भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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रसभेदीयाध्यायः १० ]

सूत्रस्थानम्

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मल को बाँधता है। यह अत्यन्त रूक्ष होता है, त्वचा को स्वच्छ करता है। इसका अधिक सेवन करने से बिष्टम्भ, आधमान ( अफरा ), हृदय में पीड़ा, प्यास, कुशता, शुक्रधातु का नाश, स्त्रोतों में रुकावट तथा मल-मूत्र में रुकावट होती है॥ २०-२१ ॥

घृतहेमगुडाक्षोडमोचचोरपुरुषकम् ॥ २२ ॥

अभीरूचिरायनसरराजानबलात्रयम्। मेदे चतस्रः पर्णिन्यो जीवन्ती जीवकर्पभो॥ २३ ॥

मधूकं मधुकं बिम्बी विदारी श्रावणीयुगम्। क्षीरशुक्ला तुगाक्षीरी क्षीरिण्यो काश्मरी सहे॥ २४ ॥

क्षीरक्षुगोक्षुरक्षीद्राक्षादिर्मधुरो गणः।

मधुरस्कन्ध के द्रव्य—घृत, सोना, गुड़, अखरोट, केला, चोच ( दालचीनी, नारियल, तालफल-वैद्यकशब्दसिन्धु ), पुरुषक ( फालसा ), अभीर ( शतावरी ), काकोली, कटहल, चिरौजी, बलात्रय ( बला, अतिबला, नागबला ), दो मेदा ( मेदा, महामेदा ), चारपर्णिनी ( शालपर्णी, पुष्टपर्णी, माषपर्णी, मृदुपर्णी ), जीवन्ती, जीवक, ऋषभक, महुआ, मुलेठी, बिम्बी ( कुन्दरू ), विदारीकन्द, श्रावणीयुगल ( मुण्डी, बड़ीमुण्डी ), क्षीरशुक्ला, वंशलोचन, दो क्षीरिणी ( छोटी दुद्वी, बड़ी दुद्वी ), गम्भार, दो सहा ( सहा, महासहा ), दूध, ईख, गोखरू, मधु, मुनक्का आदि—ये सब द्रव्य मधुरस्कन्ध के हैं॥ २२-२४ ॥

अम्लो धात्रीफलास्त्रीकामातुलुङ्गारुवेतसम्॥ २५ ॥

दाडिमं रजतं तक्रं चूक्रं पालेवतं दधि। आम्रमात्रातकं भव्यं कपित्थं करमर्दकम्॥ २६ ॥

अम्लस्कन्ध के द्रव्य—औवला, इमली, मातुलिंग ( प्रायः सभी नीबू विशेषकर बिजोरानीबू ), अम्लवेत, दाडिम, रजत ( चाँदी ), तक्र ( मठा ), चूक्र, पालेवत, दही, आम, आमड़ा, भव्य ( कमरख ), कैथ तथा करमर्दक ( करौंदा )॥ २५-२६ ॥

वरं सौवर्चलं कृष्णं बिडं सामुद्रमौद्रिदम्। रोमकं पांसुजं शीसं क्षारश्च लवणो गणः॥ २७ ॥

लवणस्कन्ध के द्रव्य—संधानमक, सोंचरनमक, कालानमक, विडलवण ( नौसादर ), समुद्रानमक, औद्रिद ( रेह ) नमक, रोमक ( साँभर ) नमक, पांसुज ( धूल या मिट्टी का ) नमक, सीसाधातु तथा सभी क्षार॥ २७ ॥

तिक्तः पटोली त्रायन्ती बालकोशीरचन्दनम्। भूनिम्बनिम्बकटुकातगरागुरुवत्सकम्॥ २८ ॥

नक्तमालद्रिजनीमुस्तमूर्वाटुरुषकम्। पाठापामार्गकांस्यायोगूड्वीधन्व्यासकम्॥ २९ ॥

पञ्चमूलं महद्व्याघ्रयो विशालाऽतिविषा वचा।

तिक्तस्कन्ध के द्रव्य—तीता परवल, बायमाणा, नेत्रबाला, खस, चन्दन, चिरायता, नीम, कुटकी, तगर, अगह, कुटज, नक्तमाल ( करंज ), दो हल्दी ( दारुहल्दी, हल्दी ), नागरमोथा, मूर्वा, अडूसा, पाठा, अपामार्ग, कांस्यधातु, लोहधातु, गुरुच, धमासा, बृहत्पञ्चमूल ( बिल्ब, सोनापाठा, गम्भारी, पाङ्ल, अरणी ), वनभण्टा, कण्टकारी, विशाला ( इन्द्रायण ), अतीस तथा बालवच॥ २८-२९ ॥

कटुको हिङ्गुमरिचकूमिजित्यञ्चकोलकम्॥ ३० ॥

कूठेराद्या हरितकाः पित्तं मूत्रमरुष्करम्।

कटुस्कन्ध के द्रव्य—हिंग, कालीमिर्च, वायविडंग, पञ्चकोल ( पिप्ली, पीपलामूल, चव्य, चित्रक, नागर = सोंठ ), कुठेरक आदि, हरितक ( देखें—अ.हृ.सू. ६।१०६ ), पित्त ( मांस खाने वालों का प्रिय पदार्थ, जो मृग, बकरा आदि में पाया जाता है, वह अवयव-विशेष ), गोमूत्र आदि सभी ग्राह्य मूत्र और अरुष्कर ( भिलावा )॥ ३० ॥

वर्गः कषायः पथ्याऽक्षं शिरीषः खदिरौ मधु॥ ३१ ॥

कदम्बोदुम्बरं मुक्ताप्रवालोजनगैरिकम्। बालं कपित्थं खजूरं बिसपद्योत्पलादि च॥ ३२ ॥

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