अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः ॥ १०९ ॥
हृद्यः केशयो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः । भयसन्धानकृद्दुल्यो रक्तपित्तप्रदूषणः ॥ ११० ॥ किलासकुच्छगुल्माशौमेहक्रिमिकफानिलान् । स हिधमापीनसम्भासकासान् हन्ति रसायनम् ॥
लशुनकन्द का शाक—इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य होता है। इसका विपाक कटु होता है। यह सर है, हृदय के लिए तथा केशों के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभ्रम को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है। यह किलास ( श्वित्र ), कुच्छ, गुल्म, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और काम रोग का विनाश करता है। यह रसायन है ॥ १०९-१११ ॥
बक्तव्य—यहाँ लहसुन के केवल कन्द के गुण दिये गये हैं। प्रसंगवश उसके अन्य अंगों का वर्णन भी प्रस्तुत है—इसके पत्र खारे तथा मधुर होते हैं और इसका मध्यभाग अधिक मधुर एवं पिच्छिल होता है। कभी-कभी इसके मध्यभाग में भी लशुनकन्द पाये जाते हैं, औषध में इनका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। अष्टाङ्गहृदय-उत्तरस्थान ( ३९।१११-१२९ ) में इसकी विस्तृत रसायनविधि देखें। इसके अतिरिक्त 'काश्यपसंहिता' में भी इसके विविध कल्पों का अवलोकन करें।
पलाण्डुस्तदुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः ।
पलाण्डु ( प्याज ) का शाक—यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है। यह कफकारक है तथा पित्तकारक कम होता है।
कफवातार्शसां पथ्यः स्वेदेऽभव्यवहृतौ तथा ॥ ११२ ॥
तीक्ष्णो गुञ्जनको ग्राही पित्तान् हितकृत्त सः ।
गुञ्जनका शाक—यह कफविकार, वातविकार तथा अशरिग में हितकर होता है। ब्रणशोथ आदि पर इसका लेप कर के स्वेदन किया जाता है एवं शाक बनाकर इसे खाया भी जाता है। गाजर का शाक तीक्ष्ण गुणवाला, मल को बाँधने वाला तथा यह पित्तविकार वालों के लिए हितकर नहीं है ॥ ११२ ॥
बक्तव्य—वास्तव में उक्त ११२वें पद्य को 'पलाण्डु....तथा'। इस प्रकार दो पंक्तियों में पूरा होना चाहिए था। ऐसा मत श्री अरुणदत्त एवं श्रीचन्द्रनन्दन का था, किन्तु श्रीहेमद्रि का कथन है कि ये गुण-धर्म पलाण्डु के नहीं अपितु 'गुञ्जन' के हैं। अतः उक्त दो पंक्तियों को यहाँ एक साथ रखा है। वास्तव में स्वेदन के लिए 'पलाण्डु' तथा गुञ्जन दोनों का ही प्रयोग होता है। देखें—ब.सू. २७।१७४।
दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ ११३ ॥
विशेषादर्शसां पथ्यः—
सूरण का शाक—यह अग्निदीपक, हविकारक, कफनाशक, विशद ( पिच्छिलतानाशक ), लघु ( शीघ्र पचने वाला ), विशेष करके यह अशरिगियों के लिए हितकर होता है ॥ ११३ ॥
बक्तव्य—अशौनाशक 'शूरणमोदक' योग, देखें—शैषज्जरत्नावली-अशौरोगाधिकार में—१. स्वल्प-शूरणमोदक, २. बृहत्शूरणमोदक तथा अन्य अनेक योग। सूरण-परिचय—यह दो प्रकार का होता है—एक वह जिसे खा लेने से मुख तथा गले में काँटे जैसे चुभते-से प्रतीत होते हैं, दूसरा वह जो पहले की तुलना में कम कष्टकारक होता है। पाककर्मकुशल व्यक्ति दोनों की सच्ची सूखी अथवा रसेदार बनाते हैं, बड़े शौक से खायी भी जाती है। वे इसके टुकड़ों को इमली ( किसी प्रकार के अम्ल में ), चूना या फिटकिरी आदि में डालकर उबाल कर घी में भलीभाँति तलकर इसका पाक किया करते हैं। कुछ टीकाकारों ने 'सूरण' को ही भूकन्द माना है। 'कन्द' शब्द की दृष्टि से उनका सोचना उचित ही है, किन्तु 'सूरण' के उक्त गुणों के बाद उसे 'अतिदोषज' कहना कहीं तक युक्तिसंगत होगा ?