भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः

अथातो द्रव्यादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से द्रव्यादिविज्ञानीय अर्थात् द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन इस अध्याय में करेंगे। ऐसा प्राचीन आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इससे पहले अध्याय में अन्न-पान के उपयोगी द्रव्यों का सामान्य रूप से वर्णन तथा आहार-विधि का उपदेश किया गया था। अब इस अध्याय द्वारा द्रव्य और उसमें आश्रित रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव का इसलिए वर्णन किया जायेगा कि इनकी परीक्षा करके ही अन्न-पान के उपयोग का उपदेश दिया जायेगा। अतएव प्रस्तुत अध्याय की उपस्थापना की जा रही है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २६; सु.सू. ४०-४१ तथा अ.सं.सू. १७ में देखें।

द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं, ते हि तदाश्रयाः ।

द्रव्य की प्रधानता —रस, गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव द्रव्य में रहने वाले इन धर्मों में हीरतकी आदि द्रव्यों को ही श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये रस आदि द्रव्य में ही आश्रित होते हैं। अर्थात् ये रस आदि भाव द्रव्य में प्राप्त होते हैं।

बलव्य —चरक ने द्रव्य की परिभाषा इस प्रकार की है—'यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्'। तद् द्रव्यम्'। (च.सू. १।५१) अर्थात् जिसमें कर्म एवं गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य गुण-कर्म का समवायिकारण है, वह द्रव्य है। इसका विस्तृत व्याख्यान सुरभारती प्रकाशन चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित 'चरकसंहिता' प्रथम भाग में यथास्थान देखें।

पञ्चभूतात्मकं तत्तु—

द्रव्य का स्वरूप —वह द्रव्य पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतों के संयोग वाला है।

—क्षमामधिष्ठाय जायते ॥ १ ॥

द्रव्य की उत्पत्ति —वह द्रव्य पृथिवी का आश्रय पाकर उस प्रकार उत्पन्न होता है, जैसे मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है ॥ १ ॥

अन्बुद्योन्मयिपवननभसां समवायतः । तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च—

उत्पत्ति के कारण —द्रव्य की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल है, तथापि इसकी उत्पत्ति में अग्नि, वायु तथा आकाश के समवाय सम्बन्ध से उसकी उत्पत्ति होती है। उक्त पदार्थों (महाभूतों) के संयोग-भेद से द्रव्यों में भिन्नता भी होती है।

—व्यपदेशस्तु भूयसा ॥ २ ॥

नामकरण में कारण —जिस द्रव्य में जिस महाभूत तत्त्व की विशेषता होती है, वह उसी नाम से कहा जाता है। जैसे—पार्थिव, आग्नेय, वायव्य, नामस आदि व्यवहार के लिए उस-उसकी संज्ञाएँ होती हैं ॥ २ ॥

१० अ० ४०