अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
अतिसार, रक्तातिसार आदि में इसका फाण्ट ( चाय ) बनाकर दिया जाता है तथा पित्तजनित विकारों में इसे घोलकर इसका शरबत बनाकर दिया जाता है। इससे लाभ भी होता है।
शम्या गुरुष्णं केशधन् रूक्षम्—
शमी का फल—यह पाक में गुरु, उष्णवीर्य, केशनाशक तथा रूक्ष होता है।
बक्तव्य—शमी को हिन्दी में 'छोंकर' कहते हैं। इसका वर्णन 'भानप्रकाश' तथा 'धन्वन्तरि' निघण्टुओं में भी आया है। यह छोटी-बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है। धार्मिक कार्यों में इसका बड़ा महत्त्व है। इसकी कच्ची फलियों का शाक बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाया जाता है, दशहरा के पुण्य पर्व पर इस वृक्ष की पूजा की जाती है। विशेष देखें—च.सू. २७।१५९; सु.सू. ४६।१९३।
—पीलु तु पित्तलम्। कफवातहरं भेदि प्लीहार्षःकृमिगुल्मनतु॥ १३०॥ सतित्तं स्वादु यत्पीलु नात्युष्णं तत्त्रिदोषपजित्।
पीलु का फल—यह पित्तकारक, कफ तथा वात नाशक, मलभेदक ( दस्तावर ), प्लीहारोग, अशौरीग, क्रिमिरोग तथा गुल्मरोग नाशक होता है। जो पीलु कुछ तीता एवं मधुर होता है, वह अधिक उष्ण नहीं होता और वह त्रिदोषनाशक भी होता है॥१३०॥
बक्तव्य—इसके वृक्ष राजस्थान, बिहार, कोंकण, दक्षिणप्रदेश, कर्नाटक, बलुचिस्तान आदि सूखे स्थानों में पाये जाते हैं। यह पीलु छोटा-बड़ा भेद से दो प्रकार का होता है।
त्वक्तिकटुका स्निग्धा मातुलुङ्गस्य वातजित्॥ १३१॥
बृंहणं मधुरं मांसं वातपित्तहरं गुरु। लघु तलेसरं कासश्वासहिध्याममात्ययान्॥ १३२॥ आस्यशोषानिलरूक्षम्बिबन्धच्छयीरोचकान्। गुल्मोदराश्वःशूलानि मन्दाग्निर्व च नाशयेत्॥
मातुलुंग ( बिजौरा नीबू ) की त्वचा—यह तित्त एवं कटु होती है और स्निग्ध तथा वातनाशक होती है। उसका मांस ( गूदा ) बृंहण, मधुर, वात तथा पित्त नाशक और गुरु होता है। बिजौरानीबू का केशर लघु, कास, श्वास, हिचकी, मदात्यय, मुखशोष, वातरोग, कफरोग, विबन्ध ( कञ्चित्त ), वमन, अरोचक, गुल्मरोग, उदररोग, अशौरीग, शूलरोग एवं मन्दाग्नि का विनाश करता है॥१३१-१३३॥
बक्तव्य—नैनीताल, अलमोड़ा आदि पर्वतीय स्थानों में 'बिजौरानीबू' पर्याप्त रूप में पाया जाता है। इसका छिलका बाहरी और भीतरी भेद से दो प्रकार का कहा गया है। बाहरी छिलका को त्वक्, भीतरी छिलका को मांस और उसके भीतर मिलने वाले अम्ल पदार्थ को केसर कहा गया है। अब आप इसका अर्थ इस प्रकार लगायें—बाहरी छिलका को अत्यन्त पतला छीलकर फेंक दिया जाता है, उसके गुण हैं—'त्वक्तिका'...'वातजित्'। इस बाहरी छिलका में तेल का अंश पाया जाता है, जो छीलने बाने के हाथ में लग जाता है। इसका वह भाग जिसे बाभट ने 'मांस' कहा है, इसे मित्रमण्डली या परिजनों के साथ बैठकर खाया जाता है, जिसे 'सीगात' = 'स्वागत' माना जाता है। यह अत्यन्त कोमल तथा मधुर होता है।
इसी का एक भेद 'मतकाकड़ी' भी है, जिसे आयुर्वेद में 'मधुकर्कटी' कहा है। इसके विपरीत जो निघण्टु-ग्रन्थों में इसे चकोतरा कहा है, यह भ्रम है। आप देखें—मधुकर्कटी और मतकाकड़ी शब्दों में कितना साम्य है? इसी प्रकार बिजौरानीबू और मतकाकड़ी में क्रमशः छोटे-बड़े मात्र का अन्तर है। इसी बहाने आप पर्वतीय यात्रा करें और देखें—इन दोनों फलों को। 'चकोतरा' जिसे कहते हैं, उसका बाह्य का छिलका फेंक दिया जाता है और भीतर का केशर मीठा होने के कारण खाया जाता है। उक्त बिजौरानीबू तथा मतकाकड़ी का केशर अत्यन्त खट्टा होता है। ये दोनों के परस्पर विभेदक लक्षण हैं।
भरलातकस्य त्वइमांसं बृंहणं स्वादु शीतलम्। तदस्य्यग्रिसमं मेधयं कफवातहरं परम्॥ १३४॥