अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
५. मधुर, अम्ल, तित्त, कषाय रसों का संयोग (लवण-कटुरसहीन); ६. मधुर, अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग (लवण-तित्तरसहीन); ७. मधुर, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग (अम्ल-कषायरसहीन); ८. मधुर, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-कटुरसहीन); ९. मधुर, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-तित्तरसहीन); १०. मधुर, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-लवणरसहीन); ११. अम्ल, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग (मधुर-कषायरसहीन); १२. अम्ल, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग (मधुर-कटुरसहीन); १३. अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-तित्तरसहीन); १४. अम्ल, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-लवणरसहीन) और १५. लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-अम्लरसहीन)।
द्विक रससंयोग के १५ भेद—१. मधुर तथा अम्ल रस का संयोग, २. मधुर तथा लवण रस का संयोग, ३. मधुर तथा तित्त रस का संयोग, ४. मधुर तथा कटु रस का संयोग, ५. मधुर तथा कषाय रस का संयोग, ६. अम्ल तथा लवण रस का संयोग, ७. अम्ल तथा तित्त रस का संयोग, ८. अम्ल तथा कटु रस का संयोग, ९. अम्ल तथा कषाय रस का संयोग, १०. लवण तथा तित्त रस का संयोग, ११. लवण तथा कटु रस का संयोग, १२. लवण तथा कषाय रस का संयोग, १३. तित्त तथा कटु रस का संयोग, १४. तित्त तथा कषाय रस का संयोग और १५. कटु तथा कषाय रस का संयोग।
त्रिक रससंयोग के २० भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण रसों का संयोग; २. मधुर, अम्ल, तित्त रसों का संयोग; ३. मधुर, अम्ल, कटु रसों का संयोग; ४. मधुर, अम्ल, कषाय रसों का संयोग; ५. मधुर, लवण, तित्त रसों का संयोग; ६. मधुर, लवण, कटु रसों का संयोग; ७. मधुर, लवण, कषाय रसों का संयोग; ८. मधुर, तित्त, कटु रसों का संयोग; ९. मधुर, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १०. मधुर, कटु, कषाय रसों का संयोग; ११. अम्ल, लवण, तित्त रसों का संयोग; १२. अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग; १३. अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग; १४. अम्ल, तित्त, कटु रसों का संयोग; १५. अम्ल, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १६. अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग; १७. लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग; १८. लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १९. लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग और २०. तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग।
षडस्वाद रससंयोग का १ भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग। इस प्रकार ६ + ६ + १५ + १५ + २० + १ = रसकल्पना के ६३ भेद किये गये हैं। इनका उपयोग चिकित्सा काल में किया जाता है।
ते रसानुरसतो रसभेदास्तारतम्यपरिकल्पनया च।
सम्भवन्ति गणानां समतीता दोषभेषजवशादुपयोज्याः ॥ ४४ ॥
इति श्रौवेद्यपतिसिंहगुप्तसुनुश्रीमद्रागभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने रसभेदीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
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रससंयोगों के असंख्य भेद—वे (उपर्युक्त) रसभेद रस तथा अनुरस के भेद से एवं तर-तम भाव की परिकल्पना से असंख्य हो जाते हैं। तथापि उन रससंयोग-भेदों का प्रयोग बात आदि दोषों का तथा हरीतकी आदि औषध-द्रव्यों के रस-अनुरस आदि का विचार करके यथोचित प्रकार से उपयोग करना चाहिए ॥ ४४ ॥
बक्तव्यम्—रसानुरस—प्रत्येक द्रव्य में एक प्रधान रस तथा एकाधिक अनुरस रहते ही हैं। जैसे—हरीतकी का प्रधान रस कषाय है, शेष लवण रहित चार रस उसके अनुरस हैं। यथा—‘हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम्’। और भी कहा गया है—‘द्रव्यमेकरसं नास्ति, न रोगोऽप्येकदोषजः’। अस्तु।