अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरसभेदीयाध्यायः १० ]
सूत्रस्थानम्
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संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥ ३९ ॥
रसानां योगिकत्वेन यथास्थूलं विभज्यते ।
रसों के ६३ भेद—मधुर आदि छः रसों के परस्पर ( एक-दूसरे के साथ ) संयोग करने पर इनके स्थूल रूप से ५७ भेद होते हैं। पुनः इनमें छः रसों को जोड़ देने पर इनकी कल्पना दोषों को आधार मानकर करने से ६३ प्रकार की हो जाती है। इसे शास्त्रकार स्थूल गणना मानते हैं ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—अ.हृ.सू. १२ में देखें, वहाँ ६२ प्रकार के दोषभेदों का वर्णन किया गया है।
एकैकहीनास्तान् पञ्चदश यान्ति रसा द्विके ॥ ४० ॥
त्रिके स्वादुर्दशात्मः षट् त्रीन् पटुस्तित्त एककम् । चतुष्केषु दश स्वादुश्चतुरोऽम्लः पटुः सकृत ॥
पञ्चकेष्वेकमेवात्मो मधुरः पञ्च सेवते । द्रव्यमेकं षडास्वादमसयुक्ताश्च षड्रसाः ॥ ४१ ॥
दो-दो रसों के १५ योग—एक-एक रस को कम करते हुए पाँच भागों में दो-दो रसों के संयोग से इस प्रकार इनके १५ भेद होते हैं—मधुररस के साथ अम्ल आदि ५ रसों के संयोग से ५, अम्लरस के साथ लवण आदि ४ रसों के संयोग से ४, लवणरस के साथ तित्त आदि ३ रसों के संयोग से ३, तित्तरस के साथ कटु आदि २ रसों के संयोग से २ तथा कटुरस के साथ कषाय १ रस के संयोग से १ ( योग १५ ); त्रिक ( तीन-तीन ) रसों के संयोग से इनके २० भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ६, लवणरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ३ और तित्तरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १ ( योग २० ); चतुष्क ( चार-चार ) रसों के संयोग से इनके १५ भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से ४ और लवणरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १ ( योग १५ ); पञ्चक ( पाँच-पाँच ) रसों के संयोग से इनके छः भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से ५ और अम्लरस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से १ ( योग ६ ); षट्क ( छः ) रसों के संयोग से केवल एक भेद इस प्रकार होता है—मधुररस के साथ अन्य पाँच रसों के संयोग से १ और असंयुक्त अर्थात् अलग-अलग मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु एवं कषाय नामक रस ६; इस प्रकार इनका कुल ६३ योग होता है ॥ ४०-४१ ॥
षट् पञ्चकाः, षट् च पुष्परसाः स्युश्चतुर्द्विकौ पञ्चदशप्रकारौ ।
भेदास्त्यत्रिकां विशतिरकेमेव द्रव्यं षडास्वादमिति त्रिषष्टिः ॥ ४३ ॥
विषयोपसंहार—पाँच-पाँच रसों के योग ६, अलग-अलग रस ६, चतुष्क रसयोग १५, द्विक रस योग १५, त्रिक रसयोग २० तथा षट्क रसयोग १—इस प्रकार कुल ६३ प्रकार के भेद होते हैं ॥ ४३ ॥
वक्तव्य—उक्त ६३ प्रकार के रससंयोगों का यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है—
पंचक रससंयोग के ६ भेद—१. अम्ल, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुररसहीन ), २. मधुर, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( अम्लरसहीन ), ३. मधुर, अम्ल, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( लवणरसहीन ), ४. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग ( तित्तरसहीन ), ५. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग ( कटुरसहीन ), ६. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग ( कषायरसहीन );
पृथक् रसों की गणना ६—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तित्त, ५. कटु तथा ६. कषाय;
चतुष्क रससंयोग के १५ भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त रसों का संयोग ( कटुकषायरसहीन ); २. मधुर, अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग ( तित्त-कषायरसहीन ); ३. मधुर, अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग ( तित्त-कटुरसहीन ); ४. मधुर, अम्ल, तित्त, कटु रसों का संयोग ( लवण-कषायरसहीन );