भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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रसभेदीयाध्यायः १० ]

सूत्रस्थानम्

१५३

लवणरस के लक्षण—लवणरस का सेवन करने से मुख से लालझाब होने लगता है और कपोल तथा गले के भीतरी भाग में जलन पैदा होने लगती है।

तिक्तो विशदयत्यास्यं रसनं प्रतिहन्ति च॥४॥

तिक्तरस के लक्षण—तिक्तरस का सेवन करने से मुख का भीतरी भाग विशद (स्वच्छ) हो जाता है तथा जीभ को कुछ समय के लिए यह अन्य रस ग्रहण करने के अयोग्य कर देता है॥४॥

उद्रेजयति जिह्वायां कूर्वश्चिमिचिमां कटुः। द्रावयत्यक्षिनासास्यं कपोलो दहतीव च॥५॥

कटुरस के लक्षण—कटुरस (सौंठ, मरिच, पीपल या लाल मिर्चा) का सेवन जीभ के अगले भाग को उद्विग्न कर देता है अर्थात् जीभ इसके स्वाद से घबड़ा जाती है। इससे जीभ में चिमचिमाहट होने लगती है। इसका सेवन करने से आँख, नाक तथा मुख से द्राव निकलने लगता है और कपोलों (गालों) में दाह होने लगता है॥५॥

कषायो जडयेज्जिह्वां कण्ठघ्रोतोविबन्धकृत।

कषायरस के लक्षण—कषायरस (हरीतकी, आँवला आदि) का सेवन जीभ को जड़ (अन्य रस के सेवन में कुछ देर के लिए असमर्थ) कर देता है और कण्ठ (गला) के घ्रोतस् को अवरुद्ध कर देता है अर्थात् उसमें ऐंठन पैदा कर देता है।

रसानामिति रूपाणि—

रसों के स्वरूप—यहाँ तक छहों रसों के परिचायक स्वरूपों का वर्णन कर दिया गया है।

—कर्माणि—

रसों के कर्म—अब इसके आगे उक्त रसों के कर्मों का वर्णन किया जायेगा।

—मधुरो रसः॥६॥

आजन्मसात्प्यात् कुरुते धातूनां प्रबलं बलम्। बालवृद्धक्षतक्षीणवर्णकेशेन्द्रियोजसाम्॥७॥

प्रशस्तो बृंहणः कण्ठघः स्तन्यसन्धानकटुहः। आयुष्यो जीवनः स्निग्धः पित्तानिलविषापहः॥

कुरुतेऽत्युपयोगेन स मेदः श्लेष्मजान् गदान्। स्थौल्याग्निसादसन्त्यासभेहगण्डार्बुदादिकात्॥९॥

मधुररस के कर्म—मधुररस माता के दूध के रूप में जन्मकाल से सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल) होने के कारण रस आदि धातुओं को अत्यन्त बलदायक होता है। यह बालक, वृद्ध, क्षत (उरःक्षत आदि), क्षीण (धातुक्षीण), वर्ण, केश, इन्द्रियों तथा ओजस् के लिए हितकारक होता है। यह शरीर को पुष्ट करता है, स्वरयन्त्र के लिए हितकर है, दूध को बढ़ाता है, टूटी अस्थियों को जोड़ता है तथा मध्यसन्धानकारक भी है; गृह (देर में पचने वाला) है, आयुवर्धक है, जीवन है, स्निग्ध है, पित्त, वात तथा विष का नाशक है। इसका अधिक उपयोग करने से यह मेदोरोग तथा कफज रोगों को उत्पन्न करता है। यथा—स्थूलता, मन्दाग्नि, सन्त्यास, प्रमेह, गलगण्ड तथा अर्बुद आदि रोग हो जाते हैं॥६-९॥

अम्लोऽग्निदीपिकृतु स्निग्धो हृद्यः पाचनरोचनः। उष्णवीर्यो हिमस्पर्शः प्रीणनः क्लेदनो लघुः॥

करोति कफपिताम् मृदवातानुलोमनः। सोऽत्यभ्यस्तस्तनोः कुर्याच्छैथिल्यं तिमिरं भ्रमम्॥

कण्डुपाण्डुत्ववीसर्पशोफविस्फोटतुड्वज्जरन् ।

अम्लरस के कर्म—अम्लरस का सेवन अप्रिवर्धक, स्निग्ध, हृदय के लिए हितकर, पाचन, रोचन (रुचिकारक), उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, प्रीणन (तृप्तिकारक), क्लेदकारक तथा लघुपाकी है। यह कफ, पित्त तथा रक्त वर्धक है; प्रतिलोम या मृदु वातदोष का अनुलोमन करता है। इसका अधिक सेवन करने से शरीर में शिथिलता, तिमिर नामक नेत्ररोग, चक्करों का आना, खुजली, पाण्डुरोग, वीसर्प, शोफ (सूजन), विस्फोट (फोड़े, शीतलारोग), प्यास का लगना तथा ज्वररोग को उत्पन्न करता है॥१०-११॥