अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंअक्षरस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११३
है। बेर की मज्जा के गुण—इसके गुण भी प्रायः प्रियात्मज्जा के समान होते हैं, किन्तु यह तुष्णा तथा कास का विनाश करती है॥ १२२-१२४॥
वक्तव्य —'वातामादि'—यहाँ आदि शब्द से अभिप्रेत ( पिस्ता ), अखरोट, मकूलक, निकोचक ( चिलगोजा ) और उरुमाण ( खुमानी ) तक के द्रव्यों को लेना चाहिए। उरुमाण फल पर्वतीय प्रदेशों ( नैनीताल, अलमोड़ा, शिमला, मंसूरी, काश्मीर आदि ) में होता है। इसका बाहरी गूदा भी और भीतर की गिरी भी खायी जाती है, जो बादाम के आकार की तथा स्वाद में मधुर होती है। यह आकार-भेद से दो प्रकार की होती है—छोटी तथा बड़ी। बड़ी खुमानी के भीतर से निकलने वाली गिरी के ये गुण हैं।
पक्वं सुवर्जं बिल्वं दोषलं पूतिमास्तम्॥ १२५॥
दीपनं कफवातघ्नं बालं, ग्राह्यभ्यं च तत्।
बिल्ब का पका फल —पका हुआ बेल का फल बड़ी कठिनता से पचता है, दोषकारक होता है तथा इसका सेवन करने से अपानवायु दुर्गन्धयुक्त निकलता है। कच्चा बेल का फल अग्नि प्रदीप्त करता है, कफ तथा वात दोष का नाश करता है। ये दोनों प्रकार के बेल ग्राही ( मल को बांधने वाले ) होते हैं।
कपित्यमामं कण्ठघ्नं दोषलं, दोषयाति तु॥ १२६॥
पक्वं हिंश्चावमथुजित्, सर्वं ग्राहि विषापहम्।
कैथ का कच्चा फल —यह कण्ठ ( स्वरयन्त्र ) को हानि पहुँचाता है, दोषकारक होता है। कैथ का पका फल दोषशामक, हिचकी तथा वमन का विनाश करता है। दोनों प्रकार के कैथ ग्राही होते हैं और विषविकार को नष्ट करते हैं॥ १२६॥
जाम्बवं गुरु विष्टिम्भि शीतलं भुशवातलम्॥ १२७॥
सङ्ग्राहि मूत्रशकृतोरकण्ठचं कफपित्तजित्।
जामुन का फल —यह गुरु ( देर में पचने वाला ), विष्टम्भी, शीतवीर्य, वातविकार को अत्यन्त बढ़ाने वाला, मल-मूत्र को रोकने वाला, स्वरयन्त्र के लिए अहितकर, कफ तथा पित्त विकार को जीतने वाला होता है॥ १२७॥
वक्तव्य —राजजम्बू को संस्कृत में 'फलेन्द्रा' तथा हिन्दी में 'फरेना' कहते हैं। इसके अतिरिक्त जामुन के ये भेद पाये जाते हैं—शुद्रजम्बू, काकजम्बू, भूमिजम्बू तथा जलजम्बू। 'राजजम्बू का ही वर्णन महाकवि कालिदास ने मेघदूत में इस प्रकार किया है—'श्यामजम्बूवनान्ताः'। ( पूर्वमेघ )
वातपित्ताम्रकृद्वालं, बद्धास्थि कफपित्तकृत्॥ १२८॥
गुर्वाग्रं वातजित्यक्वं स्वाद्वस्तं कफशुक्रकृत्।
आम का वर्णन —जिसमें अभी गुठली नहीं पड़ी हो ऐसा बाल ( छोटा ) आम वातकारक, पित्तकारक तथा रक्तधातु को दूषित करता है। गुठली पड़ जाने पर अर्थात् कुछ बड़ा होने पर वह कफकारक तथा पित्तकारक होता है। पका हुआ आम पाक में गुरु, वातनाशक, स्वाद में मधुर होता है। पका हुआ खट्टा आम कफकारक तथा शुक्रवर्धक होता है॥ १२८॥
वृक्षाम्भं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्च्लेष्महरं लघु॥ १२९॥
वृक्षाम्भ का वर्णन —वृक्षाम्भ ( विषाविल, कोकम ) का फल ग्राही, रूक्ष, उष्णवीर्य, वात तथा कफदोष नाशक तथा पाचन में लघु होता है॥ १२९॥
वक्तव्य —इसकी उत्पत्ति कोकण, कनारा आदि दक्षिणी प्रान्तों में होती है। बीज निकाल कर सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहते हैं। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है। इसे कोकम का घी या तेल कहते हैं। यह तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण होता है। इसके छिलकों की चटनी बनायी जाती है।
८ अ० ह०