भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

१११

हृत्स्वं बृहत्त्वशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम् ॥ १६८ ॥ स्वादुपाकरसं नातिशीतोष्णं सर्वदोषजित्।

लघुपञ्चमूल के गुण—वनभण्टा, कण्टकारी, शालपर्णी, पुष्पिपर्णी एवं गोखरू—इस योग को लघुपञ्चमूल कहते हैं। यह विपाक एवं रस में मधुर, समशीतोष्ण तथा सभी दोषों का शामक है ॥ १६८ ॥

बलापुनर्नैर्रण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु ॥ १६९ ॥ मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं सरम्।

मध्यमपञ्चमूल के गुण—बला, पुनर्वा, रेड की जड़, माषपर्णी और मुद्रापर्णी—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'मध्यमपञ्चमूल' है। यह कफ तथा वात दोष का नाशक तथा सर होता है। यह अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १६९ ॥

अभीरुवीराजीवन्तीजीवकपैभकैः स्मृतम् ॥ १७० ॥ जीवनाख्यं तु चक्षुष्यं वृष्यं पित्तानिलापहम्।

जीवनपञ्चमूल के गुण—शतावरी, मेदा, जीवन्ती, जीवक और ऋषभक—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'जीवनपञ्चमूल' है। यह आँखों के लिए हितकर, वीर्यवर्धक, पित्तदोष तथा वातदोष का शमन करता है ॥ १७० ॥

तृणाख्यं पित्तजिह्बर्भकासेक्षुशरशालिभिः ॥ १७१ ॥ इत्यौषधवर्गः ।

तृणपञ्चमूल के गुण—दर्भ (डाभ या कुश), कास (काँस), ईख की जड़, शर (सरपत) और शालिधानों की जड़—इनके योग का नाम 'तृणपञ्चमूल' है। यह पित्तशामक होता है ॥ १७१ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में दो पञ्चमूलों का संग्रह और मिलता है। यथा—बल्लीपञ्चमूल—मेदासिंगी, हल्दी, विदारीकन्द, सारिवा तथा गिलोय। दूसरा है कण्टकपञ्चमूल—गोखरू, शतावरी, कटसरैया, अर्हीस तथा करौदा। देखें—अ.सं.सू. ११।६१-६२।

शूकशिम्वीजपक्वान्नमांसशाकफलीषधैः। वर्गितैरन्नलेशेऽयमुक्तो नित्योपयोगिकः ॥ १७२ ॥

इति श्रीवैद्यपतिंसिंहगुप्तसूत्रोपनिषद्भाष्यविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नस्वरूपविज्ञानीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


उपसंहार—१. शूकधान्यवर्ग, २. शिम्वीधान्यवर्ग, ३. पक्वान्नवर्ग, ४. मांसवर्ग, ५. शाकवर्ग, ६. फलवर्ग और ७. औषधवर्ग—इस प्रकार के वर्गीकरण द्वारा आहारद्रव्यों का लेशमात्र (अत्यन्त उपयोगी द्रव्यों का) वर्णन यहाँ कर दिया गया है ॥ १७२ ॥

वक्तव्य—उक्त वर्गों के बीच-बीच में कुछ अन्य वर्गों का भी वर्णन इस अध्याय में हुआ है। यथा—'फलवर्ग' के अन्त में 'लवणवर्ग', इसके बाद ही 'हिंगु' का वर्णन सहिताकार ने किया है। प्राचीन निघण्टु-ग्रन्थों में द्रव्यों का वर्गीकरण स्वतन्त्र रूप से देखा जाता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से बिभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में अन्नस्वरूपविज्ञानीय नामक छठा अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥


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