अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]
सूत्रस्थानम्
१५१
उष्ण कहा गया है और उसी के समान रस तथा गुण से युक्त दूध शीतवीर्य होता है। इसी प्रकार सिंह तथा सूअर का मांस मधुर एवं गुरु होता है, परन्तु विपाक की दृष्टि से सिंह का मांस कटु तथा सूअर का मांस मधुर होता है॥ २८॥
वक्तव्य —उक्त उदाहरणों का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक द्रव्य भले ही वह स्थावर अथवा जंगम भेद से किसी प्रकार का भी हो, वह विचित्र कारणों के विचित्र संयोग से उत्पन्न होता है। फलतः प्रत्येक के रस-गुण आदि समान होने पर भी उस-उस के वीर्य, विपाक तथा प्रभाव परस्पर भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। फिर भी हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि सभी द्रव्य पाञ्चभौतिक होते हैं। यही कारण है कि ‘प्रभाव’ को अचिन्त्य शक्ति वाला कहा एवं माना गया है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्रव्यादिविज्ञानीय नामक नवौ अध्याय समाप्त ॥ ९ ॥
—❧❧❧—