अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें११८
अष्टाङ्गहृदये
सामान्य निर्देश —जहाँ केवल इस प्रकार का शास्त्रनिर्देश हो कि इस योग में लवण का प्रयोग करें, वहीं निश्चित होकर सैन्धवलवण का प्रयोग करना चाहिए॥ १४९॥
बक्तव्य —जहाँ एक लवण का प्रयोग करना हो वहाँ सैन्धवलवण का, जहाँ दो नमकों का प्रयोग करना हो; जैसे—हिम्बष्टकचूर्ण में 'द्विपटु', यहाँ १. सैन्धव तथा २. सौवर्चल का. जहाँ तीन लवणों का प्रयोग करना हो वहाँ—१. सैन्धव, २. सौवर्चल, ३. विड का प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार चतुर्लवण तथा पञ्चलवण का भी प्रयोग करना चाहिए। चरक ने 'सैन्धव लवणानां हिततमम्' ( च.सू. २५।३८ ) तथा 'ऊपर लवणानामहिततमम्' ( च.सू. २५।३९ ) अर्थात् सभी नमकों में सैन्धानमक उत्तम होता है और ऊपर नमक अहित होता है।
गुल्महृदयग्रहीपाण्डुप्लीहानाहगुलामयान्। श्वासार्शःकफकासांश्च शमयेद्यश्चकूजः॥ १५०॥
यवक्षार के गुण —यवक्षार ( जीवार ) गुल्मरोग, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, प्लीहारोग, आनाह ( अफरा रोग ), स्वरयन्त्र के रोग, श्वासरोग, अशरिग, कफरोग तथा कासरोग को नष्ट करता है॥ १५०॥
क्षारः सर्वश्व परमं तीक्ष्णोष्णः कृमिजिल्लघुः। पितासुन्दृषणः पाकी छेद्यहृद्यो विदारणः॥
अपथ्यः कटुलावण्याच्छूक्रीजःकेशचक्षुषाम्।
सभी प्रकार के क्षार —सभी क्षार अत्यन्त तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमिनाशक तथा लघु होते हैं। वे पित्त तथा रक्त को दूषित करते हैं; आहार तथा व्रणशोथ ( फोड़ा ) को पका देते हैं। छेदक ( अर्ध के मसों एवं बालों की जड़ों को काट देते ) हैं, हृदय के लिए अहितकर हैं, पके हुए व्रणशोथ को पका देते हैं, कटु तथा लवण रस-प्रधान होने के कारण ये शुक्र, ओजस, केश तथा नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं॥ १५१॥
बक्तव्य —पलाश ( ढाक ) अथवा अर्क ( मदार ) की सूखी लकड़ियों को आग से जला दें। उक्त भस्म को लेकर चौगुना जल डालकर मिट्टी के पात्र में रातभर रहने दें। इस प्रकार राख नीचे जम जायेगी और क्षारयुक्त जल ऊपर रहेगा, इसे सावधानी के साथ दूसरे पात्र में ले लें। इस जल को अग्नि पर रखकर सुखायें। सूखने पर सफेद रंग का क्षार मिलेगा, उसे खुरच कर रख लें। क्षार तैयार है। यह दो प्रकार का होता है—१. प्रतिसारणीय क्षार चूर्णरूप में और २. पानीय क्षार क्वाथ के रूप में। विशेष देखें—सू.नू. ११ सम्पूर्ण। क्षारों का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। देखें—च.वि. १।१५। और भी देखें—'क्षारपुस्तकोपधातिनां श्रेष्ठः' ( च.सू. २५।४० ) इनका अधिक सेवन करने से पुरुष नपुंसक हो जाता है।
हिङ्गु वातकफानाहशूलज्घ्नं पित्तकोपनम्॥ १५२॥
कटुपाकरसं रुच्यं दीपनं पाचनं लघु।
हींग का वर्णन —वातज रोगों, कफज रोगों, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों को यह नष्ट करती है, पित्त को प्रकृपित करती है तथा विपाक एवं रस में कटु होती है। हींग रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, पाचक तथा लघु है॥ १५२॥
बक्तव्य —हींग अनेक प्रकार की पायी जाती है, उन सबमें १. हीरा हींग और २. तलाव हींग अच्छी होती है। आजकल नकली हींग की प्राप्ति अच्छी हींग की तुलना में अधिक है। हींग के वृक्ष काबुन फारस, अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में अधिक पाये जाते हैं। इन वृक्षों की गोंद को ही हींग कहते हैं। देशी हींग की तुलना में काबुली हींग उत्तम होती है। अच्छी हींग को पानी में घिसने से दुधिया घोल बनता है, दूसरों का नहीं, यही इसकी पहचान है।
कषाया मधुरा पाके रूक्षा विलवणा लघुः॥ १५३॥
दीपनी पाचनी मेध्या वयसः स्थापनी परम्। उष्णवीर्या सराऽऽयुष्या बुद्धीन्द्रियबलप्रदा
कृच्छ्रवैवर्ण्यवैस्वर्यपुराणविषमज्वरान्। शिरोऽक्षिपाण्डुहृद्वोगकामलाग्रहणीगदान्॥ १५४॥