भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

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आश्रय द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण, विशद, सूक्ष्म तथा रूपगुण-प्रधान होता है, उसे आश्रय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आश्रय द्रव्य दाह, कान्ति, वर्ण, प्रकाश तथा पाचन करने वाला होता है ॥७॥

वायव्यं रुक्षविशदलघुस्पर्शगुणोल्बणम् ॥८॥ रौक्षलाघववैशद्विचारलग्निकारकम् ।

वायव्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, विशद, लघु तथा स्पर्शगुण-प्रधान होता है, वह वायव्य द्रव्य कहा जाता है। वह रुक्षता, लघुता, विशदता, विचरणशीलता एवं लग्निक ( हर्षक्षय ) कारक होता है ॥८॥

नाभसं सूक्ष्मविशदलघुशब्दगुणोल्बणम् ॥९॥

सौषिर्प्यलाघवकरम्—

नाभस द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य सूक्ष्म, विशद, लघु तथा शब्दगुण-प्रधान होता है वह नाभस ( आकाशीय ) कहा जाता है। वह सौषिर्प्य ( खोललापन ) तथा लघुता कारक होता है ॥९॥

—जगत्येवमनौषधम्। न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशात्रानार्थयोगयोः ॥१०॥

औषधमय द्रव्य—इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों ( प्रयोजनों ) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥१०॥

बक्तव्य—इसी विषय का जीवातु भगवानु पुनर्वसु का यह उपदेश है—'नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते'। ( च.सू. २६।१२ ) तथा इसी का समर्थक गद्य देखें—सु.सू. ४१।५। गुरु आदि २० गुणों का वर्णन इसके प्रथम अध्याय में महर्षि वाग्भट ने किया है। इनके अतिरिक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन्हें भी गुण कहा गया है। ऊपर श्लोक ५ से ९ तक में देखें। महर्षि कणाद ने २४ गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण, ७. पुष्कल्य, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व, १२. गुरुत्व, १३. द्रवत्व, १४. स्नेह, १५. शब्द, १६. बुद्धि, १७. सुख, १८. दुःख, १९. इच्छा, २०. द्वेष, २१. प्रयत्न, २२. धर्म, २३. अधर्म और २४. संस्कार। साथ ही च.सू. १।४९ भी देखें। इन गुण-धर्मों वाले द्रव्य स्वयं तथा दूसरे के संयोग से औषध-कार्य का निर्वह करते हैं। ये औषध द्रव्य स्थावर-जंगम भेद से दो प्रकार के होते हैं।

द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽरिषपबनोक्तम्। अधोगामि च भूमिच्छं भूमितोयगुणाधिकम् ॥११॥

द्रव्यों की विशेषता—जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी अर्थात् वमनकारक होता है, उसमें प्रायः अग्नि तथा वायु तत्त्व के गुण अधिक होते हैं और जो द्रव्य अधोगामी अर्थात् विरेचनकारक होता है, उसमें प्रायः पृथिवी तथा जल तत्त्व के गुण अधिक पाये जाते हैं ॥११॥

बक्तव्य—एक 'नाभस' गुण-प्रधान द्रव्य का वर्णन ऊपर के श्लोक में छूट गया है। इसका गुण है—संशमनकारकत्व। प्रायः शब्द कभी-कभी इसके विपरीत प्रभाव की भी सूचना देता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक ही द्रव्य वमन तथा विरेचन कारक होता है, तो उसमें उक्त बारों भूतों के गुण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, फलतः वे दोनों कार्य में समर्थ हैं। इस विषय का निस्तुत वर्णन मुश्रुत में इस प्रकार प्राप्त है—'तत्र...साधयेत्' ( सु.सू. ४१।६ ) अर्थात् विरेचक द्रव्यों में पृथिवी एवं जल तत्त्व के गुणों की अधिकता रहती है, क्योंकि ये दोनों तत्त्व भारी होने के कारण अधोगामी होते हैं। वामक द्रव्यों में अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता होती है। ये दोनों तत्त्व लघु होने के कारण ऊर्ध्वगामी होते हैं। आकाश गुण अधिकता वाले द्रव्य संशमन होते हैं। इसी प्रकार यहाँ दीपन, लेखन तथा वृंहण द्रव्यों का भी वर्णन किया गया है।