अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६
अष्टाङ्गहृदये
तस्मात्रैकरसं द्रव्यं भूतसङ्कातसम्भवात्।
द्रव्य / अनेक -पृथिवी आदि महाभूतों के समवाय से उत्पन्न होने के कारण कोई भी द्रव्य किसी एक रसवाला नहीं होता है।
नैकदोषास्ततो रोगास्तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः ॥ ३ ॥
अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चैष्यते।
अनेकदोषज रोग—यही कारण है कि उस द्रव्य का सेवन करने से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी किसी एक ही दोष वाले नहीं होते हैं, उस द्रव्य में जो रस व्यक्त (प्रतीत) होता है, वही उसका प्रधान रस कहा जाता है। जो रस प्रधान रस का अनुभव होने के बाद प्रतीत होता है अथवा जिसका बहुत कम अनुभव हो पाता है, उसे 'अनुरस' कहा जाता है ॥ ३ ॥
वक्तव्य—महर्षि पुनर्वसु के समय में रस तथा आहार विषय सम्बन्धी एक सम्भाषा परिषद् हुई थी, जिसका विशद विवेचन च.सू. २६ में किया गया है। अन्त में भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ने सिद्धान्त पक्ष की स्थापना की तथा द्रव्य, देश, काल के प्रभाव से ६३ प्रकार के रसभेदों की त्रचा की गयी। इसका परिशीलन करें। इस प्रसंग में सु.सू. ४० का भी अवलोकन कर लें।
गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये ॥ ४ ॥
रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः।
द्रव्यगत गुरु आदि गुण—गुरु आदि बीस गुण (जिनका वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।१८ में किया जा चुका है) पार्थिव आदि द्रव्यों में रहते हैं। ये ही द्रव्य मधुर आदि रसों के आश्रय भी होते हैं, किन्तु साहचर्य (संगति) होने के कारण वे गुरु आदि गुण रसों में भी होते हैं, ऐसा कह दिया जाता है ॥ ४ ॥
वक्तव्य—'गुर्वादयो गुणाः'—इसका वर्णन पहले किया जा चुका है। 'पृथिव्यादौ' के स्थान पर 'पार्थिवादी' पद अधिक सुगम होता। ऐसा न होने के कारण श्री अरुणदत्त को उक्त पद की व्याख्या 'पृथिव्यादि महाभूतारब्धे द्रव्ये' इस प्रकार करनी पड़ी है। इसके पहले तीसरे पद्य में भी इन्होंने द्रव्य को 'भूतसङ्कातसम्भव' माना है और अगले पद्यों में भी द्रव्यों को क्रम से पार्थिव, आप्य, आश्रय आदि संज्ञा दी है। वास्तव में पृथिवी आदि भूत हैं, इनके संयोग से ही पञ्चभूतात्मक द्रव्य या द्रव्यों की उत्पत्ति होती है।
तत्र द्रव्यं गुरुस्थूलस्थिरगन्धगुणोल्बणम् ॥ ५ ॥
पार्थिवं गौरवस्थैर्यसङ्कातोपचयावहम्।
पार्थिव द्रव्य का वर्णन—उक्त पञ्चमहाभूतात्मक द्रव्यों में जो द्रव्य गुरु, स्थूल, स्थिर तथा गन्धगुण-प्रधान होता है, उसे पार्थिव द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त पार्थिव द्रव्य गुरुता, स्थिरता, संयातता (ठोसपन) तथा उपचय (शरीरपुष्टि) कारक होता है ॥ ५ ॥
द्रवशीतगुरुस्तिग्धमन्दसान्द्रसोलब्णम् ॥ ६ ॥
आप्यं स्नेहनविष्यन्दक्लैदप्रह्लादबन्धकृतं।
आप्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य द्रव, शीत, गुरु, स्निग्ध, मन्द, सान्द्र तथा रसगुण-प्रधान होता है, उसे आप्य (अपू धातु-प्रधान) या जलीय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आप्य द्रव्य स्नेहन, विष्यन्दन (अभिष्यन्दकारक), क्लैदन (ग्रीलापन), प्रह्लादन (आनन्द या तृप्तिकारक) तथा बन्धन (आटा आदि को बाँधने वाला) कारक होता है ॥ ६ ॥
रूक्षतीक्ष्णोष्णविशदसूक्ष्मरूपगुणोल्बणम् ॥ ७ ॥
आश्रये दाहभावर्णप्रकाशपचनात्मकम्।