अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमात्राशितौषध्यायः ८ ]
सूत्रस्थानम्
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(दही का पानी), मठा, खट्टी काँजी है। कुश (दुबले) पुरुषों को पूए करने के लिए सुरा अनुपान के रूप में दें। स्थूल पुरुषों को कुश करने के लिए मधु मिला हुआ जल पीने के लिए दें। शोष (क्षय) रोग में मांसरस (शोरवा) पीने के लिए दें। मांस खाने के बाद तथा अग्नि के मन्द पड़ जाने पर अनुपान के रूप में मद्य पीने को दें। रोग, औषधसेवन, रास्ता चलने से थकने पर, भाषण, मैथुन (स्त्रीसहवास), लंघन, धूप लगाना, काम करने से क्षीण, बालक तथा वृद्ध—इत सबको अनुपान में दूध दें। यह इनके लिए अमृत के समान हितकर होता है ॥४७-५०॥
विपरीतं यदत्रस्य गुणैः स्यादविरोधि च। अनुपानं समासेन, सर्वदा तत्प्रशस्यते ॥५१॥
उत्तम अनुपान —संक्षेप में उत्तम अनुपान का यह सूत्र है—जो अन्न (आहार) के गुणों से विपरीत गुणों वाला हो, किन्तु उन आहार-द्रव्यों का विरोधी न हो, वह अनुपान सदा प्रशंसनीय माना जाता है ॥५१॥
वक्तव्य —विपरीत तथा विरोधी का अन्तर आप इस प्रकार समझें—शीतल आहारों के साथ उष्ण और उष्ण आहारों के साथ शीत अनुपान उत्तम होता है। इसी प्रकार रूक्ष आहार-द्रव्यों के साथ स्निग्ध और स्निग्ध के साथ रूक्ष पेय अनुपान में हितकर होते हैं।
अनुपानं करोत्यूर्जां तृप्तिं व्याप्तिं दृढाङ्गताम्। अन्नसङ्घातशैथिल्यविकिल्तिजरणानि च ॥५२॥
अनुपान-सेवन का फल —उचित अनुपान का सेवन ऊर्जा (बल एवं दीर्घ जीवन), तृप्ति, आहाररस को फैलाना, अंगों को दृढ़ करना, खाने गये अन्नसमूह को ढीला करना, उसे गीला करना तथा उसे पचाना—इन कार्यों को करता है ॥५२॥
वक्तव्य —सुश्रुत-सूत्रस्थान अध्याय ४६।४३४ से ४४५ में एक अनुपानवर्ग दिया गया है। इसका परिशीलन अवश्य कर लें और इस श्लोक को याद कर लें—‘सर्वेषामनुपानानां मोहेन्द्रं तोयमुत्तमम्। सात्यं वा यस्य यतोयं तत् तस्मै हितमुच्यते ॥ उष्णं वाते कफे तोयं पित्रे रक्ते च शीतलम् ॥ (सु.सू. ४६।४३४)
नोर्ध्वजत्रगदग्धासकासोरःक्षतपीनसे। गीतभाष्यप्रसङ्गे च स्वरभेदे च तद्वितम ॥५३॥
१. अनुपान का निषेध —जत्रु (ग्रीवास्थि या हंसुली) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों (मुख, कर्ण, नेत्र तथा शिर के रोगों) में, श्वास, कास, उरःक्षत, पीनस (नासारोग) में, गाने, भाषण आदि में तथा स्वरभेद में अनुपान (पेय पदार्थ) हितकर नहीं होते हैं ॥५३॥
प्रकिलन्नदेहेमहाक्षिगलरोगब्रणातुराः। पानं त्यजेयुः—
२. अनुपान का निषेध —जिनके शरीर में क्लिन्नता (कहीं भी गलन या सङ्ग) हो, जो प्रमेहरोग, नेत्ररोग, गलरोग तथा व्रणरोग से पीड़ित हों, ये भी उक्त अनुपानों का सेवन न करें।
—सर्वश्च भाष्याध्वशयनं त्यजेत् ॥५४॥
पीत्वा, भुक्त्वाऽऽतपं वहिं यानं फलवनबाहनम्।
३. अनुपान का निषेध —सभी स्वस्थ अथवा रोगी अनुपान (पेय पदार्थ) का सेवन करके भाषण, रास्ता चलना तथा दिन में सोना छोड़ दें। खाना खाकर एवं पानी पीकर धूप सेंकना, आग सेंकना, यान (सवारी द्वारा यात्रा करना), कुदना-फाँदना तथा घोड़ा आदि की सवारी न करें ॥५४॥
वक्तव्य —चरक ने (सूत्रस्थान २७।३२७-३२८ में) उक्त विषय का इस प्रकार वर्णन किया है—‘भोजन के बाद पिया हुआ जल कण्ठ तथा उरःप्रदेश में स्थित आहार के स्नेह को वहीं रोक कर उसके न पचने से दोष को बढ़ाने में समर्थ हो जाता है। यहाँ ‘हत्वा’ का अर्थ ‘प्राप्त होकर’ यह भी हो सकता है, क्योंकि ‘हल घातु’ का अर्थ हिंसा और गति भी है। अर्थात् अनुपान के रूप में पिया गया जल आहार के स्नेह को प्राप्त होकर तथा आमाशय को दूषित कर दोष को बढ़ा देता है। इस सन्दर्भ में सु.सू. ४६ का अनुपानवर्ग भी देखें।