अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षररूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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भिलावा का वर्णन —भिलावा का छिलका तथा गूदा बृहण ( शरीर को स्थूल करने वाला ), रस में मधुर तथा शीतवीर्य होता है। भिलावा की गुठली अग्नि के समान तीक्ष्ण ( दाहक ), बुद्धिवर्धक एवं अत्यन्त कफ एवं वातनाशक होती है ॥ १३४ ॥
वक्तव्य —भिलावा के फल हृदयाकृति होने पर भी ये दो भागों में मूलतः विभक्त होते हैं। जब इसका ऊपरी भाग दाहक होता है और नीचे का भाग पकी नारंगी के सदृश हो जाता है, तब उसे खाया जाता है। इसी का वर्णन ऊपर प्रथम पंक्ति द्वारा किया गया है।
स्वाद्भ्रम्लं शीतमृण्णं च द्विधा पालेवतं गुरु। रुच्यमत्यग्निशमनं—
पारेवत का वर्णन —पारेवत मधुर तथा अम्ल भेद से दो प्रकार का होता है। मीठा पारेवत शीतवीर्य होता है तथा अम्लपारेवत उष्णवीर्य होता है। ये दोनों पारेवत पाचन में गुरु, रचिकाकारक तथा अत्यग्नि ( भस्मक रोग ) का शमन करते हैं।
वक्तव्य —उक्त गुण-धर्मों से युक्त द्रव्य को चरक ने 'पारावत' कहा है। देखें—च.सू. २७।१३४। यह फल कामरूप ( आसाम ) आदि देशों में पाया जाता है ( चक्रपाणि )
—रुच्यं मधुरमारुकम् ॥ १३५ ॥
पक्वमाशु जरां याति नात्युष्णगुरुदोषलम्।
आरुक-फल का वर्णन —आडुफल रचिकाकारक तथा रस में मधुर होता है। यह पका हुआ शीघ्र पच जाता है। यह अधिक गरम नहीं होता किन्तु गुरु तथा दोषकारक होता है ॥ १३५ ॥
वक्तव्य —यह पर्वतीय क्षेत्रों का फल है। इसके अनेक भेद-उपभेद होते हैं। तदनुसार ये वैशाख से पकने प्रारम्भ होते हैं और जातिभेद से आश्विन तक पकते रहते हैं। अब इसकी कुछ जातियों मैदानी भागों में भी पायी जाने लगी है, फिर भी पर्वतीय जल-वायु का स्वाद कुछ और ही होता है।
द्राक्षापरुषकं चार्द्रमम्लं पित्तकफप्रदम् ॥ १३६ ॥
गुरुष्णवीर्यं वातघ्नं सरं सकरमर्दकम्।
कच्चे दाख आदि का फल —द्राक्षा ( मुनक्का ) एवं परुषक ( फालसा ) के कच्चे फल स्वाद में बट्टे होते हैं। ये पित्त तथा कफ वर्धक होते हैं।
करमर्द ( करौदा ) के कच्चे फल —यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, वातनाशक तथा सर होते हैं ॥ १३६ ॥
तथाऽम्लं कोलकर्कन्धुलकुचाग्नातकारकम् ॥ १३७ ॥
ऐरावतं दन्तशठं सतूदं मृगलिण्डिकम्। नातिपित्तकरं पक्वं शुष्कं च करमर्दकम् ॥ १३८ ॥
कोल-कर्कन्धु-वर्णन —कोल ( बड़ा बेर ) तथा कर्कन्धु ( छोटे बेर ), लकुच ( बड़हल ), आग्नातक ( आमड़ा ), ऐरावत ( नारंगी—वै० नि० ), दन्तशठ ( जम्बीरीनीबू ), तूद ( शहतूत ), मृगलिण्डिक ( बड़े शहतूत )—ये सभी फल कच्ची दाख के समान गुण-धर्म वाले होते हैं। इनमें सूखा तथा पका हुआ करौदा अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १३७-१३८ ॥
दीपनं भेदनं शुष्कमम्लीकाकोलयोः फलम्। तृष्णाश्रमकलमच्छेदि लच्चिष्टं कफवातयोः ॥
इमली तथा बेर के सूखे फल —ये अग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा मलमेदक ( दस्तावर ) होते हैं। ये दोनों प्यास, शारीरिक एवं मानसिक थकावट को दूर करते हैं, कफ तथा वातविकार में लाभदायक होते हैं एवं पाचन में लघु होते हैं ॥ १३९ ॥
फलानामबरं तत्र लकुचं सर्वदोषकृतम्।
बड़हर के फल —फलों में बड़हर का फल अधम गुणों वाला होता है तथा यह वात आदि सभी दोषों को उभाड़ने वाला होता है।