भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

इति द्रव्यम्—

द्रव्य-वर्णन की समाप्ति—यहाँ तक पाञ्चभौतिक द्रव्य के सम्बन्ध में जो वर्णन करना था, उसका व्याख्यान समाप्त हो गया है।

—रसान् भेदेष्टतरत्रोपदेश्यते।

रसवर्णन-प्रस्ताव—द्रव्यों का वर्णन करने के बाद अब अगले (११वें) अध्याय में रसों के भेदों का वर्णन किया जायेगा।

वीर्य पुनर्वदत्येके गुरु स्निग्धं हिमं मृदुं॥१२॥

लघु रूक्षोष्णतीक्ष्णं च तदेवं मतमष्टधा।

द्रव्यगत वीर्य-वर्णन—कुछ आचार्यों का कथन है कि द्रव्यगत वीर्य आठ प्रकार का होता है। यथा—१. गुरु, २. स्निग्ध, ३. हिम, ४. मृदु, ५. लघु, ६. रूक्ष, ७. उष्ण एवं ८. तीक्ष्ण॥१२॥

चरकस्त्वाह वीर्यं तत् क्रियते येन या क्रिया॥१३॥

नावीर्यं कृते किञ्चित्सर्वं वीर्यकृता हि सा।

चरकसम्मत वीर्य—महर्षि चरक का कथन है कि वीर्य उसे कहते हैं जिससे जो क्रिया की जाती है। कोई भी द्रव्य वीर्य के बिना किसी कार्य को नहीं कर सकता, अतः सभी क्रियाएँ वीर्य से ही सम्पन्न होती हैं॥१३॥

गुर्वादिव्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वण्यते॥१४॥

समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविरतिषु। व्यवहाराय मुख्यत्वाद् बहुप्रग्रहणादपि॥१५॥

वाग्भट का मत—थीवाग्भटाचार्य का कथन है कि ऊपर कहे गये गुरु आदि आठ गुणों में ही वीर्य संज्ञा सार्थक है, अतएव उक्त आठ गुणों को वीर्य कहा जाता है, क्योंकि उक्त आठ गुण ही पहले कहे गये बीस गुणों में प्रमुख होते हैं और अपनी शक्ति की श्रेष्ठता के कारण ही विविध प्रकार से क्रिया करते हैं। यह (वीर्य) सभी गुणों में चिरस्थायी होने के कारण तथा शक्ति की अधिकता के कारण चिकित्सा-व्यवहार में प्रमुख होता है। सभी गुणों में प्रमुख होने के कारण उसी की गणना (उल्लेख) होती है॥१४-१५॥

अतश्च विपरीतत्वात्मभ्रमवत्यपि नैव सा। विवक्ष्यते रसाद्येषु, वीर्यं गुर्वादयो हृतः॥१६॥

रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता—इसीलिए उक्त विशेषताओं से विपरीत होने के कारण रस, विपाक, प्रभाव को 'वीर्य' संज्ञा नहीं दी गयी है। यद्यपि उक्त रस आदि को भी वीर्य कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया। अतएव गुरु आदि आठ गुणों का नाम ही 'वीर्य' है॥१६॥

उष्णं शीतं द्विधैवान्ये वीर्यमाचक्षते—

वीर्य सम्बन्धी अन्य मत—कुछ दूसरे आचार्यों का मत है कि 'वीर्य' केवल दो प्रकार का होता है—१. उष्ण एवं २. शीत। यहाँ 'एवं' शब्द निश्चयात्मक है अर्थात् वीर्य दो ही प्रकार का होता है।

—अपि च। नानात्मकमपि द्रव्यमश्रीषोमो महाबली॥१७॥

व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित्।

वाग्भट का समर्थन—वाग्भटाचार्य का कथन है कि यह मत भी ठीक ही है, क्योंकि अनेक प्रकार के शक्तिशाली द्रव्य भी अग्नि तथा सोम (जल) तत्त्वों का कभी भी उस प्रकार अतिक्रमण नहीं कर पाते, जिस प्रकार व्यक्त एवं अव्यक्त कारण वाला जगत् (संसार) अग्नि एवं सोम का अतिक्रमण नहीं कर सकता॥१७॥

वक्तव्य—ऊपर वीर्य की मान्यता के सम्बन्ध में मत-मतान्तरों की चर्चा की गयी है। चरक का मत है कि 'वीर्य' वह है जिसकी शक्ति से द्रव्य कर्म को पूर्ण करता है और उन्होंने 'कर्म' की परिभाषा