भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

रहित भेद से भी दो प्रकार के होते हैं। स्वाद-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. खट्टे और २. मीठे। वर्ण-भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं—१. काले तथा २. सफेद या हरिताभ सफेद। मुनक्का या किसमिन् बनाने के लिए इन्हें थोड़ा पकाना पड़ता है, नहीं तो ये जल्दी सुखते नहीं अपितु सड़ जाते हैं।

उद्विकृत्पित्ताज्ययति त्रीन्दोषान्स्वादु दाडिमम् ॥ ११७ ॥

पित्ताविरोधि नात्युष्णमस्मं वातकफापहम्। सर्वं हृद्यं लघु स्निग्धं ग्राहि रोचनदीपनम् ॥ ११८ ॥

दाडिम-फल का वर्णन—यह स्वादभेद से दो प्रकार का होता है—१. मधुर और २. अम्ल ( खट्टा )। मधुर दाडिम के गुण—इसी को 'अनार' कहते हैं। यह पित्त-प्रधान तीनों दोषों को शास्त करता है। खट्टा दाडिम—यह खट्टा होने पर पित्तदोष को प्रकुपित नहीं करता। यह अधिक उष्ण भी नहीं होता है। यह वात तथा कफ दोष का विनाशक होता है।

सभी प्रकार के दाडिम हृदय के लिए हितकर, शीघ्र पचने वाले, स्निग्ध, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), रुचि तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं ॥ ११७-११८ ॥

बक्तव्य—पर्वतीय क्षेत्रों में दाडिम के वृक्ष पर्याप्त रूप में पाये जाते हैं। इसके वृक्ष चिरायु होते हैं। स्थानीय लोग खट्टे तथा मीठे दाडिमों की चटनी बनाकर रख लेते हैं। इसे 'काली चटनी' कहते हैं। यह लाल, सफेद वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। इसके छिलकों को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लिया जाता है। यह चूर्ण पित्तातिसार, प्रवाहिका, काम, बालको के दांत निकलने तथा टाउन्सिल में प्रयोग किया जाता है। यद्यपि सभी अम्ल पदार्थ पित्तवर्धक तथा उष्णवीर्य होते हैं, तथापि अनार एवं आँवला फल इसके अपवाद हैं।

मोचखजूरपनसनारिकेलपुरुषकम्। आम्रतातालकाशमर्यराजादनमधूकजम् ॥ ११९ ॥

सौवीरबदराङ्गुल्लफलगुश्लेष्मातकोद्भवम्। वातामाभिपुकाओडमुकूलकनिकोचकम् ॥ १२० ॥

उरुमाणं प्रियालं च बृंहणं गुरु शीतलम्। दाहक्षतक्षयहर् रक्तपित्तप्रसादनम् ॥ १२१ ॥

स्वादुपाकरसं स्निग्धं विष्टम्भि कफशुक्रकृतं।

केला आदि फलों का वर्णन—मोच ( केले का फल ), खजूर ( खजूर या छुहारा ), पनस ( कटहल ), नारियल, पुरुषक ( फालसा ), आम्रत ( आमड़ा ), तालफल, काशमर्य ( गम्भारी का फल ), राजादन ( खिरनी ), महूआ का फल, सौवीर ( बड़ा बेर का फल ), बेर का फल, अंकोल, फलु ( गुलर ), श्लेष्मातक ( लिसोड़ा ), बादाम, अभिपुका ( पिस्ता ), अखरोट, मुकूलक ( यह भी पिस्ता की जाति है ), निकोचक ( चिलगोजा—बीज का बीज ), उरुमाण ( खुमानी या खुरमानी ) और प्रियाल ( चिरौंजी )—ये सभी फल बृंहण ( शरीर को बढ़ाने वाले ), गुरु ( देर में पचने वाले ) तथा शीतवीर्य होते हैं। दाह, क्षत ( उरु:क्षत ) तथा अन्य स्थानों में लगे घावों का शमन करते हैं। रक्त तथा पित्त को शुद्ध करते हैं। ये सभी विपाक में मधुर हैं, स्निग्ध, विष्टभकारक ( मलावरोधक ), कफ एवं शुक्रधातु को बढ़ाते हैं ॥ ११९-१२१ ॥

फलं तु पित्तलं तालं सरं काशमर्यजं हिमम् ॥ १२२ ॥

शक्रुन्मूत्रविबन्धच्छं केश्यं मेध्यं रसायनम्। वातामाशुण्णवीर्यं तु कफपित्तकरं सरम् ॥ १२३ ॥

परं वातहर् स्निग्धमनुष्णं तु प्रियालजम्। प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः ॥ १२४ ॥

कोलमज्जा गुणैस्तद्भुट्टुर्द्विः कासजिच्च सः।

ताल आदि फलों का वर्णन—ताल ( ताड़ ) का फल पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है। गम्भार का फल शीतवीर्य, मल तथा मूत्र की रूखावट को दूर करता है, बालों एवं मेधा ( धारणाशक्ति ) के लिए हितकर, रसायन गुणों से युक्त होता है। बादाम आदि फलों के गुण—ये उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, सर, वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ठ तथा स्निग्ध होते हैं, किन्तु प्रियाल ( चिरौंजी ) उष्णवीर्य नहीं होता। प्रियालमज्जा के गुण—चिरौंजी की गिरी मधुर, वीर्यवर्धक, पित्त तथा वातविकार का नाश करती