भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]

सूत्रस्थानम्

१४९

इस प्रकार दो हैं—'प्रयत्नादि कर्म त्रेष्टितमुच्यते'। (च.सू. १४९) वीर्य की परिभाषा—'वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुलते किञ्चित्, सर्वा वीर्यकृता क्रिया' ॥ (च.सू. २६६५) इस प्रसंग में सुश्रुतोक्त गद्य का भी अवलोकन करें—सु.सू. ४०१५।

तत्रोष्णं भ्रमतृङ्गलानिस्वेददाहाशुपाकितः ॥ १८ ॥

शर्मं च वातकफयोः करोति, शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥ १९ ॥

वीर्य के लक्षण—वारभट के अनुसार वीर्य दो प्रकार का होता है। उन दोनों में प्रथम उष्णवीर्य के लक्षण—भ्रम, प्यास का लगना, ग्लानि (हर्षशय), स्वेद, दाह, आशुपाकित (शीघ्र पचना—भोजन का तथा व्रण आदि का) एवं वात तथा कफ दोषों का शमन करता है।

शीतवीर्य—ह्लादन (मन को प्रसन्न करने वाला), जीवन, स्तम्भनकारक और रक्त एवं पित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥ १८-१९ ॥

जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥ २० ॥

विपाक का वर्णन—जठराग्नि के संयोग से जब खाये हुए मधुर आदि रस युक्त आहार का पाक होने लगता है, उसके बाद जो आहाररस से अलग रस उत्पन्न होता है, उसे 'विपाक' कहते हैं ॥ २० ॥

वक्तव्य—थीमानों का भोजन प्रायः षड् रस युक्त होता है। इसको समझाने के लिए उक्त श्लोक में 'रसानां' पद दिया है। उसके बाद उस खाये हुए आहार का जब जठराग्नि से पुनः पाक होकर जो दूसरा रस पैदा होता है, उसे 'विपाक' अर्थात् विशिष्ट पाक कहते हैं।

स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। तित्तोषणकघायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ॥ २१ ॥

विपाकज रस-भेद—प्रायः मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थों का विपाक मधुर होता है, अम्ल पदार्थों का विपाक अम्ल ही होता है और तित्त, कटु एवं कषाय रसों का विपाक कटु होता है ॥ २१ ॥

वक्तव्य—उक्त दृष्टि से छः रसों का त्रिविध (मधुर, अम्ल तथा कटु) विपाक होता है, किन्तु सुश्रुत ने दो प्रकार का विपाक माना है। देखें—सु.सू. ४०१०-१२। वे दो विपाक हैं—१. मधुर तथा २. कटु। श्रीवारभट ने 'प्रायः' पद का प्रयोग करके प्राचीन मत को स्वीकार कर अपने मत को भी प्रदर्शित कर दिया है।

कटु-तित्तरस विवाद—प्रायः समाज में देखा जाता है कि मिर्च तीती है एवं नीम कड़वी है, इस प्रकार प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं है। आप ध्यान दें—कटुरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र में घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या उसे कष्ट दे, जो दाह करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, उसे कटुरस कहते हैं'। (शा.सं.पू.खं. २।२०) जैसे—सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली को 'त्रिकटु' या 'कटुत्रय' कहते हैं। इन्हों के गुण लाल मिर्चा में भरपूर पाये जाते हैं, अतः ये सभी द्रव्य कटु कहे जाते हैं। तित्तरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र से कष्ट दे अर्थात् अप्रिय लगे और जो दूसरे रसों के स्वाद को प्रतीत न होने दे, उसे तित्तरस कहते हैं। यह मुख की तित्त्ता को दूर करके लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है'। (शा.सं.पू.खं. २।२१) तित्त रस युक्त द्रव्यों में नीम, कुटकी आदि प्रमुख हैं।

रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्यं शुभाशुभम्। किञ्चिद्वत्सेन कुस्ते कर्म पाकेन चापरम् ॥ २२ ॥

गुणान्तरेण वीर्येण प्रभावेणैव किञ्चन।

रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव—विपाक का फल मूल (आहार) रस के समान ही फलदायक होता है, किन्तु उसमें भी द्रव्य के अपने विशिष्ट लक्षण इस प्रकार होते हैं—कोई द्रव्य दोषशमन रूप कर्म करने के कारण शुभ होता है और कोई द्रव्य दोषप्रकोपन रूप कर्म करने के कारण अशुभ होता है। उसमें भी