भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः

अथातो रसभेदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब यहाँ से हम रसभेदीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले नवें अध्याय के १२वें श्लोक में 'रसान् भेदरुत्तरत्रोपदेश्यते' ऐसा कहा गया था, तदनुसार प्रस्तुत अध्याय में रसभेदों का वर्णन किया जा रहा है। जीभ द्वारा ग्रहण किये जाने वाले विषय का नाम ही रस है अर्थात् रस की उत्पत्ति का मूल आधार जल एवं पृथिवी है। देखें—च.सू. १।६४। वास्तव में रस के मूलभूत कारण हैं—जल तथा पृथिवी, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति का कारण पृथिवी तत्त्व है। इसी का समर्थन हमें उपनिषद् तथा वैशेषिक दर्शन में मिलता है। यथा—'रसो रसनेन्द्रियग्राहः, पृथिव्युदकवृत्तिः'। इति। और भी देखें—'आपो स्मृताः'। (च.सू. २५।१३) अर्थात् यह पुरुष रसज है, क्योंकि इसकी पुष्टि गर्भकाल में गर्भिणी के आहाररस से होती है और जल रस वाले होते हैं। अष्टांगहृदय में भी कहा गया है—'रसाः स्वाद्वम्ललवणतितोषणकषायकाः। षड्व्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहाः' ॥ (अ.हृ.सू.१।१४) अर्थात् रस छः होते हैं—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तित्त, ५. कटु तथा ६. कषाय। इनका आधार द्रव्य होता है। ये स्वतन्त्र रूप से नहीं पाये जाते। ये यथापूर्वं बलवान् होते हैं। जैसे—कषाय रस से कटुरस बलवान् होता है आदि।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. २६; च.वि. ८; सु.सू. ४२; सु.उ. ६३ तथा अ.सं.सू. १७ एवं १८ में देखें।

क्षमास्मोऽशिक्षमास्मृतेजःखवाव्यमन्यनिलगोनिर्लेः। द्वयोल्बणैः क्रमादूर्तैर्मधुरादिरसोद्भवः ॥ १ ॥

मधुर आदि रसों की उत्पत्ति —दो-दो महाभूतों की प्रधानता के कारण मधुर आदि रसों की उत्पत्ति होती है। यथा—पृथिवी एवं जल तत्त्वों की प्रधानता से मधुररस , अग्नि एवं पृथिवी तत्त्वों की प्रधानता से अम्लरस , जल एवं अग्नि तत्त्वों की प्रधानता से लवणरस , आकाश एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से तित्तरस , अग्नि एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कटुरस तथा पृथिवी एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कषायरस की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥

बक्तव्य —इसी का समर्थन चरक ने भी किया है। देखें—च.सू. २६।४०।

तेषां विद्याद्वसं स्वादुं यो वक्तवमनुलिप्सति। आस्वाद्यमानो देहस्य ह्लादनोऽक्षप्रसादनः ॥ २ ॥

प्रियः पिपीलिकादीनाम्—

मधुररस के लक्षण —उक्त छः रसों में मधुररस वह है, जो मुख को चारों ओर से लीप देता है। उसका स्वाद मिलते ही सम्पूर्ण शरीर का अधिष्ठाता मन प्रसन्न हो जाता है तथा सभी इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जाती हैं। यह रस चिउँती तथा मक्खियों का भी प्रिय होता है ॥ २ ॥

—अम्लः क्षालयते मुखम्। हर्षणो रोमदन्तानामक्षिभ्रुवनिकोचनः ॥ ३ ॥

अम्लरस के लक्षण —अम्ल (खट्टा) रस मुख को भीतर की ओर से मानो घों डालता है। इसे खाने से रोमांच तथा दन्तहर्ष हो जाता है। यह आँखों तथा भौंहों को संकुचित कर देता है ॥ ३ ॥

लवणः स्यन्दयत्यास्यं कपोलगलदाहकृत्।