अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
न .तामत्युपयुज्जीत रसायनविधिं विना।
पिप्पली के गुण—हरी पिप्पली कफकारक, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, देर में पचने वाली तथा कुछ स्निग्ध होती है। बही पिप्पली जब सूख जाती है तो उक्त गुणों से विपरीत हो जाती है। तब यह स्निग्ध, वीर्यवर्धक, रस में कटु और विपाक में मधुर होती है। यह वातनाशक, कफनाशक, श्वास तथा कास नाशक एवं सर ( मलभेदक ) है। 'पिप्पलीरसायन' विधि के अतिरिक्त पिप्पली का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए॥ १६१-१६२॥
बक्तुध्य—चरक में भी इसके अधिक सेवन का निषेध किया है। देखें—च.वि. १।१५।
नागरं दीपनं वृष्यं ग्राहि हृद्यं विबन्धयत्॥ १६३॥
रुच्यं लघु स्वादुपाकं स्निग्धोष्णं कफवातजित्।
नागर ( सोठ ) के गुण—यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, वीर्यवर्धक है, मल को बाँधता है, हृदय के लिए हितकर है। सोठों को शुद्ध करता है, रुचिवर्धक, लघु, विपाक में मधुर, स्निग्ध, उष्ण, कफ तथा वात नाशक है॥ १६३॥
तद्वदार्कमेतच्च त्रयं त्रिकटुकं जयेत्॥ १६४॥
स्थौल्याग्निसदनश्वासकासश्चोपदीनसान् ।
आर्द्रक के गुण—सोठ के समान ही इसके भी गुण होते हैं। ये तीनों ( सोठ, मरिच, पीपल ) मिलकर 'त्रिकटु' कहे जाते हैं। इसी को 'कटुत्रय' या 'त्र्युष्ण' भी कहते हैं।
त्रिकटु के गुण—यह स्थूलता ( मोटापा ), मन्दाग्नि, श्वास, कास, श्लोपद ( फीलपाँव ) तथा पीनस रोगों का विनाश करता है॥ १६४॥
चविकापिप्पलीमूलं मरिचाल्पातन्तरं गुणेः॥ १६५॥
चव्य तथा पीपलामूल के गुण—चव्य तथा पीपलामूल ये दोनों द्रव्य गुणों में मरिच के गुणों से कुछ ही कम हैं अर्थात् लगभग वैसे ही गुणों वाले होते हैं॥ १६५॥
चित्रकंऽग्निस्मः पाके शोफार्शःकूमिकुष्ठहा।
चित्रक के गुण—चित्रक के जड़ की छाल पाक में अग्नि के समान है। यह शोफ ( सूजन ), अर्श ( बवासीर ), क्रिमिरोग तथा कुष्ठरोग का विनाश करती है।
पञ्चकोलकमेतच्च मरिचैन विना स्मृतम्॥ १६६॥
गुल्मप्रीहोदरानाहशुलघ्नं दीपनं परम्।
पञ्चकोल के गुण—यह 'पञ्चकोल' के संयोग के बिना ही माना गया है अर्थात् इस योग में—पीपल, सोठ, चव्य, पीपलामूल और चीता की छाल ये ५ द्रव्य हैं। यह गुल्म, प्लीहारोग, उदररोग, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों का विनाशक है और उत्तम अग्निदीपक है॥ १६६॥
बक्तुध्य—श्लोक १६१ से १६६ तक में वर्णित द्रव्यों में से मरिच को छोड़कर शेष कहे गये द्रव्यों के योग का नाम 'पञ्चकोल' है, क्योंकि इस योग में इन द्रव्यों की मात्रा १-१ कोल ( आधा-आधा तोला ) होती है। इस 'पञ्चकोल' में यदि मरिच का संयोग कर दिया जाता है, तो इसे 'षडुष्ण' कहते हैं अर्थात् छः उष्ण द्रव्यों का योग।
बिल्वकाशमर्यतकारीपाटलाटिण्टुकैर्महत् ॥ १६७॥
जयेत्कषायतित्कोष्णं पञ्चमूलं कफानिली।
बृहत्पञ्चमूल के योग—बेल की गिरी, गम्भार, अरणी, पाडल तथा सोनापाठा की छाल—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'बृहत्पञ्चमूल' है। यह रस में कषाय, तित्तक तथा उष्णवीर्य होता है। यह कफ एवं वात विकारों का विनाशक होता है॥ १६७॥