अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षरसाध्यायः ७ ]
सूत्रस्थानम्
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अप्रियाम् अन्ययोषितम्—इन सभी विषयों का विचार स्त्रियों को पुरुषों के प्रति भी कर लेना चाहिए अर्थात् नारी ऐसे नर से सहवास न करे। स्त्री-पुरुष दोनों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सहवास पुत्र सन्तान-प्राप्ति के लिए ही किया जा रहा है।
शिरोहृदयताडनम्—यद्यपि शिरःताडन, हृदयताडन, केशाकर्षण, नखक्षत आदि रतिकलह सम्बन्धी विषयों का वर्णन वात्स्यायन-कामसूत्र में मिलता है, तथापि इस स्वास्थ्याशत्र में उसका पूर्ण रूप से निषेध किया गया है।
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्रान् दुःस्थिताङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगतस्त्यजेद्रेगो च मैथुनम् ॥
मैथुन के अयोग्य स्थिति—जिसने बहुत भोजन किया हो, अधीर (घबराया हुआ) हो, जिसे भूख लगी हो, दुःस्थिताङ्ग अर्थात् अनुचित आसन में स्थित होकर, जो प्यासा हो, जो बालक (अभी युवक न हुआ) हो, जो बूढ़ा हो गया हो, जिसे मल-मूत्र आदि का वेग प्रवृत्त हो तथा रोगी पुरुष मैथुन कर्म न करे ॥ ७१ ॥
बक्तव्य—उक्त विधि-निषेध नर-नारी दोनों के लिए है, क्योंकि 'मैथुन' मिथुन का कर्म है, निषेध के कारण स्पष्ट है। इस प्रसंग में वृद्धवाग्भट के वचनों का भी अनुसन्धान कर लेना चाहिए। देखें—अ.सं.सू. ९।८१-८४। अर्थात् इन निर्देशों का उल्लंघन वही कर सकता है, जिसे दीर्घजीवन की कामना न हो। देखें—'आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति'। क्योंकि शुक्रधातु शरीर का बहुमूल्य पदार्थ है। जिसके सम्बन्ध में कहा गया है—'मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्'। यहाँ तक आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य नामक शरीर को धारण करने वाले तीन उपस्तम्भों का वर्णन कर दिया गया है।
सेवेत कामतः कामं तुतो वाजीकृतो हिमे। श्रृहाद् वसन्तशरदोः पक्षाद् वर्षानिदाघयोः ॥ ७३ ॥
मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश—वाजीकरण औषधों एवं आहारों से तुप्त फलतः परिपुष्ट शरीरावयवों वाले नर-नारी हिमकाल (हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं) में इच्छानुसार मैथुन का सेवन करें। वसन्त एवं शरद् ऋतुओं में तीन दिनों तथा गर्मी और वर्षा ऋतुओं में पन्द्रह दिनों में मैथुन करें ॥ ७३ ॥
भ्रमकलमोरुदौर्बल्यबलधात्विन्द्रियक्षयाः। अपर्वमरणं च स्यादन्वथा गच्छतः स्त्रियम् ॥ ७४ ॥
विपरीत व्यवहार का फल—उक्त नियमों के विपरीत मैथुन करने पर भ्रम, क्लम (सुस्ती), ऊर्ध्वों में कमजोरी, कुशता तथा बल, रस आदि शुक्र पर्यन्त धातुओं का क्षय, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय अधवा असमय में मृत्यु भी हो सकती है ॥ ७४ ॥
स्मृतिमेधायुरारोग्यपुष्ठीन्द्रिययशोबलैः। अधिका मन्वजरसो भवन्ति स्त्रीषु संयताः ॥ ७५ ॥
संयम का महत्त्व—जो पुरुष स्त्री-सहवास में अपने को वश में रखते हैं, उनकी स्मरणशक्ति, मेधा, दीर्घायु, आरोग्य (स्वास्थ्य), शारीरिक पुष्टि, इन्द्रियबल, सुयश, शारीरिक एवं मानसिक बल अधिक होता है; वे देर में वृद्ध होते हैं ॥ ७५ ॥
बक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इस 'मैथुन' को तथा इसी प्रकार के अन्य भावों को भी 'तदाल् मुखसंज्ञक' कहा है। देखें—अ.सं.सू. ९।८५। इसी विषय का प्रतिपादन भगवद्गीता में भी किया गया है—'ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनि एव ते। आद्यन्तवन्तः क्रोन्तेय न तेषु रमते बुधः' ॥ (गीता) इसे पुरुष के लिए स्त्रीस्पर्शज और स्त्री के लिए पुरुषस्पर्शज सुखभोग कहा जाता है। इस प्रकार के सुखभोगों में समझदार स्त्री-पुरुष विशेष आसक्त नहीं होते।
स्नानानुलेपनहिमानिलखण्डवाद्यशीताम्बुदुग्धरसयूपसुराप्रसन्नाः ।
सेवेत चान् शयनं विरतं रतस्य तस्यैवमाशु वपुषः पुनरेति धाम ॥ ७६ ॥