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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यश्च बलाबलम् ॥५३॥ वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च।

निद्रा नामक उपस्तम्भ—दूसरा उपस्तम्भ है निद्रा—शयन करना ( सुख से सोना )। इसी के ऊपर आगे कहे जाने वाले भाव निर्भर रहते हैं। यथा—सुख, पुष्टि, बल, वृषता ( भैषुन करने की शक्ति ), ज्ञान तथा दीर्घजीवन का लाभ भलीभाँति नींद आ जाने पर मिलते हैं और नींद के न आने पर इनके विपरीत भावों की प्राप्ति होती है। यथा—दुःख, कुशता, दुर्बलता, क्लीवता ( नपुंसकता—रतिशक्ति का अभाव ), अज्ञान तथा मृत्यु ॥५३॥

अकालेऽतिप्रसङ्गान्च न च निद्रा निषेविता ॥५४॥ सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा।

निद्रा का अभाव—निद्रा का दुरुपयोग या अभाव—असमय में निद्रा का सेवन ( सोना ), आवश्यकता से अधिक सोना अथवा थोड़ा-सा भी न सोना जीवन के सुखों तथा आयु को नष्ट कर देता है। इस प्रकार की अनियमित निद्रा कालरात्रि के समान होती है ॥५४॥

बक्तव्य—उक्त पद्य श्रीवाग्भट ने चरक से अविकल रूप में उद्धृत किया है। देखें—च.सू. २१।३७।

रात्रौ जागरणं रूक्षं, स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ॥५५॥ अरूक्षमनभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम्।

निद्रा के गुण-दोष—रात्रि में जागने से शरीर में रुक्षता हो जाती है, दिन में सोने से शरीर में स्निग्धता बढ़ जाती है ( इसमें मूल कारण कफदोष की वृद्धि है )। सोने का एक प्रकार और है—बैठे-बैठे ऊँचाना या झपकियाँ लेते रहना। यह न तो रुक्षता करता है और न कफ को ही बढ़ाता है ॥५५॥

बक्तव्य—चरक ने निद्रा की इस स्थिति को 'आसीनप्रचलायित' संज्ञा दी है। देखें—च.सू. २१।५०। ग्रीष्मे वायुचयादानरीक्षरात्र्यल्पभावतः ॥५६॥

दिवास्वप्नो हितोऽन्यस्मिन् कफपित्तकरो हि सः। मुक्त्वा तु भाष्ययानाध्वमघस्त्रीभारकर्मभिः ॥ क्रोधशोकभयैः क्लान्तान् श्वासहिष्मातिसारिणः। वृद्धबालाबलक्षीणक्षततृशूलपीडितान् ॥ अजीर्ण्यभिहृतोन्मत्तान् दिवास्वप्नोचितानपि। धातुसाम्यं तथा होषां श्लेष्मा चाङ्गानि पुष्यति ॥

निद्रा सम्बन्धी विचार—ग्रीष्म ऋतु में वातदोष का संचय होने से, आदानकाल के कारण होने वाली रुक्षता से एवं इन दिनों रातों के छोटी हो जाने से दिन में सोना हितकर होता है। इसके अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में दिन में सोना कफकारक होता है ॥५६॥

अधिक बोलने से, सवारी करने से, रास्ता चलने से, मद्यपान करने से, स्त्री-सहवास करने से, क्रोध से, शोक से, भय से, थके हुए पुरुषों को, श्वास, हिक्का ( हिचकी ) एवं अतिसार रोगियों को, वृद्ध, बालक, दुर्बल ( कमजोर ), क्षीण ( कुश ), क्षत ( उरःक्षत ), प्यास तथा शूलरोग से पीड़ित, अजीर्णरोगी, घायल ( चोट लगे हुए ), उन्मत्त ( पागल ) व्यक्ति को और जिन्हें शास्त्र ने दिन में सोने की अनुमति दे रखी है उन्हें तथा ऊपर कहे गये रोगियों को भी दिन में सोना उचित है; क्योंकि दिन में सोने से इनका धातु साम्य हो जाता है और कफ इनके शरीरावयवों को पुष्ट कर देता है ॥५७-५९॥

बहुमेदःकफाः स्वप्न्युः स्नेहनित्याश्च नाहनि। विपार्ताः कण्ठरोगी च नैव जातु निशास्वपि ॥६०॥

दिन में न सोने का निर्देश—जिन मनुष्यों के शरीर में मेदोधातु एवं कफदोष बढ़ा हुआ हो और जो प्रतिदिन स्निग्ध आहारों का सेवन करते हैं, उन्हें दिन में नहीं सोना चाहिए। विषरोग से तथा गले के रोग से पीड़ित रोगी को रात में भी नहीं सोना चाहिए ॥६०॥

अकालशयनान्मोहज्वरस्तैमित्यपिनासः। शिरोरुक्शोफहूत्तलसप्तमोरोधाग्रिमन्दताः ॥६१॥

अन्नरसाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

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अकाल शयन से हानि—असमय में सोने से मोह, ज्वर, स्तैमिल्य ( गीले कपड़े से ओढ़े हुए का जैसा अनुभव होना ), पीनस ( प्रतिशयय ), शिरोरोग, मूजन, जी मिचलाना, रसवाही द्रोतों में रुकावट तथा मन्दाग्नि हो जाती है ॥ ६१ ॥

तत्रोपवासवसनस्वेदानवन्मोषधम् । योजयेदतिनिद्रायां तीक्ष्णं प्रच्छदन्नाञ्जनम् ॥ ६२ ॥ नावनं लङ्घनं चिन्तां व्यवार्थं शोकभीक्रुधः । एभिरेव च निद्रायां नाशः श्लेष्मातिसङ्ख्यात् ॥

चिकित्सा-निर्देश—उक्त स्थिति में रोगी को उपवास, बमन, स्वेदन और नत्य कारक औषधों का प्रयोग करें। अतिनिद्रा की स्थिति में तीक्ष्ण बमन, अञ्जन ( सुरमा ) एवं नत्य दें। उसे लंघन, चिन्ता, व्यवार्थ ( मैथुन ), शोक, भय तथा क्रोध करायें, जिससे रोगी के कफ का नाश होकर निद्रा का भी नाश हो सके ॥ ६२-६३ ॥

वक्तव्य—ऊपर कहे गये ६२ तथा ६३वें श्लोकों में केवल कफनाशक उपायों का वर्णन किया गया है, कफदोष की निवृत्ति हो जाने पर अतिनिद्रा स्वयं शान्त हो जाती है।

निद्रानाशादङ्गमर्दशिरोगौरवजुम्भिकाः । जाडघृणानिप्रमापक्तिनद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ६४ ॥

निद्रानाश के लक्षण—निद्रा के समुचित रूप से न आने पर शरीर में मसल देने की पीड़ा, सिर में भारीपन, बार-बार जँभाड़यों का आना, शरीर में जड़ता, हर्षक्षय, चक्करों का आना, भुक्त आहार का न पचना, उँघाई आदि वातविकार सम्बन्धी रोग हो जाते हैं ॥ ६४ ॥

यथाकालमतो निद्रां रात्रौ सेवेत सात्प्यतः । असात्स्याज्जागरादर्थं प्रातः स्वप्यादभुक्तवान् ॥ ६५ ॥

निद्रासेवन-निर्देश—अतएव रात्रि में समय पर सो जाना चाहिए। यही सात्प्यतः का अर्थ है—जिसे जितनी नींद आती हो उतना ही सोयें अर्थात् कोई रात में दो पहर, कोई तीन पहर सोता है, तदनुसार सोये। जो पूरी रात भलीभाँति न सो सका हो तो वह प्रातःकाल भोजन करके आधी नींद सो जाय ॥ ६५ ॥

शीलयेन्मन्दनिद्रस्तु क्षीरघररसान् दधि । अभ्यङ्गोद्गतस्तान्मूर्ध्कर्णक्षितर्पणम् ॥ ६६ ॥

कान्ताबाहुलताश्लेषो निर्वृत्तिः कृतकृत्यता । मनोऽनुकूला विषयाः कामं निद्रासुखप्रदाः ॥ ६७ ॥

ब्रह्मचर्यरतेर्ग्राम्यसुखनिःस्पृहचेतसः । निद्रा सन्तोषतृप्तस्य स्वं कालं नातिवर्तते ॥ ६८ ॥

पूर्णनिद्रा-प्राप्तिविधि—जिसे पूर्ण निद्रा न आती हो वह दुःख, मद्य, मांसरस, दही का सेवन करें; अभ्रंश, उबटन स्नान करें तथा सिर में, कानों में एवं आँखों में तर्पण स्नेह का प्रयोग करें। सामान्य रूप से स्त्री या पुरुष जिसे नींद न आती हो वह अपने प्रिय या प्रिया का आलिंगन करके सोये। निर्वृत्ति ( सुख ), कृतकृत्यता ( मैंने अपना कार्य कर लिया है ), मन के अनुकूल शब्द ( स्नेहपूर्ण कथाएँ या सुरीले गीत ) आदि विषयों की चर्चा—ये पर्याप्त निद्रासुख को देते हैं ॥ ६६-६७ ॥

ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ—जिसकी ब्रह्मचर्य के पालन में रति है, जिसका मन स्त्री-सहवास की ओर से निःस्पृह ( विरक्त ) रहता है और जो सदा सन्तोष से तृप्त रहता है, उसे अपने समय से निद्रा आ जाती है। अर्थात् उसकी निद्रा कभी भी अपने समय का अतिक्रमण नहीं करती है ॥ ६८ ॥

वक्तव्य—श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमद्रि की टीकाओं से युक्त अष्टांगहृदय में उक्त ६८वें पद्य को निद्रावर्णन सम्बन्धी अन्य श्लोकों के साथ केवल इसलिपि जोड़ दिया है कि उक्त श्लोक के उत्तरार्ध में निद्रा शब्द आया है। वास्तव में ६८वीं पद्य ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ का परिचायक होने के कारण स्वतन्त्र है।

निद्रा का वर्णन प्राचीन संहिताओं में इस प्रकार उपलब्ध होता है—च.सू. २१।३५ से ५९ तक और मु.शा. ४।३२ से ४७ तक। चरक ने निद्रा के अनेक भेद इस प्रकार किये हैं—‘तमोभवा श्लेष्मसमुद्रवा च मनःशरीरश्चसम्भवा च। आगतुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभावप्रभवा च निद्रा’ ॥ ( च.सू. २१।५८ ) चरक ने उक्त भाव को पुनः अपने शब्दों में इस प्रकार कहा है—‘रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधार्म-

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अष्टाङ्गहृदये

प्रवदन्ति निद्राम् ॥ (च.सू. २१।५९) अर्थात् जो स्वस्थ पुरुषों को रात्रि के समय स्वभाव से निद्रा आती है, उसे 'भूतधात्री' (समस्त प्राणियों की उपमाता के समान) कहते हैं, जो समस्त प्राणियों का धारण-पोषण करती है। यही निद्रा सभी प्रकार की निद्राओं में उत्तम है। तामसिक नींद भैंस, शेर, बाघ आदि प्राणियों को आती है, फलतः ये रात-दिन सोते रहते हैं। राजस व्यक्ति कभी भी अपनी नींद पूरी कर लेते हैं। सात्त्विक निद्रा जिनमें आती है, वे सत्ता आधी रात को थोड़ा-सा सो लेते हैं। एक निद्रा है—'अनवबोधिनी', जिस नींद के आ जाने पर प्राणी फिर जगता नहीं अर्थात् मर जाता है। यह मृत्युकाल की निद्रा का नाम है।

सुश्रुत ने ग्राम्य ऋतु में दिन में सोने का विधान इस प्रकार किया है—'सर्वतृषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्'। (सु.शा. ४।३८) इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक विकल्पों की चर्चा की है—'निद्रा सात्य्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा। दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः। न तेषां स्वप्तां दोषो जाग्रतां वापि जायते' ॥ (सु.शा. ४।४१) अर्थात् जिन लोगों ने रात में अथवा दिन में सोने का अभ्यास बना लिया है, जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के अभ्यासी हो गये हैं, उन्हें दिन में सोने अथवा रात में जागने से किसी प्रकार का दोष नहीं होता। वास्तव में तमोगुण और निद्रा का सम्बन्ध कफदोष से है, यही कारण है कि भोजन करते ही कफ की वृद्धि होने के कारण नींद आती है या आने लगती है। निद्रा का प्रारम्भिक स्वरूप है तन्त्र।

ग्राम्यधर्मं त्यजेन्नारौमनृतानां रजस्वलाम्। अप्रियामप्रियाचारां दुष्टसङ्कीर्णमेहनाम् ॥ ६९ ॥

अतिशूलकृशां सूतां गर्भिणीमन्ययोपितम्। वर्णिनीमन्ययोनिं च गुरुदेवपुनालयम् ॥ ७० ॥

चैत्यश्मशानाऽऽयतनचत्वारम्बुचतुष्यम्। पर्वाण्यनङ्गं दिवसं शिरोहृदयताडनम् ॥ ७१ ॥

स्त्री-सहवास का वर्णन—ग्राम्यधर्म (मैथुनकाल) में इस प्रकार की स्त्री का परित्याग करें—जो उस समय चित लेटी न हो, जो रजस्वला धर्म से निवृत्त न हुई हो, जो प्रिय (मनोनुकूल) न हो अथवा जिसका आचरण (व्यवहार) रुचिकर न हो, जिसका भग उपदेश आदि रोग से दूषित हो अथवा संकीर्ण हो, जो अत्यन्त मोटी या अत्यन्त कुश हो, जिसे अभी ४०-४५ दिन पूर्व प्रसव हुआ हो, जो पहले से गर्भिणी हो या जो दूसरे की स्त्री हो, जो ब्रह्मचारिणी हो, जो अन्यजातीया हो; इनको त्याग देना चाहिए।

निषिद्ध स्थान—गुरुगृह, देवगृह, राजगृह, चैत्य (यज्ञमण्डप, वेदी आदि), श्मशानभूमि, बध्यभूमि, चबूतरा, जलस्थान (नदीतट आदि) और चौराहा।

निषिद्ध दिन—संक्रांति, सूर्य-चन्द्रग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या, भग के अतिरिक्त (मुख आदि) अंगों में दिन में सहवास न करें। इस सम्भोग काल में हृदय तथा शिरः ताडन न करें ॥ ६९-७१ ॥

वक्तव्य—'हुरसङ्कीर्णमिहनाम्'—श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमदिने 'मेहनाम्' शब्द का अर्थ 'योनि' किया है। जब कि मेहन शब्द पुरुष की मूत्रेन्द्रिय के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। देखें—'मेदुं मेहनशेफसी' (अमरकोश) तथा—'मेहनं मूत्रशिशनयोः'। (मेदिनी) 'मेहनम्' क्ली० लिङ्गे। (बै.श.सि.) सुश्रुत ने उक्त विषय का वर्णन करते हुए कहा है—'योनिदोषसमन्विताम्'। (सु.चि. २४।१५)

'वाचां भटः = वाग्भट' के उक्त प्रयोग पर दोषवृष्टि डालने से पहले हम उक्त शब्द के परिवेश का पर्यालोचन करा देना चाहते हैं। वेद में पुरुष को 'द्यौः' और स्त्री को 'पुषिबी' तथा वात्स्यायन-कामसूत्र में पुरुष को 'कर्ता' और स्त्री को 'अधिकरण' कहा है। आकाश से वर्षा पुषिबी पर होती है। अतः कर्ता (गर्भाधानकर्ता अर्थात् बीज बोने वाले पुरुष) का अधिकरण (आधार) स्त्री है। ठीक इन्हीं परम्पराओं के आधार को लेकर सुधी वाग्भट ने 'करणाधिकरणयोश्च' (३।३।१७) सूत्र से अधिकरण अर्थ में 'मिह सेचनं' धातु तथा ल्युट् प्रत्ययान्त मेहन शब्द से 'इध्मप्रब्रश्चनः कुटारः' तथा 'गोदोहनी स्थाली' की भांति 'मेहना' प्रयोग वृद्धिपूर्वक किया है। अब इसका अर्थ होगा 'योनि' जिसमें वीर्य का सेचन होता है। यही दिक् के अनित्य होने से 'टाप्' प्रत्यय हुआ है।

अक्षरसाध्यायः ७ ]

सूत्रस्थानम्

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अप्रियाम् अन्ययोषितम्—इन सभी विषयों का विचार स्त्रियों को पुरुषों के प्रति भी कर लेना चाहिए अर्थात् नारी ऐसे नर से सहवास न करे। स्त्री-पुरुष दोनों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सहवास पुत्र सन्तान-प्राप्ति के लिए ही किया जा रहा है।

शिरोहृदयताडनम्—यद्यपि शिरःताडन, हृदयताडन, केशाकर्षण, नखक्षत आदि रतिकलह सम्बन्धी विषयों का वर्णन वात्स्यायन-कामसूत्र में मिलता है, तथापि इस स्वास्थ्याशत्र में उसका पूर्ण रूप से निषेध किया गया है।

अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्रान् दुःस्थिताङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगतस्त्यजेद्रेगो च मैथुनम् ॥

मैथुन के अयोग्य स्थिति—जिसने बहुत भोजन किया हो, अधीर (घबराया हुआ) हो, जिसे भूख लगी हो, दुःस्थिताङ्ग अर्थात् अनुचित आसन में स्थित होकर, जो प्यासा हो, जो बालक (अभी युवक न हुआ) हो, जो बूढ़ा हो गया हो, जिसे मल-मूत्र आदि का वेग प्रवृत्त हो तथा रोगी पुरुष मैथुन कर्म न करे ॥ ७१ ॥

बक्तव्य—उक्त विधि-निषेध नर-नारी दोनों के लिए है, क्योंकि 'मैथुन' मिथुन का कर्म है, निषेध के कारण स्पष्ट है। इस प्रसंग में वृद्धवाग्भट के वचनों का भी अनुसन्धान कर लेना चाहिए। देखें—अ.सं.सू. ९।८१-८४। अर्थात् इन निर्देशों का उल्लंघन वही कर सकता है, जिसे दीर्घजीवन की कामना न हो। देखें—'आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति'। क्योंकि शुक्रधातु शरीर का बहुमूल्य पदार्थ है। जिसके सम्बन्ध में कहा गया है—'मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्'। यहाँ तक आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य नामक शरीर को धारण करने वाले तीन उपस्तम्भों का वर्णन कर दिया गया है।

सेवेत कामतः कामं तुतो वाजीकृतो हिमे। श्रृहाद् वसन्तशरदोः पक्षाद् वर्षानिदाघयोः ॥ ७३ ॥

मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश—वाजीकरण औषधों एवं आहारों से तुप्त फलतः परिपुष्ट शरीरावयवों वाले नर-नारी हिमकाल (हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं) में इच्छानुसार मैथुन का सेवन करें। वसन्त एवं शरद् ऋतुओं में तीन दिनों तथा गर्मी और वर्षा ऋतुओं में पन्द्रह दिनों में मैथुन करें ॥ ७३ ॥

भ्रमकलमोरुदौर्बल्यबलधात्विन्द्रियक्षयाः। अपर्वमरणं च स्यादन्वथा गच्छतः स्त्रियम् ॥ ७४ ॥

विपरीत व्यवहार का फल—उक्त नियमों के विपरीत मैथुन करने पर भ्रम, क्लम (सुस्ती), ऊर्ध्वों में कमजोरी, कुशता तथा बल, रस आदि शुक्र पर्यन्त धातुओं का क्षय, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय अधवा असमय में मृत्यु भी हो सकती है ॥ ७४ ॥

स्मृतिमेधायुरारोग्यपुष्ठीन्द्रिययशोबलैः। अधिका मन्वजरसो भवन्ति स्त्रीषु संयताः ॥ ७५ ॥

संयम का महत्त्व—जो पुरुष स्त्री-सहवास में अपने को वश में रखते हैं, उनकी स्मरणशक्ति, मेधा, दीर्घायु, आरोग्य (स्वास्थ्य), शारीरिक पुष्टि, इन्द्रियबल, सुयश, शारीरिक एवं मानसिक बल अधिक होता है; वे देर में वृद्ध होते हैं ॥ ७५ ॥

बक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इस 'मैथुन' को तथा इसी प्रकार के अन्य भावों को भी 'तदाल् मुखसंज्ञक' कहा है। देखें—अ.सं.सू. ९।८५। इसी विषय का प्रतिपादन भगवद्गीता में भी किया गया है—'ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनि एव ते। आद्यन्तवन्तः क्रोन्तेय न तेषु रमते बुधः' ॥ (गीता) इसे पुरुष के लिए स्त्रीस्पर्शज और स्त्री के लिए पुरुषस्पर्शज सुखभोग कहा जाता है। इस प्रकार के सुखभोगों में समझदार स्त्री-पुरुष विशेष आसक्त नहीं होते।

स्नानानुलेपनहिमानिलखण्डवाद्यशीताम्बुदुग्धरसयूपसुराप्रसन्नाः ।

सेवेत चान् शयनं विरतं रतस्य तस्यैवमाशु वपुषः पुनरेति धाम ॥ ७६ ॥

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अष्टाङ्गहृदय

मैथुनोत्तर कर्तव्य —मैथुन क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करें अथवा लिंग एवं योनि को भलीभाँति धो लें। ऋतु के अनुसार चन्दन, कस्तूरी आदि का अनुलेपन लगायें, शीतल वायु का सेवन करें; मिथी, मिठाई आदि, शीतल जल, दूध, मांसरस, उड़द आदि का जूस, सूरा, प्रसन्ना आदि का सेवन कर पुनः सो जायें। ऐसा करने से पुनः उसके शरीर में तेजस् का संचार हो जाता है ॥ ७६ ॥

वक्तव्य —इस सन्दर्भ से सम्बन्धित विषय की चर्चा सुश्रुत ने (सु.चि. २४।११० से १३२ में) की है, आप उसे देखें। इस प्रकरण में सुश्रुत ने यह भी निर्देश दिया है—मैथुन करते समय आये हुए शुक्र के वेग को रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से 'शुक्राशमरी' पैदा हो जाती है, जो बाद में कष्टप्रद होती है। सुश्रुत ने इसी प्रसंग के १२०वें श्लोक में 'मूर्धावरणमेव च' का उल्लेख किया है। इस तथ्य की ओर ध्यान दें—शिशु के अगले भाग में स्थित मणि के ऊपर आवरण बढ़ाना, यहाँ से योनि के भीतर शुक्र का धरण होता है। क्या यह मूर्धावरण सुश्रुत के समय का कोई कुत्रिम उपाय था जो फ्रेञ्चलेटर की भाँति सन्तानोत्पत्ति न चाहने की इच्छा से प्रयुक्त होता हो ?

मैथुन की प्रवृत्ति युवा-युवती के परस्पर एक-दूसरे के प्रति आकर्षण में कारण है, इसका धार्मिक दृष्टिकोण है—पुत्रोत्पादन का लक्ष्य, जिसे वाग्भट ने अ.हू.शा. १।३० में स्वीकार किया है। दूसरा है आलिकृन्पूर्वक स्पर्शमुख की प्राप्ति, फ्रेञ्चलेटर इसमें बाधक होता है, क्योंकि इसके लगा लेने से स्पर्शमुख में बाधा आ जाती है। तीसरा लक्ष्य है—विमुष्टिमुख अर्थात् शुक्र के निकलने का मुख। खेल-खेल में भी मैथुन करने का निषेध है। देखें—'क्रीडायामपि'...'परिवजयेत्'। (सु.चि. २४।२११)

राजा-महाराजाओं अर्थात् धनसम्पन्न लोगों के आत्मीय जनों से अधिक उनके शत्रु होते हैं, जो उन्हें लूटने-खसोटने में लगे रहते हैं। इनसे भी अधिक सावधान रहना चाहिए, जो विषकन्या आदि के प्रयोग से उन्हें मार डालना चाहते हैं। इसका विस्तृत विवेचन 'विषकन्या' नाम से अ.सं.सू. ८।८६-८९ में दिया है, इसे पढ़ें। यदि राजा आदि श्रीमान् पुरुष चिकित्सक की सलाह से दैनिक व्यवहार करते हैं, तो वह उन्हें सावधान कर बाहर से उस सुन्दरी भीतर से घातक स्त्री का स्पर्श भी नहीं होने देता, फलतः वे सुरक्षित रह जाते हैं।

श्रुतचरितसमूदे कर्मदक्षे दयालो भिषजि निरनुबन्धं देहरक्षां निवेशय।

भवति विपुलतेजःस्वास्थ्यकीर्तिप्रभावः स्वकुशलफलभोगी भूमिपालश्चिरायुः ॥ ७७ ॥

इति श्रीबेद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्राग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नरक्षा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥


राजा आदि का कर्तव्य —शास्त्रज्ञ, चरित्रवान्, चिकित्साकार्यकुशल, प्राणियों पर दया करने वाले चिकित्सक पर निःशंक होकर अपने शरीर की रक्षा का भार डालकर राजा-महाराजा या श्रीमान् पुरुष अत्यन्त तेजस्वी, स्वस्थ (नैरोग्य), कीर्तिमान्, प्रभावशाली तथा अपने जीवन के सुखों का उपभोग करता हुआ दीर्घायु होता है ॥ ७७ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

अन्नरक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ॥ ७७ ॥


अष्टमोऽध्यायः

अथातो मात्राशितौयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से मात्राशितौय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले ७।५३ में कहा गया है—‘आहारो वर्णितस्तत्र तत्र च वक्ष्यते’। अतएव इस ८वें अध्याय में उस आहार का किस प्रकार मात्रा के अनुकूल सेवन करना चाहिए, इस विषय की चर्चा की जा रही है, क्योंकि यहाँ जो मात्रा शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका ताल्य है आहार का सम्यक्योग। यह अशन या आहार सात प्रकार का होता है—१. सकीर्णशन, २. विरुद्धाशन, ३. अमात्राशन, ४. अजीर्णशन, ५. समशन, ६. अध्यशन तथा ७. विषमाशन। इनमें दो के उदाहरण आगे इसी अध्याय में दिये जायेंगे।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५, च.सू. २७, च.वि. २, च.वि. १५, च.सि. १२, सु.सू. ४६, सु.उ. ५६ एवं अ.सं.सू. १० तथा ११ में देखें।

मात्राशी सर्वकालं स्यान्मात्रा ह्यग्रेः प्रवर्तिका । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते गुरुण्यपि लघून्यपि ॥ १ ॥

आहार-मात्रा का वर्णन —मनुष्य को सदा मात्रा के अनुसार आहार (भोजन) करना चाहिए, क्योंकि उचित मात्रा में किया गया भोजन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरु तथा लघु द्रव्यों को देखकर करना चाहिए, जैसा आगे कहा जायेगा ॥ १ ॥

वक्तव्य —मात्रा का विचार च.सू. ५।४ में संक्षेप से नेपे-तुले शब्दों में किया गया है। इसके आगे च.वि. २।३ में कुछ विशेष ढंग से इसे कहा है—‘आहार करते समय पुरुष को आमाशय की खाली जगह को तीन भागों में इस प्रकार बाँट देना चाहिए; यथा—एक भाग को ठोस आहार-द्रव्यों के लिए, एक भाग द्रव द्रव्यों के लिए और एक भाग वात, पित्त तथा कफ के लिए रखें’। वामभट ने इसी विषय को प्रकारान्तर से आगे कहा है—‘अग्नेन कुक्षेर्द्विषी पानेनैकं प्रपूरयेत् । आश्रयं पवनादीनां चतुर्यमवशेषयेत्’। (अ.हृ.सू. ८।४६) अर्थात् ‘भोजन करते समय आमाशय के दो भागों को रोटी, दाल, भात आदि से भर ले, तीसरे भाग को पेय पदार्थों से भर ले और शेष चौथे भाग को वात-पित्त-कफ की क्रिया के लिए सुरक्षित रखें’। इसके पहले भी श्रीवृद्धावभट ने मात्रा का विचार करते हुए कहा है—‘मात्रा’...‘चाहारराशिः’। (अ.सं.सू. १०।९) अर्थात् ‘मात्रा वह है, जो आहार के सभी पदार्थों के परिमाण से तथा प्रत्येक द्रव्य के गुरु-लघु आदि गुणों के समुदाय से ‘आहारराशि’ कही जाती है’। इसके आगे फिर वृद्धावभट ने अ.सं.सू. ११।३-५ में आहार-मात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। सु.सू. ४६ के उत्तरार्ध में इस विषय को सूत्र रूप में कहा गया है।

गुरुणामर्धसौहित्यं लघूनां नातिवृत्तता । मात्राप्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद्भिजीर्यति ॥ २ ॥

मात्रा में गुरु-लघु विचार —गुरु भोजन-पदार्थों को आधी तृप्ति हो जाने पर खाना छोड़ दें और लघु भोजन-पदार्थों को भी अधिक तृप्त होने तक न खायें। वास्तव में भोजन की उचित मात्रा वही है, जो सुखपूर्वक पच जाय ॥ २ ॥

भोजनं हीनमात्रं तु न बलोपचयीजसे । सर्वेषां वातरोगाणां हेतुतां च प्रपद्यते ॥ ३ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

हीन मात्रा वाले आहार से हानि—हीन ( कम ) मात्रा वाला भोजन बल, शरीरपुष्टि तथा ओजस् को नहीं बढ़ाता है और इस प्रकार का भोजन सभी प्रकार की वातव्याधियों की उत्पत्ति का कारण होता है॥ ३॥

अतिमात्रं पुनः सर्वांनाशु दोषान् प्रकोपयेत्।

अधिक मात्रा वाले आहार से हानि—मात्रा से अधिक किया गया आहार वात आदि सभी प्रकार के दोषों को शीघ्र ही प्रकृपित कर देता है।

पीड्यमाना हि वाताद्या युगपत्तेन कोपिताः॥ ४॥

आमेनात्रेन दुष्टेन तदेवाविश्य कुर्वते। विष्टम्भयन्तोऽलसकं च्यावयन्तो विसूचिकाम्॥ ५॥

अधरोत्तरमार्गाभ्यां सहस्रैवाजितात्मनः।

विसूचिका के लक्षण—ऊपर कहे गये अतिमात्रा वाले आहार का सेवन कर लेने से पीड़ित वात आदि दोष उस आम ( न पचे हुए ) तथा दूषित आहार से एक साथ कृपित होकर एवं उसी आहार में मिलकर आमाशय की गति को रोककर 'अलसक' नामक रोग को पैदा कर देते हैं। उस अजितात्मा पुरुष के ऊपर तथा नीचे के मार्ग से अर्थात् मुख एवं गुद मार्ग से क्रमशः वमन तथा अतिसार के रूप में आहार पदार्थ को निकालते हुए 'विसूचिका' नामक रोग को पैदा कर देते हैं॥ ४-५॥

प्रयाति नोर्ध्वं नाधस्तादाहारो न च पच्यते॥ ६॥

आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः।

अलसक की परिभाषा—अलसक रोग होने के पहले जो आहार खाया गया था, वह न तो ऊपर ( मुख ) की ओर से निकलता है और न नीचे ( गुदमार्ग ) से निकलता है, न वह पचता ही है। वह आमाशय में आलसी की भाँति पड़ा रहता है, अतएव इस रोग को 'अलसक' कहा जाता है॥ ६॥

विविधैर्वेदनोद्भेदाभ्याद्विभुशकोपतः॥ ७॥

सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका।

विसूचिका की परिभाषा—वात आदि दोषों के अत्यन्त प्रकृपित हो जाने के कारण अनेक प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति होने से जो बार-बार सूर्य की भाँति शरीरावय को बंधती रहती है, उसे 'विसूचिका' कहते हैं॥ ७॥

वक्तव्य—'विसूचिका' शब्द में श, ष, स इन तीनों का प्रयोग यत्र-तत्र देखा जाता है। जैसे—कलश, कलस आदि। विसूचिका—इसमें आम आहार वमन एवं विरेचन के रूप में बार-बार निकलता रहता है। अलसक—इसमें आम आहार आमाशय में पड़ा ही रहता है और वह पचता भी नहीं। इसका उक्त नाम इसके लक्षणों के अनुरूप है।

तत्र शूलप्रमानाहकम्पस्तम्भादयोऽनिलात्॥ ८॥

पिताञ्च्वरातिसारान्दर्हातृष्टुप्रलयायः। कफाच्छर्द्वज्जगुरुतावाक्सङ्घोषिनादयः॥ ९॥

विसूचिका के लक्षण—वातदोष से शूल, चक्करों का आना, आनाह, कैंपकैपी का होना तथा स्तम्भ ( जड़ता ) ये लक्षण होते हैं। पित्तदोष से ज्वर, अतिसार, भीतर से जलन, बार-बार प्यास का लगना एवं प्रलाप ( अंत-संत बकाना ) ये लक्षण होते हैं। कफदोष से छर्दि ( वमन ), शरीर के अवयवों में भारीपन, बोलने में रुकावट तथा लार का चूना ये लक्षण होते हैं॥ ८-९॥

विशेषादुर्बलस्याल्पवहेर्वगविधारिणः। पीडितं मारुतेनात्रं श्लेष्मणा रुद्धमन्तरा॥ १०॥

अलसं क्षोभितं दोषैः शल्यत्वेनैव संस्थितम्। शूलादीन् कुस्ते तीव्रांश्चर्द्वतीसारवर्जितान्॥ ११॥

सोऽलसः—

मात्राशिलीयाध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१३७

अलसक का वर्णन—यह रोग विशेष करके दुर्बल, मन्द अग्निवाले, वात, मूत्र तथा मल के वेगों को रोकने वाले पुरुष को होता है। इसमें खाया गया आहार वात द्वारा पीड़ित एवं कफ के कारण आमाशय में रोका गया स्वयं वह गतिहीन हो जाता है। वात आदि दोषों द्वारा हिलाया-डुलाया जाने पर भी वह आमाशय में शल्य के रूप में स्थित रहता है तथा कष्टकारक शूल आदि विकारों को तो करता है, किन्तु इसमें वमन-विरेचन नहीं होते, अतः इस रोग को अलस या अलसक कहते हैं॥ १०-११॥

—अत्यर्थदुष्प्रास्तु दोषा दुष्प्रामबद्धाः। यान्तस्तियर्क्तुं सर्वं दण्डवत्तस्मभ्यन्ति चेत्॥ १२॥ दण्डकालसकं नाम तं त्यजेदाशुकारिणम्।

दण्डालसक का वर्णन—ऊपर कहे गये कारणों से वात आदि दोष अत्यन्त कुपित तथा दूषित होकर आम (अपचय) अन्न द्वारा मुख एवं गुद मार्ग के रुक जाने के कारण ये तिर्यग्वाही अर्थात् रसवाही प्रोटों द्वारा समस्त शरीर में फैलकर सम्पूर्ण शरीर को दण्ड (डण्डा) के समान जड़ कर देते हैं। अतः इस रोग को दण्डालसक कहते हैं। यह रोग शीघ्र मारक होता है, इसकी चिकित्सा करना छोड़ देनी चाहिए॥ १२॥

वक्तव्य—अ.सं.सू. ११५१ में विस्चिका के असाध्य लक्षणों का वर्णन किया है। इनका अवलोकन कर लें।

विरुद्धाध्यशनाजीर्णशीलिनो विषलक्षणम्॥ १३॥

आमदोषं महाघोरं वज्येद्विषसंज्ञकम्। विषरूपाशुकारित्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वतः॥ १४॥

आमविष का वर्णन—विरुद्धअशन (अ.हृ.सू.७।३१), अध्यशन (इसी अध्याय का ३४वाँ पद्य) तथा अजीर्ण अवस्था में भी आहार करने वाले पुरुष का आमदोष अत्यन्त कष्टदायक होता है, इसीलिए इसे 'आमविष' कहते हैं। यह विष के समान अपना शीघ्र प्रभाव दिखलाता है और इसकी यदि चिकित्सा की जाती है तो उसका प्रभाव भी विपरीत ही होता है॥ १३-१४॥

वक्तव्य—'विरुद्धोपक्रमत्व'—यह आमविष विष के समान गुणों वाला होता है, अतः विष की शीत प्रधान चिकित्सा की जाती है और आमदोष में उष्ण उपचार करने का विधान है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है, जिससे सफलता नहीं मिल पाती। चरक ने भी उक्त विषय का प्रतिपादन इस प्रकार किया है—'विरुद्धाध्यशनाजीर्णशनीलिनाः पुनरामदोषमामविषमित्यावक्ष्यते भिषजः'। (च.वि. १।१२) ठीक इसी का पद्यानुवाद श्रीवामट ने किया है। यद्यपि विषरोगी की चिकित्सा की जाती है, वह नीरोग भी होता है, किन्तु यहाँ (आमविष में) परिस्थिति का भेद है, अतएव यह विरुद्धोपक्रम होता है। इस आमविष का जब प्रकोप होता है तो ऐंठन या मरोड़ के साथ चावल के धोअन का जैसा वमन या विरेचन होता देखा जाता है। प्रायः इसका स्वरूप 'आमालिसार' जैसा होता है।

अथाममलसोभूतं साध्यं त्वरितमृलिल्लेखेत्। पीत्वा सोप्रापदुर्फलं वार्युष्णं योजयेत्ततः॥ १५॥

स्वेदनं फलवर्ति च मलवातानुलोमनीम्। नाम्यमानानि चाङ्गानि भृशं स्विन्नानि वेष्टयेत्॥ १६॥

आमदोष की चिकित्सा—जब आमदोष अलसक के रूप में परिणत हो गया हो और साध्यता के लक्षणों से युक्त हो, तब उसे बाल्यवच, पटु (नमक) एवं फल (मैनफल) को गरम पानी में मिलाकर पिलायें, जिससे शीघ्र ही वमन हो अर्थात् उस रोगी को यह वमनकारक पेय पिलाकर शीघ्र वमन करायें। उसके बाद उसे स्वेदन करायें और फिर उसे मल तथा अपानवायु को अनुलोम कराने वाली फलवर्ति का प्रयोग करायें। यदि इस समय आमदोष की विकृति के कारण उसके अंगों में सिकुड़न आ रही हो तो उन्हें पर्याप्त स्वेदन कराकर वस्त्र आदि से कसकर बाँध दें॥ १५-१६॥

वक्तव्य—'फलवर्ति' नामक जिस योग की चर्चा खारणदि ने यहाँ की है, वह इस प्रकार है—'शूले तु स्तिमिते सामे स्वेदः शस्तो मुद्गर्मुहुः। ह्युष्णोः कटुकैः पांशुकीरषिकतादिभिः॥ पिपल्योऽगारधूमश्र मदनं

१३८

अष्टाङ्गहृदये

सर्पपास्त्रिवृत् । हेमक्षीरी वचा किण्वं कुण्डं दन्ती यवाग्रजः ॥ समूत्रलवणाभ्यक्ता फलवर्तिरियं हिता । संसेद्यालसके शूलविबन्धानाहनाशिनी ॥ अर्थ प्रायः स्पष्ट है। दूसरी फलवर्ति का योग श्रीचक्रमाणि ने 'उदावर्तचिकित्सा' श्लोक १३ चन्द्रदत्त में दिया है। श्रीअरुणदत्त ने अपनी व्याख्या में एक फलवर्ति का योग इस प्रकार दिया है—'विपाच्च मुत्राम्लमधुनि दन्तीपिण्डीतकुष्णाविडधूमकुष्ठैः । वर्ति कराङ्गुष्ठनिभां घृतात्कां गुदे रूजानाहहरीं विदध्यात् ॥ यदि ये वर्तियां समय पर उपलब्ध न हों तो किसी अन्य मूल तथा वात को अनुलोमन करने वाली वर्ति का प्रयोग किया जा सकता है।

विसूच्यामतित्वद्वयां पाण्योर्दाहः प्रशस्यते। तदहश्चोपवास्येनं विरिक्तवदुपाचरेत् ॥ १७ ॥

पार्णिदाह-प्रयोग—यदि विसूची (हैजा) रोग का वेग अधिक बढ़ गया हो तो दोनों एडियों में दाहकर्म करना चाहिए, इसकी प्रशंसा की गयी है। उस दिन इस रोगी को उपवास कराकर विरिक्त की भांति इसका उपचार करें ॥ १७ ॥

वक्तव्य—विसूची के वेग के अधिक बढ़ जाने पर जो ऊपर पार्णिदाह की चर्चा की गयी है, वह वास्तव में रोगी की बेहोशी को दूर करने के लिए है। इसका उल्लेख सुश्रुत में भी है। देखें—सू.उ. ५६।१२। ध्यान दें—सुश्रुत ने कहा है कि यह दाह कर्म तभी करे जब रोगी साध्य हो। विरिक्तवदुपाचरेत्—वमन कराने के बाद रोगी को संसर्जन क्रम में रखा जाता है, इसे बाद में पेया, विलेपी देकर स्वस्थ होने पर भोजन दिया जाता है। इसकी विस्तृत विधि देखें—अ.हृ.सू. १८।

तीव्रार्तिरपि नाजीर्णो पिबेच्छूलज्जनमौषधम्। आमसन्नाऽन्तले नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ १८ ॥ निहत्यादपि चैतौषां विभ्रमः सहसाऽऽतुरम्।

अन्य उपचार—अत्यन्त वेदना होने पर भी जीर्णों का रोगी शूलनाशक औषध का पान न करे, क्योंकि आमदोष के कारण मन्द जठराग्नि वात आदि दोषों, औषध तथा अशन (पहले खाये गये आहार) को पचाने में समर्थ नहीं होता है। कभी ऐसा भी होता है कि दोष, औषध एवं आहार का विभ्रम (समुचित प्रयोग न हो पाना) रोगी को सहसा मार सकता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य—च.वि. २।१३ का यह गद्य वाग्भट के उक्त पद्यरचना का मूल स्रोत रहा है।

जीर्णाशने तु भेषज्यं युज्य्यात् स्तब्धगुरुदरे ॥ १९ ॥

दोषशेषस्य पाकार्थमग्नेः सन्धुक्षणाय च।

भोजन के पच जाने पर भी यदि पेट में स्तब्धता एवं भारीपन प्रतीत होता है, तो शेष दोष को पचाने के लिए और जठराग्नि को मुल्लगाने अर्थात् तीव्र करने के लिए औषध-योगों का प्रयोग करें ॥ १९ ॥

शान्तिरामविकाराणां भवति त्वपतर्पणात् ॥ २० ॥

त्रिविधं त्रिविधे दोषे तत्समीक्ष्य प्रयोजयेत्।

अपतर्पण-प्रयोग—आमदोषजनित विकारों की शान्ति करने के लिए अपतर्पण (तर्पण = चकाचक भोजन करना, इसके विपरीत उपवास-लंघन = अपतर्पण) का प्रयोग करना चाहिए और उस अपतर्पण का प्रयोग तीन प्रकार के दोषों में तीन प्रकार (अल्प, मध्य, प्रधान भेद) से विचार करके करना चाहिए ॥ २० ॥

तत्रालपे लङ्घनं पथ्यं, मध्ये लङ्घनपाचनम् ॥ २१ ॥

प्रभूते शोधनं, तद्वि मूलादुमूलयेन्मलात्।

यदि आमदोष अल्पमात्रा में हो तो लंघन (उपवास) करना ही हितकर होता है। मध्यम श्रेणी का आमदोष हो तो इसमें लंघन के साथ-साथ दोष को पचाने वाले औषध-द्रव्यों का भी प्रयोग करना चाहिए। यदि आमदोष अधिक मात्रा में हो तो वमन तथा विरंजन करायें, क्योंकि यह शोधन कर्म उक्त आमदोष को जड़ से उखाड़ देता है ॥ २१ ॥

मात्राशितौषध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१३९

एवमन्यानिप व्याधीन् स्वनिदानविपर्ययात् ॥ २२ ॥

चिकित्सेदनुबन्धे तु सति हेतुविपर्ययम् । त्यक्त्वा यथायथं वैद्यो युज्यादव्याधिविपर्ययम् ॥ २३ ॥

हेतुविपरीत आदि चिकित्सा—इसी प्रकार ज्वर आदि अन्य रोगों की भी अपने-अपने निदान ( हेतु ) के विपरीत चिकित्सा करे । यदि ऐसा करने पर भी रोग शान्त न हो तो उसे छोड़कर चिकित्सक यथोचित अवसर देखकर व्याधिविपरीत औषध-योगों का प्रयोग करे ॥ २२-२३ ॥

तदर्थकारि वा, पक्वे दोषे त्विद्धे च पावके । हितमभ्यञ्जनस्नेहपानबस्त्यादि युक्तितः ॥ २४ ॥

विपरीतार्थकारी चिकित्सा—अथवा विपरीतार्थकारी चिकित्सा-विधि का प्रयोग करना चाहिए । जब इस प्रकार दोष का पावन हो जाता है और जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, तो विधिपूर्वक अभ्यञ्जन ( तैलमर्दन ), स्नेहपान तथा बस्ति आदि का प्रयोग करना चाहिए ॥ २४ ॥

बक्तव्य—‘तदर्थकारि’—तत् अर्थात् निदान, व्याधिविपर्यय द्वारा साध्य, जो ‘अर्थ’ रोगशान्तिरूप लक्षण को करने का स्वभाव है, जिसका इस प्रकार की चिकित्सा अथवा जैसे मदात्यय रोग में पुनः मद्यपान कराना, अतिसार में विरेचन कराना आदि । ‘बस्त्यादि’—यहाँ आदि शब्द से रसायन आदि चिकित्सा-विधियों की ओर संकेत है ।

अजीर्णं च कफादामं तत्र शोफोऽक्षिगण्डयोः । सद्योभुक्त इबोद्गारः प्रसेकोक्त्तलेशगौरवम् ॥ २५ ॥

आमाजीर्ण के लक्षण—कफदोष के प्रकोप से आमाजीर्ण होता है । इसके लक्षण—आँखें तथा गालों पर शोथ, तत्काल खाये हुए आहार के अनुरूप उद्गारों ( डकारों ) का आना, लालाझाव, जो मिचलाना तथा शरीर में भारीपन—ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥

विष्टब्धमनिलाच्चूलविबन्धाधमानसादकृत ।

विष्टब्धाजीर्ण के लक्षण—वातदोष के प्रकोप से विष्टब्धाजीर्ण होता है । इसमें पेट में शूल, मल-मूत्र एवं अपानवायु के निकलने में रुकावट, अफरा एवं शरीर में दीलापन—ये लक्षण होते हैं ।

पिताद् विदग्धं तुण्मोहभ्रमाम्लोद्गारदाहवत् ॥ २६ ॥

विदग्धाजीर्ण के लक्षण—पित्तदोष के प्रकोप से विदग्धाजीर्ण होता है । इसमें बार-बार प्यास लगना, मोह ( बेहोशी ), चक्करों का आना, खट्टे डकारों का आना एवं जलन का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ २६ ॥

लङ्घनं कार्यमामे तु, विष्टब्धे स्वेदनं भृशम् । विदग्धे वमनं, यद्वा यथावस्थं हितं भवेत् ॥ २७ ॥

चिकित्सा-सूत्र—आमाजीर्ण में रोग के अनुसार पूर्ण लंघन ( उपवास ) करे या लघुभोजन करे । विष्टब्धाजीर्ण में बार-बार पेट के ऊपर स्वेदन करे, इससे वातदोष का अनुलोमन होता है । विष्टब्धाजीर्ण में तब तक वमन कराना चाहिए जब तक वमन में पित्त का दर्शन न हो जाय । अन्य लक्षणों की शान्ति के लिए परिस्थिति के अनुसार समयोचित चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २७ ॥

गरीयसो भवेल्लीनादामादेव विलम्बिका । कफवातानुबद्धाऽऽमलिङ्ग तत्समसाधना ॥ २८ ॥

विलम्बिका के लक्षण—भयावह आमदोष जो लीन ( छिपा ) रहता है, उसी से यह विलम्बिका रोग हो जाता है । इसमें कफ एवं वात दोष युक्त आमाजीर्ण के लक्षण होते हैं और ऊपर कहे गये कफ-वात-दोष सम्बन्धित अजीर्णों के समान ही इसकी भी चिकित्सा होती है ॥ २८ ॥

बक्तव्य—‘लीन’ शब्द की चरितार्थता—वमन-विरेचन से सामान्य आमदोष निकल जाता है, ऐसा ऊपर कहा गया है, किन्तु यह आमदोष उक्त उपायों से भी नहीं निकल पाता, अतएव इसे लीन ( सटा हुआ ) कहा गया है । सूश्रुत ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है—‘दुष्टं तु भुक्तं कफमाक्षताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमध्य यस्य । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्सामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः’ ॥ ( मु. उ. ५६९ ) सुश्रुत

१४०

अष्टाङ्गहृदये

ने इसे अन्य आमदोषों से अतिकष्टसाध्य कहा है। अतएव इसका नाम भी विलम्बिका (लीचड़ रोग) रखा है। महर्षि वामदेव ने इस आमदोष के लिए 'लीन' शब्द (सट जाने वाला) का युक्तियुक्त प्रयोग किया है।

अश्रद्धा हृद्व्यथा शुद्धेऽप्युद्गारे रसशेषतः । शयीत किञ्चिदेवात्र सर्वश्रानाशितो दिवा ॥ २९ ॥

स्वप्यादजीर्णी, सज्जातबुभुक्षोऽद्यान्मिन्तं लघु।

रसशेषाजीर्ण-चिकित्सा—रसशेषाजीर्ण में आहार के पच जाने पर भी जब रस का परिपाक नहीं हो पाता है, तब ये लक्षण होते हैं—उद्गारों (डकारों) के शुद्ध आने पर भी रस के अपक्व रह जाने से भोजन के प्रति असन्धि तथा हृदय में पीड़ा होती रहती है।

उपचार—इस दशा में दिन में कुछ खाये-पीये बिना थोड़ा सो जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य अजीर्णरोगी भी दिन में सो जायें और भलीभाँति भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में लघु (सुपच) आहार का सेवन करें ॥ २९ ॥

विवग्धोऽतिप्रवृत्तिर्वा ग्लानिर्माश्रुतमूकता ॥ ३० ॥

अजीर्णलिङ्गं सामान्यं विष्टम्भो गौरवं भ्रमः ।

अजीर्ण का सामान्य लक्षण—अजीर्ण के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं—मल का खुलकर न होना अथवा अधिक (अतिसार के रूप में) निकलना, ग्लानि (मन का मलिन रहना), वायु का अनुलोम न होना अर्थात् ठीक ढंग से डकार एवं अपानवायु के रूप में न निकल पाना, विष्टम्भ (आमाशय में स्वाभाविक गति का न होना), पेट तथा सम्पूर्ण शरीर में भारीपन का होना एवं चक्करों का आना ॥ ३० ॥

न चातिमात्रमेवात्रामादोपाय केवलम् ॥ ३१ ॥

द्विष्टविष्टम्भिदग्धामगुरुक्षहिमाशुचि । विदाहि शुष्कमत्यम्बुलुप्तं चात्रं न जीर्यति ॥ ३२ ॥

उपतप्तेन भुक्तं च शोकक्रोधक्षुदादिभिः ।

अजीर्ण के विविध कारण—केवल अधिक मात्रा में खाया हुआ आहार ही आमदोष का कारण नहीं होता है, अपितु इसके अन्य अनेक कारण हैं। यथा—द्विष्ट (जिसे खाने की इच्छा न हो), विष्टम्भकारक, जला हुआ, आम (भलीभाँति न पका हुआ), गुरु (देर में पचने वाला), रूक्ष (स्नेह रहित), शीत (बासी), अपवित्र, विदाहकारक, अत्यन्त सूखा, अधिक पानी पीने से अथवा थोड़ा भी जल न पीने से खाया हुआ भोजन नहीं पचता। बड़ी देर से भूख लगने के बाद में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता तथा शोक, क्रोध आदि से पीड़ित होने के बाद में खाया हुआ भोजन भी ठीक प्रकार से नहीं पचता ॥ ३१-३२ ॥

वक्तव्य—'क्षुदादिभिः'—यहाँ प्रयुक्त आदि शब्द से काम, क्रोध, लोभ, मोह, लज्जा, अपमान, तिरस्कार, भय और घबड़ाहट की स्थिति में खाया गया आहार समुचित प्रकार से नहीं पचता है। ऊपर की चतुर्थ पंक्ति का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—'शोकक्रोधक्षुदादिभिः उपतप्तेन (पुंसा) भुक्तम्'। शोक, क्रोध आदि मानसिक विकृतियाँ भोजन करते समय जो तन्मयता होती चाहिए, उसमें बाधा पहुँचाती हैं, क्योंकि चरक का आदेश है—'तन्मना भुज्यते' (च.वि. १।२५)। इसके अतिरिक्त इस अध्ययन में भोजन कैसे करना चाहिए, इसका विधिपूर्वक वर्णन किया है, इसे पढ़कर तब भोजन करें। आज भी जो अनशन किया करते हैं, उन्हें पहले फलों का रस ही दिया जाता है, न कि पूर्ण भोजन।

मिश्रं पथ्यमपथ्यं च भुक्तं समशनं मतम् ॥ ३३ ॥

विद्यादध्यशतं भूयो भुक्तस्योपरि भोजनम् । अकाले बहु चाल्यं वा भुक्तं तु विषमाशनम् ॥ ३४ ॥

त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान् व्याधीन् सुजन्ति वा ।

समशन आदि के लक्षण—पथ्य (हितकर) तथा अपथ्य (अहितकर) प्रकार के भोजनों को मिलाकर जो खाया जाता है, उसे 'समशन' कहते हैं। अभी भोजन किया है, वह पचा नहीं तब तक जो पुनः

मात्राशितौप्याध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१४१

भोजन कर लिया जाता है, उसे 'अध्याशन' कहते हैं। असमय में अधिक या थोड़ा जो भोजन किया जाता है, उसे 'विषमाशन' कहते हैं। ये तीनों प्रकार के 'अशन' घोर (कष्टकारक) रोगों को उत्पन्न कर देते हैं अथवा मृत्युकारक होते हैं ॥ ३३-३४ ॥

बक्तव्य— चरक-विमानस्थान १।२५ में निर्दिष्ट विधियों के विपरीत ये तीनों अशन हैं; अतएव ये हानिकारक होते हैं। 'समशन' शब्द उक्त अर्थ में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है, अन्यत्र इसका अर्थ—'सम्यक् अशन' भी हो सकता है। आहार जीवन को धारण करने वाले उपस्तम्भों में सर्वप्रथम है, अतः इसका विधिवत् सेवन करना ही चाहिए। उक्त तीनों प्रकार के अशन आहार की विकृतियाँ हैं। सुश्रुत में आहार-विधि का उत्तम वर्णन किया है। आप भी देखें, पढ़ें तथा इसे व्यवहार में लायें—सु.सू. ४६।४४ से ४९५ तक और देखें—अ.सं.सू. ११।६३।

काले सात्त्व्यं शुचि हितं स्निग्धोष्णं लघु तन्मनाः ॥ ३५ ॥

षड्रसं मधुरप्रायं नातिद्रुतबिलम्बितम्। स्नातः भुद्धान् विविक्तस्थो धीतपादकरानतः ॥ ३६ ॥

तर्पयित्वा पितॄन् देवानतिथीन् बालकान् गुरुन्। प्रत्यवेक्ष्य तिरश्चोऽपि प्रतिपन्नपरिग्रहान् ॥

समीक्ष्य सम्यगात्मानमतिन्द्रव्रवन् द्रवम्। इष्टमिष्टैः सहशनीयाच्छुचिभक्तजनहृतम् ॥ ३८ ॥

शास्त्रीय भोजन-विधि— उचित समय पर, सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल), पवित्र, स्वास्थ्यवर्धक, स्निग्ध, गरमागरम, लघु (सुपाच्य), मन लगाकर, छः रसों से युक्त, जिसमें मधुररस वाले पदार्थ अधिक हों; इस प्रकार के भोज्य पदार्थों को न बहुत जल्दी और न बहुत देर करके खाना चाहिए। स्नान करके, भूख लग जाने पर, एकान्त में बैठकर, हाथ, मुख तथा पैरों को धोकर, पितरों, देवताओं, अतिथियों, बच्चों तथा बूढ़ों को तृप्त करकर, पशु-पक्षियों का ध्यान देकर, अतिथियों एवं परिवारजनों के भोजन की व्यवस्था करके; अपने शरीर की वर्तमान स्थिति का विचार करता हुआ, भोजन की निन्दा न करता हुआ मौन होकर मित्रों के साथ बैठकर, पवित्र सेवकों द्वारा परोसा गया रुचिकर एवं द्रवप्राय भोजन का सेवन करे ॥ ३५-३८ ॥

बक्तव्य— श्लोक की रचना में पदों को व्यवस्थित करने की एक समस्या होती है, उन्हें व्यवस्थित करने के लिए अन्यत्र का सहारा लेना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से आप उक्त पद्यों को देखें—'स्नातः विविक्तस्थः देवान् (ऋषीन्) पितॄन् तर्पयित्वा, अतिथीन् बालकान् गुरुन् च तर्पयित्वा, प्रतिपन्नपरिग्रहान् तिरश्चोऽपि प्रत्यवेक्ष्य सम्यक् आत्मानं समीक्ष्य'... 'धीतपादकरानतः इष्टैः सह शुचिभक्तजनहृतं इष्टं, द्रवं च अशनीयात्'।

भोजनं तुणैकेशादिजुष्टमुष्णीकृतं पुनः। शाकावराश्रभूयिष्ठन्त्युष्णलवणं त्यजेत् ॥ ३९ ॥

त्याज्य भोजन— जिस भोजन में तिनके, केश (बाल), मक्खी आदि पड़े हों, जो फिर से गरम किया गया हो अर्थात् जो एक बार ठण्डा हो चुका हो, जिसमें शाक अथवा कुत्सित (निर्वीर्य) अन्न अधिक मात्रा में डाले गये हों, जो अत्यन्त गरम हो या उष्णवीर्य हो या जिसमें अधिक नमक पड़ा हो, ऐसे भोजन-पदार्थों का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ३९ ॥

किलाटवधिकूर्चकाक्षारशुक्ताममूलकम्। कृशशुष्कवराहविगोमत्सम्यमहिषामिषम् ॥ ४० ॥

माषनिष्पावशालूकबिसपिष्टबिरुद्धकम्। शुष्कशाकानि यवकान् फाणितं च न शीलयेत् ॥

असेवनीय आहार— किलाट, दही, कूर्चका, क्षार, शुक्त, कच्छी मूली, कृश प्राणी का मांस, सुखाया गया मांस, सूअर, गाय, मछली तथा भैंस का मांस, उड़द, निष्पाव (उबले हुए धान्य), शालुककन्द, विसकन्द, पीठी के द्वारा निर्मित पदार्थ, अंकुरित अन्न, सुखाये गये शाक, यवक (जई) नामक अन्न एवं राब—इनका अधिक मात्रा में निरन्तर सेवन न करे ॥ ४०-४१ ॥

शीलयेच्छालिगोधूमवषष्ठिकजाङ्गलम्। सुनिषण्णकजीवन्तीबालमूलकवास्तुकम् ॥ ४२ ॥

पथ्यामलकमृद्वीकापटोलीमुद्गशर्कराः। घृतद्विष्योदकक्षीरसौद्रवादिसैन्धवम् ॥ ४३ ॥

१४२

अष्टाङ्गहृदये

सेवनीय आहार—शालिधान्य, गेहूँ, जौ, साँठी, जांगल देश के प्राणियों के मांस, सुनिषण्णक, जीवन्ती, मुलायम मूली, बथुआ, हरीतकी, आँवला, मुनक्ता, परबल, मूँग, चीनी, घृत, दिव्योदक ( गंगा का जल ), दूध, मधु, दाडिम ( अनार ) तथा संधानमक—इन द्रव्यों का सदा सेवन करें ॥ ४२-४३ ॥

त्रिफलां मधुसर्पिभ्यां निशि तैत्रबलाय च । स्वास्थ्यानुवृत्तिकृद्यच्च रोगोच्छेदकरं च यत् ॥ ४४ ॥

रात में सेवनीय पदार्थ—द्रुष्टि की शक्ति को बढ़ाने के लिए रात में मधु तथा घी में मिलाकर त्रिफला का सेवन करें। जो-जो द्रव्य स्वास्थ्य की रक्षा करने वाला तथा रोगनाशक हो उस-उस का भी निरन्तर सेवन करें ॥ ४४ ॥

बिसेक्षुमोचचोचाग्रमोदकोत्कारिकादिकम् । अद्यादव्यं गुरु स्निग्धं स्वादु मन्दं स्थिरं पुरः ॥

विपरीतमतश्रान्ते मध्येऽम्ललवणोत्कटम्।

अन्य पदार्थों को खाने की विधि—विस ( कमलकन्द ), ईब, केला, चोच ( नारियल, तालफल, बड़हर या कटहर ), आम, लड्डू, उत्कारिका ( लपसी या हलुआ ) तथा अन्य गुरु, स्निग्ध, स्वादु, मन्द एवं स्थिर पदार्थों को भोजन के आरम्भ में खाना चाहिए। उक्त द्रव्यों के विपरीत गुण वाले आहार-द्रव्यों को अन्त में खाये और बीच में अम्ल तथा लवण रस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करें ॥ ४५ ॥

बक्तव्य—उक्त विवेचन का निष्कर्ष यह निकला कि वातशामक भोजन-द्रव्यों का प्रयोग प्रारम्भ में, कफशामक द्रव्यों का अन्त में और अग्निवर्धक द्रव्यों का प्रयोग भोजन के मध्य में करना चाहिए। अर्थात् लवण आदि रसों के अन्त में 'मधुरेण समापयेत्' सूक्ति का अनुसरण करें और मधुररस-प्रधान आहार द्रव्यों के अन्त में 'भोजनान्ते पिबेत् तक्रम्' का स्मरण अवश्य कर लेना चाहिए, क्योंकि 'न तक्रसेवी व्यथते कदाचित्'।

अत्रेन कुक्षेद्वीवंशो पानेनैकं प्रूरयेत् ॥ ४६ ॥

आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत्।

आमाशय के चार भाग—कुक्षि ( आमाशय ) को चार भागों में बाँटकर उसके दो भागों को अन्न ( दाल, भात, रोटी, तरकारी आदि ) से भर लें, एक अर्थात् तीसरे भाग को पेश पदार्थों ( दूध, काँजी, जल आदि ) से भर लें और शेष चौथे भाग में वात-पित्त-कफ दोष अपनी क्रिया कर सकें, इसके लिए खाली छोड़ दें ॥ ४६ ॥

बक्तव्य—यह पद्य अविकलरूप से अ.सं.सू. १०।५५ में भी आया है। चरक में कुक्षि के तीन भाग करने को कहा है, यह अपनी व्यवस्था है। देखें—च.वि. २।३। इनके अनुसार भक्ष्य एवं पेश आदि को दो भागों में और एक भाग दोषों की गति के लिए छोड़ना चाहिए। इस विधि से अजीर्ण आदि रोग नहीं हो पाते। उक्त पद्य अन्यत्र इस प्रकार देखा जाता है—'द्वौ भागौ पूरयेदत्र तोयमेकेन पूरयेत्। माहृतस्य प्रचाराथं चतुर्थमवशेषयेत्' ॥ आशय दोनों का समान है। उक्त प्रकार के कुक्षि-विभाजन से 'अर्धसौहित्यं' तथा 'नातितुप्तता' का अनुमान सुखपूर्वक लगाया जा सकता है।

अनुपानं हिमं वारि यवगोधूमयोर्हितम् ॥ ४७ ॥

दन्ति मद्ये विषे क्षौद्रे, कोष्णं पिष्टमयेषु तु। शाकमुद्गादिविकृतो मस्तुतक्राम्लकाजिकम् ॥ ४८ ॥

सुरा कृशानां पुष्टचर्यं स्थूलानां तु मधूदकम्। शोषे मांसरसो, मद्यं मासे स्वल्पे च पावके ॥ ४९ ॥

व्याध्यापिधाध्वभाष्यस्त्रीलङ्घनातपकर्मभिः। क्षीणे वृद्धे च बाले च पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥

विविध प्रकार के अनुपान—गेहूँ तथा जौ का, दही, मद्य, विष या विषयुक्त औषध-द्रव्यों तथा मधु का अनुपान शीतल जल है। पीठी आदि से बने हुए ( कलौडी आदि ) भक्ष्य पदार्थों का अनुपान गुनगुना जल है। विविध प्रकार के शाकों, मूँग, उड़द आदि द्वारा बनाये गये बड़ा आदि पदार्थों का अनुपान मस्तु

मात्राशितौषध्यायः ८ ]

सूत्रस्थानम्

१४३

(दही का पानी), मठा, खट्टी काँजी है। कुश (दुबले) पुरुषों को पूए करने के लिए सुरा अनुपान के रूप में दें। स्थूल पुरुषों को कुश करने के लिए मधु मिला हुआ जल पीने के लिए दें। शोष (क्षय) रोग में मांसरस (शोरवा) पीने के लिए दें। मांस खाने के बाद तथा अग्नि के मन्द पड़ जाने पर अनुपान के रूप में मद्य पीने को दें। रोग, औषधसेवन, रास्ता चलने से थकने पर, भाषण, मैथुन (स्त्रीसहवास), लंघन, धूप लगाना, काम करने से क्षीण, बालक तथा वृद्ध—इत सबको अनुपान में दूध दें। यह इनके लिए अमृत के समान हितकर होता है ॥४७-५०॥

विपरीतं यदत्रस्य गुणैः स्यादविरोधि च। अनुपानं समासेन, सर्वदा तत्प्रशस्यते ॥५१॥

उत्तम अनुपान —संक्षेप में उत्तम अनुपान का यह सूत्र है—जो अन्न (आहार) के गुणों से विपरीत गुणों वाला हो, किन्तु उन आहार-द्रव्यों का विरोधी न हो, वह अनुपान सदा प्रशंसनीय माना जाता है ॥५१॥

वक्तव्य —विपरीत तथा विरोधी का अन्तर आप इस प्रकार समझें—शीतल आहारों के साथ उष्ण और उष्ण आहारों के साथ शीत अनुपान उत्तम होता है। इसी प्रकार रूक्ष आहार-द्रव्यों के साथ स्निग्ध और स्निग्ध के साथ रूक्ष पेय अनुपान में हितकर होते हैं।

अनुपानं करोत्यूर्जां तृप्तिं व्याप्तिं दृढाङ्गताम्। अन्नसङ्घातशैथिल्यविकिल्तिजरणानि च ॥५२॥

अनुपान-सेवन का फल —उचित अनुपान का सेवन ऊर्जा (बल एवं दीर्घ जीवन), तृप्ति, आहाररस को फैलाना, अंगों को दृढ़ करना, खाने गये अन्नसमूह को ढीला करना, उसे गीला करना तथा उसे पचाना—इन कार्यों को करता है ॥५२॥

वक्तव्य —सुश्रुत-सूत्रस्थान अध्याय ४६।४३४ से ४४५ में एक अनुपानवर्ग दिया गया है। इसका परिशीलन अवश्य कर लें और इस श्लोक को याद कर लें—‘सर्वेषामनुपानानां मोहेन्द्रं तोयमुत्तमम्। सात्यं वा यस्य यतोयं तत् तस्मै हितमुच्यते ॥ उष्णं वाते कफे तोयं पित्रे रक्ते च शीतलम् ॥ (सु.सू. ४६।४३४)

नोर्ध्वजत्रगदग्धासकासोरःक्षतपीनसे। गीतभाष्यप्रसङ्गे च स्वरभेदे च तद्वितम ॥५३॥

१. अनुपान का निषेध —जत्रु (ग्रीवास्थि या हंसुली) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों (मुख, कर्ण, नेत्र तथा शिर के रोगों) में, श्वास, कास, उरःक्षत, पीनस (नासारोग) में, गाने, भाषण आदि में तथा स्वरभेद में अनुपान (पेय पदार्थ) हितकर नहीं होते हैं ॥५३॥

प्रकिलन्नदेहेमहाक्षिगलरोगब्रणातुराः। पानं त्यजेयुः—

२. अनुपान का निषेध —जिनके शरीर में क्लिन्नता (कहीं भी गलन या सङ्ग) हो, जो प्रमेहरोग, नेत्ररोग, गलरोग तथा व्रणरोग से पीड़ित हों, ये भी उक्त अनुपानों का सेवन न करें।

—सर्वश्च भाष्याध्वशयनं त्यजेत् ॥५४॥

पीत्वा, भुक्त्वाऽऽतपं वहिं यानं फलवनबाहनम्।

३. अनुपान का निषेध —सभी स्वस्थ अथवा रोगी अनुपान (पेय पदार्थ) का सेवन करके भाषण, रास्ता चलना तथा दिन में सोना छोड़ दें। खाना खाकर एवं पानी पीकर धूप सेंकना, आग सेंकना, यान (सवारी द्वारा यात्रा करना), कुदना-फाँदना तथा घोड़ा आदि की सवारी न करें ॥५४॥

वक्तव्य —चरक ने (सूत्रस्थान २७।३२७-३२८ में) उक्त विषय का इस प्रकार वर्णन किया है—‘भोजन के बाद पिया हुआ जल कण्ठ तथा उरःप्रदेश में स्थित आहार के स्नेह को वहीं रोक कर उसके न पचने से दोष को बढ़ाने में समर्थ हो जाता है। यहाँ ‘हत्वा’ का अर्थ ‘प्राप्त होकर’ यह भी हो सकता है, क्योंकि ‘हल घातु’ का अर्थ हिंसा और गति भी है। अर्थात् अनुपान के रूप में पिया गया जल आहार के स्नेह को प्राप्त होकर तथा आमाशय को दूषित कर दोष को बढ़ा देता है। इस सन्दर्भ में सु.सू. ४६ का अनुपानवर्ग भी देखें।

१४४

अष्टाङ्गहृदये

प्रसृष्टे विष्णून्ने हृदि सुविमले दोषे स्वपथगे विशुद्धे चोद्भारे क्षुद्रपगमने वातेऽनुसरति।

तथाऽग्रावुद्व्रित्ते विशदकरणे देहे च सुलघौ

प्रयुज्जीताहारं विधिनियमितं, कालः स हि मतः ॥ ५५ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने मात्राशित्तौयो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥


भोजन-समय का निर्देश —मल-मूत्र के भलीभाँति निकल जाने पर, हृदय के शुद्ध अतएव विमल हो जाने पर, वात आदि दोषों के अपने-अपने मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाने पर, शुद्ध ( दोषरहित ) डकार के आने पर, भूख के लगने पर, अपानवायु के अनुकूल ढंग से निकलने पर, जठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर, इन्द्रियों के निर्मल हो जाने पर तथा शरीर के हलका हो जाने पर विधिपूर्वक आहार ( भोजन ) करें। यही आहार करने का उचित समय है ॥ ५५ ॥

वक्तव्य —इसी अध्याय के ३५वें श्लोक में ‘काले सात्स्यं शुचि हितं’ का यह उत्तर है। ऐसे समय में किया गया भोजन सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित शरीर को तृप्त कर देता है। इस समय किये गये भोजन से जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, लोभ आदि कारणों से इसके आगे-पीछे किया गया भोजन हानिकारक होता है। इस विषय में महर्षि पुनर्वसु के उपदेशों पर ध्यान दें। देखें—च.सू. २७।३४५ से ३५० तक।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

मात्राशित्तौय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥


नवमोऽध्यायः

अथातो द्रव्यादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से द्रव्यादिविज्ञानीय अर्थात् द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन इस अध्याय में करेंगे। ऐसा प्राचीन आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इससे पहले अध्याय में अन्न-पान के उपयोगी द्रव्यों का सामान्य रूप से वर्णन तथा आहार-विधि का उपदेश किया गया था। अब इस अध्याय द्वारा द्रव्य और उसमें आश्रित रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव का इसलिए वर्णन किया जायेगा कि इनकी परीक्षा करके ही अन्न-पान के उपयोग का उपदेश दिया जायेगा। अतएव प्रस्तुत अध्याय की उपस्थापना की जा रही है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २६; सु.सू. ४०-४१ तथा अ.सं.सू. १७ में देखें।

द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं, ते हि तदाश्रयाः ।

द्रव्य की प्रधानता —रस, गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव द्रव्य में रहने वाले इन धर्मों में हीरतकी आदि द्रव्यों को ही श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये रस आदि द्रव्य में ही आश्रित होते हैं। अर्थात् ये रस आदि भाव द्रव्य में प्राप्त होते हैं।

बलव्य —चरक ने द्रव्य की परिभाषा इस प्रकार की है—'यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्'। तद् द्रव्यम्'। (च.सू. १।५१) अर्थात् जिसमें कर्म एवं गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य गुण-कर्म का समवायिकारण है, वह द्रव्य है। इसका विस्तृत व्याख्यान सुरभारती प्रकाशन चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित 'चरकसंहिता' प्रथम भाग में यथास्थान देखें।

पञ्चभूतात्मकं तत्तु—

द्रव्य का स्वरूप —वह द्रव्य पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतों के संयोग वाला है।

—क्षमामधिष्ठाय जायते ॥ १ ॥

द्रव्य की उत्पत्ति —वह द्रव्य पृथिवी का आश्रय पाकर उस प्रकार उत्पन्न होता है, जैसे मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है ॥ १ ॥

अन्बुद्योन्मयिपवननभसां समवायतः । तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च—

उत्पत्ति के कारण —द्रव्य की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल है, तथापि इसकी उत्पत्ति में अग्नि, वायु तथा आकाश के समवाय सम्बन्ध से उसकी उत्पत्ति होती है। उक्त पदार्थों (महाभूतों) के संयोग-भेद से द्रव्यों में भिन्नता भी होती है।

—व्यपदेशस्तु भूयसा ॥ २ ॥

नामकरण में कारण —जिस द्रव्य में जिस महाभूत तत्त्व की विशेषता होती है, वह उसी नाम से कहा जाता है। जैसे—पार्थिव, आग्नेय, वायव्य, नामस आदि व्यवहार के लिए उस-उसकी संज्ञाएँ होती हैं ॥ २ ॥

१० अ० ४०

१४६

अष्टाङ्गहृदये

तस्मात्रैकरसं द्रव्यं भूतसङ्कातसम्भवात्।

द्रव्य / अनेक -पृथिवी आदि महाभूतों के समवाय से उत्पन्न होने के कारण कोई भी द्रव्य किसी एक रसवाला नहीं होता है।

नैकदोषास्ततो रोगास्तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः ॥ ३ ॥

अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चैष्यते।

अनेकदोषज रोग—यही कारण है कि उस द्रव्य का सेवन करने से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी किसी एक ही दोष वाले नहीं होते हैं, उस द्रव्य में जो रस व्यक्त (प्रतीत) होता है, वही उसका प्रधान रस कहा जाता है। जो रस प्रधान रस का अनुभव होने के बाद प्रतीत होता है अथवा जिसका बहुत कम अनुभव हो पाता है, उसे 'अनुरस' कहा जाता है ॥ ३ ॥

वक्तव्य—महर्षि पुनर्वसु के समय में रस तथा आहार विषय सम्बन्धी एक सम्भाषा परिषद् हुई थी, जिसका विशद विवेचन च.सू. २६ में किया गया है। अन्त में भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ने सिद्धान्त पक्ष की स्थापना की तथा द्रव्य, देश, काल के प्रभाव से ६३ प्रकार के रसभेदों की त्रचा की गयी। इसका परिशीलन करें। इस प्रसंग में सु.सू. ४० का भी अवलोकन कर लें।

गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये ॥ ४ ॥

रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः।

द्रव्यगत गुरु आदि गुण—गुरु आदि बीस गुण (जिनका वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।१८ में किया जा चुका है) पार्थिव आदि द्रव्यों में रहते हैं। ये ही द्रव्य मधुर आदि रसों के आश्रय भी होते हैं, किन्तु साहचर्य (संगति) होने के कारण वे गुरु आदि गुण रसों में भी होते हैं, ऐसा कह दिया जाता है ॥ ४ ॥

वक्तव्य—'गुर्वादयो गुणाः'—इसका वर्णन पहले किया जा चुका है। 'पृथिव्यादौ' के स्थान पर 'पार्थिवादी' पद अधिक सुगम होता। ऐसा न होने के कारण श्री अरुणदत्त को उक्त पद की व्याख्या 'पृथिव्यादि महाभूतारब्धे द्रव्ये' इस प्रकार करनी पड़ी है। इसके पहले तीसरे पद्य में भी इन्होंने द्रव्य को 'भूतसङ्कातसम्भव' माना है और अगले पद्यों में भी द्रव्यों को क्रम से पार्थिव, आप्य, आश्रय आदि संज्ञा दी है। वास्तव में पृथिवी आदि भूत हैं, इनके संयोग से ही पञ्चभूतात्मक द्रव्य या द्रव्यों की उत्पत्ति होती है।

तत्र द्रव्यं गुरुस्थूलस्थिरगन्धगुणोल्बणम् ॥ ५ ॥

पार्थिवं गौरवस्थैर्यसङ्कातोपचयावहम्।

पार्थिव द्रव्य का वर्णन—उक्त पञ्चमहाभूतात्मक द्रव्यों में जो द्रव्य गुरु, स्थूल, स्थिर तथा गन्धगुण-प्रधान होता है, उसे पार्थिव द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त पार्थिव द्रव्य गुरुता, स्थिरता, संयातता (ठोसपन) तथा उपचय (शरीरपुष्टि) कारक होता है ॥ ५ ॥

द्रवशीतगुरुस्तिग्धमन्दसान्द्रसोलब्णम् ॥ ६ ॥

आप्यं स्नेहनविष्यन्दक्लैदप्रह्लादबन्धकृतं।

आप्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य द्रव, शीत, गुरु, स्निग्ध, मन्द, सान्द्र तथा रसगुण-प्रधान होता है, उसे आप्य (अपू धातु-प्रधान) या जलीय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आप्य द्रव्य स्नेहन, विष्यन्दन (अभिष्यन्दकारक), क्लैदन (ग्रीलापन), प्रह्लादन (आनन्द या तृप्तिकारक) तथा बन्धन (आटा आदि को बाँधने वाला) कारक होता है ॥ ६ ॥

रूक्षतीक्ष्णोष्णविशदसूक्ष्मरूपगुणोल्बणम् ॥ ७ ॥

आश्रये दाहभावर्णप्रकाशपचनात्मकम्।

द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

१४७

आश्रय द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण, विशद, सूक्ष्म तथा रूपगुण-प्रधान होता है, उसे आश्रय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आश्रय द्रव्य दाह, कान्ति, वर्ण, प्रकाश तथा पाचन करने वाला होता है ॥७॥

वायव्यं रुक्षविशदलघुस्पर्शगुणोल्बणम् ॥८॥ रौक्षलाघववैशद्विचारलग्निकारकम् ।

वायव्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, विशद, लघु तथा स्पर्शगुण-प्रधान होता है, वह वायव्य द्रव्य कहा जाता है। वह रुक्षता, लघुता, विशदता, विचरणशीलता एवं लग्निक ( हर्षक्षय ) कारक होता है ॥८॥

नाभसं सूक्ष्मविशदलघुशब्दगुणोल्बणम् ॥९॥

सौषिर्प्यलाघवकरम्—

नाभस द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य सूक्ष्म, विशद, लघु तथा शब्दगुण-प्रधान होता है वह नाभस ( आकाशीय ) कहा जाता है। वह सौषिर्प्य ( खोललापन ) तथा लघुता कारक होता है ॥९॥

—जगत्येवमनौषधम्। न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशात्रानार्थयोगयोः ॥१०॥

औषधमय द्रव्य—इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों ( प्रयोजनों ) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥१०॥

बक्तव्य—इसी विषय का जीवातु भगवानु पुनर्वसु का यह उपदेश है—'नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते'। ( च.सू. २६।१२ ) तथा इसी का समर्थक गद्य देखें—सु.सू. ४१।५। गुरु आदि २० गुणों का वर्णन इसके प्रथम अध्याय में महर्षि वाग्भट ने किया है। इनके अतिरिक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन्हें भी गुण कहा गया है। ऊपर श्लोक ५ से ९ तक में देखें। महर्षि कणाद ने २४ गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण, ७. पुष्कल्य, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व, १२. गुरुत्व, १३. द्रवत्व, १४. स्नेह, १५. शब्द, १६. बुद्धि, १७. सुख, १८. दुःख, १९. इच्छा, २०. द्वेष, २१. प्रयत्न, २२. धर्म, २३. अधर्म और २४. संस्कार। साथ ही च.सू. १।४९ भी देखें। इन गुण-धर्मों वाले द्रव्य स्वयं तथा दूसरे के संयोग से औषध-कार्य का निर्वह करते हैं। ये औषध द्रव्य स्थावर-जंगम भेद से दो प्रकार के होते हैं।

द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽरिषपबनोक्तम्। अधोगामि च भूमिच्छं भूमितोयगुणाधिकम् ॥११॥

द्रव्यों की विशेषता—जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी अर्थात् वमनकारक होता है, उसमें प्रायः अग्नि तथा वायु तत्त्व के गुण अधिक होते हैं और जो द्रव्य अधोगामी अर्थात् विरेचनकारक होता है, उसमें प्रायः पृथिवी तथा जल तत्त्व के गुण अधिक पाये जाते हैं ॥११॥

बक्तव्य—एक 'नाभस' गुण-प्रधान द्रव्य का वर्णन ऊपर के श्लोक में छूट गया है। इसका गुण है—संशमनकारकत्व। प्रायः शब्द कभी-कभी इसके विपरीत प्रभाव की भी सूचना देता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक ही द्रव्य वमन तथा विरेचन कारक होता है, तो उसमें उक्त बारों भूतों के गुण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, फलतः वे दोनों कार्य में समर्थ हैं। इस विषय का निस्तुत वर्णन मुश्रुत में इस प्रकार प्राप्त है—'तत्र...साधयेत्' ( सु.सू. ४१।६ ) अर्थात् विरेचक द्रव्यों में पृथिवी एवं जल तत्त्व के गुणों की अधिकता रहती है, क्योंकि ये दोनों तत्त्व भारी होने के कारण अधोगामी होते हैं। वामक द्रव्यों में अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता होती है। ये दोनों तत्त्व लघु होने के कारण ऊर्ध्वगामी होते हैं। आकाश गुण अधिकता वाले द्रव्य संशमन होते हैं। इसी प्रकार यहाँ दीपन, लेखन तथा वृंहण द्रव्यों का भी वर्णन किया गया है।

१४८

अष्टाङ्गहृदये

इति द्रव्यम्—

द्रव्य-वर्णन की समाप्ति—यहाँ तक पाञ्चभौतिक द्रव्य के सम्बन्ध में जो वर्णन करना था, उसका व्याख्यान समाप्त हो गया है।

—रसान् भेदेष्टतरत्रोपदेश्यते।

रसवर्णन-प्रस्ताव—द्रव्यों का वर्णन करने के बाद अब अगले (११वें) अध्याय में रसों के भेदों का वर्णन किया जायेगा।

वीर्य पुनर्वदत्येके गुरु स्निग्धं हिमं मृदुं॥१२॥

लघु रूक्षोष्णतीक्ष्णं च तदेवं मतमष्टधा।

द्रव्यगत वीर्य-वर्णन—कुछ आचार्यों का कथन है कि द्रव्यगत वीर्य आठ प्रकार का होता है। यथा—१. गुरु, २. स्निग्ध, ३. हिम, ४. मृदु, ५. लघु, ६. रूक्ष, ७. उष्ण एवं ८. तीक्ष्ण॥१२॥

चरकस्त्वाह वीर्यं तत् क्रियते येन या क्रिया॥१३॥

नावीर्यं कृते किञ्चित्सर्वं वीर्यकृता हि सा।

चरकसम्मत वीर्य—महर्षि चरक का कथन है कि वीर्य उसे कहते हैं जिससे जो क्रिया की जाती है। कोई भी द्रव्य वीर्य के बिना किसी कार्य को नहीं कर सकता, अतः सभी क्रियाएँ वीर्य से ही सम्पन्न होती हैं॥१३॥

गुर्वादिव्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वण्यते॥१४॥

समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविरतिषु। व्यवहाराय मुख्यत्वाद् बहुप्रग्रहणादपि॥१५॥

वाग्भट का मत—थीवाग्भटाचार्य का कथन है कि ऊपर कहे गये गुरु आदि आठ गुणों में ही वीर्य संज्ञा सार्थक है, अतएव उक्त आठ गुणों को वीर्य कहा जाता है, क्योंकि उक्त आठ गुण ही पहले कहे गये बीस गुणों में प्रमुख होते हैं और अपनी शक्ति की श्रेष्ठता के कारण ही विविध प्रकार से क्रिया करते हैं। यह (वीर्य) सभी गुणों में चिरस्थायी होने के कारण तथा शक्ति की अधिकता के कारण चिकित्सा-व्यवहार में प्रमुख होता है। सभी गुणों में प्रमुख होने के कारण उसी की गणना (उल्लेख) होती है॥१४-१५॥

अतश्च विपरीतत्वात्मभ्रमवत्यपि नैव सा। विवक्ष्यते रसाद्येषु, वीर्यं गुर्वादयो हृतः॥१६॥

रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता—इसीलिए उक्त विशेषताओं से विपरीत होने के कारण रस, विपाक, प्रभाव को 'वीर्य' संज्ञा नहीं दी गयी है। यद्यपि उक्त रस आदि को भी वीर्य कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया। अतएव गुरु आदि आठ गुणों का नाम ही 'वीर्य' है॥१६॥

उष्णं शीतं द्विधैवान्ये वीर्यमाचक्षते—

वीर्य सम्बन्धी अन्य मत—कुछ दूसरे आचार्यों का मत है कि 'वीर्य' केवल दो प्रकार का होता है—१. उष्ण एवं २. शीत। यहाँ 'एवं' शब्द निश्चयात्मक है अर्थात् वीर्य दो ही प्रकार का होता है।

—अपि च। नानात्मकमपि द्रव्यमश्रीषोमो महाबली॥१७॥

व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित्।

वाग्भट का समर्थन—वाग्भटाचार्य का कथन है कि यह मत भी ठीक ही है, क्योंकि अनेक प्रकार के शक्तिशाली द्रव्य भी अग्नि तथा सोम (जल) तत्त्वों का कभी भी उस प्रकार अतिक्रमण नहीं कर पाते, जिस प्रकार व्यक्त एवं अव्यक्त कारण वाला जगत् (संसार) अग्नि एवं सोम का अतिक्रमण नहीं कर सकता॥१७॥

वक्तव्य—ऊपर वीर्य की मान्यता के सम्बन्ध में मत-मतान्तरों की चर्चा की गयी है। चरक का मत है कि 'वीर्य' वह है जिसकी शक्ति से द्रव्य कर्म को पूर्ण करता है और उन्होंने 'कर्म' की परिभाषा

द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

१४९

इस प्रकार दो हैं—'प्रयत्नादि कर्म त्रेष्टितमुच्यते'। (च.सू. १४९) वीर्य की परिभाषा—'वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुलते किञ्चित्, सर्वा वीर्यकृता क्रिया' ॥ (च.सू. २६६५) इस प्रसंग में सुश्रुतोक्त गद्य का भी अवलोकन करें—सु.सू. ४०१५।

तत्रोष्णं भ्रमतृङ्गलानिस्वेददाहाशुपाकितः ॥ १८ ॥

शर्मं च वातकफयोः करोति, शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥ १९ ॥

वीर्य के लक्षण—वारभट के अनुसार वीर्य दो प्रकार का होता है। उन दोनों में प्रथम उष्णवीर्य के लक्षण—भ्रम, प्यास का लगना, ग्लानि (हर्षशय), स्वेद, दाह, आशुपाकित (शीघ्र पचना—भोजन का तथा व्रण आदि का) एवं वात तथा कफ दोषों का शमन करता है।

शीतवीर्य—ह्लादन (मन को प्रसन्न करने वाला), जीवन, स्तम्भनकारक और रक्त एवं पित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥ १८-१९ ॥

जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥ २० ॥

विपाक का वर्णन—जठराग्नि के संयोग से जब खाये हुए मधुर आदि रस युक्त आहार का पाक होने लगता है, उसके बाद जो आहाररस से अलग रस उत्पन्न होता है, उसे 'विपाक' कहते हैं ॥ २० ॥

वक्तव्य—थीमानों का भोजन प्रायः षड् रस युक्त होता है। इसको समझाने के लिए उक्त श्लोक में 'रसानां' पद दिया है। उसके बाद उस खाये हुए आहार का जब जठराग्नि से पुनः पाक होकर जो दूसरा रस पैदा होता है, उसे 'विपाक' अर्थात् विशिष्ट पाक कहते हैं।

स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। तित्तोषणकघायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ॥ २१ ॥

विपाकज रस-भेद—प्रायः मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थों का विपाक मधुर होता है, अम्ल पदार्थों का विपाक अम्ल ही होता है और तित्त, कटु एवं कषाय रसों का विपाक कटु होता है ॥ २१ ॥

वक्तव्य—उक्त दृष्टि से छः रसों का त्रिविध (मधुर, अम्ल तथा कटु) विपाक होता है, किन्तु सुश्रुत ने दो प्रकार का विपाक माना है। देखें—सु.सू. ४०१०-१२। वे दो विपाक हैं—१. मधुर तथा २. कटु। श्रीवारभट ने 'प्रायः' पद का प्रयोग करके प्राचीन मत को स्वीकार कर अपने मत को भी प्रदर्शित कर दिया है।

कटु-तित्तरस विवाद—प्रायः समाज में देखा जाता है कि मिर्च तीती है एवं नीम कड़वी है, इस प्रकार प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं है। आप ध्यान दें—कटुरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र में घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या उसे कष्ट दे, जो दाह करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, उसे कटुरस कहते हैं'। (शा.सं.पू.खं. २।२०) जैसे—सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली को 'त्रिकटु' या 'कटुत्रय' कहते हैं। इन्हों के गुण लाल मिर्चा में भरपूर पाये जाते हैं, अतः ये सभी द्रव्य कटु कहे जाते हैं। तित्तरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र से कष्ट दे अर्थात् अप्रिय लगे और जो दूसरे रसों के स्वाद को प्रतीत न होने दे, उसे तित्तरस कहते हैं। यह मुख की तित्त्ता को दूर करके लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है'। (शा.सं.पू.खं. २।२१) तित्त रस युक्त द्रव्यों में नीम, कुटकी आदि प्रमुख हैं।

रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्यं शुभाशुभम्। किञ्चिद्वत्सेन कुस्ते कर्म पाकेन चापरम् ॥ २२ ॥

गुणान्तरेण वीर्येण प्रभावेणैव किञ्चन।

रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव—विपाक का फल मूल (आहार) रस के समान ही फलदायक होता है, किन्तु उसमें भी द्रव्य के अपने विशिष्ट लक्षण इस प्रकार होते हैं—कोई द्रव्य दोषशमन रूप कर्म करने के कारण शुभ होता है और कोई द्रव्य दोषप्रकोपन रूप कर्म करने के कारण अशुभ होता है। उसमें भी