अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४
अष्टाङ्गहृदये
लवणः स्तम्भसङ्गतबन्धविधमापनोऽग्रियुक्तं ॥ १२ ॥
स्नेहनः स्वेदनस्तीक्ष्णो रोचनश्छेदभेदकृतं । सोऽतियुक्तोऽग्रपवनं खलितं पलितं बलिम् ॥ १३ ॥
तृप्त्युक्तविषवीसर्पान् जनयेत् क्षपयेद्बलम् ।
लवणरस के कर्म—लवणरस का सेवन स्तम्भ ( जकड़न ) तथा संघातबन्ध ( मल-मूत्र की रूकावट ) विधमापक अर्थात् विनाशक है तथा अग्नि ( जठराग्नि ) की वृद्धि करता है। यह स्नेहन तथा स्वेदन है, तीक्ष्ण गुणयुक्त है, रुचिकारक, मांस का छेदक एवं मल का भेदक है। इसे अधिक खाने से वातरक्त, खलित तथा पलित नामक कपालरोगों, बली ( सुरियों ), प्यास, कुष्ठ, विष एवं वीसर्प रोगों को पैदा करता है और बल को क्षीण करता है ॥ १२-१३ ॥
बन्धव्य—चरक ने लवण के अधिक उपयोग का निषेध किया है। देखें—च.वि. १।१५। रक्तविकारों में इसको सेवन करने का निषेध है। यह बदे हुए मांस का छेदक है और व्रणशोथ का भेदक भी है तथा सभी रसों को उजागर ( प्रकट ) करने वाला भी है।
तिक्तः स्वयमरोचिष्णुररुचिं कुमितुद्बिषम् ॥ १४ ॥
कुष्ठमूच्छाज्वरोत्प्लेशदाहपित्तकफान् जयेत् । क्लेदमेदोवसामज्जशकृन्मूत्रोपशोषणः ॥ १५ ॥
लघुर्मध्यो हिमो रूक्षः स्तन्यकण्ठविशोधनः । धातुक्षयानिलव्याधीनतियोगात्करोति सः ॥ १६ ॥
तिक्तरस के कर्म—तिक्तरस यद्यपि स्वयं अरुचिकर होता है, परन्तु यह ज्वर आदि के कारण उत्पन्न अरुचि को दूर करता है। यह कुमिरोग, तुष्णा, विष, कुष्ठ, मूच्छा, ज्वर, उत्प्लेश ( जी मिचलाना ), दाह ( जलन ), पित्तज तथा कफज विकारों का विनाश करता है। क्लेद ( सड़न ), मेदस, वसा, पुरीष ( मल ) और मूत्र को सुखाता है। यह पाक में लघु, वृद्धिवर्धक, शीतवीर्य, रूक्ष, दूध को शुद्ध करने वाला तथा गले के विकारों का शोधक है। इसका अधिक सेवन करने से धातुक्षय तथा वातव्याधियों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ १४-१६ ॥
कटूर्णलामयोर्यदकृष्णालसकशोफजित् । व्रणावसादनः स्नेहमेदःक्लेदोपशोषणः ॥ १७ ॥
दीपनः पाचनो रूच्यः शोधनोऽग्रस्य शोषणः । छिन्नति बन्धान् द्रोतांसि विवृणोति कफापहः ॥
कुस्ते सोऽतियोगेन तुष्णां शुक्लबलक्षयम् । मूच्छामाकुञ्जन् कम्पं कटिपृष्ठादिवु ब्यथाम् ॥ १९ ॥
कटूरस के कर्म—कटूरस ग्लरोग, उदर ( कोठ, शीतपित्त ), कुष्ठ, असलक ( आमविकार ) एवं शोथरोग का विनाश करता है। व्रणशोथ की कठोरता को शिथिल ( ढीला ) कर देता है; स्नेह, मेदस एवं क्लेद ( सड़न ) को सुखाता है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भोजन को पचाता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है; मुख, नासिका, नेत्र एवं शिर का स्नावण एवं रेचन विधियों से शोधन करता है, खाये हुए अन्न को सुखाता है अतएव खाने के बाद प्यास लगती है, अतिसारनाशक है, मल के बन्धन को काटता है, द्रोतों को फैलाता है तथा कफ का नाशक है। इस रस का अधिक प्रयोग करने से प्यास अधिक लगती है, शुक्ल एवं बल का क्षय करता है। मूच्छा ( बेहोशी ), शरीर के अवयवों तथा सिराओं में सिकुड़न, कैंपकैपी, कमर तथा पीठ में पीड़ा पैदा करता है ॥ १७-१९ ॥
कषायः पित्तकफहा गुरुप्रविशोधनः । पीडनो रोपणः शीतः क्लेदमेदोविशोषणः ॥ २० ॥
आमसस्तम्भनो ग्राही रूक्षोऽति त्वषप्रसादनः । करोति शीलितः सोऽति विष्टम्ब्याध्यानहृदुजः ॥
तृट्काश्यपौरुषप्रशस्रोतोरोधमलग्रहान् ।
कषायरस के कर्म—कषायरस पित्त तथा कफ को शान्त करता है, गुरु है, रक्त को शुद्ध करता है। कषायरस-प्रधान द्रव्यों का लेप लगाने से यह पके फोड़े का पीडन करता है और पूय निकल जाने पर रोपण करता है। यह शीतीवीर्य है, सड़न तथा मेदोधातु को सुखाता है, आमदोष को रोकता है तथा