भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

११६

अष्टाङ्गहृदये

हिमानलोष्णदुर्वातव्यालालाविद्दूषितम् ॥ १४० ॥

जन्तुजुष्टं जले मयमभूमिजमनार्तवम्। अन्यधान्ययुतं हीनवीर्यं जीर्णतयाऽति च ॥ १४१ ॥

धान्यं त्यजेतथा शाकं रूक्षसिद्धमकोमलम्। असञ्जातरसं तद्रुच्छुष्कं चान्यत्र मूलकात् ॥ १४२ ॥

प्रायेण फलमयेवं तथाऽऽमं बिल्ववर्जितम्।

इति फलवर्गः।

त्याज्य धान्य, शाक एवं फल—हिम (बरफ) गिरने से, ओले पड़ने से, कड़ी धूप लगने से आग से झुलस जाने से, दूषित वायु के स्पर्श से, सौप या अन्य जहरीले प्राणियों की लार के लग जाने से, कीड़े पड़ जाने से, जल में डूब जाने से, विपरीत-(अपने प्रतिकूल) गुणों वाली भूमि में उत्पन्न होने से, विपरीत ऋतु में उत्पन्न होने से, विपरीत गुणवाले धान्य (अनाज) के साथ मिला देने से, शक्तिहीन हो जाने से अथवा अधिक पुराने हो जाने से धान्य अपने गुणों से रहित हो जाते हैं। ऐसे धान्यों का सेवन न करें। इसी प्रकार के शाक भी त्याज्य होते हैं तथा जो शाक घी-तेल स्नेहों से बिना छोड़े ही बनाये गये हों और जो कोमल न हों वे भी अखाद्य होते हैं। जिन शाकों में स्वाभाविक रस, गुण आदि की उत्पत्ति न हुई हो अथवा जो शाक सूख गये हों वे भी खाने योग्य नहीं होते।

सुखाये गये कन्दशाक (मूली आदि) खाये जा सकते हैं। जैसा कि इसी अध्याय के १०५वें पद के पूर्वार्ध में कहा गया है। इसी प्रकार के फल भी खाने योग्य नहीं होते, किन्तु सुखाया गया कच्चा बेग का फल खाया जा सकता है, अन्य कच्चे फलों को नहीं खाना चाहिए ॥ १४०-१४२ ॥

अथौषधवर्गः

विष्यन्दि लवणं सर्वं सूक्ष्मं सूक्ष्ममलं मृदु ॥ १४३ ॥

वातघ्नं पाकिं तीक्ष्णोष्णं रोचनं कफपित्तकृतं।

फलों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से विविध प्रकार के लवणों का वर्णन प्रारम्भ होता है।

लवण-सामान्य के गुण—ये विष्यन्तकारक अर्थात् अभिष्यन्दी, सूक्ष्म, मल को सरकाने वाले, मृदु, वातविकारनाशक, भोजन को पचाने वाले, तीक्ष्ण, उष्ण, रुचि को बढ़ाने वाले और कफ तथा पित्तकारक होते हैं ॥ १४३ ॥

वक्तव्य—सूक्ष्म लवण (नमक) छोटे से भी छोटे घ्रोतों में प्रवेश कर जाते हैं, यही कारण है कि नाडीव्रणविनाशक मलहमों में घृत, मधु तथा लवण आदि द्रव्यों का प्रमुख रूप से प्रयोग होता है। पाकि—बनने हुए भोजन (दाल आदि) को शीघ्र गला देता है, पकने के बाद आहार को पचाता है और व्रणशोथ (फोड़े) को भी पका देता है।

सैन्धवं तत्र सस्वादु वृष्यं हृद्यं त्रिदोषनृतं ॥ १४४ ॥

लघ्वनुष्णं वृशः पथ्यमविदाहृश्रिदीपनम्।

सैंधानमक के गुण—सभी नमकों में सैंधानमक तीक्ष्णता की कमी के कारण कुछ मधुर, वीर्यवर्धक हृदय के लिए हितकर, त्रिदोषशामक, लघु, कुछ उष्णवीर्य वाला, नेत्रों के लिए हितकारी, अविदाही (पथ्य विदाहकारक नहीं होता) होने पर भी जठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १४४ ॥

लघु सौवर्चलं हृद्यं सुगन्धयुत्तारशोधनम् ॥ १४५ ॥

कटुपाकं विबन्धनं दीपनीयं रुचिप्रदम्।

सौवर्चलनमक के गुण—इसी को 'सञ्जीवार' कहते हैं। यह लघु, हृदय के लिए हितकर, सुगन्धित, उद्गार (डकार) को शुद्ध करने वाला, विपाक में कटु, मल-मूत्र की रकावट को हटाने वाला, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला तथा रुचिकारक होता है ॥ १४५ ॥