भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

प्रवदन्ति निद्राम् ॥ (च.सू. २१।५९) अर्थात् जो स्वस्थ पुरुषों को रात्रि के समय स्वभाव से निद्रा आती है, उसे 'भूतधात्री' (समस्त प्राणियों की उपमाता के समान) कहते हैं, जो समस्त प्राणियों का धारण-पोषण करती है। यही निद्रा सभी प्रकार की निद्राओं में उत्तम है। तामसिक नींद भैंस, शेर, बाघ आदि प्राणियों को आती है, फलतः ये रात-दिन सोते रहते हैं। राजस व्यक्ति कभी भी अपनी नींद पूरी कर लेते हैं। सात्त्विक निद्रा जिनमें आती है, वे सत्ता आधी रात को थोड़ा-सा सो लेते हैं। एक निद्रा है—'अनवबोधिनी', जिस नींद के आ जाने पर प्राणी फिर जगता नहीं अर्थात् मर जाता है। यह मृत्युकाल की निद्रा का नाम है।

सुश्रुत ने ग्राम्य ऋतु में दिन में सोने का विधान इस प्रकार किया है—'सर्वतृषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्'। (सु.शा. ४।३८) इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक विकल्पों की चर्चा की है—'निद्रा सात्य्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा। दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः। न तेषां स्वप्तां दोषो जाग्रतां वापि जायते' ॥ (सु.शा. ४।४१) अर्थात् जिन लोगों ने रात में अथवा दिन में सोने का अभ्यास बना लिया है, जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के अभ्यासी हो गये हैं, उन्हें दिन में सोने अथवा रात में जागने से किसी प्रकार का दोष नहीं होता। वास्तव में तमोगुण और निद्रा का सम्बन्ध कफदोष से है, यही कारण है कि भोजन करते ही कफ की वृद्धि होने के कारण नींद आती है या आने लगती है। निद्रा का प्रारम्भिक स्वरूप है तन्त्र।

ग्राम्यधर्मं त्यजेन्नारौमनृतानां रजस्वलाम्। अप्रियामप्रियाचारां दुष्टसङ्कीर्णमेहनाम् ॥ ६९ ॥

अतिशूलकृशां सूतां गर्भिणीमन्ययोपितम्। वर्णिनीमन्ययोनिं च गुरुदेवपुनालयम् ॥ ७० ॥

चैत्यश्मशानाऽऽयतनचत्वारम्बुचतुष्यम्। पर्वाण्यनङ्गं दिवसं शिरोहृदयताडनम् ॥ ७१ ॥

स्त्री-सहवास का वर्णन—ग्राम्यधर्म (मैथुनकाल) में इस प्रकार की स्त्री का परित्याग करें—जो उस समय चित लेटी न हो, जो रजस्वला धर्म से निवृत्त न हुई हो, जो प्रिय (मनोनुकूल) न हो अथवा जिसका आचरण (व्यवहार) रुचिकर न हो, जिसका भग उपदेश आदि रोग से दूषित हो अथवा संकीर्ण हो, जो अत्यन्त मोटी या अत्यन्त कुश हो, जिसे अभी ४०-४५ दिन पूर्व प्रसव हुआ हो, जो पहले से गर्भिणी हो या जो दूसरे की स्त्री हो, जो ब्रह्मचारिणी हो, जो अन्यजातीया हो; इनको त्याग देना चाहिए।

निषिद्ध स्थान—गुरुगृह, देवगृह, राजगृह, चैत्य (यज्ञमण्डप, वेदी आदि), श्मशानभूमि, बध्यभूमि, चबूतरा, जलस्थान (नदीतट आदि) और चौराहा।

निषिद्ध दिन—संक्रांति, सूर्य-चन्द्रग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या, भग के अतिरिक्त (मुख आदि) अंगों में दिन में सहवास न करें। इस सम्भोग काल में हृदय तथा शिरः ताडन न करें ॥ ६९-७१ ॥

वक्तव्य—'हुरसङ्कीर्णमिहनाम्'—श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमदिने 'मेहनाम्' शब्द का अर्थ 'योनि' किया है। जब कि मेहन शब्द पुरुष की मूत्रेन्द्रिय के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। देखें—'मेदुं मेहनशेफसी' (अमरकोश) तथा—'मेहनं मूत्रशिशनयोः'। (मेदिनी) 'मेहनम्' क्ली० लिङ्गे। (बै.श.सि.) सुश्रुत ने उक्त विषय का वर्णन करते हुए कहा है—'योनिदोषसमन्विताम्'। (सु.चि. २४।१५)

'वाचां भटः = वाग्भट' के उक्त प्रयोग पर दोषवृष्टि डालने से पहले हम उक्त शब्द के परिवेश का पर्यालोचन करा देना चाहते हैं। वेद में पुरुष को 'द्यौः' और स्त्री को 'पुषिबी' तथा वात्स्यायन-कामसूत्र में पुरुष को 'कर्ता' और स्त्री को 'अधिकरण' कहा है। आकाश से वर्षा पुषिबी पर होती है। अतः कर्ता (गर्भाधानकर्ता अर्थात् बीज बोने वाले पुरुष) का अधिकरण (आधार) स्त्री है। ठीक इन्हीं परम्पराओं के आधार को लेकर सुधी वाग्भट ने 'करणाधिकरणयोश्च' (३।३।१७) सूत्र से अधिकरण अर्थ में 'मिह सेचनं' धातु तथा ल्युट् प्रत्ययान्त मेहन शब्द से 'इध्मप्रब्रश्चनः कुटारः' तथा 'गोदोहनी स्थाली' की भांति 'मेहना' प्रयोग वृद्धिपूर्वक किया है। अब इसका अर्थ होगा 'योनि' जिसमें वीर्य का सेचन होता है। यही दिक् के अनित्य होने से 'टाप्' प्रत्यय हुआ है।