भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अवस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

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सशोषशोफातीसारमेदमोहवमिक्रिमीन् । श्वासकासप्रसेकाशः प्रीहानाहगरोदरम् ॥ १५६ ॥

विबन्धद्वोत्तरां गुल्ममूरुस्तम्भमरोचकम् । हरीतकी जयेद्व्याघीर्स्तांताश्च कफवातजान् ॥ १५७ ॥

हरीतकी का वर्णन—यह रस में कसैली, विपाक में मधुर, गुण में रुक्ष, केवल लवण रस से रहित अर्थात् लवण के अतिरिक्त इसमें शेष सभी रस रहते हैं। यह लघु, अग्नि को दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, बुद्धिवर्धक है, दीर्घायु प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है, उष्णवीर्य है, सर (रेचक), आयु के लिए हितकर, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियों को बल देने वाली है।

यह कुष्ठरोग, विवर्णता, स्वरभेद, जीर्णज्वर, विषमज्वर, शिरोरोग, नेत्ररोग, पाण्डुरोग, हृदयरोग, कामलारोग, ग्रहणीरोग, शोष (राजयश्मा), सूजन, अतिसार, मेदोरोग, मोह (मूच्छी), वमन, क्रिमिरोग, श्वास, कास, प्रसेक (लालाप्ताव तथा योनिप्ताव), अशौरोग, प्लीहारोग, आनाह (अफरा), गरविव, उदररोग, घ्रोतों की रूकावट, गुल्मरोग, ऊहस्तम्भ तथा अरोचक आदि कफज एवं वातज रोगों का विनाश करती है ॥ १५३-१५७ ॥

वक्तव्य—आयुर्वेदशास्त्र में हरीतकी (हरड), लहसुन तथा शिलाजीत इन तीन द्रव्यों का विशेष महत्त्व है। हरीतकी की तो यहाँ तक प्रशंसा की गयी है—‘कदाचित् कृष्यति माता नोदरस्या हरीतकी’। अर्थात् माता तो अपने बालक पर कभी रुष्ट हो भी सकती है, परन्तु पेट के भीतर गयी हुई हरीतकी कभी कुपित नहीं होती। सम्भव यह इसके गुणों की वास्तविकता है, न कि अतिशयोक्ति।

तद्वदामलकं शीतमम्लं पित्तकफापहम्।

आमलक का वर्णन—आँवला के गुण भी हरीतकी (हरड) के समान ही होते हैं, परन्तु आँवला शीतवीर्य होता है तथा रस में अम्ल (खट्टा) होता है। यह पित्त तथा कफ का विनाशक होता है।

कटु पाके हिमं केश्यमक्षमीषच्च तदगुणम् ॥ १५८ ॥

बिभीतक का वर्णन—यह भी हरीतकी के समान गुण-धर्मों वाला होता है, किन्तु यह विपाक में कटु, केशों के लिए हितकर होता है, फिर भी हरीतकी तथा आँवला से कुछ कम गुण वाला होता है ॥ १५८ ॥

वक्तव्य—हरड, बहेड़ा, आँवला का सम्मिलित नाम त्रिफला है। तत्वान्तर में कहा है—‘अभयैका प्रदातव्या द्वावेव तु बिभीतकौ। धात्रीफलानि चत्वारि त्रिफलेयं प्रकीर्तिता’ ॥ अर्थात् एक हरीतकी, दो बहेड़ा और तीन आँवला—इनको इस अनुपात में मिलाकर त्रिफला का निर्माण होता है।

इयं रसायनवरा त्रिफलाऽक्षयामयापहा। रोपणी त्वगदक्लेदमेदोमेहकफाघ्नजित् ॥ १५९ ॥

त्रिफला का वर्णन—उक्त तीनों फलों के विधिवत् मिश्रण का नाम ‘त्रिफला’ है। यह उत्तम कोटि का रसायन है। यह नेत्ररोगों का विनाश करती है, ब्रणरोपण, त्वचा में होने वाली सड़न, मेदोदोष, प्रमेह, कफज रोग एवं रक्तज रोगों का विनाश करती है ॥ १५९ ॥

सकेसरं चतुर्जातं त्वकत्रैलं त्रिजातकम्। पित्तप्रकोपि तीक्ष्णोष्णं रुक्षं रोचनदीपनम् ॥ १६० ॥

त्रिजात का वर्णन—दालचीनी, तेजपत्ता और बड़ी इलायची इन तीन द्रव्यों के संयोग का नाम ‘त्रिजात’ या ‘त्रिजातक’ है। ये दोनों शब्द शास्त्रीय प्रयोगों में पाये जाते हैं।

चतुर्जात का वर्णन—उक्त त्रिजात में नागकेसर द्रव्य को मिला देने से इसे ‘चतुर्जात’ या ‘चतुर्जातक’ कहा जाता है। उक्त योगों के गुण-धर्म—ये पित्तवर्धक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुक्ष, अग्नि को प्रदीप्त कर भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाते हैं ॥ १६० ॥

रसे पाके च कटुकं कफघ्नं मरिचं लघु।

मरिच (कालीमरिच) के गुण—यह रस एवं विपाक में कटु, कफनाशक तथा लघु होती है।

श्लेष्मला स्वादुशीताऽऽर्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ॥ १६१ ॥

सा शुष्का विपरीताऽतः स्निग्धा वृष्या रसे कटुः। स्वादुपाकाऽनिलश्लेष्मश्वासकासापहा सरा ॥