भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यश्च बलाबलम् ॥५३॥ वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च।

निद्रा नामक उपस्तम्भ—दूसरा उपस्तम्भ है निद्रा—शयन करना ( सुख से सोना )। इसी के ऊपर आगे कहे जाने वाले भाव निर्भर रहते हैं। यथा—सुख, पुष्टि, बल, वृषता ( भैषुन करने की शक्ति ), ज्ञान तथा दीर्घजीवन का लाभ भलीभाँति नींद आ जाने पर मिलते हैं और नींद के न आने पर इनके विपरीत भावों की प्राप्ति होती है। यथा—दुःख, कुशता, दुर्बलता, क्लीवता ( नपुंसकता—रतिशक्ति का अभाव ), अज्ञान तथा मृत्यु ॥५३॥

अकालेऽतिप्रसङ्गान्च न च निद्रा निषेविता ॥५४॥ सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा।

निद्रा का अभाव—निद्रा का दुरुपयोग या अभाव—असमय में निद्रा का सेवन ( सोना ), आवश्यकता से अधिक सोना अथवा थोड़ा-सा भी न सोना जीवन के सुखों तथा आयु को नष्ट कर देता है। इस प्रकार की अनियमित निद्रा कालरात्रि के समान होती है ॥५४॥

बक्तव्य—उक्त पद्य श्रीवाग्भट ने चरक से अविकल रूप में उद्धृत किया है। देखें—च.सू. २१।३७।

रात्रौ जागरणं रूक्षं, स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ॥५५॥ अरूक्षमनभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम्।

निद्रा के गुण-दोष—रात्रि में जागने से शरीर में रुक्षता हो जाती है, दिन में सोने से शरीर में स्निग्धता बढ़ जाती है ( इसमें मूल कारण कफदोष की वृद्धि है )। सोने का एक प्रकार और है—बैठे-बैठे ऊँचाना या झपकियाँ लेते रहना। यह न तो रुक्षता करता है और न कफ को ही बढ़ाता है ॥५५॥

बक्तव्य—चरक ने निद्रा की इस स्थिति को 'आसीनप्रचलायित' संज्ञा दी है। देखें—च.सू. २१।५०। ग्रीष्मे वायुचयादानरीक्षरात्र्यल्पभावतः ॥५६॥

दिवास्वप्नो हितोऽन्यस्मिन् कफपित्तकरो हि सः। मुक्त्वा तु भाष्ययानाध्वमघस्त्रीभारकर्मभिः ॥ क्रोधशोकभयैः क्लान्तान् श्वासहिष्मातिसारिणः। वृद्धबालाबलक्षीणक्षततृशूलपीडितान् ॥ अजीर्ण्यभिहृतोन्मत्तान् दिवास्वप्नोचितानपि। धातुसाम्यं तथा होषां श्लेष्मा चाङ्गानि पुष्यति ॥

निद्रा सम्बन्धी विचार—ग्रीष्म ऋतु में वातदोष का संचय होने से, आदानकाल के कारण होने वाली रुक्षता से एवं इन दिनों रातों के छोटी हो जाने से दिन में सोना हितकर होता है। इसके अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में दिन में सोना कफकारक होता है ॥५६॥

अधिक बोलने से, सवारी करने से, रास्ता चलने से, मद्यपान करने से, स्त्री-सहवास करने से, क्रोध से, शोक से, भय से, थके हुए पुरुषों को, श्वास, हिक्का ( हिचकी ) एवं अतिसार रोगियों को, वृद्ध, बालक, दुर्बल ( कमजोर ), क्षीण ( कुश ), क्षत ( उरःक्षत ), प्यास तथा शूलरोग से पीड़ित, अजीर्णरोगी, घायल ( चोट लगे हुए ), उन्मत्त ( पागल ) व्यक्ति को और जिन्हें शास्त्र ने दिन में सोने की अनुमति दे रखी है उन्हें तथा ऊपर कहे गये रोगियों को भी दिन में सोना उचित है; क्योंकि दिन में सोने से इनका धातु साम्य हो जाता है और कफ इनके शरीरावयवों को पुष्ट कर देता है ॥५७-५९॥

बहुमेदःकफाः स्वप्न्युः स्नेहनित्याश्च नाहनि। विपार्ताः कण्ठरोगी च नैव जातु निशास्वपि ॥६०॥

दिन में न सोने का निर्देश—जिन मनुष्यों के शरीर में मेदोधातु एवं कफदोष बढ़ा हुआ हो और जो प्रतिदिन स्निग्ध आहारों का सेवन करते हैं, उन्हें दिन में नहीं सोना चाहिए। विषरोग से तथा गले के रोग से पीड़ित रोगी को रात में भी नहीं सोना चाहिए ॥६०॥

अकालशयनान्मोहज्वरस्तैमित्यपिनासः। शिरोरुक्शोफहूत्तलसप्तमोरोधाग्रिमन्दताः ॥६१॥