भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदय

कोई द्रव्य मधुर आदि रस से कर्म करता है, तो कोई पाक ( विपाक ) से, कोई गुण से, कोई वीर्य से और कोई प्रभाव से ही कर्म करता है ॥ २२ ॥

यद्यद्व्यर्थे रसादीनां बलवत्त्वेन वर्तते ॥ २३ ॥

अभिभूयेतरांस्तत्कारणत्वं प्रपद्यते। विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ॥ २४ ॥

द्रव्य का स्वाभाविक बल—द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव इनमें से जो बलवान् होकर रहता है, वही अपना कर्म करता है और वह दूसरों को दबाकर ( पराजित कर ) शुभ अथवा अशुभ कार्य करने में कारण होता है। परस्पर विपरीत गुणों का संयोग होने के कारण अधिकांश यह देखा जाता है कि बलवान् द्वारा अल्प बल वाला जीत लिया जाता है ॥ २३-२४ ॥

रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तान्यपोहति। बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ २५ ॥

रस आदि का स्वाभाविक बल—रस की समानता होने पर कभी-कभी रस को विपाक जीत लेता है, रस और विपाक को वीर्य जीत लेता है तथा रस-विपाक-वीर्य को प्रभाव जीत लेता है। यह द्रव्यों का अथवा रस आदि का स्वाभाविक बल कहा जाता है ॥ २५ ॥

रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम्। दन्ती रसादौस्तुत्याऽपि चित्रकस्य विरेचनी ॥

मधुकस्य च मृद्वीका, घृत्तं क्षीरस्य दीपनम्।

प्रभाव का वर्णन—रस एवं विपाक आदि की समानता होने पर भी उन-उन द्रव्यों का जो प्रमुख कर्म होता है, उसमें प्रभाव ही कारण है। जैसे—दन्ती ( जमाल्मोटा नामक ) द्रव्य रस तथा विपाक में चित्रक ( चीता ) द्रव्य के समान होती है, फिर भी यह विरेचक ही होता है। इसी प्रकार मुनक्का द्रव्य के रस आदि महूआ के समान होते हैं, तथापि मुनक्का मधुर एवं विरेचक होता है। घृत्त के रस, गुण आदि दूध के समान होते हैं, फिर भी दूध अग्निदीपन होता है ॥ २६ ॥

बक्तव्य—इस विषय को विस्तारपूर्वक समझने के लिए आप च.सू. २६।६७ से ७२ तक के पद्यों का अवलोकन करें। शाङ्कधराचार्य ने भी इस विषय में प्रकाश डाला है अर्थात् द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव रहते हैं, जो प्रयोगानुसार अपना-अपना कार्य करते हैं।

इति सामान्यतः कर्म द्रव्यादीनां, पुनश्च तत् ॥ २७ ॥

विविचित्रप्रत्ययारब्धद्रव्यभेदेन भिद्यते।

द्रव्य आदि के कर्म—इस प्रकार इस अध्याय में द्रव्यों तथा द्रव्यगत रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर दिया गया है। फिर भी द्रव्यों के कर्मों में अनेक प्रकार के भेद देखे जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य में पञ्चमहाभूतों के लक्षण ही उसमें मूल कारण होते हैं। प्रत्येक द्रव्य की रचना में पञ्चमहाभूतों का संयोग होता है, किन्तु यह संयोग सबमें भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है; अतएव प्रत्येक द्रव्य एक-दूसरे द्रव्य से भिन्न होता है ॥ २७ ॥

स्वादुगुरुश्च गोधूतोऽवातजिदवातकृद्यवः ॥ २८ ॥

उष्ण मत्स्याः पयः शीतं कदुः सिंहो न शूकरः।

इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने द्रव्यादिविज्ञानीयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ १ ॥

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भिन्नता के उदाहरण—गोहूँ तथा जौ ये दोनों द्रव्य स्वाद में मधुर तथा गुरु होने पर भी गोहूँ वातविकार का शमन करता है और जौ वातकारक होता है। मत्स्यमांस स्वादु रसयुक्त तथा गुरु गुणयुक्त होने पर भी