भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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ऊर्ध्वधःकफवातानुलोमं दीपनं विडम् ॥ १४६ ॥

विवध्नातहविष्टम्भशूलगौरवनाशनम् ।

विड ( बिरिया ) नमक के गुण—इसका सेवन करने से कफ ऊपर की ओर से निकलने लगता है और अपानवायु नीचे की ओर से निकलता है अर्थात् यह कफ एवं वायु की गति का अनुलोमन करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है, मल-मूत्र की रूकावट, आनाह, विष्टम्भ ( आंतों की गति की रूकावट को ), शूल तथा भारीपन का नाश करता है ॥ १४६ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने इसे कफ का अनुलोमक नहीं कहा है, केवल वातानुलोमक ही कहा है। देखें—सू. सू. ४६।३१६। आचार्य डल्हन कहते हैं—यह नमक घ्रोतों की शुद्धि करता है, अतएव रूका हुआ वातदोष अनुलोम हो जाता है। कुछ टीकाकारों ने सौवर्चल लवण को कालानमक स्वीकार किया है। जो विडलवण को 'कालानमक' कहते हैं, यह कुत्रिम नमक है।

कालानमक-निर्माणविधि—४०, सेर संधानमक, हरड के छिलके, आंवला का सूखा गुदा और सज्जीबार—ये द्रव्य प्रत्येक आधा-आधा सेर लेकर किसी लोहे या मिट्टी के पात्र में मिलाकर पकाते हैं। जब हरड तथा आंवला गलकर मिल जाता है, तो शीतल होने पर नमक निकाल लिया जाता है। इसी को मराठी में 'पादेलोण' कालानमक कहते हैं।

सौवर्चल लवण—कुछ विद्वानों ने इसे 'कालालवण' माना है। फारसी में सोंचरनमक को ही 'नमकस्याह' कहते हैं। कुछ लोगों का मत है कि जो सौवर्चलनमक गन्धरहित होता है। वह 'कालालवण' है। डॉ० देसाई कहते हैं कि रसग्रन्थों में सौवर्चल 'शोरे' को कहते हैं। श्री द.अ. कुलकर्णी जी कहते हैं—जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त होता है, उसे लुनिया मिट्टी कहते हैं, इसमें कुछ मात्रा नमक की भी रहती है। शोरा के साथ प्राप्त होने के कारण इसे सोंचर या सौवर्चल कहते हैं। अस्तु।

विपाके स्वादु सामुद्रं गुरु श्लेष्मविवर्धनम् ॥ १४७ ॥

सामुद्र लवण के गुण—समुद्रलवण ( समुद्र के जल को सुखाकर बनाया गया नमक ) रस में नमकीन किन्तु विपाक में मधुर, गुरु तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ १४७ ॥

सत्तिकटुकक्षारं तीक्ष्णमुक्लेदि चौद्धिदम्।

औद्धिदलवण के गुण—औद्धिदलवण ( रेह या ऊषर नमक ) कुछ तित्त एवं कटु रस वाला, क्षार गुण युक्त, तीक्ष्ण तथा क्लेदकारक होता है।

वक्तव्य—रेह मिट्टी को जल में घोलकर उस पानी को सुखाकर जो नमक तैयार किया जाता है, उसे औद्धिद लवण कहते हैं। जिससे घोबी कपड़े धोते हैं, वही रेह मिट्टी है।

कृष्णे सौवर्चलगुणा लवणे गन्धवर्जिताः ॥ १४८ ॥

कृष्णलवण के गुण—इसमें सोंचर नमक के समान गुण होते हैं, किन्तु उसकी जैसी गन्ध इसमें नहीं होती है ॥ १४८ ॥

रोमकं लघु, पांसुत्थं सक्षारं श्लेष्मलं गुरु।

रोमकलवण के गुण—इसकी उत्पत्ति धूलि से होती है। यह लघु, कुछ खारा, कफकारक तथा गुरु होता है।

वक्तव्य—इसी वर्ग में सज्जीबार तथा सोराखार भी आते हैं। इसी को संस्कृत में सुवर्चिकाक्षार ( कलमीसोरा ) भी कहते हैं।

लवणानां प्रयोगे तु सैन्धवादि प्रयोजयेत् ॥ १४९ ॥