अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
१११
—भूकन्दस्तत्त्वतिदोषलः ।
भूकन्द का शाक—यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है।
वक्तव्य—भूकन्द के सम्बन्ध में विद्वानों के मतभेद—कोई इसे 'जिमीकन्द', दूसरे विद्वान इसे 'मृस्रोटा' इत्यः प्रावृद्धे उद्भवः' अर्थात् यह संवेद शाक है। हिन्दी में इसे—भुईछता, खुमी आदि कहते हैं। अंग्रेजी में 'Mushroom' कहते हैं। यह वर्षाकाल में जोरदार वर्षा होने पर सहसा पैदा हो जाता है। इसका आकार छता का जैसा होता है, रंग सफेद या बादामी सफेद होता है। यह भक्ष्य (खाने योग्य) तथा अभक्ष्य (जहरीला) भेद से दो प्रकार का होता है।
पत्रे पुष्पे फले नाले कन्दे च गुरुता क्रमात् ॥ ११४ ॥
शाकों में उत्तरोत्तर गुरुता—पत्रशाकों से पुष्पशाक गुरु, इनसे अधिक गुरु फलशाक, फलशाकों में भी अधिक गुरु नालशाक (सरसों के नाल = गन्दल), इनसे भी अधिक गुरु कन्दशाक होते हैं ॥ ११४ ॥
वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि उक्त श्लोक का क्रम 'पुष्पे पत्रे' इस प्रकार चाहते हैं, क्योंकि सुश्रुत ने एक तो 'नालशाक' का ग्रहण नहीं किया है और दूसरा जहाँ श्रीहेमाद्रि 'लघवः' पाठ को उद्धृत करते हैं, वहाँ सुश्रुत ने 'गुरुवः' पाठ दिया है, जो सर्वथा युक्तियुक्त है। देखें—सु.सू. ४६।१४२। 'गुरुवः' के स्थान पर 'लघवः' शब्द का छप जाना सम्पादकीय प्रमाद प्रतीत होता है।
वरा शाकेषु जीवन्ती सारपं त्ववरं परम्।
इति शाकवर्गः ।
उत्तम-अधम-निर्णय—शाकवर्ग में परिगणित शाकों में जीवन्ती (डोड़ी) शाक उत्तम तथा सरसों की पत्तियों एवं नाल का शाक अधम माना गया है।
वक्तव्य—शाकवर्ग के आरम्भ में छः प्रकार के शाकों का परिगणन किया गया था। तदनुसार यहाँ कहा गया 'भूकन्द' संवेदज शाकों में गिना जाता है। संक्षेप में शाक-परिचय—१. पत्रशाक—बथुआ, पोई, मरसा, चौलाई आदि। २. पुष्पशाक—गोभी, अगस्तिया के फूल, केले के फूल, सेमल के फूल आदि। ३. फलशाक—पेठा, लौकी, करेला, बैगन, परवल, टिण्डा आदि। ४. नालशाक—सरसों, राई आदि के नाल। ५. कन्दशाक—मूली, सूरण (जिमीकन्द), आलू, पिण्डालू, रक्तालू, वाराहीकन्द, गेठी, तरुड़ आदि। ६. संवेदज शाक—छत्रक, खूब आदि। आचार्य खरनाद ने कहा है कि भोजन कर लेने के बाद फलों का सेवन करना चाहिए, अतः अब इसके बाद यहाँ फलवर्ग का प्रस्ताव है।
अथ फलवर्गः
द्राक्षा फलोत्तमा वृष्या चक्षुष्या सुष्टमूत्रविद ॥ ११५ ॥
स्वादुपाकरसा स्निग्धा सकपाया हिमा गुरुः। निहन्त्यनिलेपिताम्रतित्कास्यत्वमदात्ययान् ॥ तुष्णाकासश्चमध्वासस्वरभेदक्षतक्षयान् ।
द्राक्षा-परिचय—द्राक्षा (दाब या मुनकका) सब फलों में उत्तम है। यह वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर, मल-मूत्र को सुचारू रूप से निकालती है। विपाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, कुछ कपाय रसयुक्त, शीतवीर्य तथा देर में पचने वाली है। यह वात, पित्त तथा रक्त विकारों का विनाश करती है। मुख का तीतापन, मदाल्यरोग, तुष्णा (प्यास का अधिक लगना), कास, थम (थकावट), श्वास, स्वरभेद, क्षत (उरःक्षत) एवं क्षय इन रोगों का विनाश करती है ॥ ११५-११६ ॥
वक्तव्य—अंगूर आकार-भेद से दो प्रकार के होते हैं—१. छोटे, जिनके किसमिस बनाये जाते हैं और २. बड़े, जो आकार में लम्बे होते हैं, इनके मुनबके बनाये जाते हैं। फिर ये बीज वाले तथा बीज-