भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अन्नरसाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

१३१

अकाल शयन से हानि—असमय में सोने से मोह, ज्वर, स्तैमिल्य ( गीले कपड़े से ओढ़े हुए का जैसा अनुभव होना ), पीनस ( प्रतिशयय ), शिरोरोग, मूजन, जी मिचलाना, रसवाही द्रोतों में रुकावट तथा मन्दाग्नि हो जाती है ॥ ६१ ॥

तत्रोपवासवसनस्वेदानवन्मोषधम् । योजयेदतिनिद्रायां तीक्ष्णं प्रच्छदन्नाञ्जनम् ॥ ६२ ॥ नावनं लङ्घनं चिन्तां व्यवार्थं शोकभीक्रुधः । एभिरेव च निद्रायां नाशः श्लेष्मातिसङ्ख्यात् ॥

चिकित्सा-निर्देश—उक्त स्थिति में रोगी को उपवास, बमन, स्वेदन और नत्य कारक औषधों का प्रयोग करें। अतिनिद्रा की स्थिति में तीक्ष्ण बमन, अञ्जन ( सुरमा ) एवं नत्य दें। उसे लंघन, चिन्ता, व्यवार्थ ( मैथुन ), शोक, भय तथा क्रोध करायें, जिससे रोगी के कफ का नाश होकर निद्रा का भी नाश हो सके ॥ ६२-६३ ॥

वक्तव्य—ऊपर कहे गये ६२ तथा ६३वें श्लोकों में केवल कफनाशक उपायों का वर्णन किया गया है, कफदोष की निवृत्ति हो जाने पर अतिनिद्रा स्वयं शान्त हो जाती है।

निद्रानाशादङ्गमर्दशिरोगौरवजुम्भिकाः । जाडघृणानिप्रमापक्तिनद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ६४ ॥

निद्रानाश के लक्षण—निद्रा के समुचित रूप से न आने पर शरीर में मसल देने की पीड़ा, सिर में भारीपन, बार-बार जँभाड़यों का आना, शरीर में जड़ता, हर्षक्षय, चक्करों का आना, भुक्त आहार का न पचना, उँघाई आदि वातविकार सम्बन्धी रोग हो जाते हैं ॥ ६४ ॥

यथाकालमतो निद्रां रात्रौ सेवेत सात्प्यतः । असात्स्याज्जागरादर्थं प्रातः स्वप्यादभुक्तवान् ॥ ६५ ॥

निद्रासेवन-निर्देश—अतएव रात्रि में समय पर सो जाना चाहिए। यही सात्प्यतः का अर्थ है—जिसे जितनी नींद आती हो उतना ही सोयें अर्थात् कोई रात में दो पहर, कोई तीन पहर सोता है, तदनुसार सोये। जो पूरी रात भलीभाँति न सो सका हो तो वह प्रातःकाल भोजन करके आधी नींद सो जाय ॥ ६५ ॥

शीलयेन्मन्दनिद्रस्तु क्षीरघररसान् दधि । अभ्यङ्गोद्गतस्तान्मूर्ध्कर्णक्षितर्पणम् ॥ ६६ ॥

कान्ताबाहुलताश्लेषो निर्वृत्तिः कृतकृत्यता । मनोऽनुकूला विषयाः कामं निद्रासुखप्रदाः ॥ ६७ ॥

ब्रह्मचर्यरतेर्ग्राम्यसुखनिःस्पृहचेतसः । निद्रा सन्तोषतृप्तस्य स्वं कालं नातिवर्तते ॥ ६८ ॥

पूर्णनिद्रा-प्राप्तिविधि—जिसे पूर्ण निद्रा न आती हो वह दुःख, मद्य, मांसरस, दही का सेवन करें; अभ्रंश, उबटन स्नान करें तथा सिर में, कानों में एवं आँखों में तर्पण स्नेह का प्रयोग करें। सामान्य रूप से स्त्री या पुरुष जिसे नींद न आती हो वह अपने प्रिय या प्रिया का आलिंगन करके सोये। निर्वृत्ति ( सुख ), कृतकृत्यता ( मैंने अपना कार्य कर लिया है ), मन के अनुकूल शब्द ( स्नेहपूर्ण कथाएँ या सुरीले गीत ) आदि विषयों की चर्चा—ये पर्याप्त निद्रासुख को देते हैं ॥ ६६-६७ ॥

ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ—जिसकी ब्रह्मचर्य के पालन में रति है, जिसका मन स्त्री-सहवास की ओर से निःस्पृह ( विरक्त ) रहता है और जो सदा सन्तोष से तृप्त रहता है, उसे अपने समय से निद्रा आ जाती है। अर्थात् उसकी निद्रा कभी भी अपने समय का अतिक्रमण नहीं करती है ॥ ६८ ॥

वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमद्रि की टीकाओं से युक्त अष्टांगहृदय में उक्त ६८वें पद्य को निद्रावर्णन सम्बन्धी अन्य श्लोकों के साथ केवल इसलिपि जोड़ दिया है कि उक्त श्लोक के उत्तरार्ध में निद्रा शब्द आया है। वास्तव में ६८वीं पद्य ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ का परिचायक होने के कारण स्वतन्त्र है।

निद्रा का वर्णन प्राचीन संहिताओं में इस प्रकार उपलब्ध होता है—च.सू. २१।३५ से ५९ तक और मु.शा. ४।३२ से ४७ तक। चरक ने निद्रा के अनेक भेद इस प्रकार किये हैं—‘तमोभवा श्लेष्मसमुद्रवा च मनःशरीरश्चसम्भवा च। आगतुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभावप्रभवा च निद्रा’ ॥ ( च.सू. २१।५८ ) चरक ने उक्त भाव को पुनः अपने शब्दों में इस प्रकार कहा है—‘रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधार्म-