते हैं। ४. पिण्डालुक—हमारी मान्यता के अनुसार यह वही है, जिसका विवेचन हमने इसी प्रकारण में आगे किया है। जो इसे 'सुथनी' मानते हैं, उन्हें इसका समावेश 'मध्वालुक' में अथवा 'रक्तालुक' में करना चाहिए, क्योंकि यह लाल तथा सफेद भेद से दो प्रकार का पाया जाता है। ५. मध्वालुक—यह आकृति से दो प्रकार का होता है—१. छोटा और २. बड़ा। इनमें छोटा छीलने पर भीतर से सफेद और बड़ा छीलने पर रक्ताभ होता है। हिन्दी में इन्हें छोटी सुथनी तथा बड़ी सुथनी कहते हैं। ६. रक्तालुक—यह भी वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। १. जंगली सफेद और २. घर में लगाया हुआ लाल रंग का। जंगली अधिक-से-अधिक १ या २ इंच गोलाई में मोटा, घरेलू ५ या ६ इंच मोटा या इससे भी अधिक। इसे तरूड़ या रतालू भी कहते हैं। इन्हीं कन्दों में एक शकरकन्द भी है। यह शक्कर की भाँति खाने में मीठा होता है, अतएव इसे 'शकरकन्द' कहते हैं।

नैनीताल तथा अलमोड़ा आदि जिलों में 'पिण्डालू' नाम से सुप्रसिद्ध एक कन्द मिलता है, जिसका शाक क्षेत्रीय लोगों को अतिप्रिय है। वहाँ इसकी खेती भी होती है। मैदानी स्थानों में इसे 'अरूई' या 'घुइयाँ' कहते हैं। ये पिण्डालू या पिनालू के उपकन्द हैं। पिण्डालू के जिस मूल अवयव को यहाँ बण्डा कहा जाता है, उसे पर्वतीय क्षेत्रों में 'गडेरी' कहते हैं। हमारे विचार से सुश्रुत ने जिस 'पिण्डालू' के गुण-धर्मों का वर्णन किया है, वह यही 'पिण्डालू' कन्द है।

कुठेरशिग्रसुरससमुखासुरिभूस्तुणम्। फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति ग्रहि शालनम्॥ १०६॥ विदाहि कटु रूक्षोष्णं हृदयं दीपनरोचनम्। वृक्षशुक्रकृमिहृतीक्ष्णं दोषोत्प्लेशकरं लघु॥ १०७॥

कुठेरक आदि शाक—कुठेरक ( बनतुलसी—बवई ), शिग्रु ( सहजन की फली ), सुरस ( काली तुलसी ), समुखा ( तुलसीभेद ), आसुरि ( राई के पत्ते ), भूस्तुण, फणिज्जक, अजक, जम्बीर आदि के पत्तों के शाक ग्राही ( मल को बांधने वाले ) तथा उत्तम होते हैं। यह विदाहकारी, स्वाद में कटु, रूक्ष, उष्णवीर्य, हृदय के लिए हितकारी, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा रुचिकारक होते हैं। ये दूषितनाशक, शुक्र तथा क्रिमि नाशक होते हैं। ये गुणों में तीक्ष्ण, वात आदि दोषों को उन्माडने वाले तथा पाचन में लघु होते हैं॥ १०६-१०७॥

वक्तव्य—'फणिज्जाजकजम्बीरप्रभृति' इस 'प्रभृति' शब्द से अष्टांगसंग्रह अध्याय ७ में कहे गये—धान्य, तुम्बूर, शैलये, यवानी, भुंगवेर, पण्णाश, गुंजन, अजाजी, कण्डीर, जलपिप्ली, खराशवा, काल्मालिका, दीप्यक, क्षक्कृत, द्वीपि और वस्तगन्धा का ग्रहण कर लेना चाहिए। अष्टांगहृदय में उक्त द्रव्यों को 'हरितकवर्ग' में गिना है।

हिध्माकासविषश्वासपार्थरूपृतिगन्धहा। सुरसः—

सुरसा का शाक—हिचकी, कास, विषविकार, श्वास, पार्श्वशूल ( पसलियों में पीड़ा का होना ) तथा सुख की दुर्गन्ध का विनाश करता है।

—सुमुखो नातिविदाही गरशोफहा॥ १०८॥

सुमुख नामक तुलसी का शाक—यह अधिक विदाहकारक नहीं होता है। दूषीविष तथा शोथरोग का विनाश करता है॥ १०८॥

आर्द्रिका तित्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत।

हरा धनिया का शाक—यह थोड़ा तीता तथा मधुर होता है। मूत्रल तथा पित्तकारक नहीं होता।