अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
१११
हृत्स्वं बृहत्त्वशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम् ॥ १६८ ॥ स्वादुपाकरसं नातिशीतोष्णं सर्वदोषजित्।
लघुपञ्चमूल के गुण—वनभण्टा, कण्टकारी, शालपर्णी, पुष्पिपर्णी एवं गोखरू—इस योग को लघुपञ्चमूल कहते हैं। यह विपाक एवं रस में मधुर, समशीतोष्ण तथा सभी दोषों का शामक है ॥ १६८ ॥
बलापुनर्नैर्रण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु ॥ १६९ ॥ मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं सरम्।
मध्यमपञ्चमूल के गुण—बला, पुनर्वा, रेड की जड़, माषपर्णी और मुद्रापर्णी—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'मध्यमपञ्चमूल' है। यह कफ तथा वात दोष का नाशक तथा सर होता है। यह अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १६९ ॥
अभीरुवीराजीवन्तीजीवकपैभकैः स्मृतम् ॥ १७० ॥ जीवनाख्यं तु चक्षुष्यं वृष्यं पित्तानिलापहम्।
जीवनपञ्चमूल के गुण—शतावरी, मेदा, जीवन्ती, जीवक और ऋषभक—इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम 'जीवनपञ्चमूल' है। यह आँखों के लिए हितकर, वीर्यवर्धक, पित्तदोष तथा वातदोष का शमन करता है ॥ १७० ॥
तृणाख्यं पित्तजिह्बर्भकासेक्षुशरशालिभिः ॥ १७१ ॥ इत्यौषधवर्गः ।
तृणपञ्चमूल के गुण—दर्भ (डाभ या कुश), कास (काँस), ईख की जड़, शर (सरपत) और शालिधानों की जड़—इनके योग का नाम 'तृणपञ्चमूल' है। यह पित्तशामक होता है ॥ १७१ ॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में दो पञ्चमूलों का संग्रह और मिलता है। यथा—बल्लीपञ्चमूल—मेदासिंगी, हल्दी, विदारीकन्द, सारिवा तथा गिलोय। दूसरा है कण्टकपञ्चमूल—गोखरू, शतावरी, कटसरैया, अर्हीस तथा करौदा। देखें—अ.सं.सू. ११।६१-६२।
शूकशिम्वीजपक्वान्नमांसशाकफलीषधैः। वर्गितैरन्नलेशेऽयमुक्तो नित्योपयोगिकः ॥ १७२ ॥
इति श्रीवैद्यपतिंसिंहगुप्तसूत्रोपनिषद्भाष्यविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नस्वरूपविज्ञानीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
उपसंहार—१. शूकधान्यवर्ग, २. शिम्वीधान्यवर्ग, ३. पक्वान्नवर्ग, ४. मांसवर्ग, ५. शाकवर्ग, ६. फलवर्ग और ७. औषधवर्ग—इस प्रकार के वर्गीकरण द्वारा आहारद्रव्यों का लेशमात्र (अत्यन्त उपयोगी द्रव्यों का) वर्णन यहाँ कर दिया गया है ॥ १७२ ॥
वक्तव्य—उक्त वर्गों के बीच-बीच में कुछ अन्य वर्गों का भी वर्णन इस अध्याय में हुआ है। यथा—'फलवर्ग' के अन्त में 'लवणवर्ग', इसके बाद ही 'हिंगु' का वर्णन सहिताकार ने किया है। प्राचीन निघण्टु-ग्रन्थों में द्रव्यों का वर्गीकरण स्वतन्त्र रूप से देखा जाता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से बिभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में अन्नस्वरूपविज्ञानीय नामक छठा अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातोऽन्नरक्षाध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से अन्नरक्षा नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
निरुक्ति —इस प्रकरण में 'अन्न' शब्द पकाकर तैयार किये गये तथा खाये जाने योग्य पदार्थों का वाचक है। यथा—'अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्'। इति मेदिनी। अन्यत्र इसके और भी अर्थ होते हैं। इसी अन्न की किस प्रकार और किसलिए रक्षा करनी चाहिए, यही इस अध्याय का प्रधान विषय है। यद्यपि आगे कहा जा रहा है कि राजा या महाराजा अपने घर के पास चिकित्सक के रहने की व्यवस्था करे।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ११, २१, २६; च.शा. ८; च.सि. १२; सु.सू. २०, २४; सु.शा. ४; सु.चि. २४; सु.क. १ तथा अ.सं.सू. ८-९ में देखें।
राजा राजगृहासत्रे प्राणाचार्य निवेशयेत्। सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्र प्रतिजागृविः ॥१॥
प्राणाचार्य की नियुक्ति —राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राजभवन के समीप शास्त्रज्ञ कुशल चिकित्सक को सदा रखे, उसकी नियुक्ति करे अथवा उसके रहने की व्यवस्था करे। ऐसा करने पर वह चिकित्सक राजा के आहार-विहार आदि के प्रति सदैव जागरूक (सचेष्ट) रहेगा ॥१॥
अन्नपानं विषादक्षेत्रिष्टिषेण महीपतेः। योगक्षेमौ तदायतौ धर्माद्या यन्निवन्धनाः ॥२॥
चिकित्सक का कर्तव्य —राजा या श्रीमान् पुरुष जिस अन्न-पान का सेवन करें, उसमें कहीं से किसी प्रकार विष का प्रयोग तो नहीं हुआ है, इसकी परीक्षा कर उनकी रक्षा चिकित्सक करता रहे। क्योंकि राजा की विधिपूर्वक रक्षा होने पर ही उससे योगक्षेम (जीविका एवं कुशलता) तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का लाभ प्राप्त हो सकता है ॥२॥
बन्धन्य —उक्त श्लोक में 'अन्नपान' एक प्रधान विषय कह दिया है, इसके अतिरिक्त वस्त्र, माला, गुलदस्ता, रूमाल, प्रसाधन-सामग्री आदि पर भी चिकित्सक को ध्यान रखना चाहिए। विषकन्याओं का प्रयोग होता था, आज भी उसके प्रकारान्तर हैं, इनसे सावधान रहें। वैसे शत्रुओं से सभी को सदा सावधान रहना चाहिए। महर्षि चाणक्य ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहा है—'न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्। कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गृहं प्रकाशयेत्' ॥ (चा.नी. २।६)
ओदनो विषवान् सान्द्रो यात्यविद्याव्यतामिव। चिरेण पच्यते पक्वो भवेत्सर्पुषितोपमः ॥३॥
मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छाप्रसेककृत। हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लिद्यते चन्द्रिकाचितः ॥४॥
विषैले भात के लक्षण —विष मिला हुआ भात कुछ गीला-सा रहता है, ऐसा लगता है, मानो उसमें से मीठ न निकाला गया हो। यदि पकते समय ही विष डाल दिया गया हो तो बावल देर से पकते हैं। यदि पके हुए भात में विष मिला दिया हो तो वह बासी भात जैसा दिखलायी देता है, उसमें से जो भाप निकलती है वह मोर के कण्ठ के समान वर्ण वाली (नीली) होती है। उस भाप के लगने से अथवा उस भात को खोलने से मोह, मूर्च्छा होती है तथा मुख से लार निकलने लगती है। वह विषैला भात अपने स्वाभाविक रूप तथा गन्ध वाला नहीं रह जाता है, उसमें गलन या सड़न-सी पैदा हो जाती है और उसमें चन्द्रिकाएँ जैसी दिखलायी पड़ती हैं ॥३-४॥
अन्तरक्षाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१२३
व्यञ्जान्याशु शृण्यन्ति ध्यामक्वायानि तत्र च । हीनाऽतिरिक्ता विकृता छाया दृश्यते नैव वा ॥ फेनोध्वराजीसीमन्ततन्तुबुद्धसम्भवः । विच्छिन्नविरसा रागाः खाण्डवाः शाकमाभिषम् ॥ ६ ॥
विषैले व्यञ्जनो के लक्षण—विष युक्त व्यंजन ( शाक-तरकारी आदि ) जल्दी सूख जाते हैं और उनके रस मलिन पड़ जाते हैं। उन रसों में यदि छाया दिखलायी भी पड़ती है, तो वह हीन अंगों वाली या अतिरिक्त अंगों वाली अथवा विकृत छाया दिखती है अथवा छाया नहीं दिखायी देती। उन व्यंजनों में विष के कारण ऊपर की ओर को झग उठने लगती है, रेखाएँ दिखलायी देती हैं, बीच में फटा हुआ-सा, तन्तु ( तौत ) जैसा, बुलबुले जैसे उठना—ये लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। राग ( रायते ), खांडव ( खट्टे रस वाली सन्निधियाँ ), शाक तथा मांसरसों के आकार कटे-फटे से दिखलायी देते हैं और खाने पर उनका रस विकृत जान पड़ता है ॥ ५-६ ॥
नीला राजी रसे, ताम्रा क्षीरे, दधनि दृश्यते । श्यावाऽऽपीतासिता तक्त्रे, घृते पानीयसन्निभा ॥ मस्तुनि स्यात्कपोताभा, राजी कृष्णा तुषोदके । काली मद्याम्भसोः, क्षोदे हरितैलेऽरण्यपमा ॥ पाकः फलानामासानां पक्वानां परिकोथनम् । द्रव्याणामार्द्रशुष्काणां स्यातां म्लानिविवर्णते ॥ मृदूनां कठिनानां च भवेत्स्पर्शविपर्ययः । माल्यस्य स्फुटिताग्रत्वं म्लानिर्गन्धान्तरोद्भवः ॥ १० ॥ ध्याममण्डलता वस्त्रे, शदनं तन्तुपक्षमणाम् । धातुभौक्तिककाष्ठाश्मरत्नादिषु मलाक्तता ॥ ११ ॥ स्नेहस्पश्रप्रभाहानिः, सप्रभत्वं तु मुग्धमे ।
विषैली वस्तुओं के विशिष्ट लक्षण—विषैले मांसरस में नीली रेखाएँ, दूध में लाल, दही में काली, पीली या सफेद मठा में, घी में पानी की जैसी, मस्तु ( दही के पानी आदि ) में कबूतर के वर्ण जैसी, तुषोदक ( काँजी ) में काली रेखाएँ, मद्य में तथा जल में काली रेखाएँ, मधु में हरे वर्ण वाली, तेल में अरुण वर्ण ( ईट के रंग जैसी ) रेखाएँ दिखलायी देती हैं।
विष के प्रभाव से कच्चे फल शीघ्र पक जाते हैं, पके हुए फलों से सड़न पैदा हो जाती है। गीले अथवा सूखे पदार्थ विषप्रयोग से मलिन तथा विकृत वर्ण के हो जाते हैं। कोमल एवं कठोर द्रव्यों के स्पर्श में अन्तर पड़ जाता है। अथवा इसे इस प्रकार समझें—विष-प्रयोग से मुदु द्रव्य कठोर और कठोर द्रव्य मुदु स्पर्श वाले हो जाते हैं। माला में फूलों के अगले हिस्से फूट जाते हैं, वे मलिन पड़ जाते हैं और उनकी गन्ध विकृत हो जाती है। वस्त्रों पर सूखापन, चकते पड़ जाना, उनके धागे या रोएँ ढीले पड़ जाते हैं या टूटने लगते हैं। सोना आदि धातुओं के आभूषणों, मोती आदि में; लकड़ी से बने हुए कुर्सी, टेबुल, चौकी, छड़ी आदि में; पत्थर से गढ़े गये पात्रों पर, हीरे आदि उत्तम रत्नों में मेलापन आ जाता है। उनमें से चिकनापन, स्पर्शप्रियता, प्रभा की हानि हो जाती है और मिट्टी के पात्रों में चमकीलापन आ जाता है ॥ ७-११ ॥
विषदः श्यावशुष्कास्यो विलक्षो वीक्षते दिशः ॥ १२ ॥
स्वेदवेपथुमांश्रस्तो भीतः स्वलति जूम्भते ।
विषदाता के लक्षण—इसका मुख गेरा होने पर भी काली छाया युक्त, चेहरा सूखा हुआ-सा कान्तिहीन हो जाता है। वह लज्जित होकर इधर-उधर दूर तक दिशाओं की ओर देखता रहता है अर्थात् वह अपराधी होने के कारण किसी से नजर मिला नहीं पाता। उसके शरीर में पसीना तथा कम्पन होने लगता है, वह घबड़ा जाता है, डर जाता है, चलने में उसके पैर लड़बड़ाने लगते हैं और बार-बार जँभाइयाँ लेता रहता है ॥ १२ ॥
बक्तव्य—विषदाता के कुछ और भी लक्षण होते हैं उन्हें चरक, सुश्रुत आदि में देखें। कभी-कभी पुलिस की धर-पकड़ से निरपराधी भी फँस जाते हैं और वे भी वैसी चेष्टा करने लगते हैं। अतः सावधानी से निर्णय करना चाहिए।
१२४
अष्टाङ्गहृदये
प्राप्यान्नं सविषं त्वशिरैकावर्तः स्फुटत्यति ॥१३॥ शिखिकण्ठाभधुमाचिरन्तर्बिर्गप्रगन्धवान् ।
बिपैले अन्न की अग्नि-परीक्षा—यदि विपैला अन्न आग में डाला जाता है, तो उसकी लौ किसी एक ओर ही होती है। वह अन्न अत्यन्त फूटने ( चट-चटाने ) लगता है, मोर के गले के सदृश नीली लौ तथा ऐसा ही धुआँ निकलता है अथवा आग की लौ नहीं भी उठती और उसमें से अत्यन्त तीव्र दुर्गन्ध आती है ॥ १३ ॥
वक्तव्य—हमारे प्राचीन धर्माचार्यों ने भोजन करने के पहले कुछ ग्रास गाय, कुत्ता, कौआ आदि को देने का और कुछ अंश अग्नि में डालने का जो निर्देश दिया था, उसमें धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-ही-साथ एक रहस्य यह भी अवश्य रहा होगा। इसी से सम्बन्धित वर्णन आगे भी है।
प्रियन्ते मक्षिकाः प्राशय काकः क्षामस्वरो भवेत् ॥१४॥
उल्लोशन्ति च वृष्ट्वैतच्छुकदात्यूहसारिकाः । हंसः प्रस्खलति, ग्लानिर्जीवज्जीवस्य जायते ॥ चकोरस्याऽक्षिवैराग्यं, क्रौञ्चस्य स्यान्मदोदयः । कपोतपरभूदक्षचक्रवाका जहत्यसून ॥१६॥ उद्देगं याति माज्जरः, शकुन्मूञ्चति वानरः । हृष्येन्मयूरस्तद्वृष्ट्या मन्दतेजो भवेद्विषम् ॥१७॥ इत्यन्नं विषवज्जात्वा त्यजेदेवं प्रयत्नतः । यथा तेन विषचोरन्नपि न क्षुद्रजन्तवः ॥१८॥
विपैले अन्न का प्रभाव—विपैले अन्न ( आहार ) को खाकर मक्षिष्यो मर जाती हैं, कौए का स्वर क्षीण हो जाता है और ऐसे अन्न को देखते ही सुग्गा, दाल्युह ( जलमूर्गा या कौआ या चातक पक्षी ) तथा मैना—ये पक्षी चिल्लाने लगते हैं। हंस लड़बड़ाने लगते हैं, जीवजीव ( कोषकार कहते हैं कि इसे देखने मात्र से विष का नाश हो जाता है ) पक्षी विष को देखकर दुःखी हो जाता है, चकोर की आँखों का रंग बिगड़ जाता है, क्रौञ्च को नशा चढ़ जाता है; कबूतर, कोयल, मूर्गा, चक्का ये मर जाते हैं, बिलव घबड़ा जाता है, बन्दर देखते ही मल्लयाग कर देता है तथा मोर विष को देखकर प्रसन्न हो जाता है और इसके देखने मात्र से विष का प्रभाव कम हो जाता है ( अतएव यह जहरीले साँपों को भी खा जाता है )। इन परीक्षाओं से उस अन्न को विष के समान समझ कर छोड़ दे और उस अन्न को ऐसे स्थान पर डाल दे, जिससे क्षुद्र प्राणी भी उसे खाकर न मरें ॥ १४-१८ ॥
वक्तव्य—‘प्रमादो धीमतामपि’ अर्थात् सूक्ष्म-बूझसम्पन्न लोग भी जब भूल कर बैठते हैं तो श्रीमान् पुरुषों की तो बात ही क्या कहना है! यदि किसी प्रकार विष-प्रयोग हो ही गया हो तो उसका निराकरण इस प्रकार करें।
सृष्टे तु कण्ठ्वाहोषाज्वरातिस्फोटसुत्तयः । नखरोमच्युतिः शोफः, सेकाद्या विषनाशनाः ॥१९॥ शस्तास्तत्र प्रलेपाश्च सेव्यचन्दनपद्यकैः । ससोमवलकतालीसपत्रकुष्ठामृतानतैः ॥२०॥
स्पर्शज विष-चिकित्सा—विपैले पदार्थों ( माला, वस्त्र आदि ) का स्पर्श हो जाने पर खुजली, जलन, ऊष्मा ( गरम-गरम भाप जैसी निकलना ), ज्वर हो जाना, पीड़ा, उस स्थान पर फफोलों का निकलना, सूत्र पड़ जाना, नख तथा रोमों का उखड़ जाना, सूजन हो जाना आदि लक्षण हो जाते हैं। इस स्थिति में शीघ्र ही विषनाशक स्नान, अभ्यंग, अवगाहन तथा लेपों-प्रलेपों की व्यवस्था करें। यथा—खस, सफेद चन्दन, पद्मकाष्ठ ( पद्माव ), कायफल का छिलका ( इसकी नस्म भी बनायी जाती है ), तालीसपत्र, कूठ ( यह सुगन्धित द्रव्य है ), गिलोय तथा तगर के कल्क का लेप करें और क्वाथ को पिलायें अथवा इनके क्वाथों का उन अवयवों में सेचन करें ॥ १९-२० ॥
लाला जिह्वाच्छयोर्जाडघमूषा चिमिचिमायनम् । दन्तहर्षो रसाज्ज्वं हनुतस्मश्च वक्त्रग्रे ॥२१॥ सेव्याद्यैस्तत्र गण्डूपाः सर्वे च विषजिह्वितम् ।
अक्षरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१२५
मुख में विष का प्रभाव—यदि मुख के भीतरी प्रदेश में किसी विष का प्रभाव हो गया हो तो उसमें ये लक्षण होते हैं—मुख से बार-बार लार निकलना, जीभ तथा होठों में जड़ता, जलन का होना, चुनचुनाहट का होना, दन्तहर्ष, रसों का ज्ञान न होना (यह जिह्वा की जड़ता है) तथा हनुस्तम्भ। इनकी चिकित्सा—बीसवें श्लोक में कहे गये खस आदि द्रव्यों के क्वाथ बनवाकर उनके गण्डूष (कुल्ले) करें और भी जो विषनाशक चिकित्सा हो, उसे करें, ये सब हितकर होती हैं॥ २१॥
आमाशयगते स्वेदमूच्छीर्ध्यानमद्व्रमाः ॥ २२ ॥
रोमहर्षो बमिर्दाहश्चक्षुहृदयरोधनम्। बिन्दुभिश्चाच्योऽङ्गानां, पक्वाशयगते पुनः ॥ २३ ॥ अनेकवर्णं वसति मूत्रयत्यतिसार्यते। तन्ना कुशलं पाण्डुत्वमुदरं बलसह्ययः ॥ २४ ॥ तयोर्वात्तविरक्तस्य हरिद्रे कटभीं गुडम्। सिन्दुवारितनिष्पावबाष्पिकाशतपर्विकाः ॥ २५ ॥ तपडुलीयकमूलानि कुक्कुटाण्डमवलजुजम्। नावनाञ्जनपानेषु योजयेद्विषशान्तये ॥ २६ ॥
आमाशयगत विष के लक्षण—पसीना का आना, मूच्छी, आध्यान (अफरा), मद (नशा का होना), चक्कर आना, रोंगटे खड़े होना, वमन, जलन, आँखों के सामने अंधेरा छा जाना, हृदय की गति में रूकावट का होना तथा शरीर के अवयवों पर पानी के फफोलों जैसे बिन्दुओं का उभड़ आना।
पक्वाशयगत विष के लक्षण—अनेक रंग के वमनों का होना, मूत्र का अधिक होना, अतिसार का होना, तन्ना (उधार्ड का आना), कुशता, शरीर में पीलापन का होना, उदररोग तथा बल का क्रमशः क्षय होना।
उक्त दोनों की चिकित्सा—ऊपर वर्णित लक्षणों में वमन तथा अतिसार का वर्णन है, उस स्थिति में आप देखें कि यदि वमन-विरक्त आवश्यकता के अनुसार हो गये हैं, तो आगे की चिकित्सा इस प्रकार करें—हल्दी, दाहहल्दी की छाल, कटभी (अपराजिता), गुड, सिन्दुवार (मेवड़ी) के पत्ते, निष्पाव (मटर), हिंगुपत्री, बाल्लव, चौलाई की जड़, मुर्गी के अण्डे का रस तथा बाकुची—इनका प्रयोग नस्य, अञ्जन तथा क्वाथ बनाकर पीने के रूप में करें, इससे विषविकार शान्त हो जाते हैं॥ २२-२६॥
बक्तव्य—आमाशयगत विष प्रारम्भ में वमनों द्वारा और पक्वाशयगत विष विरेचनों द्वारा निकल जाता है, शेष उक्तनिर्दिष्ट औषधयोग से शान्त हो जाता है। विष में घृतपान अत्यन्त लाभकारी होता है, उसमें भी गाय का घृत और भी उत्तम होता है।
विषभुक्ताय दद्यान्व शुद्रायोर्ध्वमधस्तथा। सूक्ष्मं ताघ्ररजः काले सखीन्द्रं हृदिशोधनम् ॥ २७ ॥
शुद्धे हृदि ततः शाणं हेमचूर्णस्य दापयेत्।
ताघ्र एवं स्वर्ण भस्म-प्रयोग—जिस व्यक्ति ने विष खाया है, उसे वमन-विरक्त विधियों से नीचे-ऊपर शुद्ध हो जाने पर प्रतिदिन १ रत्ती ताघ्रभस्म १ तोला मधु के साथ प्रातः-सायं सेवन करने के लिए देना चाहिए। इससे विशेषरूप से हृदय का शोधन हो जाता है। जब हृदय शुद्ध हो जाय तब इस रोगी को १ शाण स्वर्णभस्म का सेवन करने के लिए दें॥ २७॥
वक्तव्य—४ माषा = १ शाण, ६ रत्ती = १ माषा, ६ × ४ = २४ रत्ती अर्थात् १-१ रत्ती की मात्रा में मधु के साथ विषभुक्त रोगी को २४ दिनों तक इसका सेवन कराना चाहिए।
न सज्जते हेमपाङ्के पद्यपत्रेऽन्बुवद्विषम् ॥ २८ ॥
जायते विपुलं चायुर्गिरऽप्येष विधिः स्मृतः।
स्वर्णभस्म का प्रभाव—जो सदा इस प्रकार स्वर्णभस्म का सेवन करता है उसके शरीर में विष का प्रभाव उस प्रकार नहीं होता, जिस प्रकार कमलपत्र पर जल का स्पर्श नहीं हो पाता। स्वर्ण का सेवन करने से आयु बढ़ती है। गरवियों तथा मूलविषों की चिकित्सा भी इसी प्रकार की जाती है॥ २८॥
१२६
अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य—अष्टांगहृदय-उत्तरस्थान अध्याय ३५ से ३८ तक विविध प्रकार के विषों की चिकित्साओं का वर्णन विस्तार से किया गया है।
विरुद्धमपि चाहारं विद्याद्विषगरोपमम् ॥ २९ ॥
विरोधी आहार—विरुद्ध अथवा परस्पर विरोधी आहार भी विष (स्थान, जंगम) तथा गरविष (कृत्रिम विष) के समान होता है ॥ २९ ॥
वक्तव्य—विरुद्ध अन्नपानों के सेवन का निषेध तो वाग्भट ने किया है, किन्तु उनका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, स्पष्टरूप से उसका निर्देश नहीं किया है। इसे चरक के अनुसार इस प्रकार समझें—‘षण्डधान्येः...हेतुम्’ ॥ (च.सू. २६।१०२-१०३) अर्थात् विरुद्ध आहारों के सेवन से होने वाले रोग—नपुंसकता, अन्धापन, विसर्प, जलोदर, विस्फोट, उत्साद, भ्रान्दर, मूच्छा, मदरोग, आध्मान, गले के रोग, पाण्डुरोग, अलसक (गुमहेजा), विस्मृत्तिका, किलास (श्वेत कुष्ठ), कूष्ठ, ग्रहणीरोग, शोथ, रक्तपित्त, ज्वर, प्रतिशय, सन्तानदोष (गर्भावस्था में माता द्वारा सेवन करने से भ्रूण का गर्भ में मर जाना या पैदा होकर मर जाना आदि) तथा मृत्यु—ये कारण होते हैं। इसी प्रकार के निर्देश अ.स.सू. १।२९ में भी देखें।
आनूपमामिषं माषक्षीद्रक्षीरविरुद्धैः। विरुध्यते सह बिसैर्मूलकेन गुडेन वा ॥ ३० ॥ विशेषात्मयसा मत्स्या मत्स्येष्णपि चिलीचिमः।
आनूपदेशीय (सुअर आदि का) मांस—उड़द, मधु, दूध, अंकुरित धान्यों (चना, गेहूँ, मूंग, मोठ, मटर आदि) के साथ परस्पर गुणों में विपरीत होता है तथा बिस (भैंसीड़ा), मूली एवं गुड़ के साथ भी विरुद्ध होता है। विशेष करके दूध के साथ मछलियों का सेवन न करें, उनमें भी चिलीचिम नामक मछली का तो कभी भी दूध के साथ सेवन नहीं करना चाहिए ॥ ३० ॥
वक्तव्य—विरुद्ध आहार इस प्रकारण में जिन-जिन को कहा जायेगा, उनमें से कौन क्या विकार करता है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा गया है; तथापि इनसे रक्त दूषित होकर अनेक विस्फोट आदि विकृतियाँ होती हैं। ये सभी खाद्य पदार्थ हैं, इनका एक ही समय में एक साथ खाना ही विरुद्ध कहा गया है। स्वतन्त्र रूप से क्रमशः इनका सेवन किया ही जाता है, तब कोई दोष भी नहीं होता है। यही मत चरक, सुश्रुत आदि का भी है।
विरुद्धमम्लं पयसा सह सर्वं फलं तथा ॥ ३१ ॥
तद्रक्तुलत्थवरककङ्गुवल्लमकुष्ठाः ।
दुग्धपान-विचार—अम्लरस-प्रधान सभी पदार्थ तथा फल दूध के साथ नहीं खाने चाहिए, क्योंकि ये परस्पर विरुद्ध होते हैं। इसी प्रकार कुलथी, वरक (उद्गलक), कंगुनी (कौंगी), मटर, मोठ आदि भी दूध के साथ नहीं खाने चाहिए ॥ ३१ ॥
वक्तव्य—‘सर्वं फलं’—ऐसा नहीं है कि दूध के साथ कोई फल नहीं खाया जाता हो। बादाम, छूहारा, किसमिश आदि के साथ दूध का प्रयोग किया ही जाता है, दूध के साथ किन फलों को नहीं खाना चाहिए, देखें—‘आम्रातकः’...‘चान्यानि’ (च.सू. २६।८४) इसी प्रकार सु.सू. २०।८ का भी अवलोकन करें।
भक्षयित्वा हूरितकं मूलकादि पयस्यजेतु ॥ ३२ ॥
विरुद्ध आहार के लक्षण—मूली आदि हरे पदार्थों को खाकर उनके तत्काल बाद भी दूध नहीं पीना चाहिए ॥ ३२ ॥
बाराहं श्वाविधा नाद्याद्वाध्ना पृषतकुक्कुटी । आममांसानि पितेन, माषसूपेन मूलकम् ॥ ३३ ॥
अर्वि कुसुमशकाकेन, बिसैः सह विरुद्धकम् । माषसूपगुडक्षीरदध्याज्येलीकुचं फलम् ॥ ३४ ॥
फलं कदल्यास्तक्रेण दध्ना तालफलंन वा । कणोपणाम्बां मधुना काकमाचीं गुडेन वा ॥ ३५ ॥
सिद्धां वा मत्स्यपचने पचने नागरस्य वा । सिद्धामन्त्र्य वा पात्रे कामात्तामृपितां निशाम् ॥ ३६ ॥
अन्तरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१२७
वराह (सूअर) का मांस साही (सेह या सौल) के मांस के साथ मिलाकर न खायें। चितकबरा हरिण तथा मुर्गा का मांस दही के साथ नहीं खाना चाहिए। कल्चे मांसों को प्राणियों के पित्तद्रव के साथ न खायें, उड़द की दाल के साथ मूली न खायें, भेड़ के मांस को कुसुम्भ के शाक के साथ न खायें। बिस (भैंसीडा) के साथ अंकुरित धान्यों को, बड़हर के फल को उड़द की दाल, गुड़, दूध, दही तथा घी के साथ नहीं खाना चाहिए। केले के पके फल को मठा, दही अथवा ताड़ के फल के साथ, मकोय को पीपल तथा मरिच के साथ, मधु अथवा गुड़ के साथ नहीं खाना चाहिए। जिस पात्र में मछली पकायी गयी हो अथवा सोठ पकायी गयी हो उसी पात्र में पकाया गया मकोय का शाक न खायें। यदि दूसरे पात्र में मकोय का शाक पकाया गया हो किन्तु रातभर का बासी शाक हो, उसे भी भरपेट न खायें॥ ३३-३६॥
मत्स्यनिस्तलनस्तेह साधिताः पिप्पलीत्यजेत्। कांस्ये दशाहमुषितं सर्पिहणं त्वरुच्छरे॥ ३७॥
जिस स्नेह (तैल या घी) में मछली का मांस तला गया हो, उसी स्नेह में तली गयी पिप्पली का सेवन न करें। काँसा के पात्र में दस दिन तक रखे हुए घी (यह घी देखने में हरा या नीला हो जाता है और खा लेने पर इससे वमन होने लगते हैं, अतः इस) को न खायें। भिलावा के सेवन काल में उष्णताकारक आहार-विहारों का सेवन न करें॥ ३७॥
भासो विरुध्यते शून्यः कम्पिलस्तक्रसाधितः।
भास (गोध) का मांस शुल (लोहे की छड़) पर लपेट कर अंगारों में पकाया गया विरुद्ध होता है। मठा के साथ पकाया गया कम्पिल (कबीला) विरुद्ध होता है।
एकध्वं पायससुराकुशराः परिवर्जयेत्॥ ३८॥
पायस (खीर, खोया या मलाई) आदि पदार्थों को सुरा (मद्यभेद) एवं खिचड़ी के साथ नहीं खाना चाहिए॥ ३८॥
मधुसर्पर्वसातैलपानीयानि द्विशस्त्रिभः। एकत्र वा समांशानि विरुध्यन्ते परस्परम्॥ ३९॥
समान भाग मधु-घृत, वसा (प्राणिज स्नेह), तैल, जल—इन द्रव्यों को दो-दो करके अथवा तीन-तीन को एक साथ मिलाकर सेवन करना विरुद्ध होता है॥ ३९॥
वक्तव्य— केवल इन्हीं द्रव्यों का परस्पर संयोग विरुद्ध होता है, इनके साथ और भी द्रव्य मिलाये गये हों तो कोई हानि नहीं होती। जैसे—अगस्त्यलेह। यह दो-दो या तीन-तीन का जो योग कहा गया है यह उपलक्षण मात्र है। यह संयोग चार-पाँच द्रव्यों का भी हो सकता है।
भिन्नांशे अपि मध्वाज्ये दिव्यवार्थनुपानतः। मधुपुष्करबीजं च, मधुमैर्यशार्करम्॥ ४०॥
मध्यानुपानतः क्षैर्यो, हारिद्रः कटुतैलवान्।
कम-ज्यादा परिमाण में भी मिलाये गये मधु-घृत वर्षाजल के अनुपान से विरुद्ध हो जाते हैं। मधु तथा कमलबीज (कमलगट्टा), मधु तथा मैर्य (धान्यासव—चन्द्रनन्दन के अनुसार, खजूर्रासव—अरुणदत्त एवं इन्द्रु के अनुसार) तथा शर्करासव ये भी परस्पर विरुद्ध होते हैं। खीर, मठा या सत्तू के घोल के साथ और हारिद्रक (पीले रंग वाला छत्राक नामक कन्द-विशेष, इसको संवेदज शाक कहा है) को सरसों के तैल में तलकर नहीं खाना चाहिए॥ ४०॥
उपोदकाऽतिसाराय तिलकल्केन साधिता॥ ४१॥
तिल की चटनी के साथ पकाया गया पोई (उपोदिक्का या उपोदका) का शाक विरुद्ध होता है। इसका सेवन करने से अतिसार होने लगता है॥ ४१॥
बलाका वारुणीयुक्ता कुल्मायैश्च विरुध्यते। भृष्टा वराहवसया सैव सद्यो निहृत्यसूत्॥ ४२॥
१२८
अष्टाङ्गहृदये
बलाका ( बगुला की स्त्री ) का मांस बारुणी ( सूर ) तथा कुल्माष ( उबाले हुए चना, मटर, मूँग ) के साथ खाने से विरुद्ध होते हैं। बलाका का मांस सुअर की चर्बी में तल कर खाने से शीघ्र ही मारक हो जाता है ॥ ४९ ॥
तद्वत्तिस्तिरिपत्रादघगोधालावकपिञ्जलाः । ऐरण्डेनाग्निना सिद्धास्तत्सैलेन विमूच्छिताः ॥ ४३ ॥
तीतर आदि निम्नलिखित प्राणियों के मांस रेंड की लकड़ियों की आग में और रेंड के तेल में तले जाने पर ऊपर कहे गये बलाका-मांस की भाँति मारक होते हैं। प्राणियों के नाम—तीतर, पत्रादघ ( मोर ), गोह, लवा एवं गौरैया ॥ ४३ ॥
हारौतमांसं हरिद्रशूलकप्रोतपाचितम् । हरिद्रावहिना सद्यो व्यापादयति जीवितम् ॥ ४४ ॥
हारौत ( हरिल ) पक्षी का मांस दारुहल्दी की लकड़ी में पिरोकर या लपेट कर हल्दी की लकड़ी की आग में पकाया गया शीघ्र मारक होता है ॥ ४४ ॥
भस्मपांशुपरिध्वस्तं तदेव च समाधिकम् ।
भस्म ( राख ) तथा धूल से घूसरित ( मलिन ) एवं मधु मिलाकर खाया गया वह हरिल पक्षी का मांस तत्काल मारक होता है।
यत्किञ्चिद्वोषमुक्लेश्य न हरेत्तस्मासतः ॥ ४५ ॥
विरुद्धम्—
जो कोई आहार-पदार्थ वात आदि दोषों को उभाड़कर उन्हें निकालता नहीं, वह आहार संयोगविरुद्ध कहा जाता है ॥ ४५ ॥
वक्तव्य—यहाँ केवल संयोगविरुद्ध की चर्चा की गयी है। चरकसंहिता में इसके अनेक भेदों का इस प्रकार वर्णन किया है। देखें—१. देशविरुद्ध, २. कालविरुद्ध, ३. अग्निविरुद्ध, ४. मात्राविरुद्ध, ५. सात्त्व्यविरुद्ध, ६. दोषविरुद्ध, ७. संस्कारविरुद्ध, ८. वीर्यविरुद्ध, ९. कोष्णविरुद्ध, १०. अवस्थाविरुद्ध, ११. क्रमविरुद्ध, १२. परिहारविरुद्ध, १३. उपचारविरुद्ध, १४. पाकविरुद्ध, १५. संयोगविरुद्ध, १६. सम्पद्भविरुद्ध और १७. विधिविरुद्ध। देखें—च.सू. २६।८६-१०१।
—शुद्धिरत्रेष्ठा शमो वा तद्विरोधिभिः ।
इस प्रकार विरुद्ध आहारों का सेवन करने से जो विकार उत्पन्न हो गये हों, उनको दूर करने के लिए वमन-बिरेचन द्वारा शरीर का शोधन करना चाहिए अथवा उन-उन आहारों के विरोधी आहारों द्वारा उनकी शमन-चिकित्सा करनी चाहिए।
द्रव्यैस्तैरेव वा पूर्वं शरीरस्याभिसंस्कृतिः ॥ ४६ ॥
अथवा उस प्रकार के विरुद्ध आहारों के विरोधी आहारद्रव्यों का सेवन करने से पहले ही से शरीर को उस प्रकार का बना लेना चाहिए, जिससे विरुद्ध आहार का प्रभाव शरीर पर न पड़ सके ॥ ४६ ॥
वक्तव्य—विरुद्ध भोजन भी निरन्तर सेवन करते रहने से सात्त्व्य ( प्रकृति के अनुकूल ) कर लिये जाते हैं। इस विवशता का एक उदाहरण है। जैसे—रात की नौकरी करने वाले दिन में सोकर रात की नींद पूरी कर लेते हैं। फिर भी यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध तो है ही।
व्यायामस्तिरघदोत्ताग्रिवयःस्थबलशालिनाम् । विरोध्यपि न पीडयै सान्त्वमल्पं च भोजनम् ॥
विरोधी आहारों का सेवन—प्रतिदिन व्यायाम करने वाले, स्निग्ध शरीर वाले, जिनकी जठराग्नि दीप्त है, युवक ( युवती ), बलवान् पुरुषों ( स्त्रियों ) को विरोधी अन्न-पानों से कोई हानि नहीं होती। यदि वे पदार्थ सात्त्व्य ( प्रकृति के अनुकूल ) हों तथा स्वल्प मात्रा में खाये गये हों तो वे हानिकारक नहीं होते ॥ ४७ ॥
अन्नसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१२९
बक्तव्य —उक्त उदाहरण व्यक्ति-विशेष तथा परिस्थिति-विशेष का है। इस पद्य का सन्निवेश यहाँ इसलिए किया गया है कि कोई मनचला व्यक्ति आयुर्वेद के प्रति आक्षेप न करे कि अमुक व्यक्ति ने विरुद्ध आहार का सेवन किया, वह स्वस्थ है। वास्तव में विरुद्ध आहारों का सेवन न करें।
पादेनापथ्यमभ्यस्तं पादपादेन वा त्यजेत्। निषेवेत हितं तद्वेदकडिध्यन्तरीकृतम्॥४८॥
अपथ्य का त्याग, पथ्य का सेवन —प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा सेवन करने के कारण अभ्यास किये गये अपथ्य ( विरुद्ध आहार-विहार ) को भी एक-एक चौथाई क्रम से छोड़ने जाना चाहिए। यदि इतनी मात्रा में छोड़ने पर भी हानि होने की सम्भावना हो तो उसे सोलहवें हिस्से से छोड़ना आरम्भ करें और उसी क्रम से एक, दो, तीन दिन का अन्तर देकर उन्हें छोड़ देना चाहिए। इसी क्रम से हितकर आहार-विहार का सेवन प्रारम्भ करना चाहिए॥४८॥
अपथ्यमपि हि त्यक्तं शीलितं पथ्यमेव वा। सात्स्यासात्स्यविकाराय जायते सहसाऽन्यथा॥४९॥
सहसा त्याग का निषेध —यदि उक्त प्रकार से व्यवहार न करके अपने सहसा अपथ्य का परित्याग कर दिया और पथ्य का सेवन प्रारम्भ कर दिया तो सहसा सात्स्य पदार्थों के छोड़ने और असात्स्य पदार्थों के सेवन करने के कारण अनेक प्रकार के विकार ( रोग ) उत्पन्न हो सकते हैं॥४९॥
क्रमेणापचित्ता दोषाः क्रमेणोपचित्ता गुणाः। सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च॥५०॥
दोषों का ह्रास, गुणों की वृद्धि —क्रमशः घटाये गये वात आदि दोष पुनः बढ़ने नहीं पाते तथा क्रमशः संचित किये गये गुण चिर-स्थिर होते हैं अर्थात् उन्हें कोई डिगा नहीं पाता॥५०॥
अत्यन्तसन्निधानानां दोषाणां दूषणात्सनाम्। अहितैर्दूषणं भूयो न विद्वान् कर्तुमर्हति॥५१॥
दोषों को दूषित न करें —शरीर में वात आदि दोष सदा रहा करते हैं, उनका स्वभाव है, वे शरीर को दूषित किया करते हैं। अतएव पथ्य तथा अपथ्य को जानकर विद्वान् वैद्य अहितकर आहार एवं विहार द्वारा उन दोषों को दूषित न होने दें अर्थात् चिकित्सा की आज्ञा के अनुकूल मनुष्य आहार-विहार करें॥५१॥
आहारशयनाब्रह्मचर्ययुक्त्या प्रयोजितैः। शरीरं धारयते नित्यमागारमिव धारणेः॥५२॥
तीन उपस्तम्भ —शरीर के तीन उपस्तम्भ हैं—१. आहार, २. शयन ( निद्रा ) तथा ३. ब्रह्मचर्य। इन तीनों का शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार युक्तिपूर्वक उपयोग करने से शरीर का उस प्रकार धारण होता है जिस प्रकार खम्भों से मकान स्थिर रहता है॥५२॥
बक्तव्य —इस विषय का प्रतिपादन चरक में भी किया गया है—‘त्रयः...’देश्यते। ( च.सू. ११।३५ ) अर्थात् ‘आहार, स्वप्न, ब्रह्मचर्य’ इन तीन उपस्तम्भों के विधिवत् प्रयोग करने से शरीर जीवनभर बल, कान्ति तथा पुष्टि से युक्त रहता है; किन्तु इस बीच में अहितकर आहार-विहारों का यदि सेवन किया जाता है, तो उक्त लाभ नहीं मिलते। इन विषयों का वर्णन हम इसी अध्याय में आगे करेंगे।
आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते।
आहार नामक उपस्तम्भ —शरीर को धारण करने में जिन तीन उपस्तम्भों का वर्णन किया गया है, उनमें पहला उपस्तम्भ आहार है। इसके पहले अ.हू.सू. ३ में तथा अ.हू.सू. ५,६ और ७वें अध्याय में भी इसका वर्णन कर दिया गया है, इसके आगे भी यथास्थान किया जायेगा।
बक्तव्य —‘अन्नं वै प्राणिनां प्राणः’; ‘जगदन्ने प्रतिष्ठितम्’ तथा ‘अन्नं वृत्तिकराणां श्रेष्ठम्’ ( च.सू. २५।४० ) और ‘इष्टवर्णनघरसत्सर्षि विधिर्विहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञकानां प्राणमाचक्षते कुशलाः प्रत्यक्षफलदर्शनात्’। ( च.सू. २७।३ ) इसके आगे च.सू. २८।३ भी देखें। वास्तव में जीवन की रक्षा करने वाले भावों में अन्न सर्वश्रेष्ठ भाव है। इसी विषय का समर्थन सुश्रुत में भगवान् धन्वन्तरि ने इस प्रकार किया है—‘प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवर्णजिसां च’। ( सु.सू. ४६।३ )
९ अ० हू०
१३०
अष्टाङ्गहृदये
निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यश्च बलाबलम् ॥५३॥ वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च।
निद्रा नामक उपस्तम्भ—दूसरा उपस्तम्भ है निद्रा—शयन करना ( सुख से सोना )। इसी के ऊपर आगे कहे जाने वाले भाव निर्भर रहते हैं। यथा—सुख, पुष्टि, बल, वृषता ( भैषुन करने की शक्ति ), ज्ञान तथा दीर्घजीवन का लाभ भलीभाँति नींद आ जाने पर मिलते हैं और नींद के न आने पर इनके विपरीत भावों की प्राप्ति होती है। यथा—दुःख, कुशता, दुर्बलता, क्लीवता ( नपुंसकता—रतिशक्ति का अभाव ), अज्ञान तथा मृत्यु ॥५३॥
अकालेऽतिप्रसङ्गान्च न च निद्रा निषेविता ॥५४॥ सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा।
निद्रा का अभाव—निद्रा का दुरुपयोग या अभाव—असमय में निद्रा का सेवन ( सोना ), आवश्यकता से अधिक सोना अथवा थोड़ा-सा भी न सोना जीवन के सुखों तथा आयु को नष्ट कर देता है। इस प्रकार की अनियमित निद्रा कालरात्रि के समान होती है ॥५४॥
बक्तव्य—उक्त पद्य श्रीवाग्भट ने चरक से अविकल रूप में उद्धृत किया है। देखें—च.सू. २१।३७।
रात्रौ जागरणं रूक्षं, स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ॥५५॥ अरूक्षमनभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम्।
निद्रा के गुण-दोष—रात्रि में जागने से शरीर में रुक्षता हो जाती है, दिन में सोने से शरीर में स्निग्धता बढ़ जाती है ( इसमें मूल कारण कफदोष की वृद्धि है )। सोने का एक प्रकार और है—बैठे-बैठे ऊँचाना या झपकियाँ लेते रहना। यह न तो रुक्षता करता है और न कफ को ही बढ़ाता है ॥५५॥
बक्तव्य—चरक ने निद्रा की इस स्थिति को 'आसीनप्रचलायित' संज्ञा दी है। देखें—च.सू. २१।५०। ग्रीष्मे वायुचयादानरीक्षरात्र्यल्पभावतः ॥५६॥
दिवास्वप्नो हितोऽन्यस्मिन् कफपित्तकरो हि सः। मुक्त्वा तु भाष्ययानाध्वमघस्त्रीभारकर्मभिः ॥ क्रोधशोकभयैः क्लान्तान् श्वासहिष्मातिसारिणः। वृद्धबालाबलक्षीणक्षततृशूलपीडितान् ॥ अजीर्ण्यभिहृतोन्मत्तान् दिवास्वप्नोचितानपि। धातुसाम्यं तथा होषां श्लेष्मा चाङ्गानि पुष्यति ॥
निद्रा सम्बन्धी विचार—ग्रीष्म ऋतु में वातदोष का संचय होने से, आदानकाल के कारण होने वाली रुक्षता से एवं इन दिनों रातों के छोटी हो जाने से दिन में सोना हितकर होता है। इसके अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में दिन में सोना कफकारक होता है ॥५६॥
अधिक बोलने से, सवारी करने से, रास्ता चलने से, मद्यपान करने से, स्त्री-सहवास करने से, क्रोध से, शोक से, भय से, थके हुए पुरुषों को, श्वास, हिक्का ( हिचकी ) एवं अतिसार रोगियों को, वृद्ध, बालक, दुर्बल ( कमजोर ), क्षीण ( कुश ), क्षत ( उरःक्षत ), प्यास तथा शूलरोग से पीड़ित, अजीर्णरोगी, घायल ( चोट लगे हुए ), उन्मत्त ( पागल ) व्यक्ति को और जिन्हें शास्त्र ने दिन में सोने की अनुमति दे रखी है उन्हें तथा ऊपर कहे गये रोगियों को भी दिन में सोना उचित है; क्योंकि दिन में सोने से इनका धातु साम्य हो जाता है और कफ इनके शरीरावयवों को पुष्ट कर देता है ॥५७-५९॥
बहुमेदःकफाः स्वप्न्युः स्नेहनित्याश्च नाहनि। विपार्ताः कण्ठरोगी च नैव जातु निशास्वपि ॥६०॥
दिन में न सोने का निर्देश—जिन मनुष्यों के शरीर में मेदोधातु एवं कफदोष बढ़ा हुआ हो और जो प्रतिदिन स्निग्ध आहारों का सेवन करते हैं, उन्हें दिन में नहीं सोना चाहिए। विषरोग से तथा गले के रोग से पीड़ित रोगी को रात में भी नहीं सोना चाहिए ॥६०॥
अकालशयनान्मोहज्वरस्तैमित्यपिनासः। शिरोरुक्शोफहूत्तलसप्तमोरोधाग्रिमन्दताः ॥६१॥
अन्नरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१३१
अकाल शयन से हानि—असमय में सोने से मोह, ज्वर, स्तैमिल्य ( गीले कपड़े से ओढ़े हुए का जैसा अनुभव होना ), पीनस ( प्रतिशयय ), शिरोरोग, मूजन, जी मिचलाना, रसवाही द्रोतों में रुकावट तथा मन्दाग्नि हो जाती है ॥ ६१ ॥
तत्रोपवासवसनस्वेदानवन्मोषधम् । योजयेदतिनिद्रायां तीक्ष्णं प्रच्छदन्नाञ्जनम् ॥ ६२ ॥ नावनं लङ्घनं चिन्तां व्यवार्थं शोकभीक्रुधः । एभिरेव च निद्रायां नाशः श्लेष्मातिसङ्ख्यात् ॥
चिकित्सा-निर्देश—उक्त स्थिति में रोगी को उपवास, बमन, स्वेदन और नत्य कारक औषधों का प्रयोग करें। अतिनिद्रा की स्थिति में तीक्ष्ण बमन, अञ्जन ( सुरमा ) एवं नत्य दें। उसे लंघन, चिन्ता, व्यवार्थ ( मैथुन ), शोक, भय तथा क्रोध करायें, जिससे रोगी के कफ का नाश होकर निद्रा का भी नाश हो सके ॥ ६२-६३ ॥
वक्तव्य—ऊपर कहे गये ६२ तथा ६३वें श्लोकों में केवल कफनाशक उपायों का वर्णन किया गया है, कफदोष की निवृत्ति हो जाने पर अतिनिद्रा स्वयं शान्त हो जाती है।
निद्रानाशादङ्गमर्दशिरोगौरवजुम्भिकाः । जाडघृणानिप्रमापक्तिनद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ६४ ॥
निद्रानाश के लक्षण—निद्रा के समुचित रूप से न आने पर शरीर में मसल देने की पीड़ा, सिर में भारीपन, बार-बार जँभाड़यों का आना, शरीर में जड़ता, हर्षक्षय, चक्करों का आना, भुक्त आहार का न पचना, उँघाई आदि वातविकार सम्बन्धी रोग हो जाते हैं ॥ ६४ ॥
यथाकालमतो निद्रां रात्रौ सेवेत सात्प्यतः । असात्स्याज्जागरादर्थं प्रातः स्वप्यादभुक्तवान् ॥ ६५ ॥
निद्रासेवन-निर्देश—अतएव रात्रि में समय पर सो जाना चाहिए। यही सात्प्यतः का अर्थ है—जिसे जितनी नींद आती हो उतना ही सोयें अर्थात् कोई रात में दो पहर, कोई तीन पहर सोता है, तदनुसार सोये। जो पूरी रात भलीभाँति न सो सका हो तो वह प्रातःकाल भोजन करके आधी नींद सो जाय ॥ ६५ ॥
शीलयेन्मन्दनिद्रस्तु क्षीरघररसान् दधि । अभ्यङ्गोद्गतस्तान्मूर्ध्कर्णक्षितर्पणम् ॥ ६६ ॥
कान्ताबाहुलताश्लेषो निर्वृत्तिः कृतकृत्यता । मनोऽनुकूला विषयाः कामं निद्रासुखप्रदाः ॥ ६७ ॥
ब्रह्मचर्यरतेर्ग्राम्यसुखनिःस्पृहचेतसः । निद्रा सन्तोषतृप्तस्य स्वं कालं नातिवर्तते ॥ ६८ ॥
पूर्णनिद्रा-प्राप्तिविधि—जिसे पूर्ण निद्रा न आती हो वह दुःख, मद्य, मांसरस, दही का सेवन करें; अभ्रंश, उबटन स्नान करें तथा सिर में, कानों में एवं आँखों में तर्पण स्नेह का प्रयोग करें। सामान्य रूप से स्त्री या पुरुष जिसे नींद न आती हो वह अपने प्रिय या प्रिया का आलिंगन करके सोये। निर्वृत्ति ( सुख ), कृतकृत्यता ( मैंने अपना कार्य कर लिया है ), मन के अनुकूल शब्द ( स्नेहपूर्ण कथाएँ या सुरीले गीत ) आदि विषयों की चर्चा—ये पर्याप्त निद्रासुख को देते हैं ॥ ६६-६७ ॥
ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ—जिसकी ब्रह्मचर्य के पालन में रति है, जिसका मन स्त्री-सहवास की ओर से निःस्पृह ( विरक्त ) रहता है और जो सदा सन्तोष से तृप्त रहता है, उसे अपने समय से निद्रा आ जाती है। अर्थात् उसकी निद्रा कभी भी अपने समय का अतिक्रमण नहीं करती है ॥ ६८ ॥
वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमद्रि की टीकाओं से युक्त अष्टांगहृदय में उक्त ६८वें पद्य को निद्रावर्णन सम्बन्धी अन्य श्लोकों के साथ केवल इसलिपि जोड़ दिया है कि उक्त श्लोक के उत्तरार्ध में निद्रा शब्द आया है। वास्तव में ६८वीं पद्य ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ का परिचायक होने के कारण स्वतन्त्र है।
निद्रा का वर्णन प्राचीन संहिताओं में इस प्रकार उपलब्ध होता है—च.सू. २१।३५ से ५९ तक और मु.शा. ४।३२ से ४७ तक। चरक ने निद्रा के अनेक भेद इस प्रकार किये हैं—‘तमोभवा श्लेष्मसमुद्रवा च मनःशरीरश्चसम्भवा च। आगतुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभावप्रभवा च निद्रा’ ॥ ( च.सू. २१।५८ ) चरक ने उक्त भाव को पुनः अपने शब्दों में इस प्रकार कहा है—‘रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधार्म-
१३२
अष्टाङ्गहृदये
प्रवदन्ति निद्राम् ॥ (च.सू. २१।५९) अर्थात् जो स्वस्थ पुरुषों को रात्रि के समय स्वभाव से निद्रा आती है, उसे 'भूतधात्री' (समस्त प्राणियों की उपमाता के समान) कहते हैं, जो समस्त प्राणियों का धारण-पोषण करती है। यही निद्रा सभी प्रकार की निद्राओं में उत्तम है। तामसिक नींद भैंस, शेर, बाघ आदि प्राणियों को आती है, फलतः ये रात-दिन सोते रहते हैं। राजस व्यक्ति कभी भी अपनी नींद पूरी कर लेते हैं। सात्त्विक निद्रा जिनमें आती है, वे सत्ता आधी रात को थोड़ा-सा सो लेते हैं। एक निद्रा है—'अनवबोधिनी', जिस नींद के आ जाने पर प्राणी फिर जगता नहीं अर्थात् मर जाता है। यह मृत्युकाल की निद्रा का नाम है।
सुश्रुत ने ग्राम्य ऋतु में दिन में सोने का विधान इस प्रकार किया है—'सर्वतृषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्'। (सु.शा. ४।३८) इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक विकल्पों की चर्चा की है—'निद्रा सात्य्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा। दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः। न तेषां स्वप्तां दोषो जाग्रतां वापि जायते' ॥ (सु.शा. ४।४१) अर्थात् जिन लोगों ने रात में अथवा दिन में सोने का अभ्यास बना लिया है, जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के अभ्यासी हो गये हैं, उन्हें दिन में सोने अथवा रात में जागने से किसी प्रकार का दोष नहीं होता। वास्तव में तमोगुण और निद्रा का सम्बन्ध कफदोष से है, यही कारण है कि भोजन करते ही कफ की वृद्धि होने के कारण नींद आती है या आने लगती है। निद्रा का प्रारम्भिक स्वरूप है तन्त्र।
ग्राम्यधर्मं त्यजेन्नारौमनृतानां रजस्वलाम्। अप्रियामप्रियाचारां दुष्टसङ्कीर्णमेहनाम् ॥ ६९ ॥
अतिशूलकृशां सूतां गर्भिणीमन्ययोपितम्। वर्णिनीमन्ययोनिं च गुरुदेवपुनालयम् ॥ ७० ॥
चैत्यश्मशानाऽऽयतनचत्वारम्बुचतुष्यम्। पर्वाण्यनङ्गं दिवसं शिरोहृदयताडनम् ॥ ७१ ॥
स्त्री-सहवास का वर्णन—ग्राम्यधर्म (मैथुनकाल) में इस प्रकार की स्त्री का परित्याग करें—जो उस समय चित लेटी न हो, जो रजस्वला धर्म से निवृत्त न हुई हो, जो प्रिय (मनोनुकूल) न हो अथवा जिसका आचरण (व्यवहार) रुचिकर न हो, जिसका भग उपदेश आदि रोग से दूषित हो अथवा संकीर्ण हो, जो अत्यन्त मोटी या अत्यन्त कुश हो, जिसे अभी ४०-४५ दिन पूर्व प्रसव हुआ हो, जो पहले से गर्भिणी हो या जो दूसरे की स्त्री हो, जो ब्रह्मचारिणी हो, जो अन्यजातीया हो; इनको त्याग देना चाहिए।
निषिद्ध स्थान—गुरुगृह, देवगृह, राजगृह, चैत्य (यज्ञमण्डप, वेदी आदि), श्मशानभूमि, बध्यभूमि, चबूतरा, जलस्थान (नदीतट आदि) और चौराहा।
निषिद्ध दिन—संक्रांति, सूर्य-चन्द्रग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या, भग के अतिरिक्त (मुख आदि) अंगों में दिन में सहवास न करें। इस सम्भोग काल में हृदय तथा शिरः ताडन न करें ॥ ६९-७१ ॥
वक्तव्य—'हुरसङ्कीर्णमिहनाम्'—श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमदिने 'मेहनाम्' शब्द का अर्थ 'योनि' किया है। जब कि मेहन शब्द पुरुष की मूत्रेन्द्रिय के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। देखें—'मेदुं मेहनशेफसी' (अमरकोश) तथा—'मेहनं मूत्रशिशनयोः'। (मेदिनी) 'मेहनम्' क्ली० लिङ्गे। (बै.श.सि.) सुश्रुत ने उक्त विषय का वर्णन करते हुए कहा है—'योनिदोषसमन्विताम्'। (सु.चि. २४।१५)
'वाचां भटः = वाग्भट' के उक्त प्रयोग पर दोषवृष्टि डालने से पहले हम उक्त शब्द के परिवेश का पर्यालोचन करा देना चाहते हैं। वेद में पुरुष को 'द्यौः' और स्त्री को 'पुषिबी' तथा वात्स्यायन-कामसूत्र में पुरुष को 'कर्ता' और स्त्री को 'अधिकरण' कहा है। आकाश से वर्षा पुषिबी पर होती है। अतः कर्ता (गर्भाधानकर्ता अर्थात् बीज बोने वाले पुरुष) का अधिकरण (आधार) स्त्री है। ठीक इन्हीं परम्पराओं के आधार को लेकर सुधी वाग्भट ने 'करणाधिकरणयोश्च' (३।३।१७) सूत्र से अधिकरण अर्थ में 'मिह सेचनं' धातु तथा ल्युट् प्रत्ययान्त मेहन शब्द से 'इध्मप्रब्रश्चनः कुटारः' तथा 'गोदोहनी स्थाली' की भांति 'मेहना' प्रयोग वृद्धिपूर्वक किया है। अब इसका अर्थ होगा 'योनि' जिसमें वीर्य का सेचन होता है। यही दिक् के अनित्य होने से 'टाप्' प्रत्यय हुआ है।
अक्षरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
१३३
अप्रियाम् अन्ययोषितम्—इन सभी विषयों का विचार स्त्रियों को पुरुषों के प्रति भी कर लेना चाहिए अर्थात् नारी ऐसे नर से सहवास न करे। स्त्री-पुरुष दोनों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सहवास पुत्र सन्तान-प्राप्ति के लिए ही किया जा रहा है।
शिरोहृदयताडनम्—यद्यपि शिरःताडन, हृदयताडन, केशाकर्षण, नखक्षत आदि रतिकलह सम्बन्धी विषयों का वर्णन वात्स्यायन-कामसूत्र में मिलता है, तथापि इस स्वास्थ्याशत्र में उसका पूर्ण रूप से निषेध किया गया है।
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्रान् दुःस्थिताङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगतस्त्यजेद्रेगो च मैथुनम् ॥
मैथुन के अयोग्य स्थिति—जिसने बहुत भोजन किया हो, अधीर (घबराया हुआ) हो, जिसे भूख लगी हो, दुःस्थिताङ्ग अर्थात् अनुचित आसन में स्थित होकर, जो प्यासा हो, जो बालक (अभी युवक न हुआ) हो, जो बूढ़ा हो गया हो, जिसे मल-मूत्र आदि का वेग प्रवृत्त हो तथा रोगी पुरुष मैथुन कर्म न करे ॥ ७१ ॥
बक्तव्य—उक्त विधि-निषेध नर-नारी दोनों के लिए है, क्योंकि 'मैथुन' मिथुन का कर्म है, निषेध के कारण स्पष्ट है। इस प्रसंग में वृद्धवाग्भट के वचनों का भी अनुसन्धान कर लेना चाहिए। देखें—अ.सं.सू. ९।८१-८४। अर्थात् इन निर्देशों का उल्लंघन वही कर सकता है, जिसे दीर्घजीवन की कामना न हो। देखें—'आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति'। क्योंकि शुक्रधातु शरीर का बहुमूल्य पदार्थ है। जिसके सम्बन्ध में कहा गया है—'मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्'। यहाँ तक आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य नामक शरीर को धारण करने वाले तीन उपस्तम्भों का वर्णन कर दिया गया है।
सेवेत कामतः कामं तुतो वाजीकृतो हिमे। श्रृहाद् वसन्तशरदोः पक्षाद् वर्षानिदाघयोः ॥ ७३ ॥
मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश—वाजीकरण औषधों एवं आहारों से तुप्त फलतः परिपुष्ट शरीरावयवों वाले नर-नारी हिमकाल (हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं) में इच्छानुसार मैथुन का सेवन करें। वसन्त एवं शरद् ऋतुओं में तीन दिनों तथा गर्मी और वर्षा ऋतुओं में पन्द्रह दिनों में मैथुन करें ॥ ७३ ॥
भ्रमकलमोरुदौर्बल्यबलधात्विन्द्रियक्षयाः। अपर्वमरणं च स्यादन्वथा गच्छतः स्त्रियम् ॥ ७४ ॥
विपरीत व्यवहार का फल—उक्त नियमों के विपरीत मैथुन करने पर भ्रम, क्लम (सुस्ती), ऊर्ध्वों में कमजोरी, कुशता तथा बल, रस आदि शुक्र पर्यन्त धातुओं का क्षय, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय अधवा असमय में मृत्यु भी हो सकती है ॥ ७४ ॥
स्मृतिमेधायुरारोग्यपुष्ठीन्द्रिययशोबलैः। अधिका मन्वजरसो भवन्ति स्त्रीषु संयताः ॥ ७५ ॥
संयम का महत्त्व—जो पुरुष स्त्री-सहवास में अपने को वश में रखते हैं, उनकी स्मरणशक्ति, मेधा, दीर्घायु, आरोग्य (स्वास्थ्य), शारीरिक पुष्टि, इन्द्रियबल, सुयश, शारीरिक एवं मानसिक बल अधिक होता है; वे देर में वृद्ध होते हैं ॥ ७५ ॥
बक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इस 'मैथुन' को तथा इसी प्रकार के अन्य भावों को भी 'तदाल् मुखसंज्ञक' कहा है। देखें—अ.सं.सू. ९।८५। इसी विषय का प्रतिपादन भगवद्गीता में भी किया गया है—'ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनि एव ते। आद्यन्तवन्तः क्रोन्तेय न तेषु रमते बुधः' ॥ (गीता) इसे पुरुष के लिए स्त्रीस्पर्शज और स्त्री के लिए पुरुषस्पर्शज सुखभोग कहा जाता है। इस प्रकार के सुखभोगों में समझदार स्त्री-पुरुष विशेष आसक्त नहीं होते।
स्नानानुलेपनहिमानिलखण्डवाद्यशीताम्बुदुग्धरसयूपसुराप्रसन्नाः ।
सेवेत चान् शयनं विरतं रतस्य तस्यैवमाशु वपुषः पुनरेति धाम ॥ ७६ ॥
१३४
अष्टाङ्गहृदय
मैथुनोत्तर कर्तव्य —मैथुन क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करें अथवा लिंग एवं योनि को भलीभाँति धो लें। ऋतु के अनुसार चन्दन, कस्तूरी आदि का अनुलेपन लगायें, शीतल वायु का सेवन करें; मिथी, मिठाई आदि, शीतल जल, दूध, मांसरस, उड़द आदि का जूस, सूरा, प्रसन्ना आदि का सेवन कर पुनः सो जायें। ऐसा करने से पुनः उसके शरीर में तेजस् का संचार हो जाता है ॥ ७६ ॥
वक्तव्य —इस सन्दर्भ से सम्बन्धित विषय की चर्चा सुश्रुत ने (सु.चि. २४।११० से १३२ में) की है, आप उसे देखें। इस प्रकरण में सुश्रुत ने यह भी निर्देश दिया है—मैथुन करते समय आये हुए शुक्र के वेग को रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से 'शुक्राशमरी' पैदा हो जाती है, जो बाद में कष्टप्रद होती है। सुश्रुत ने इसी प्रसंग के १२०वें श्लोक में 'मूर्धावरणमेव च' का उल्लेख किया है। इस तथ्य की ओर ध्यान दें—शिशु के अगले भाग में स्थित मणि के ऊपर आवरण बढ़ाना, यहाँ से योनि के भीतर शुक्र का धरण होता है। क्या यह मूर्धावरण सुश्रुत के समय का कोई कुत्रिम उपाय था जो फ्रेञ्चलेटर की भाँति सन्तानोत्पत्ति न चाहने की इच्छा से प्रयुक्त होता हो ?
मैथुन की प्रवृत्ति युवा-युवती के परस्पर एक-दूसरे के प्रति आकर्षण में कारण है, इसका धार्मिक दृष्टिकोण है—पुत्रोत्पादन का लक्ष्य, जिसे वाग्भट ने अ.हू.शा. १।३० में स्वीकार किया है। दूसरा है आलिकृन्पूर्वक स्पर्शमुख की प्राप्ति, फ्रेञ्चलेटर इसमें बाधक होता है, क्योंकि इसके लगा लेने से स्पर्शमुख में बाधा आ जाती है। तीसरा लक्ष्य है—विमुष्टिमुख अर्थात् शुक्र के निकलने का मुख। खेल-खेल में भी मैथुन करने का निषेध है। देखें—'क्रीडायामपि'...'परिवजयेत्'। (सु.चि. २४।२११)
राजा-महाराजाओं अर्थात् धनसम्पन्न लोगों के आत्मीय जनों से अधिक उनके शत्रु होते हैं, जो उन्हें लूटने-खसोटने में लगे रहते हैं। इनसे भी अधिक सावधान रहना चाहिए, जो विषकन्या आदि के प्रयोग से उन्हें मार डालना चाहते हैं। इसका विस्तृत विवेचन 'विषकन्या' नाम से अ.सं.सू. ८।८६-८९ में दिया है, इसे पढ़ें। यदि राजा आदि श्रीमान् पुरुष चिकित्सक की सलाह से दैनिक व्यवहार करते हैं, तो वह उन्हें सावधान कर बाहर से उस सुन्दरी भीतर से घातक स्त्री का स्पर्श भी नहीं होने देता, फलतः वे सुरक्षित रह जाते हैं।
श्रुतचरितसमूदे कर्मदक्षे दयालो भिषजि निरनुबन्धं देहरक्षां निवेशय।
भवति विपुलतेजःस्वास्थ्यकीर्तिप्रभावः स्वकुशलफलभोगी भूमिपालश्चिरायुः ॥ ७७ ॥
इति श्रीबेद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्राग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नरक्षा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
राजा आदि का कर्तव्य —शास्त्रज्ञ, चरित्रवान्, चिकित्साकार्यकुशल, प्राणियों पर दया करने वाले चिकित्सक पर निःशंक होकर अपने शरीर की रक्षा का भार डालकर राजा-महाराजा या श्रीमान् पुरुष अत्यन्त तेजस्वी, स्वस्थ (नैरोग्य), कीर्तिमान्, प्रभावशाली तथा अपने जीवन के सुखों का उपभोग करता हुआ दीर्घायु होता है ॥ ७७ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
अन्नरक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ॥ ७७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातो मात्राशितौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से मात्राशितौय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इसके पहले ७।५३ में कहा गया है—‘आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते’। अतएव इस ८वें अध्याय में उस आहार का किस प्रकार मात्रा के अनुकूल सेवन करना चाहिए, इस विषय की चर्चा की जा रही है, क्योंकि यहाँ जो मात्रा शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका ताल्य है आहार का सम्यक्योग। यह अशन या आहार सात प्रकार का होता है—१. सकीर्णशन, २. विरुद्धाशन, ३. अमात्राशन, ४. अजीर्णशन, ५. समशन, ६. अध्यशन तथा ७. विषमाशन। इनमें दो के उदाहरण आगे इसी अध्याय में दिये जायेंगे।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५, च.सू. २७, च.वि. २, च.वि. १५, च.सि. १२, सु.सू. ४६, सु.उ. ५६ एवं अ.सं.सू. १० तथा ११ में देखें।
मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्रेः प्रवर्तिका । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरुण्यपि लघून्यपि ॥ १ ॥
आहार-मात्रा का वर्णन —मनुष्य को सदा मात्रा के अनुसार आहार (भोजन) करना चाहिए, क्योंकि उचित मात्रा में किया गया भोजन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरु तथा लघु द्रव्यों को देखकर करना चाहिए, जैसा आगे कहा जायेगा ॥ १ ॥
वक्तव्य —मात्रा का विचार च.सू. ५।४ में संक्षेप से नेपे-तुले शब्दों में किया गया है। इसके आगे च.वि. २।३ में कुछ विशेष ढंग से इसे कहा है—‘आहार करते समय पुरुष को आमाशय की खाली जगह को तीन भागों में इस प्रकार बाँट देना चाहिए; यथा—एक भाग को ठोस आहार-द्रव्यों के लिए, एक भाग द्रव द्रव्यों के लिए और एक भाग वात, पित्त तथा कफ के लिए रखें’। वामभट ने इसी विषय को प्रकारान्तर से आगे कहा है—‘अग्नेन कुक्षेर्द्विषी पानेनैकं प्रपूरयेत् । आश्रयं पवनादीनां चतुर्यमवशेषयेत्’। (अ.हृ.सू. ८।४६) अर्थात् ‘भोजन करते समय आमाशय के दो भागों को रोटी, दाल, भात आदि से भर ले, तीसरे भाग को पेय पदार्थों से भर ले और शेष चौथे भाग को वात-पित्त-कफ की क्रिया के लिए सुरक्षित रखें’। इसके पहले भी श्रीवृद्धावभट ने मात्रा का विचार करते हुए कहा है—‘मात्रा’...‘चाहारराशिः’। (अ.सं.सू. १०।९) अर्थात् ‘मात्रा वह है, जो आहार के सभी पदार्थों के परिमाण से तथा प्रत्येक द्रव्य के गुरु-लघु आदि गुणों के समुदाय से ‘आहारराशि’ कही जाती है’। इसके आगे फिर वृद्धावभट ने अ.सं.सू. ११।३-५ में आहार-मात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। सु.सू. ४६ के उत्तरार्ध में इस विषय को सूत्र रूप में कहा गया है।
गुरुणामर्धसौहित्यं लघूनां नातिवृत्तता । मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद्भिजीर्यति ॥ २ ॥
मात्रा में गुरु-लघु विचार —गुरु भोजन-पदार्थों को आधी तृप्ति हो जाने पर खाना छोड़ दें और लघु भोजन-पदार्थों को भी अधिक तृप्त होने तक न खायें। वास्तव में भोजन की उचित मात्रा वही है, जो सुखपूर्वक पच जाय ॥ २ ॥
भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयीजसे । सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ ३ ॥
१३६
अष्टाङ्गहृदये
हीन मात्रा वाले आहार से हानि—हीन ( कम ) मात्रा वाला भोजन बल, शरीरपुष्टि तथा ओजस् को नहीं बढ़ाता है और इस प्रकार का भोजन सभी प्रकार की वातव्याधियों की उत्पत्ति का कारण होता है॥ ३॥
अतिमात्रं पुनः सर्वांनाशु दोषान् प्रकोपयेत्।
अधिक मात्रा वाले आहार से हानि—मात्रा से अधिक किया गया आहार वात आदि सभी प्रकार के दोषों को शीघ्र ही प्रकृपित कर देता है।
पीड्यमाना हि वाताद्या युगपत्तेन कोपिताः॥ ४॥
आमेनात्रेन दुष्टेन तदेवाविश्य कुर्वते। विष्टम्भयन्तोऽलसकं च्यावयन्तो विसूचिकाम्॥ ५॥
अधरोत्तरमार्गाभ्यां सहस्रैवाजितात्मनः।
विसूचिका के लक्षण—ऊपर कहे गये अतिमात्रा वाले आहार का सेवन कर लेने से पीड़ित वात आदि दोष उस आम ( न पचे हुए ) तथा दूषित आहार से एक साथ कृपित होकर एवं उसी आहार में मिलकर आमाशय की गति को रोककर 'अलसक' नामक रोग को पैदा कर देते हैं। उस अजितात्मा पुरुष के ऊपर तथा नीचे के मार्ग से अर्थात् मुख एवं गुद मार्ग से क्रमशः वमन तथा अतिसार के रूप में आहार पदार्थ को निकालते हुए 'विसूचिका' नामक रोग को पैदा कर देते हैं॥ ४-५॥
प्रयाति नोर्ध्वं नाधस्तादाहारो न च पच्यते॥ ६॥
आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः।
अलसक की परिभाषा—अलसक रोग होने के पहले जो आहार खाया गया था, वह न तो ऊपर ( मुख ) की ओर से निकलता है और न नीचे ( गुदमार्ग ) से निकलता है, न वह पचता ही है। वह आमाशय में आलसी की भाँति पड़ा रहता है, अतएव इस रोग को 'अलसक' कहा जाता है॥ ६॥
विविधैर्वेदनोद्भेदाभ्याद्विभुशकोपतः॥ ७॥
सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका।
विसूचिका की परिभाषा—वात आदि दोषों के अत्यन्त प्रकृपित हो जाने के कारण अनेक प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति होने से जो बार-बार सूर्य की भाँति शरीरावय को बंधती रहती है, उसे 'विसूचिका' कहते हैं॥ ७॥
वक्तव्य—'विसूचिका' शब्द में श, ष, स इन तीनों का प्रयोग यत्र-तत्र देखा जाता है। जैसे—कलश, कलस आदि। विसूचिका—इसमें आम आहार वमन एवं विरेचन के रूप में बार-बार निकलता रहता है। अलसक—इसमें आम आहार आमाशय में पड़ा ही रहता है और वह पचता भी नहीं। इसका उक्त नाम इसके लक्षणों के अनुरूप है।
तत्र शूलप्रमानाहकम्पस्तम्भादयोऽनिलात्॥ ८॥
पिताञ्च्वरातिसारान्दर्हातृष्टुप्रलयायः। कफाच्छर्द्वज्जगुरुतावाक्सङ्घोषिनादयः॥ ९॥
विसूचिका के लक्षण—वातदोष से शूल, चक्करों का आना, आनाह, कैंपकैपी का होना तथा स्तम्भ ( जड़ता ) ये लक्षण होते हैं। पित्तदोष से ज्वर, अतिसार, भीतर से जलन, बार-बार प्यास का लगना एवं प्रलाप ( अंत-संत बकाना ) ये लक्षण होते हैं। कफदोष से छर्दि ( वमन ), शरीर के अवयवों में भारीपन, बोलने में रुकावट तथा लार का चूना ये लक्षण होते हैं॥ ८-९॥
विशेषादुर्बलस्याल्पवहेर्वगविधारिणः। पीडितं मारुतेनात्रं श्लेष्मणा रुद्धमन्तरा॥ १०॥
अलसं क्षोभितं दोषैः शल्यत्वेनैव संस्थितम्। शूलादीन् कुस्ते तीव्रांश्चर्द्वतीसारवर्जितान्॥ ११॥
सोऽलसः—
मात्राशिलीयाध्यायः ८ ]
सूत्रस्थानम्
१३७
अलसक का वर्णन—यह रोग विशेष करके दुर्बल, मन्द अग्निवाले, वात, मूत्र तथा मल के वेगों को रोकने वाले पुरुष को होता है। इसमें खाया गया आहार वात द्वारा पीड़ित एवं कफ के कारण आमाशय में रोका गया स्वयं वह गतिहीन हो जाता है। वात आदि दोषों द्वारा हिलाया-डुलाया जाने पर भी वह आमाशय में शल्य के रूप में स्थित रहता है तथा कष्टकारक शूल आदि विकारों को तो करता है, किन्तु इसमें वमन-विरेचन नहीं होते, अतः इस रोग को अलस या अलसक कहते हैं॥ १०-११॥
—अत्यर्थदुष्प्रास्तु दोषा दुष्प्रामबद्धाः। यान्तस्तियर्क्तुं सर्वं दण्डवत्तस्मभ्यन्ति चेत्॥ १२॥ दण्डकालसकं नाम तं त्यजेदाशुकारिणम्।
दण्डालसक का वर्णन—ऊपर कहे गये कारणों से वात आदि दोष अत्यन्त कुपित तथा दूषित होकर आम (अपचय) अन्न द्वारा मुख एवं गुद मार्ग के रुक जाने के कारण ये तिर्यग्वाही अर्थात् रसवाही प्रोटों द्वारा समस्त शरीर में फैलकर सम्पूर्ण शरीर को दण्ड (डण्डा) के समान जड़ कर देते हैं। अतः इस रोग को दण्डालसक कहते हैं। यह रोग शीघ्र मारक होता है, इसकी चिकित्सा करना छोड़ देनी चाहिए॥ १२॥
वक्तव्य—अ.सं.सू. ११५१ में विस्चिका के असाध्य लक्षणों का वर्णन किया है। इनका अवलोकन कर लें।
विरुद्धाध्यशनाजीर्णशीलिनो विषलक्षणम्॥ १३॥
आमदोषं महाघोरं वज्येद्विषसंज्ञकम्। विषरूपाशुकारित्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वतः॥ १४॥
आमविष का वर्णन—विरुद्धअशन (अ.हृ.सू.७।३१), अध्यशन (इसी अध्याय का ३४वाँ पद्य) तथा अजीर्ण अवस्था में भी आहार करने वाले पुरुष का आमदोष अत्यन्त कष्टदायक होता है, इसीलिए इसे 'आमविष' कहते हैं। यह विष के समान अपना शीघ्र प्रभाव दिखलाता है और इसकी यदि चिकित्सा की जाती है तो उसका प्रभाव भी विपरीत ही होता है॥ १३-१४॥
वक्तव्य—'विरुद्धोपक्रमत्व'—यह आमविष विष के समान गुणों वाला होता है, अतः विष की शीत प्रधान चिकित्सा की जाती है और आमदोष में उष्ण उपचार करने का विधान है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है, जिससे सफलता नहीं मिल पाती। चरक ने भी उक्त विषय का प्रतिपादन इस प्रकार किया है—'विरुद्धाध्यशनाजीर्णशनीलिनाः पुनरामदोषमामविषमित्यावक्ष्यते भिषजः'। (च.वि. १।१२) ठीक इसी का पद्यानुवाद श्रीवामट ने किया है। यद्यपि विषरोगी की चिकित्सा की जाती है, वह नीरोग भी होता है, किन्तु यहाँ (आमविष में) परिस्थिति का भेद है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है। इस आमविष का जब प्रकोप होता है तो ऐंठन या मरोड़ के साथ चावल के धोअन का जैसा वमन या विरेचन होता देखा जाता है। प्रायः इसका स्वरूप 'आमालिसार' जैसा होता है।
अथाममलसोभूतं साध्यं त्वरितमृलिल्लेखेत्। पीत्वा सोप्रापदुर्फलं वार्युष्णं योजयेत्ततः॥ १५॥
स्वेदनं फलवर्ति च मलवातानुलोमनीम्। नाम्यमानानि चाङ्गानि भृशं स्विन्नानि वेष्टयेत्॥ १६॥
आमदोष की चिकित्सा—जब आमदोष अलसक के रूप में परिणत हो गया हो और साध्यता के लक्षणों से युक्त हो, तब उसे बाल्यवच, पटु (नमक) एवं फल (मैनफल) को गरम पानी में मिलाकर पिलायें, जिससे शीघ्र ही वमन हो अर्थात् उस रोगी को यह वमनकारक पेय पिलाकर शीघ्र वमन करायें। उसके बाद उसे स्वेदन करायें और फिर उसे मल तथा अपानवायु को अनुलोम कराने वाली फलवर्ति का प्रयोग करायें। यदि इस समय आमदोष की विकृति के कारण उसके अंगों में सिकुड़न आ रही हो तो उन्हें पर्याप्त स्वेदन कराकर वस्त्र आदि से कसकर बाँध दें॥ १५-१६॥
वक्तव्य—'फलवर्ति' नामक जिस योग की चर्चा खारणदि ने यहाँ की है, वह इस प्रकार है—'शूले तु स्तिमिते सामे स्वेदः शस्तो मुद्गर्मुहुः। ह्युष्णोः कटुकैः पांशुकीरषिकतादिभिः॥ पिपल्योऽगारधूमश्र मदनं
१३८
अष्टाङ्गहृदये
सर्पपास्त्रिवृत् । हेमक्षीरी वचा किण्वं कुण्डं दन्ती यवाग्रजः ॥ समूत्रलवणाभ्यक्ता फलवर्तिरियं हिता । संसेद्यालसके शूलविबन्धानाहनाशिनी ॥ अर्थ प्रायः स्पष्ट है। दूसरी फलवर्ति का योग श्रीचक्रमाणि ने 'उदावर्तचिकित्सा' श्लोक १३ चन्द्रदत्त में दिया है। श्रीअरुणदत्त ने अपनी व्याख्या में एक फलवर्ति का योग इस प्रकार दिया है—'विपाच्च मुत्राम्लमधुनि दन्तीपिण्डीतकुष्णाविडधूमकुष्ठैः । वर्ति कराङ्गुष्ठनिभां घृतात्कां गुदे रूजानाहहरीं विदध्यात् ॥ यदि ये वर्तियां समय पर उपलब्ध न हों तो किसी अन्य मूल तथा वात को अनुलोमन करने वाली वर्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
विसूच्यामतित्वद्वयां पाण्योर्दाहः प्रशस्यते। तदहश्चोपवास्येनं विरिक्तवदुपाचरेत् ॥ १७ ॥
पार्णिदाह-प्रयोग—यदि विसूची (हैजा) रोग का वेग अधिक बढ़ गया हो तो दोनों एडियों में दाहकर्म करना चाहिए, इसकी प्रशंसा की गयी है। उस दिन इस रोगी को उपवास कराकर विरिक्त की भांति इसका उपचार करें ॥ १७ ॥
वक्तव्य—विसूची के वेग के अधिक बढ़ जाने पर जो ऊपर पार्णिदाह की चर्चा की गयी है, वह वास्तव में रोगी की बेहोशी को दूर करने के लिए है। इसका उल्लेख सुश्रुत में भी है। देखें—सू.उ. ५६।१२। ध्यान दें—सुश्रुत ने कहा है कि यह दाह कर्म तभी करे जब रोगी साध्य हो। विरिक्तवदुपाचरेत्—वमन कराने के बाद रोगी को संसर्जन क्रम में रखा जाता है, इसे बाद में पेया, विलेपी देकर स्वस्थ होने पर भोजन दिया जाता है। इसकी विस्तृत विधि देखें—अ.हृ.सू. १८।
तीव्रार्तिरपि नाजीर्णो पिबेच्छूलज्जनमौषधम्। आमसन्नाऽन्तले नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ १८ ॥ निहत्यादपि चैतौषां विभ्रमः सहसाऽऽतुरम्।
अन्य उपचार—अत्यन्त वेदना होने पर भी जीर्णों का रोगी शूलनाशक औषध का पान न करे, क्योंकि आमदोष के कारण मन्द जठराग्नि वात आदि दोषों, औषध तथा अशन (पहले खाये गये आहार) को पचाने में समर्थ नहीं होता है। कभी ऐसा भी होता है कि दोष, औषध एवं आहार का विभ्रम (समुचित प्रयोग न हो पाना) रोगी को सहसा मार सकता है ॥ १८ ॥
वक्तव्य—च.वि. २।१३ का यह गद्य वाग्भट के उक्त पद्यरचना का मूल स्रोत रहा है।
जीर्णाशने तु भेषज्यं युज्य्यात् स्तब्धगुरुदरे ॥ १९ ॥
दोषशेषस्य पाकार्थमग्नेः सन्धुक्षणाय च।
भोजन के पच जाने पर भी यदि पेट में स्तब्धता एवं भारीपन प्रतीत होता है, तो शेष दोष को पचाने के लिए और जठराग्नि को मुल्लगाने अर्थात् तीव्र करने के लिए औषध-योगों का प्रयोग करें ॥ १९ ॥
शान्तिरामविकाराणां भवति त्वपतर्पणात् ॥ २० ॥
त्रिविधं त्रिविधे दोषे तत्समीक्ष्य प्रयोजयेत्।
अपतर्पण-प्रयोग—आमदोषजनित विकारों की शान्ति करने के लिए अपतर्पण (तर्पण = चकाचक भोजन करना, इसके विपरीत उपवास-लंघन = अपतर्पण) का प्रयोग करना चाहिए और उस अपतर्पण का प्रयोग तीन प्रकार के दोषों में तीन प्रकार (अल्प, मध्य, प्रधान भेद) से विचार करके करना चाहिए ॥ २० ॥
तत्रालपे लङ्घनं पथ्यं, मध्ये लङ्घनपाचनम् ॥ २१ ॥
प्रभूते शोधनं, तद्वि मूलादुमूलयेन्मलात्।
यदि आमदोष अल्पमात्रा में हो तो लंघन (उपवास) करना ही हितकर होता है। मध्यम श्रेणी का आमदोष हो तो इसमें लंघन के साथ-साथ दोष को पचाने वाले औषध-द्रव्यों का भी प्रयोग करना चाहिए। यदि आमदोष अधिक मात्रा में हो तो वमन तथा विरंजन करायें, क्योंकि यह शोधन कर्म उक्त आमदोष को जड़ से उखाड़ देता है ॥ २१ ॥
मात्राशितौषध्यायः ८ ]
सूत्रस्थानम्
१३९
एवमन्यानिप व्याधीन् स्वनिदानविपर्ययात् ॥ २२ ॥
चिकित्सेदनुबन्धे तु सति हेतुविपर्ययम् । त्यक्त्वा यथायथं वैद्यो युज्यादव्याधिविपर्ययम् ॥ २३ ॥
हेतुविपरीत आदि चिकित्सा—इसी प्रकार ज्वर आदि अन्य रोगों की भी अपने-अपने निदान ( हेतु ) के विपरीत चिकित्सा करे । यदि ऐसा करने पर भी रोग शान्त न हो तो उसे छोड़कर चिकित्सक यथोचित अवसर देखकर व्याधिविपरीत औषध-योगों का प्रयोग करे ॥ २२-२३ ॥
तदर्थकारि वा, पक्वे दोषे त्विद्धे च पावके । हितमभ्यञ्जनस्नेहपानबस्त्यादि युक्तितः ॥ २४ ॥
विपरीतार्थकारी चिकित्सा—अथवा विपरीतार्थकारी चिकित्सा-विधि का प्रयोग करना चाहिए । जब इस प्रकार दोष का पावन हो जाता है और जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, तो विधिपूर्वक अभ्यञ्जन ( तैलमर्दन ), स्नेहपान तथा बस्ति आदि का प्रयोग करना चाहिए ॥ २४ ॥
बक्तव्य—‘तदर्थकारि’—तत् अर्थात् निदान, व्याधिविपर्यय द्वारा साध्य, जो ‘अर्थ’ रोगशान्तिरूप लक्षण को करने का स्वभाव है, जिसका इस प्रकार की चिकित्सा अथवा जैसे मदात्यय रोग में पुनः मद्यपान कराना, अतिसार में विरेचन कराना आदि । ‘बस्त्यादि’—यहाँ आदि शब्द से रसायन आदि चिकित्सा-विधियों की ओर संकेत है ।
अजीर्णं च कफादामं तत्र शोफोऽक्षिगण्डयोः । सद्योभुक्त इबोद्गारः प्रसेकोक्त्तलेशगौरवम् ॥ २५ ॥
आमाजीर्ण के लक्षण—कफदोष के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है । इसके लक्षण—आँखें तथा गालों पर शोथ, तत्काल खाये हुए आहार के अनुरूप उद्गारों ( डकारों ) का आना, लालाझाव, जो मिचलाना तथा शरीर में भारीपन—ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥
विष्टब्धमनिलाच्चूलविबन्धाधमानसादकृत ।
विष्टब्धाजीर्ण के लक्षण—वातदोष के प्रकोप से विष्टब्धाजीर्ण होता है । इसमें पेट में शूल, मल-मूत्र एवं अपानवायु के निकलने में रुकावट, अफरा एवं शरीर में दीलापन—ये लक्षण होते हैं ।
पिताद् विदग्धं तुण्मोहभ्रमाम्लोद्गारदाहवत् ॥ २६ ॥
विदग्धाजीर्ण के लक्षण—पित्तदोष के प्रकोप से विदग्धाजीर्ण होता है । इसमें बार-बार प्यास लगना, मोह ( बेहोशी ), चक्करों का आना, खट्टे डकारों का आना एवं जलन का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ २६ ॥
लङ्घनं कार्यमामे तु, विष्टब्धे स्वेदनं भृशम् । विदग्धे वमनं, यद्वा यथावस्थं हितं भवेत् ॥ २७ ॥
चिकित्सा-सूत्र—आमाजीर्ण में रोग के अनुसार पूर्ण लंघन ( उपवास ) करे या लघुभोजन करे । विष्टब्धाजीर्ण में बार-बार पेट के ऊपर स्वेदन करे, इससे वातदोष का अनुलोमन होता है । विष्टब्धाजीर्ण में तब तक वमन कराना चाहिए जब तक वमन में पित्त का दर्शन न हो जाय । अन्य लक्षणों की शान्ति के लिए परिस्थिति के अनुसार समयोचित चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २७ ॥
गरीयसो भवेल्लीनादामादेव विलम्बिका । कफवातानुबद्धाऽऽमलिङ्ग तत्समसाधना ॥ २८ ॥
विलम्बिका के लक्षण—भयावह आमदोष जो लीन ( छिपा ) रहता है, उसी से यह विलम्बिका रोग हो जाता है । इसमें कफ एवं वात दोष युक्त आमाजीर्ण के लक्षण होते हैं और ऊपर कहे गये कफ-वात-दोष सम्बन्धित अजीर्णों के समान ही इसकी भी चिकित्सा होती है ॥ २८ ॥
बक्तव्य—‘लीन’ शब्द की चरितार्थता—वमन-विरेचन से सामान्य आमदोष निकल जाता है, ऐसा ऊपर कहा गया है, किन्तु यह आमदोष उक्त उपायों से भी नहीं निकल पाता, अतएव इसे लीन ( सटा हुआ ) कहा गया है । सूश्रुत ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है—‘दुष्टं तु भुक्तं कफमाक्षताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमध्य यस्य । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्सामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः’ ॥ ( मु. उ. ५६९ ) सुश्रुत
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अष्टाङ्गहृदये
ने इसे अन्य आमदोषों से अतिकष्टसाध्य कहा है। अतएव इसका नाम भी विलम्बिका (लीचड़ रोग) रखा है। महर्षि वामदेव ने इस आमदोष के लिए 'लीन' शब्द (सट जाने वाला) का युक्तियुक्त प्रयोग किया है।
अश्रद्धा हृद्व्यथा शुद्धेऽप्युद्गारे रसशेषतः । शयीत किञ्चिदेवात्र सर्वश्रानाशितो दिवा ॥ २९ ॥
स्वप्यादजीर्णी, सज्जातबुभुक्षोऽद्यान्मिन्तं लघु।
रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा—रसशेषाजीर्ण में आहार के पच जाने पर भी जब रस का परिपाक नहीं हो पाता है, तब ये लक्षण होते हैं—उद्गारों (डकारों) के शुद्ध आने पर भी रस के अपक्व रह जाने से भोजन के प्रति असन्धि तथा हृदय में पीड़ा होती रहती है।
उपचार—इस दशा में दिन में कुछ खाये-पीये बिना थोड़ा सो जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य अजीर्णरोगी भी दिन में सो जायें और भलीभाँति भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में लघु (सुपच) आहार का सेवन करें ॥ २९ ॥
विवग्धोऽतिप्रवृत्तिर्वा ग्लानिर्माश्रुतमूकता ॥ ३० ॥
अजीर्णलिङ्गं सामान्यं विष्टम्भो गौरवं भ्रमः ।
अजीर्ण का सामान्य लक्षण—अजीर्ण के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं—मल का खुलकर न होना अथवा अधिक (अतिसार के रूप में) निकलना, ग्लानि (मन का मलिन रहना), वायु का अनुलोम न होना अर्थात् ठीक ढंग से डकार एवं अपानवायु के रूप में न निकल पाना, विष्टम्भ (आमाशय में स्वाभाविक गति का न होना), पेट तथा सम्पूर्ण शरीर में भारीपन का होना एवं चक्करों का आना ॥ ३० ॥
न चातिमात्रमेवात्रामादोपाय केवलम् ॥ ३१ ॥
द्विष्टविष्टम्भिदग्धामगुरुक्षहिमाशुचि । विदाहि शुष्कमत्यम्बुलुप्तं चात्रं न जीर्यति ॥ ३२ ॥
उपतप्तेन भुक्तं च शोकक्रोधक्षुदादिभिः ।
अजीर्ण के विविध कारण—केवल अधिक मात्रा में खाया हुआ आहार ही आमदोष का कारण नहीं होता है, अपितु इसके अन्य अनेक कारण हैं। यथा—द्विष्ट (जिसे खाने की इच्छा न हो), विष्टम्भकारक, जला हुआ, आम (भलीभाँति न पका हुआ), गुरु (देर में पचने वाला), रूक्ष (स्नेह रहित), शीत (बासी), अपवित्र, विदाहकारक, अत्यन्त सूखा, अधिक पानी पीने से अथवा थोड़ा भी जल न पीने से खाया हुआ भोजन नहीं पचता। बड़ी देर से भूख लगने के बाद में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता तथा शोक, क्रोध आदि से पीड़ित होने के बाद में खाया हुआ भोजन भी ठीक प्रकार से नहीं पचता ॥ ३१-३२ ॥
वक्तव्य—'क्षुदादिभिः'—यहाँ प्रयुक्त आदि शब्द से काम, क्रोध, लोभ, मोह, लज्जा, अपमान, तिरस्कार, भय और घबड़ाहट की स्थिति में खाया गया आहार समुचित प्रकार से नहीं पचता है। ऊपर की चतुर्थ पंक्ति का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—'शोकक्रोधक्षुदादिभिः उपतप्तेन (पुंसा) भुक्तम्'। शोक, क्रोध आदि मानसिक विकृतियाँ भोजन करते समय जो तन्मयता होती चाहिए, उसमें बाधा पहुँचाती हैं, क्योंकि चरक का आदेश है—'तन्मना भुज्यते' (च.वि. १।२५)। इसके अतिरिक्त इस अध्ययन में भोजन कैसे करना चाहिए, इसका विधिपूर्वक वर्णन किया है, इसे पढ़कर तब भोजन करें। आज भी जो अनशन किया करते हैं, उन्हें पहले फलों का रस ही दिया जाता है, न कि पूर्ण भोजन।
मिश्रं पथ्यमपथ्यं च भुक्तं समशनं मतम् ॥ ३३ ॥
विद्यादध्यशतं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम् । अकाले बहु चाल्यं वा भुक्तं तु विषमाशनम् ॥ ३४ ॥
त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान् व्याधीन् सुजन्ति वा ।
समशन आदि के लक्षण—पथ्य (हितकर) तथा अपथ्य (अहितकर) प्रकार के भोजनों को मिलाकर जो खाया जाता है, उसे 'समशन' कहते हैं। अभी भोजन किया है, वह पचा नहीं तब तक जो पुनः