अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
कषायस्कन्ध के द्रव्य—हरड, बहेड़ा, सिरौष, खदिर ( बबूल, कीकर आदि ), मधु, कदम्ब, गूजर, मोती, मूंगा, अंजन, गेरु, कच्चा कैथ, कच्चा खजूर, बिस ( कमलकन्द ), कमल तथा उत्पल ( कमलभेद ) आदि ॥ ३१-३२ ॥
मधुर श्लेषलं प्रायो जीर्णोच्चालियवादृते । मुद्राद्रोधूमतः शौद्रास्तिताया जाङ्गलमिषात् ॥ ३३ ॥
मधुररस का विशिष्ट वर्णन—प्रायः सभी मधुर रस वाले द्रव्य कफकारक होते हैं; केवल पुराने शालिघान्य, जी, मूंग, गेहूँ, मधु, सफेद मिश्री तथा जांगल देश के प्राणियों के मांस को छोड़कर ॥ ३३ ॥
प्रायोऽम्लं पित्तजननं दाडिमामलकादृते ।
अम्लरस का विशिष्ट वर्णन—अनार ( यहाँ अनार शब्द से पहाड़ों में पाये जाने वाले खट्टे दाड़िमों की ओर वाग्भट का संकेत है ) एवं आँवला को छोड़कर प्रायः सभी अम्लद्रव्य पित्तकारक होते हैं ।
अपथ्यं लवणं प्रायश्चक्षुषोऽन्यत्र सैन्धवात् ॥ ३४ ॥
लवणरस का विशिष्ट वर्णन—संधानमक के अतिरिक्त सभी नमक नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं ॥ ३४ ॥
तिक्तं कटु च भूयिष्ठमवृष्यं वातकोपनम् । ऋतेऽमृतापटोलीभ्यां शुण्टीकृष्णारसोन्नतः ॥ ३५ ॥
तिक्त-कटुरसों का विशिष्ट वर्णन—गुरुत्व तथा तिक्त परबल के बिना प्रायः सभी तिक्त द्रव्य अवृष्य ( बीर्यनाशक ) तथा वातकारक होते हैं । सोंठ, पीपल, लहसुन को छोड़कर प्रायः सभी कटु द्रव्य अवृष्य तथा वातकारक होते हैं ॥ ३५ ॥
कषायं प्रायशः शीतं स्तम्भनं चाभ्यां विना ।
कषायरस का विशिष्ट वर्णन—हरड को छोड़कर प्रायः सभी कषाय द्रव्य शीतवीर्य तथा स्तम्भन-कारक होते हैं ।
रसाः कटुम्ललवणा वीर्यणोष्णा यथोत्तरम् ॥ ३६ ॥
तिक्तः कषायो मधुरस्तद्वेद च शीतलाः । तिक्तः कटुः कषायश्च रूक्षा बद्धमलास्तथा ॥ ३७ ॥
पट्टुम्लमधुराः स्निग्धाः सृष्टविष्णूत्रामाहाः । पटोः कषायस्तस्माच्च मधुरः परमं गुरुः ॥ ३८ ॥
लघुरम्लः कटुस्तस्मात् तस्मादपि च तिक्तकः ।
रसों के द्विविध बीर्य—कटु, अम्ल तथा लवण रस बीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक उष्ण होते हैं और तिक्त, कषाय तथा मधुर रस बीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक शीत होते हैं ।
रसों के रूक्ष एवं स्निग्ध गुण—तिक्त, कटु तथा कषाय रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर रूक्ष गुण वाले तथा मल को बांधने वाले होते हैं । लवण, अम्ल एवं मधुर रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर स्निग्ध गुण वाले तथा मल, मूत्र एवं अपानवायु को निकालने वाले होते हैं ।
रसों के गुरु एवं लघु गुण—लवणरस से कषायरस से कषायरस से मधुररस गुण में अधिक गुरु होता है । अम्लरस लघु होता है, इससे अधिक लघु कटुरस होता है और इससे भी अधिक लघु होता है तिक्तरस ॥ ३६-३८ ॥
वक्तव्य—महर्षियों की विचारदृष्टि अत्यन्त सूक्ष्म तथा व्यापक होती थी, अतएव उन्हें विविधता कदम-कदम पर दिखलायी देती थी और अपवाद भी, अस्तु । यहाँ तक के विवेचन से हमने रसों के गुण, बीर्य, विपाक तथा प्रभाव को समझा किन्तु इनके विपरीत भी कई स्थल ऐसे मिलते हैं जो उक्त सिद्धान्तों के विपरीत देखे जाते हैं । जैसे ऊपर रस का विवेचन किया गया है, वैसा ही विस्तृत क्षेत्र विपाक का भी है । इन गुणियों को सुलझाने के लिए च.सू. २६ का अध्ययन एवं मनन करें ।