अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
मात्राशितौषध्यायः ८ ]
सूत्रस्थानम्
१४३
(दही का पानी), मठा, खट्टी काँजी है। कुश (दुबले) पुरुषों को पूए करने के लिए सुरा अनुपान के रूप में दें। स्थूल पुरुषों को कुश करने के लिए मधु मिला हुआ जल पीने के लिए दें। शोष (क्षय) रोग में मांसरस (शोरवा) पीने के लिए दें। मांस खाने के बाद तथा अग्नि के मन्द पड़ जाने पर अनुपान के रूप में मद्य पीने को दें। रोग, औषधसेवन, रास्ता चलने से थकने पर, भाषण, मैथुन (स्त्रीसहवास), लंघन, धूप लगाना, काम करने से क्षीण, बालक तथा वृद्ध—इत सबको अनुपान में दूध दें। यह इनके लिए अमृत के समान हितकर होता है ॥४७-५०॥
विपरीतं यदत्रस्य गुणैः स्यादविरोधि च। अनुपानं समासेन, सर्वदा तत्प्रशस्यते ॥५१॥
उत्तम अनुपान —संक्षेप में उत्तम अनुपान का यह सूत्र है—जो अन्न (आहार) के गुणों से विपरीत गुणों वाला हो, किन्तु उन आहार-द्रव्यों का विरोधी न हो, वह अनुपान सदा प्रशंसनीय माना जाता है ॥५१॥
वक्तव्य —विपरीत तथा विरोधी का अन्तर आप इस प्रकार समझें—शीतल आहारों के साथ उष्ण और उष्ण आहारों के साथ शीत अनुपान उत्तम होता है। इसी प्रकार रूक्ष आहार-द्रव्यों के साथ स्निग्ध और स्निग्ध के साथ रूक्ष पेय अनुपान में हितकर होते हैं।
अनुपानं करोत्यूर्जां तृप्तिं व्याप्तिं दृढाङ्गताम्। अन्नसङ्घातशैथिल्यविकिल्तिजरणानि च ॥५२॥
अनुपान-सेवन का फल —उचित अनुपान का सेवन ऊर्जा (बल एवं दीर्घ जीवन), तृप्ति, आहाररस को फैलाना, अंगों को दृढ़ करना, खाने गये अन्नसमूह को ढीला करना, उसे गीला करना तथा उसे पचाना—इन कार्यों को करता है ॥५२॥
वक्तव्य —सुश्रुत-सूत्रस्थान अध्याय ४६।४३४ से ४४५ में एक अनुपानवर्ग दिया गया है। इसका परिशीलन अवश्य कर लें और इस श्लोक को याद कर लें—‘सर्वेषामनुपानानां मोहेन्द्रं तोयमुत्तमम्। सात्यं वा यस्य यतोयं तत् तस्मै हितमुच्यते ॥ उष्णं वाते कफे तोयं पित्रे रक्ते च शीतलम् ॥ (सु.सू. ४६।४३४)
नोर्ध्वजत्रगदग्धासकासोरःक्षतपीनसे। गीतभाष्यप्रसङ्गे च स्वरभेदे च तद्वितम ॥५३॥
१. अनुपान का निषेध —जत्रु (ग्रीवास्थि या हंसुली) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों (मुख, कर्ण, नेत्र तथा शिर के रोगों) में, श्वास, कास, उरःक्षत, पीनस (नासारोग) में, गाने, भाषण आदि में तथा स्वरभेद में अनुपान (पेय पदार्थ) हितकर नहीं होते हैं ॥५३॥
प्रकिलन्नदेहेमहाक्षिगलरोगब्रणातुराः। पानं त्यजेयुः—
२. अनुपान का निषेध —जिनके शरीर में क्लिन्नता (कहीं भी गलन या सङ्ग) हो, जो प्रमेहरोग, नेत्ररोग, गलरोग तथा व्रणरोग से पीड़ित हों, ये भी उक्त अनुपानों का सेवन न करें।
—सर्वश्च भाष्याध्वशयनं त्यजेत् ॥५४॥
पीत्वा, भुक्त्वाऽऽतपं वहिं यानं फलवनबाहनम्।
३. अनुपान का निषेध —सभी स्वस्थ अथवा रोगी अनुपान (पेय पदार्थ) का सेवन करके भाषण, रास्ता चलना तथा दिन में सोना छोड़ दें। खाना खाकर एवं पानी पीकर धूप सेंकना, आग सेंकना, यान (सवारी द्वारा यात्रा करना), कुदना-फाँदना तथा घोड़ा आदि की सवारी न करें ॥५४॥
वक्तव्य —चरक ने (सूत्रस्थान २७।३२७-३२८ में) उक्त विषय का इस प्रकार वर्णन किया है—‘भोजन के बाद पिया हुआ जल कण्ठ तथा उरःप्रदेश में स्थित आहार के स्नेह को वहीं रोक कर उसके न पचने से दोष को बढ़ाने में समर्थ हो जाता है। यहाँ ‘हत्वा’ का अर्थ ‘प्राप्त होकर’ यह भी हो सकता है, क्योंकि ‘हल घातु’ का अर्थ हिंसा और गति भी है। अर्थात् अनुपान के रूप में पिया गया जल आहार के स्नेह को प्राप्त होकर तथा आमाशय को दूषित कर दोष को बढ़ा देता है। इस सन्दर्भ में सु.सू. ४६ का अनुपानवर्ग भी देखें।
१४४
अष्टाङ्गहृदये
प्रसृष्टे विष्णून्ने हृदि सुविमले दोषे स्वपथगे विशुद्धे चोद्भारे क्षुद्रपगमने वातेऽनुसरति।
तथाऽग्रावुद्व्रित्ते विशदकरणे देहे च सुलघौ
प्रयुज्जीताहारं विधिनियमितं, कालः स हि मतः ॥ ५५ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने मात्राशित्तौयो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
भोजन-समय का निर्देश —मल-मूत्र के भलीभाँति निकल जाने पर, हृदय के शुद्ध अतएव विमल हो जाने पर, वात आदि दोषों के अपने-अपने मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाने पर, शुद्ध ( दोषरहित ) डकार के आने पर, भूख के लगने पर, अपानवायु के अनुकूल ढंग से निकलने पर, जठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर, इन्द्रियों के निर्मल हो जाने पर तथा शरीर के हलका हो जाने पर विधिपूर्वक आहार ( भोजन ) करें। यही आहार करने का उचित समय है ॥ ५५ ॥
वक्तव्य —इसी अध्याय के ३५वें श्लोक में ‘काले सात्स्यं शुचि हितं’ का यह उत्तर है। ऐसे समय में किया गया भोजन सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित शरीर को तृप्त कर देता है। इस समय किये गये भोजन से जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है, लोभ आदि कारणों से इसके आगे-पीछे किया गया भोजन हानिकारक होता है। इस विषय में महर्षि पुनर्वसु के उपदेशों पर ध्यान दें। देखें—च.सू. २७।३४५ से ३५० तक।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
मात्राशित्तौय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो द्रव्यादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से द्रव्यादिविज्ञानीय अर्थात् द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन इस अध्याय में करेंगे। ऐसा प्राचीन आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इससे पहले अध्याय में अन्न-पान के उपयोगी द्रव्यों का सामान्य रूप से वर्णन तथा आहार-विधि का उपदेश किया गया था। अब इस अध्याय द्वारा द्रव्य और उसमें आश्रित रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव का इसलिए वर्णन किया जायेगा कि इनकी परीक्षा करके ही अन्न-पान के उपयोग का उपदेश दिया जायेगा। अतएव प्रस्तुत अध्याय की उपस्थापना की जा रही है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २६; सु.सू. ४०-४१ तथा अ.सं.सू. १७ में देखें।
द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं, ते हि तदाश्रयाः ।
द्रव्य की प्रधानता —रस, गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव द्रव्य में रहने वाले इन धर्मों में हीरतकी आदि द्रव्यों को ही श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये रस आदि द्रव्य में ही आश्रित होते हैं। अर्थात् ये रस आदि भाव द्रव्य में प्राप्त होते हैं।
बलव्य —चरक ने द्रव्य की परिभाषा इस प्रकार की है—'यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्'। तद् द्रव्यम्'। (च.सू. १।५१) अर्थात् जिसमें कर्म एवं गुण आश्रित हैं और जो द्रव्य गुण-कर्म का समवायिकारण है, वह द्रव्य है। इसका विस्तृत व्याख्यान सुरभारती प्रकाशन चौखम्बा, वाराणसी से प्रकाशित 'चरकसंहिता' प्रथम भाग में यथास्थान देखें।
पञ्चभूतात्मकं तत्तु—
द्रव्य का स्वरूप —वह द्रव्य पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतों के संयोग वाला है।
—क्षमामधिष्ठाय जायते ॥ १ ॥
द्रव्य की उत्पत्ति —वह द्रव्य पृथिवी का आश्रय पाकर उस प्रकार उत्पन्न होता है, जैसे मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
अन्बुद्योन्मयिपवननभसां समवायतः । तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च—
उत्पत्ति के कारण —द्रव्य की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल है, तथापि इसकी उत्पत्ति में अग्नि, वायु तथा आकाश के समवाय सम्बन्ध से उसकी उत्पत्ति होती है। उक्त पदार्थों (महाभूतों) के संयोग-भेद से द्रव्यों में भिन्नता भी होती है।
—व्यपदेशस्तु भूयसा ॥ २ ॥
नामकरण में कारण —जिस द्रव्य में जिस महाभूत तत्त्व की विशेषता होती है, वह उसी नाम से कहा जाता है। जैसे—पार्थिव, आग्नेय, वायव्य, नामस आदि व्यवहार के लिए उस-उसकी संज्ञाएँ होती हैं ॥ २ ॥
१० अ० ४०
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अष्टाङ्गहृदये
तस्मात्रैकरसं द्रव्यं भूतसङ्कातसम्भवात्।
द्रव्य / अनेक -पृथिवी आदि महाभूतों के समवाय से उत्पन्न होने के कारण कोई भी द्रव्य किसी एक रसवाला नहीं होता है।
नैकदोषास्ततो रोगास्तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः ॥ ३ ॥
अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चैष्यते।
अनेकदोषज रोग—यही कारण है कि उस द्रव्य का सेवन करने से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी किसी एक ही दोष वाले नहीं होते हैं, उस द्रव्य में जो रस व्यक्त (प्रतीत) होता है, वही उसका प्रधान रस कहा जाता है। जो रस प्रधान रस का अनुभव होने के बाद प्रतीत होता है अथवा जिसका बहुत कम अनुभव हो पाता है, उसे 'अनुरस' कहा जाता है ॥ ३ ॥
वक्तव्य—महर्षि पुनर्वसु के समय में रस तथा आहार विषय सम्बन्धी एक सम्भाषा परिषद् हुई थी, जिसका विशद विवेचन च.सू. २६ में किया गया है। अन्त में भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ने सिद्धान्त पक्ष की स्थापना की तथा द्रव्य, देश, काल के प्रभाव से ६३ प्रकार के रसभेदों की त्रचा की गयी। इसका परिशीलन करें। इस प्रसंग में सु.सू. ४० का भी अवलोकन कर लें।
गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ रसाश्रये ॥ ४ ॥
रसेषु व्यपदिश्यन्ते साहचर्योपचारतः।
द्रव्यगत गुरु आदि गुण—गुरु आदि बीस गुण (जिनका वर्णन अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।१८ में किया जा चुका है) पार्थिव आदि द्रव्यों में रहते हैं। ये ही द्रव्य मधुर आदि रसों के आश्रय भी होते हैं, किन्तु साहचर्य (संगति) होने के कारण वे गुरु आदि गुण रसों में भी होते हैं, ऐसा कह दिया जाता है ॥ ४ ॥
वक्तव्य—'गुर्वादयो गुणाः'—इसका वर्णन पहले किया जा चुका है। 'पृथिव्यादौ' के स्थान पर 'पार्थिवादी' पद अधिक सुगम होता। ऐसा न होने के कारण श्री अरुणदत्त को उक्त पद की व्याख्या 'पृथिव्यादि महाभूतारब्धे द्रव्ये' इस प्रकार करनी पड़ी है। इसके पहले तीसरे पद्य में भी इन्होंने द्रव्य को 'भूतसङ्कातसम्भव' माना है और अगले पद्यों में भी द्रव्यों को क्रम से पार्थिव, आप्य, आश्रय आदि संज्ञा दी है। वास्तव में पृथिवी आदि भूत हैं, इनके संयोग से ही पञ्चभूतात्मक द्रव्य या द्रव्यों की उत्पत्ति होती है।
तत्र द्रव्यं गुरुस्थूलस्थिरगन्धगुणोल्बणम् ॥ ५ ॥
पार्थिवं गौरवस्थैर्यसङ्कातोपचयावहम्।
पार्थिव द्रव्य का वर्णन—उक्त पञ्चमहाभूतात्मक द्रव्यों में जो द्रव्य गुरु, स्थूल, स्थिर तथा गन्धगुण-प्रधान होता है, उसे पार्थिव द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त पार्थिव द्रव्य गुरुता, स्थिरता, संयातता (ठोसपन) तथा उपचय (शरीरपुष्टि) कारक होता है ॥ ५ ॥
द्रवशीतगुरुस्तिग्धमन्दसान्द्रसोलब्णम् ॥ ६ ॥
आप्यं स्नेहनविष्यन्दक्लैदप्रह्लादबन्धकृतं।
आप्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य द्रव, शीत, गुरु, स्निग्ध, मन्द, सान्द्र तथा रसगुण-प्रधान होता है, उसे आप्य (अपू धातु-प्रधान) या जलीय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आप्य द्रव्य स्नेहन, विष्यन्दन (अभिष्यन्दकारक), क्लैदन (ग्रीलापन), प्रह्लादन (आनन्द या तृप्तिकारक) तथा बन्धन (आटा आदि को बाँधने वाला) कारक होता है ॥ ६ ॥
रूक्षतीक्ष्णोष्णविशदसूक्ष्मरूपगुणोल्बणम् ॥ ७ ॥
आश्रये दाहभावर्णप्रकाशपचनात्मकम्।
द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]
सूत्रस्थानम्
१४७
आश्रय द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण, विशद, सूक्ष्म तथा रूपगुण-प्रधान होता है, उसे आश्रय द्रव्य कहते हैं। इन गुणों से युक्त आश्रय द्रव्य दाह, कान्ति, वर्ण, प्रकाश तथा पाचन करने वाला होता है ॥७॥
वायव्यं रुक्षविशदलघुस्पर्शगुणोल्बणम् ॥८॥ रौक्षलाघववैशद्विचारलग्निकारकम् ।
वायव्य द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य रुक्ष, विशद, लघु तथा स्पर्शगुण-प्रधान होता है, वह वायव्य द्रव्य कहा जाता है। वह रुक्षता, लघुता, विशदता, विचरणशीलता एवं लग्निक ( हर्षक्षय ) कारक होता है ॥८॥
नाभसं सूक्ष्मविशदलघुशब्दगुणोल्बणम् ॥९॥
सौषिर्प्यलाघवकरम्—
नाभस द्रव्य का वर्णन—जो द्रव्य सूक्ष्म, विशद, लघु तथा शब्दगुण-प्रधान होता है वह नाभस ( आकाशीय ) कहा जाता है। वह सौषिर्प्य ( खोललापन ) तथा लघुता कारक होता है ॥९॥
—जगत्येवमनौषधम्। न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशात्रानार्थयोगयोः ॥१०॥
औषधमय द्रव्य—इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों ( प्रयोजनों ) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥१०॥
बक्तव्य—इसी विषय का जीवातु भगवानु पुनर्वसु का यह उपदेश है—'नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते'। ( च.सू. २६।१२ ) तथा इसी का समर्थक गद्य देखें—सु.सू. ४१।५। गुरु आदि २० गुणों का वर्णन इसके प्रथम अध्याय में महर्षि वाग्भट ने किया है। इनके अतिरिक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन्हें भी गुण कहा गया है। ऊपर श्लोक ५ से ९ तक में देखें। महर्षि कणाद ने २४ गुणों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण, ७. पुष्कल्य, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व, १२. गुरुत्व, १३. द्रवत्व, १४. स्नेह, १५. शब्द, १६. बुद्धि, १७. सुख, १८. दुःख, १९. इच्छा, २०. द्वेष, २१. प्रयत्न, २२. धर्म, २३. अधर्म और २४. संस्कार। साथ ही च.सू. १।४९ भी देखें। इन गुण-धर्मों वाले द्रव्य स्वयं तथा दूसरे के संयोग से औषध-कार्य का निर्वह करते हैं। ये औषध द्रव्य स्थावर-जंगम भेद से दो प्रकार के होते हैं।
द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽरिषपबनोक्तम्। अधोगामि च भूमिच्छं भूमितोयगुणाधिकम् ॥११॥
द्रव्यों की विशेषता—जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी अर्थात् वमनकारक होता है, उसमें प्रायः अग्नि तथा वायु तत्त्व के गुण अधिक होते हैं और जो द्रव्य अधोगामी अर्थात् विरेचनकारक होता है, उसमें प्रायः पृथिवी तथा जल तत्त्व के गुण अधिक पाये जाते हैं ॥११॥
बक्तव्य—एक 'नाभस' गुण-प्रधान द्रव्य का वर्णन ऊपर के श्लोक में छूट गया है। इसका गुण है—संशमनकारकत्व। प्रायः शब्द कभी-कभी इसके विपरीत प्रभाव की भी सूचना देता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक ही द्रव्य वमन तथा विरेचन कारक होता है, तो उसमें उक्त बारों भूतों के गुण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, फलतः वे दोनों कार्य में समर्थ हैं। इस विषय का निस्तुत वर्णन मुश्रुत में इस प्रकार प्राप्त है—'तत्र...साधयेत्' ( सु.सू. ४१।६ ) अर्थात् विरेचक द्रव्यों में पृथिवी एवं जल तत्त्व के गुणों की अधिकता रहती है, क्योंकि ये दोनों तत्त्व भारी होने के कारण अधोगामी होते हैं। वामक द्रव्यों में अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता होती है। ये दोनों तत्त्व लघु होने के कारण ऊर्ध्वगामी होते हैं। आकाश गुण अधिकता वाले द्रव्य संशमन होते हैं। इसी प्रकार यहाँ दीपन, लेखन तथा वृंहण द्रव्यों का भी वर्णन किया गया है।
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अष्टाङ्गहृदये
इति द्रव्यम्—
द्रव्य-वर्णन की समाप्ति—यहाँ तक पाञ्चभौतिक द्रव्य के सम्बन्ध में जो वर्णन करना था, उसका व्याख्यान समाप्त हो गया है।
—रसान् भेदेष्टतरत्रोपदेश्यते।
रसवर्णन-प्रस्ताव—द्रव्यों का वर्णन करने के बाद अब अगले (११वें) अध्याय में रसों के भेदों का वर्णन किया जायेगा।
वीर्य पुनर्वदत्येके गुरु स्निग्धं हिमं मृदुं॥१२॥
लघु रूक्षोष्णतीक्ष्णं च तदेवं मतमष्टधा।
द्रव्यगत वीर्य-वर्णन—कुछ आचार्यों का कथन है कि द्रव्यगत वीर्य आठ प्रकार का होता है। यथा—१. गुरु, २. स्निग्ध, ३. हिम, ४. मृदु, ५. लघु, ६. रूक्ष, ७. उष्ण एवं ८. तीक्ष्ण॥१२॥
चरकस्त्वाह वीर्यं तत् क्रियते येन या क्रिया॥१३॥
नावीर्यं कृते किञ्चित्सर्वं वीर्यकृता हि सा।
चरकसम्मत वीर्य—महर्षि चरक का कथन है कि वीर्य उसे कहते हैं जिससे जो क्रिया की जाती है। कोई भी द्रव्य वीर्य के बिना किसी कार्य को नहीं कर सकता, अतः सभी क्रियाएँ वीर्य से ही सम्पन्न होती हैं॥१३॥
गुर्वादिव्वेव वीर्याख्या तेनान्वर्थेति वण्यते॥१४॥
समग्रगुणसारेषु शक्त्युत्कर्षविरतिषु। व्यवहाराय मुख्यत्वाद् बहुप्रग्रहणादपि॥१५॥
वाग्भट का मत—थीवाग्भटाचार्य का कथन है कि ऊपर कहे गये गुरु आदि आठ गुणों में ही वीर्य संज्ञा सार्थक है, अतएव उक्त आठ गुणों को वीर्य कहा जाता है, क्योंकि उक्त आठ गुण ही पहले कहे गये बीस गुणों में प्रमुख होते हैं और अपनी शक्ति की श्रेष्ठता के कारण ही विविध प्रकार से क्रिया करते हैं। यह (वीर्य) सभी गुणों में चिरस्थायी होने के कारण तथा शक्ति की अधिकता के कारण चिकित्सा-व्यवहार में प्रमुख होता है। सभी गुणों में प्रमुख होने के कारण उसी की गणना (उल्लेख) होती है॥१४-१५॥
अतश्च विपरीतत्वात्मभ्रमवत्यपि नैव सा। विवक्ष्यते रसाद्येषु, वीर्यं गुर्वादयो हृतः॥१६॥
रस आदि में वीर्य की श्रेष्ठता—इसीलिए उक्त विशेषताओं से विपरीत होने के कारण रस, विपाक, प्रभाव को 'वीर्य' संज्ञा नहीं दी गयी है। यद्यपि उक्त रस आदि को भी वीर्य कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया। अतएव गुरु आदि आठ गुणों का नाम ही 'वीर्य' है॥१६॥
उष्णं शीतं द्विधैवान्ये वीर्यमाचक्षते—
वीर्य सम्बन्धी अन्य मत—कुछ दूसरे आचार्यों का मत है कि 'वीर्य' केवल दो प्रकार का होता है—१. उष्ण एवं २. शीत। यहाँ 'एवं' शब्द निश्चयात्मक है अर्थात् वीर्य दो ही प्रकार का होता है।
—अपि च। नानात्मकमपि द्रव्यमश्रीषोमो महाबली॥१७॥
व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित्।
वाग्भट का समर्थन—वाग्भटाचार्य का कथन है कि यह मत भी ठीक ही है, क्योंकि अनेक प्रकार के शक्तिशाली द्रव्य भी अग्नि तथा सोम (जल) तत्त्वों का कभी भी उस प्रकार अतिक्रमण नहीं कर पाते, जिस प्रकार व्यक्त एवं अव्यक्त कारण वाला जगत् (संसार) अग्नि एवं सोम का अतिक्रमण नहीं कर सकता॥१७॥
वक्तव्य—ऊपर वीर्य की मान्यता के सम्बन्ध में मत-मतान्तरों की चर्चा की गयी है। चरक का मत है कि 'वीर्य' वह है जिसकी शक्ति से द्रव्य कर्म को पूर्ण करता है और उन्होंने 'कर्म' की परिभाषा
द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]
सूत्रस्थानम्
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इस प्रकार दो हैं—'प्रयत्नादि कर्म त्रेष्टितमुच्यते'। (च.सू. १४९) वीर्य की परिभाषा—'वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुलते किञ्चित्, सर्वा वीर्यकृता क्रिया' ॥ (च.सू. २६६५) इस प्रसंग में सुश्रुतोक्त गद्य का भी अवलोकन करें—सु.सू. ४०१५।
तत्रोष्णं भ्रमतृङ्गलानिस्वेददाहाशुपाकितः ॥ १८ ॥
शर्मं च वातकफयोः करोति, शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥ १९ ॥
वीर्य के लक्षण—वारभट के अनुसार वीर्य दो प्रकार का होता है। उन दोनों में प्रथम उष्णवीर्य के लक्षण—भ्रम, प्यास का लगना, ग्लानि (हर्षशय), स्वेद, दाह, आशुपाकित (शीघ्र पचना—भोजन का तथा व्रण आदि का) एवं वात तथा कफ दोषों का शमन करता है।
शीतवीर्य—ह्लादन (मन को प्रसन्न करने वाला), जीवन, स्तम्भनकारक और रक्त एवं पित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥ १८-१९ ॥
जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥ २० ॥
विपाक का वर्णन—जठराग्नि के संयोग से जब खाये हुए मधुर आदि रस युक्त आहार का पाक होने लगता है, उसके बाद जो आहाररस से अलग रस उत्पन्न होता है, उसे 'विपाक' कहते हैं ॥ २० ॥
वक्तव्य—थीमानों का भोजन प्रायः षड् रस युक्त होता है। इसको समझाने के लिए उक्त श्लोक में 'रसानां' पद दिया है। उसके बाद उस खाये हुए आहार का जब जठराग्नि से पुनः पाक होकर जो दूसरा रस पैदा होता है, उसे 'विपाक' अर्थात् विशिष्ट पाक कहते हैं।
स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। तित्तोषणकघायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ॥ २१ ॥
विपाकज रस-भेद—प्रायः मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थों का विपाक मधुर होता है, अम्ल पदार्थों का विपाक अम्ल ही होता है और तित्त, कटु एवं कषाय रसों का विपाक कटु होता है ॥ २१ ॥
वक्तव्य—उक्त दृष्टि से छः रसों का त्रिविध (मधुर, अम्ल तथा कटु) विपाक होता है, किन्तु सुश्रुत ने दो प्रकार का विपाक माना है। देखें—सु.सू. ४०१०-१२। वे दो विपाक हैं—१. मधुर तथा २. कटु। श्रीवारभट ने 'प्रायः' पद का प्रयोग करके प्राचीन मत को स्वीकार कर अपने मत को भी प्रदर्शित कर दिया है।
कटु-तित्तरस विवाद—प्रायः समाज में देखा जाता है कि मिर्च तीती है एवं नीम कड़वी है, इस प्रकार प्रयोग करते हैं, यह उचित नहीं है। आप ध्यान दें—कटुरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र में घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या उसे कष्ट दे, जो दाह करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, उसे कटुरस कहते हैं'। (शा.सं.पू.खं. २।२०) जैसे—सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली को 'त्रिकटु' या 'कटुत्रय' कहते हैं। इन्हों के गुण लाल मिर्चा में भरपूर पाये जाते हैं, अतः ये सभी द्रव्य कटु कहे जाते हैं। तित्तरस के लक्षण—'जो रस जीभ में रखने मात्र से कष्ट दे अर्थात् अप्रिय लगे और जो दूसरे रसों के स्वाद को प्रतीत न होने दे, उसे तित्तरस कहते हैं। यह मुख की तित्त्ता को दूर करके लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है'। (शा.सं.पू.खं. २।२१) तित्त रस युक्त द्रव्यों में नीम, कुटकी आदि प्रमुख हैं।
रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्यं शुभाशुभम्। किञ्चिद्वत्सेन कुस्ते कर्म पाकेन चापरम् ॥ २२ ॥
गुणान्तरेण वीर्येण प्रभावेणैव किञ्चन।
रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव—विपाक का फल मूल (आहार) रस के समान ही फलदायक होता है, किन्तु उसमें भी द्रव्य के अपने विशिष्ट लक्षण इस प्रकार होते हैं—कोई द्रव्य दोषशमन रूप कर्म करने के कारण शुभ होता है और कोई द्रव्य दोषप्रकोपन रूप कर्म करने के कारण अशुभ होता है। उसमें भी
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अष्टाङ्गहृदय
कोई द्रव्य मधुर आदि रस से कर्म करता है, तो कोई पाक ( विपाक ) से, कोई गुण से, कोई वीर्य से और कोई प्रभाव से ही कर्म करता है ॥ २२ ॥
यद्यद्व्यर्थे रसादीनां बलवत्त्वेन वर्तते ॥ २३ ॥
अभिभूयेतरांस्तत्कारणत्वं प्रपद्यते। विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ॥ २४ ॥
द्रव्य का स्वाभाविक बल—द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव इनमें से जो बलवान् होकर रहता है, वही अपना कर्म करता है और वह दूसरों को दबाकर ( पराजित कर ) शुभ अथवा अशुभ कार्य करने में कारण होता है। परस्पर विपरीत गुणों का संयोग होने के कारण अधिकांश यह देखा जाता है कि बलवान् द्वारा अल्प बल वाला जीत लिया जाता है ॥ २३-२४ ॥
रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तान्यपोहति। बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ २५ ॥
रस आदि का स्वाभाविक बल—रस की समानता होने पर कभी-कभी रस को विपाक जीत लेता है, रस और विपाक को वीर्य जीत लेता है तथा रस-विपाक-वीर्य को प्रभाव जीत लेता है। यह द्रव्यों का अथवा रस आदि का स्वाभाविक बल कहा जाता है ॥ २५ ॥
रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम्। दन्ती रसादौस्तुत्याऽपि चित्रकस्य विरेचनी ॥
मधुकस्य च मृद्वीका, घृत्तं क्षीरस्य दीपनम्।
प्रभाव का वर्णन—रस एवं विपाक आदि की समानता होने पर भी उन-उन द्रव्यों का जो प्रमुख कर्म होता है, उसमें प्रभाव ही कारण है। जैसे—दन्ती ( जमाल्मोटा नामक ) द्रव्य रस तथा विपाक में चित्रक ( चीता ) द्रव्य के समान होती है, फिर भी यह विरेचक ही होता है। इसी प्रकार मुनक्का द्रव्य के रस आदि महूआ के समान होते हैं, तथापि मुनक्का मधुर एवं विरेचक होता है। घृत्त के रस, गुण आदि दूध के समान होते हैं, फिर भी दूध अग्निदीपन होता है ॥ २६ ॥
बक्तव्य—इस विषय को विस्तारपूर्वक समझने के लिए आप च.सू. २६।६७ से ७२ तक के पद्यों का अवलोकन करें। शाङ्कधराचार्य ने भी इस विषय में प्रकाश डाला है अर्थात् द्रव्य में रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव रहते हैं, जो प्रयोगानुसार अपना-अपना कार्य करते हैं।
इति सामान्यतः कर्म द्रव्यादीनां, पुनश्च तत् ॥ २७ ॥
विविचित्रप्रत्ययारब्धद्रव्यभेदेन भिद्यते।
द्रव्य आदि के कर्म—इस प्रकार इस अध्याय में द्रव्यों तथा द्रव्यगत रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर दिया गया है। फिर भी द्रव्यों के कर्मों में अनेक प्रकार के भेद देखे जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य में पञ्चमहाभूतों के लक्षण ही उसमें मूल कारण होते हैं। प्रत्येक द्रव्य की रचना में पञ्चमहाभूतों का संयोग होता है, किन्तु यह संयोग सबमें भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है; अतएव प्रत्येक द्रव्य एक-दूसरे द्रव्य से भिन्न होता है ॥ २७ ॥
स्वादुगुरुश्च गोधूतोऽवातजिदवातकृद्यवः ॥ २८ ॥
उष्ण मत्स्याः पयः शीतं कदुः सिंहो न शूकरः।
इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने द्रव्यादिविज्ञानीयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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भिन्नता के उदाहरण—गोहूँ तथा जौ ये दोनों द्रव्य स्वाद में मधुर तथा गुरु होने पर भी गोहूँ वातविकार का शमन करता है और जौ वातकारक होता है। मत्स्यमांस स्वादु रसयुक्त तथा गुरु गुणयुक्त होने पर भी
द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः ९ ]
सूत्रस्थानम्
१५१
उष्ण कहा गया है और उसी के समान रस तथा गुण से युक्त दूध शीतवीर्य होता है। इसी प्रकार सिंह तथा सूअर का मांस मधुर एवं गुरु होता है, परन्तु विपाक की दृष्टि से सिंह का मांस कटु तथा सूअर का मांस मधुर होता है॥ २८॥
वक्तव्य —उक्त उदाहरणों का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक द्रव्य भले ही वह स्थावर अथवा जंगम भेद से किसी प्रकार का भी हो, वह विचित्र कारणों के विचित्र संयोग से उत्पन्न होता है। फलतः प्रत्येक के रस-गुण आदि समान होने पर भी उस-उस के वीर्य, विपाक तथा प्रभाव परस्पर भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। फिर भी हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि सभी द्रव्य पाञ्चभौतिक होते हैं। यही कारण है कि ‘प्रभाव’ को अचिन्त्य शक्ति वाला कहा एवं माना गया है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में द्रव्यादिविज्ञानीय नामक नवौ अध्याय समाप्त ॥ ९ ॥
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दशमोऽध्यायः
अथातो रसभेदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब यहाँ से हम रसभेदीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इसके पहले नवें अध्याय के १२वें श्लोक में 'रसान् भेदरुत्तरत्रोपदेश्यते' ऐसा कहा गया था, तदनुसार प्रस्तुत अध्याय में रसभेदों का वर्णन किया जा रहा है। जीभ द्वारा ग्रहण किये जाने वाले विषय का नाम ही रस है अर्थात् रस की उत्पत्ति का मूल आधार जल एवं पृथिवी है। देखें—च.सू. १।६४। वास्तव में रस के मूलभूत कारण हैं—जल तथा पृथिवी, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति का कारण पृथिवी तत्त्व है। इसी का समर्थन हमें उपनिषद् तथा वैशेषिक दर्शन में मिलता है। यथा—'रसो रसनेन्द्रियग्राहः, पृथिव्युदकवृत्तिः'। इति। और भी देखें—'आपो स्मृताः'। (च.सू. २५।१३) अर्थात् यह पुरुष रसज है, क्योंकि इसकी पुष्टि गर्भकाल में गर्भिणी के आहाररस से होती है और जल रस वाले होते हैं। अष्टांगहृदय में भी कहा गया है—'रसाः स्वाद्वम्ललवणतितोषणकषायकाः। षड्व्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहाः' ॥ (अ.हृ.सू.१।१४) अर्थात् रस छः होते हैं—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तित्त, ५. कटु तथा ६. कषाय। इनका आधार द्रव्य होता है। ये स्वतन्त्र रूप से नहीं पाये जाते। ये यथापूर्वं बलवान् होते हैं। जैसे—कषाय रस से कटुरस बलवान् होता है आदि।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. २६; च.वि. ८; सु.सू. ४२; सु.उ. ६३ तथा अ.सं.सू. १७ एवं १८ में देखें।
क्षमास्मोऽशिक्षमास्मृतेजःखवाव्यमन्यनिलगोनिर्लेः। द्वयोल्बणैः क्रमादूर्तैर्मधुरादिरसोद्भवः ॥ १ ॥
मधुर आदि रसों की उत्पत्ति —दो-दो महाभूतों की प्रधानता के कारण मधुर आदि रसों की उत्पत्ति होती है। यथा—पृथिवी एवं जल तत्त्वों की प्रधानता से मधुररस , अग्नि एवं पृथिवी तत्त्वों की प्रधानता से अम्लरस , जल एवं अग्नि तत्त्वों की प्रधानता से लवणरस , आकाश एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से तित्तरस , अग्नि एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कटुरस तथा पृथिवी एवं वायु तत्त्वों की प्रधानता से कषायरस की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥
बक्तव्य —इसी का समर्थन चरक ने भी किया है। देखें—च.सू. २६।४०।
तेषां विद्याद्वसं स्वादुं यो वक्तवमनुलिप्सति। आस्वाद्यमानो देहस्य ह्लादनोऽक्षप्रसादनः ॥ २ ॥
प्रियः पिपीलिकादीनाम्—
मधुररस के लक्षण —उक्त छः रसों में मधुररस वह है, जो मुख को चारों ओर से लीप देता है। उसका स्वाद मिलते ही सम्पूर्ण शरीर का अधिष्ठाता मन प्रसन्न हो जाता है तथा सभी इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जाती हैं। यह रस चिउँती तथा मक्खियों का भी प्रिय होता है ॥ २ ॥
—अम्लः क्षालयते मुखम्। हर्षणो रोमदन्तानामक्षिभ्रुवनिकोचनः ॥ ३ ॥
अम्लरस के लक्षण —अम्ल (खट्टा) रस मुख को भीतर की ओर से मानो घों डालता है। इसे खाने से रोमांच तथा दन्तहर्ष हो जाता है। यह आँखों तथा भौंहों को संकुचित कर देता है ॥ ३ ॥
लवणः स्यन्दयत्यास्यं कपोलगलदाहकृत्।
रसभेदीयाध्यायः १० ]
सूत्रस्थानम्
१५३
लवणरस के लक्षण—लवणरस का सेवन करने से मुख से लालझाब होने लगता है और कपोल तथा गले के भीतरी भाग में जलन पैदा होने लगती है।
तिक्तो विशदयत्यास्यं रसनं प्रतिहन्ति च॥४॥
तिक्तरस के लक्षण—तिक्तरस का सेवन करने से मुख का भीतरी भाग विशद (स्वच्छ) हो जाता है तथा जीभ को कुछ समय के लिए यह अन्य रस ग्रहण करने के अयोग्य कर देता है॥४॥
उद्रेजयति जिह्वायां कूर्वश्चिमिचिमां कटुः। द्रावयत्यक्षिनासास्यं कपोलो दहतीव च॥५॥
कटुरस के लक्षण—कटुरस (सौंठ, मरिच, पीपल या लाल मिर्चा) का सेवन जीभ के अगले भाग को उद्विग्न कर देता है अर्थात् जीभ इसके स्वाद से घबड़ा जाती है। इससे जीभ में चिमचिमाहट होने लगती है। इसका सेवन करने से आँख, नाक तथा मुख से द्राव निकलने लगता है और कपोलों (गालों) में दाह होने लगता है॥५॥
कषायो जडयेज्जिह्वां कण्ठघ्रोतोविबन्धकृत।
कषायरस के लक्षण—कषायरस (हरीतकी, आँवला आदि) का सेवन जीभ को जड़ (अन्य रस के सेवन में कुछ देर के लिए असमर्थ) कर देता है और कण्ठ (गला) के घ्रोतस् को अवरुद्ध कर देता है अर्थात् उसमें ऐंठन पैदा कर देता है।
रसानामिति रूपाणि—
रसों के स्वरूप—यहाँ तक छहों रसों के परिचायक स्वरूपों का वर्णन कर दिया गया है।
—कर्माणि—
रसों के कर्म—अब इसके आगे उक्त रसों के कर्मों का वर्णन किया जायेगा।
—मधुरो रसः॥६॥
आजन्मसात्प्यात् कुरुते धातूनां प्रबलं बलम्। बालवृद्धक्षतक्षीणवर्णकेशेन्द्रियोजसाम्॥७॥
प्रशस्तो बृंहणः कण्ठघः स्तन्यसन्धानकटुहः। आयुष्यो जीवनः स्निग्धः पित्तानिलविषापहः॥
कुरुतेऽत्युपयोगेन स मेदः श्लेष्मजान् गदान्। स्थौल्याग्निसादसन्त्यासभेहगण्डार्बुदादिकात्॥९॥
मधुररस के कर्म—मधुररस माता के दूध के रूप में जन्मकाल से सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल) होने के कारण रस आदि धातुओं को अत्यन्त बलदायक होता है। यह बालक, वृद्ध, क्षत (उरःक्षत आदि), क्षीण (धातुक्षीण), वर्ण, केश, इन्द्रियों तथा ओजस् के लिए हितकारक होता है। यह शरीर को पुष्ट करता है, स्वरयन्त्र के लिए हितकर है, दूध को बढ़ाता है, टूटी अस्थियों को जोड़ता है तथा मध्यसन्धानकारक भी है; गृह (देर में पचने वाला) है, आयुवर्धक है, जीवन है, स्निग्ध है, पित्त, वात तथा विष का नाशक है। इसका अधिक उपयोग करने से यह मेदोरोग तथा कफज रोगों को उत्पन्न करता है। यथा—स्थूलता, मन्दाग्नि, सन्त्यास, प्रमेह, गलगण्ड तथा अर्बुद आदि रोग हो जाते हैं॥६-९॥
अम्लोऽग्निदीपिकृतु स्निग्धो हृद्यः पाचनरोचनः। उष्णवीर्यो हिमस्पर्शः प्रीणनः क्लेदनो लघुः॥
करोति कफपिताम् मृदवातानुलोमनः। सोऽत्यभ्यस्तस्तनोः कुर्याच्छैथिल्यं तिमिरं भ्रमम्॥
कण्डुपाण्डुत्ववीसर्पशोफविस्फोटतुड्वज्जरन् ।
अम्लरस के कर्म—अम्लरस का सेवन अप्रिवर्धक, स्निग्ध, हृदय के लिए हितकर, पाचन, रोचन (रुचिकारक), उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, प्रीणन (तृप्तिकारक), क्लेदकारक तथा लघुपाकी है। यह कफ, पित्त तथा रक्त वर्धक है; प्रतिलोम या मृदु वातदोष का अनुलोमन करता है। इसका अधिक सेवन करने से शरीर में शिथिलता, तिमिर नामक नेत्ररोग, चक्करों का आना, खुजली, पाण्डुरोग, वीसर्प, शोफ (सूजन), विस्फोट (फोड़े, शीतलारोग), प्यास का लगना तथा ज्वररोग को उत्पन्न करता है॥१०-११॥
१५४
अष्टाङ्गहृदये
लवणः स्तम्भसङ्गतबन्धविधमापनोऽग्रियुक्तं ॥ १२ ॥
स्नेहनः स्वेदनस्तीक्ष्णो रोचनश्छेदभेदकृतं । सोऽतियुक्तोऽग्रपवनं खलितं पलितं बलिम् ॥ १३ ॥
तृप्त्युक्तविषवीसर्पान् जनयेत् क्षपयेद्बलम् ।
लवणरस के कर्म—लवणरस का सेवन स्तम्भ ( जकड़न ) तथा संघातबन्ध ( मल-मूत्र की रूकावट ) विधमापक अर्थात् विनाशक है तथा अग्नि ( जठराग्नि ) की वृद्धि करता है। यह स्नेहन तथा स्वेदन है, तीक्ष्ण गुणयुक्त है, रुचिकारक, मांस का छेदक एवं मल का भेदक है। इसे अधिक खाने से वातरक्त, खलित तथा पलित नामक कपालरोगों, बली ( सुरियों ), प्यास, कुष्ठ, विष एवं वीसर्प रोगों को पैदा करता है और बल को क्षीण करता है ॥ १२-१३ ॥
बन्धव्य—चरक ने लवण के अधिक उपयोग का निषेध किया है। देखें—च.वि. १।१५। रक्तविकारों में इसको सेवन करने का निषेध है। यह बदे हुए मांस का छेदक है और व्रणशोथ का भेदक भी है तथा सभी रसों को उजागर ( प्रकट ) करने वाला भी है।
तिक्तः स्वयमरोचिष्णुररुचिं कुमितुद्बिषम् ॥ १४ ॥
कुष्ठमूच्छाज्वरोत्प्लेशदाहपित्तकफान् जयेत् । क्लेदमेदोवसामज्जशकृन्मूत्रोपशोषणः ॥ १५ ॥
लघुर्मध्यो हिमो रूक्षः स्तन्यकण्ठविशोधनः । धातुक्षयानिलव्याधीनतियोगात्करोति सः ॥ १६ ॥
तिक्तरस के कर्म—तिक्तरस यद्यपि स्वयं अरुचिकर होता है, परन्तु यह ज्वर आदि के कारण उत्पन्न अरुचि को दूर करता है। यह कुमिरोग, तुष्णा, विष, कुष्ठ, मूच्छा, ज्वर, उत्प्लेश ( जी मिचलाना ), दाह ( जलन ), पित्तज तथा कफज विकारों का विनाश करता है। क्लेद ( सड़न ), मेदस, वसा, पुरीष ( मल ) और मूत्र को सुखाता है। यह पाक में लघु, वृद्धिवर्धक, शीतवीर्य, रूक्ष, दूध को शुद्ध करने वाला तथा गले के विकारों का शोधक है। इसका अधिक सेवन करने से धातुक्षय तथा वातव्याधियों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ १४-१६ ॥
कटूर्णलामयोर्यदकृष्णालसकशोफजित् । व्रणावसादनः स्नेहमेदःक्लेदोपशोषणः ॥ १७ ॥
दीपनः पाचनो रूच्यः शोधनोऽग्रस्य शोषणः । छिन्नति बन्धान् द्रोतांसि विवृणोति कफापहः ॥
कुस्ते सोऽतियोगेन तुष्णां शुक्लबलक्षयम् । मूच्छामाकुञ्जन् कम्पं कटिपृष्ठादिवु ब्यथाम् ॥ १९ ॥
कटूरस के कर्म—कटूरस ग्लरोग, उदर ( कोठ, शीतपित्त ), कुष्ठ, असलक ( आमविकार ) एवं शोथरोग का विनाश करता है। व्रणशोथ की कठोरता को शिथिल ( ढीला ) कर देता है; स्नेह, मेदस एवं क्लेद ( सड़न ) को सुखाता है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भोजन को पचाता है, भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है; मुख, नासिका, नेत्र एवं शिर का स्नावण एवं रेचन विधियों से शोधन करता है, खाये हुए अन्न को सुखाता है अतएव खाने के बाद प्यास लगती है, अतिसारनाशक है, मल के बन्धन को काटता है, द्रोतों को फैलाता है तथा कफ का नाशक है। इस रस का अधिक प्रयोग करने से प्यास अधिक लगती है, शुक्ल एवं बल का क्षय करता है। मूच्छा ( बेहोशी ), शरीर के अवयवों तथा सिराओं में सिकुड़न, कैंपकैपी, कमर तथा पीठ में पीड़ा पैदा करता है ॥ १७-१९ ॥
कषायः पित्तकफहा गुरुप्रविशोधनः । पीडनो रोपणः शीतः क्लेदमेदोविशोषणः ॥ २० ॥
आमसस्तम्भनो ग्राही रूक्षोऽति त्वषप्रसादनः । करोति शीलितः सोऽति विष्टम्ब्याध्यानहृदुजः ॥
तृट्काश्यपौरुषप्रशस्रोतोरोधमलग्रहान् ।
कषायरस के कर्म—कषायरस पित्त तथा कफ को शान्त करता है, गुरु है, रक्त को शुद्ध करता है। कषायरस-प्रधान द्रव्यों का लेप लगाने से यह पके फोड़े का पीडन करता है और पूय निकल जाने पर रोपण करता है। यह शीतीवीर्य है, सड़न तथा मेदोधातु को सुखाता है, आमदोष को रोकता है तथा
रसभेदीयाध्यायः १० ]
सूत्रस्थानम्
१५५
मल को बाँधता है। यह अत्यन्त रूक्ष होता है, त्वचा को स्वच्छ करता है। इसका अधिक सेवन करने से बिष्टम्भ, आधमान ( अफरा ), हृदय में पीड़ा, प्यास, कुशता, शुक्रधातु का नाश, स्त्रोतों में रुकावट तथा मल-मूत्र में रुकावट होती है॥ २०-२१ ॥
घृतहेमगुडाक्षोडमोचचोरपुरुषकम् ॥ २२ ॥
अभीरूचिरायनसरराजानबलात्रयम्। मेदे चतस्रः पर्णिन्यो जीवन्ती जीवकर्पभो॥ २३ ॥
मधूकं मधुकं बिम्बी विदारी श्रावणीयुगम्। क्षीरशुक्ला तुगाक्षीरी क्षीरिण्यो काश्मरी सहे॥ २४ ॥
क्षीरक्षुगोक्षुरक्षीद्राक्षादिर्मधुरो गणः।
मधुरस्कन्ध के द्रव्य—घृत, सोना, गुड़, अखरोट, केला, चोच ( दालचीनी, नारियल, तालफल-वैद्यकशब्दसिन्धु ), पुरुषक ( फालसा ), अभीर ( शतावरी ), काकोली, कटहल, चिरौजी, बलात्रय ( बला, अतिबला, नागबला ), दो मेदा ( मेदा, महामेदा ), चारपर्णिनी ( शालपर्णी, पुष्टपर्णी, माषपर्णी, मृदुपर्णी ), जीवन्ती, जीवक, ऋषभक, महुआ, मुलेठी, बिम्बी ( कुन्दरू ), विदारीकन्द, श्रावणीयुगल ( मुण्डी, बड़ीमुण्डी ), क्षीरशुक्ला, वंशलोचन, दो क्षीरिणी ( छोटी दुद्वी, बड़ी दुद्वी ), गम्भार, दो सहा ( सहा, महासहा ), दूध, ईख, गोखरू, मधु, मुनक्का आदि—ये सब द्रव्य मधुरस्कन्ध के हैं॥ २२-२४ ॥
अम्लो धात्रीफलास्त्रीकामातुलुङ्गारुवेतसम्॥ २५ ॥
दाडिमं रजतं तक्रं चूक्रं पालेवतं दधि। आम्रमात्रातकं भव्यं कपित्थं करमर्दकम्॥ २६ ॥
अम्लस्कन्ध के द्रव्य—औवला, इमली, मातुलिंग ( प्रायः सभी नीबू विशेषकर बिजोरानीबू ), अम्लवेत, दाडिम, रजत ( चाँदी ), तक्र ( मठा ), चूक्र, पालेवत, दही, आम, आमड़ा, भव्य ( कमरख ), कैथ तथा करमर्दक ( करौंदा )॥ २५-२६ ॥
वरं सौवर्चलं कृष्णं बिडं सामुद्रमौद्रिदम्। रोमकं पांसुजं शीसं क्षारश्च लवणो गणः॥ २७ ॥
लवणस्कन्ध के द्रव्य—संधानमक, सोंचरनमक, कालानमक, विडलवण ( नौसादर ), समुद्रानमक, औद्रिद ( रेह ) नमक, रोमक ( साँभर ) नमक, पांसुज ( धूल या मिट्टी का ) नमक, सीसाधातु तथा सभी क्षार॥ २७ ॥
तिक्तः पटोली त्रायन्ती बालकोशीरचन्दनम्। भूनिम्बनिम्बकटुकातगरागुरुवत्सकम्॥ २८ ॥
नक्तमालद्रिजनीमुस्तमूर्वाटुरुषकम्। पाठापामार्गकांस्यायोगूड्वीधन्व्यासकम्॥ २९ ॥
पञ्चमूलं महद्व्याघ्रयो विशालाऽतिविषा वचा।
तिक्तस्कन्ध के द्रव्य—तीता परवल, बायमाणा, नेत्रबाला, खस, चन्दन, चिरायता, नीम, कुटकी, तगर, अगह, कुटज, नक्तमाल ( करंज ), दो हल्दी ( दारुहल्दी, हल्दी ), नागरमोथा, मूर्वा, अडूसा, पाठा, अपामार्ग, कांस्यधातु, लोहधातु, गुरुच, धमासा, बृहत्पञ्चमूल ( बिल्ब, सोनापाठा, गम्भारी, पाङ्ल, अरणी ), वनभण्टा, कण्टकारी, विशाला ( इन्द्रायण ), अतीस तथा बालवच॥ २८-२९ ॥
कटुको हिङ्गुमरिचकूमिजित्यञ्चकोलकम्॥ ३० ॥
कूठेराद्या हरितकाः पित्तं मूत्रमरुष्करम्।
कटुस्कन्ध के द्रव्य—हिंग, कालीमिर्च, वायविडंग, पञ्चकोल ( पिप्ली, पीपलामूल, चव्य, चित्रक, नागर = सोंठ ), कुठेरक आदि, हरितक ( देखें—अ.हृ.सू. ६।१०६ ), पित्त ( मांस खाने वालों का प्रिय पदार्थ, जो मृग, बकरा आदि में पाया जाता है, वह अवयव-विशेष ), गोमूत्र आदि सभी ग्राह्य मूत्र और अरुष्कर ( भिलावा )॥ ३० ॥
वर्गः कषायः पथ्याऽक्षं शिरीषः खदिरौ मधु॥ ३१ ॥
कदम्बोदुम्बरं मुक्ताप्रवालोजनगैरिकम्। बालं कपित्थं खजूरं बिसपद्योत्पलादि च॥ ३२ ॥
१५६
अष्टाङ्गहृदय
कषायस्कन्ध के द्रव्य—हरड, बहेड़ा, सिरौष, खदिर ( बबूल, कीकर आदि ), मधु, कदम्ब, गूजर, मोती, मूंगा, अंजन, गेरु, कच्चा कैथ, कच्चा खजूर, बिस ( कमलकन्द ), कमल तथा उत्पल ( कमलभेद ) आदि ॥ ३१-३२ ॥
मधुर श्लेषलं प्रायो जीर्णोच्चालियवादृते । मुद्राद्रोधूमतः शौद्रास्तिताया जाङ्गलमिषात् ॥ ३३ ॥
मधुररस का विशिष्ट वर्णन—प्रायः सभी मधुर रस वाले द्रव्य कफकारक होते हैं; केवल पुराने शालिघान्य, जी, मूंग, गेहूँ, मधु, सफेद मिश्री तथा जांगल देश के प्राणियों के मांस को छोड़कर ॥ ३३ ॥
प्रायोऽम्लं पित्तजननं दाडिमामलकादृते ।
अम्लरस का विशिष्ट वर्णन—अनार ( यहाँ अनार शब्द से पहाड़ों में पाये जाने वाले खट्टे दाड़िमों की ओर वाग्भट का संकेत है ) एवं आँवला को छोड़कर प्रायः सभी अम्लद्रव्य पित्तकारक होते हैं ।
अपथ्यं लवणं प्रायश्चक्षुषोऽन्यत्र सैन्धवात् ॥ ३४ ॥
लवणरस का विशिष्ट वर्णन—संधानमक के अतिरिक्त सभी नमक नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं ॥ ३४ ॥
तिक्तं कटु च भूयिष्ठमवृष्यं वातकोपनम् । ऋतेऽमृतापटोलीभ्यां शुण्टीकृष्णारसोन्नतः ॥ ३५ ॥
तिक्त-कटुरसों का विशिष्ट वर्णन—गुरुत्व तथा तिक्त परबल के बिना प्रायः सभी तिक्त द्रव्य अवृष्य ( बीर्यनाशक ) तथा वातकारक होते हैं । सोंठ, पीपल, लहसुन को छोड़कर प्रायः सभी कटु द्रव्य अवृष्य तथा वातकारक होते हैं ॥ ३५ ॥
कषायं प्रायशः शीतं स्तम्भनं चाभ्यां विना ।
कषायरस का विशिष्ट वर्णन—हरड को छोड़कर प्रायः सभी कषाय द्रव्य शीतवीर्य तथा स्तम्भन-कारक होते हैं ।
रसाः कटुम्ललवणा वीर्यणोष्णा यथोत्तरम् ॥ ३६ ॥
तिक्तः कषायो मधुरस्तद्वेद च शीतलाः । तिक्तः कटुः कषायश्च रूक्षा बद्धमलास्तथा ॥ ३७ ॥
पट्टुम्लमधुराः स्निग्धाः सृष्टविष्णूत्रामाहाः । पटोः कषायस्तस्माच्च मधुरः परमं गुरुः ॥ ३८ ॥
लघुरम्लः कटुस्तस्मात् तस्मादपि च तिक्तकः ।
रसों के द्विविध बीर्य—कटु, अम्ल तथा लवण रस बीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक उष्ण होते हैं और तिक्त, कषाय तथा मधुर रस बीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक शीत होते हैं ।
रसों के रूक्ष एवं स्निग्ध गुण—तिक्त, कटु तथा कषाय रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर रूक्ष गुण वाले तथा मल को बांधने वाले होते हैं । लवण, अम्ल एवं मधुर रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर स्निग्ध गुण वाले तथा मल, मूत्र एवं अपानवायु को निकालने वाले होते हैं ।
रसों के गुरु एवं लघु गुण—लवणरस से कषायरस से कषायरस से मधुररस गुण में अधिक गुरु होता है । अम्लरस लघु होता है, इससे अधिक लघु कटुरस होता है और इससे भी अधिक लघु होता है तिक्तरस ॥ ३६-३८ ॥
वक्तव्य—महर्षियों की विचारदृष्टि अत्यन्त सूक्ष्म तथा व्यापक होती थी, अतएव उन्हें विविधता कदम-कदम पर दिखलायी देती थी और अपवाद भी, अस्तु । यहाँ तक के विवेचन से हमने रसों के गुण, बीर्य, विपाक तथा प्रभाव को समझा किन्तु इनके विपरीत भी कई स्थल ऐसे मिलते हैं जो उक्त सिद्धान्तों के विपरीत देखे जाते हैं । जैसे ऊपर रस का विवेचन किया गया है, वैसा ही विस्तृत क्षेत्र विपाक का भी है । इन गुणियों को सुलझाने के लिए च.सू. २६ का अध्ययन एवं मनन करें ।
रसभेदीयाध्यायः १० ]
सूत्रस्थानम्
१५७
संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥ ३९ ॥
रसानां योगिकत्वेन यथास्थूलं विभज्यते ।
रसों के ६३ भेद—मधुर आदि छः रसों के परस्पर ( एक-दूसरे के साथ ) संयोग करने पर इनके स्थूल रूप से ५७ भेद होते हैं। पुनः इनमें छः रसों को जोड़ देने पर इनकी कल्पना दोषों को आधार मानकर करने से ६३ प्रकार की हो जाती है। इसे शास्त्रकार स्थूल गणना मानते हैं ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—अ.हृ.सू. १२ में देखें, वहाँ ६२ प्रकार के दोषभेदों का वर्णन किया गया है।
एकैकहीनास्तान् पञ्चदश यान्ति रसा द्विके ॥ ४० ॥
त्रिके स्वादुर्दशात्मः षट् त्रीन् पटुस्तित्त एककम् । चतुष्केषु दश स्वादुश्चतुरोऽम्लः पटुः सकृत ॥
पञ्चकेष्वेकमेवात्मो मधुरः पञ्च सेवते । द्रव्यमेकं षडास्वादमसयुक्ताश्च षड्रसाः ॥ ४१ ॥
दो-दो रसों के १५ योग—एक-एक रस को कम करते हुए पाँच भागों में दो-दो रसों के संयोग से इस प्रकार इनके १५ भेद होते हैं—मधुररस के साथ अम्ल आदि ५ रसों के संयोग से ५, अम्लरस के साथ लवण आदि ४ रसों के संयोग से ४, लवणरस के साथ तित्त आदि ३ रसों के संयोग से ३, तित्तरस के साथ कटु आदि २ रसों के संयोग से २ तथा कटुरस के साथ कषाय १ रस के संयोग से १ ( योग १५ ); त्रिक ( तीन-तीन ) रसों के संयोग से इनके २० भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ६, लवणरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ३ और तित्तरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १ ( योग २० ); चतुष्क ( चार-चार ) रसों के संयोग से इनके १५ भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से ४ और लवणरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १ ( योग १५ ); पञ्चक ( पाँच-पाँच ) रसों के संयोग से इनके छः भेद इस प्रकार होते हैं—मधुररस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से ५ और अम्लरस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से १ ( योग ६ ); षट्क ( छः ) रसों के संयोग से केवल एक भेद इस प्रकार होता है—मधुररस के साथ अन्य पाँच रसों के संयोग से १ और असंयुक्त अर्थात् अलग-अलग मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु एवं कषाय नामक रस ६; इस प्रकार इनका कुल ६३ योग होता है ॥ ४०-४१ ॥
षट् पञ्चकाः, षट् च पुष्परसाः स्युश्चतुर्द्विकौ पञ्चदशप्रकारौ ।
भेदास्त्यत्रिकां विशतिरकेमेव द्रव्यं षडास्वादमिति त्रिषष्टिः ॥ ४३ ॥
विषयोपसंहार—पाँच-पाँच रसों के योग ६, अलग-अलग रस ६, चतुष्क रसयोग १५, द्विक रस योग १५, त्रिक रसयोग २० तथा षट्क रसयोग १—इस प्रकार कुल ६३ प्रकार के भेद होते हैं ॥ ४३ ॥
वक्तव्य—उक्त ६३ प्रकार के रससंयोगों का यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है—
पंचक रससंयोग के ६ भेद—१. अम्ल, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुररसहीन ), २. मधुर, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( अम्लरसहीन ), ३. मधुर, अम्ल, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( लवणरसहीन ), ४. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग ( तित्तरसहीन ), ५. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग ( कटुरसहीन ), ६. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग ( कषायरसहीन );
पृथक् रसों की गणना ६—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तित्त, ५. कटु तथा ६. कषाय;
चतुष्क रससंयोग के १५ भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त रसों का संयोग ( कटुकषायरसहीन ); २. मधुर, अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग ( तित्त-कषायरसहीन ); ३. मधुर, अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग ( तित्त-कटुरसहीन ); ४. मधुर, अम्ल, तित्त, कटु रसों का संयोग ( लवण-कषायरसहीन );
१५८
अष्टाङ्गहृदये
५. मधुर, अम्ल, तित्त, कषाय रसों का संयोग (लवण-कटुरसहीन); ६. मधुर, अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग (लवण-तित्तरसहीन); ७. मधुर, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग (अम्ल-कषायरसहीन); ८. मधुर, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-कटुरसहीन); ९. मधुर, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-तित्तरसहीन); १०. मधुर, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (अम्ल-लवणरसहीन); ११. अम्ल, लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग (मधुर-कषायरसहीन); १२. अम्ल, लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग (मधुर-कटुरसहीन); १३. अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-तित्तरसहीन); १४. अम्ल, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-लवणरसहीन) और १५. लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग (मधुर-अम्लरसहीन)।
द्विक रससंयोग के १५ भेद—१. मधुर तथा अम्ल रस का संयोग, २. मधुर तथा लवण रस का संयोग, ३. मधुर तथा तित्त रस का संयोग, ४. मधुर तथा कटु रस का संयोग, ५. मधुर तथा कषाय रस का संयोग, ६. अम्ल तथा लवण रस का संयोग, ७. अम्ल तथा तित्त रस का संयोग, ८. अम्ल तथा कटु रस का संयोग, ९. अम्ल तथा कषाय रस का संयोग, १०. लवण तथा तित्त रस का संयोग, ११. लवण तथा कटु रस का संयोग, १२. लवण तथा कषाय रस का संयोग, १३. तित्त तथा कटु रस का संयोग, १४. तित्त तथा कषाय रस का संयोग और १५. कटु तथा कषाय रस का संयोग।
त्रिक रससंयोग के २० भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण रसों का संयोग; २. मधुर, अम्ल, तित्त रसों का संयोग; ३. मधुर, अम्ल, कटु रसों का संयोग; ४. मधुर, अम्ल, कषाय रसों का संयोग; ५. मधुर, लवण, तित्त रसों का संयोग; ६. मधुर, लवण, कटु रसों का संयोग; ७. मधुर, लवण, कषाय रसों का संयोग; ८. मधुर, तित्त, कटु रसों का संयोग; ९. मधुर, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १०. मधुर, कटु, कषाय रसों का संयोग; ११. अम्ल, लवण, तित्त रसों का संयोग; १२. अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग; १३. अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग; १४. अम्ल, तित्त, कटु रसों का संयोग; १५. अम्ल, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १६. अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग; १७. लवण, तित्त, कटु रसों का संयोग; १८. लवण, तित्त, कषाय रसों का संयोग; १९. लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग और २०. तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग।
षडस्वाद रससंयोग का १ भेद—१. मधुर, अम्ल, लवण, तित्त, कटु, कषाय रसों का संयोग। इस प्रकार ६ + ६ + १५ + १५ + २० + १ = रसकल्पना के ६३ भेद किये गये हैं। इनका उपयोग चिकित्सा काल में किया जाता है।
ते रसानुरसतो रसभेदास्तारतम्यपरिकल्पनया च।
सम्भवन्ति गणानां समतीता दोषभेषजवशादुपयोज्याः ॥ ४४ ॥
इति श्रौवेद्यपतिसिंहगुप्तसुनुश्रीमद्रागभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने रसभेदीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
—***—
रससंयोगों के असंख्य भेद—वे (उपर्युक्त) रसभेद रस तथा अनुरस के भेद से एवं तर-तम भाव की परिकल्पना से असंख्य हो जाते हैं। तथापि उन रससंयोग-भेदों का प्रयोग बात आदि दोषों का तथा हरीतकी आदि औषध-द्रव्यों के रस-अनुरस आदि का विचार करके यथोचित प्रकार से उपयोग करना चाहिए ॥ ४४ ॥
बक्तव्यम्—रसानुरस—प्रत्येक द्रव्य में एक प्रधान रस तथा एकाधिक अनुरस रहते ही हैं। जैसे—हरीतकी का प्रधान रस कषाय है, शेष लवण रहित चार रस उसके अनुरस हैं। यथा—‘हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम्’। और भी कहा गया है—‘द्रव्यमेकरसं नास्ति, न रोगोऽप्येकदोषजः’। अस्तु।
रसभेदीयाध्यायः १० ]
सूत्रस्थानम्
१५९
तारतम्य—तर-तम के भाव को 'तारतम्य' कहते हैं। दो द्रव्यों में एक को उत्तम या अधम बतलाने के लिए 'तर' का प्रयोग होता है और वहीं अनेक में एक को बतलाने के लिए 'तम' का प्रयोग होता है। दूसरा प्रयोग इस प्रकार है—यह द्रव्य उससे गुरुतर है अथवा यह द्रव्य उन सबमें गुरुतम है। इसी प्रकार लघुतर, लघुतम प्रयोग भी होते हैं, तीसरा प्रयोग है—मधुर, मधुरतर, मधुरतम आदि।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में रसभेदीय नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥ १० ॥
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एकादशोऽध्यायः
अथातो दोषादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से दोषों, धातुओं तथा मलों के विशेष ज्ञान को देने वाले अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—रसभेदीय नामक अध्याय के समाप्त होने के बाद अब यहाँ दोषादिविज्ञानीय नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। दोषादि शब्द में 'आदि' पद से धातु तथा मल का संग्रह किया गया है, क्योंकि धातु एवं मलों के दोष आधारस्वरूप होते हैं।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १२, १७-१८, २८; सु.सू. १५ एवं अ.सं.सू. १९ में देखें।
दोषधातुमला मूलं सदा देहस्य—
शरीर के आधार—वात आदि (पित्त-कफ) तीन दोष, रस से लेकर शुक्रपर्यन्त सात धातु तथा स्वेद (पसीना) आदि मल ये सब देह (शरीर) के सदा (जीवनभर) मूल (आधार) कहे जाते हैं।
—तं चलः । उत्साहोऽ्वासनश्चासन्वेष्टावेगप्रवर्तनैः ॥ १ ॥
सम्यग्गत्या च धातूनामक्षाणां पाटवेन च । अनुगृह्यात्यविकृतः, पित्तं पकृत्युष्मदर्शनैः ॥ २ ॥
क्षुतूहुरचिप्रभामेधाधीशौर्यतनुमादवैः । श्लेष्मा स्थिरत्वस्निग्धत्वसन्धिबन्धक्षमादिभिः ॥ ३ ॥
प्रकृतिस्य दोषों के कर्म—उस देह को प्रकृतिस्य वायु सदा उत्साहशक्ति, श्वास, प्रश्वास, चेष्टा (शरीर सम्बन्धी व्यवहार—उठना, बैठना, चलना, फिरना आदि), मल-मूत्र आदि वेगों की प्रवृत्ति, रस आदि धातुओं की उचित गति, श्रोत्र आदि इन्द्रियों की अपने-अपने विषयग्रहण की कुशलता से कृपा करता रहता है। इसी प्रकार प्रकृतिस्य पित्त इस देह के उपर सदा पाचन, उष्णता, दर्शन (देखना), श्रुख, प्यास, भोजन के प्रति रुचि, प्रभा (कात्ति), मेधा (धारण करने की क्षमता वाली बुद्धि), बुद्धि, शूरता, शरीर सम्बन्धी मुदुता द्वारा अनुग्रह करता है। प्रकृतिस्य कफ देह को सदा स्थिरता, स्निग्धता, दृढ़ सन्धिबन्धन तथा क्षमा आदि द्वारा अनुगृहीत करता है ॥ १-३ ॥
वक्तव्य—यह देह पञ्चमहाभूतों (पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश) से निर्मित है। इनमें पृथिवी तत्त्व इस शरीर का आधार ही है और आकाश तत्त्व शरीर के रिक्त स्थानों का स्वरूप है। जैसे—कानों के तथा नाक के छिद्र एवं मुख-गुहा आदि आकाश तत्त्व के आशय हैं, इस दृष्टि से उक्त दोनों तत्त्व शरीर में प्रायः निष्क्रिय हैं। शेष तीन तत्त्व वायु, तेजस् तथा जल ये क्रमशः वात, पित्त, कफ धातुओं का कर्म करते हुए जीवनभर शरीर को धारण किये रहते हैं।
प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणं । गर्भोत्पादश्च धातूनां श्रेष्ठं कर्म क्रमात्मृतम् ॥ ४ ॥
रस आदि धातुओं के कर्म—रस आदि सात धातुओं के क्रमशः ये प्रमुख कर्म हैं—१. रस का प्रीणन, २. रक्त का जीवन, ३. मांस का लेपन अर्थात् अस्थिसमूह का लेपन कर उसे स्थिर बनाये रखना, ४. मेदस् का स्नेहन (सम्पूर्ण शरीर को स्निग्ध बनाये रखना), ५. अस्थि का धारण करना, ६. मज्जा का अस्थियों की पूर्ति करना (हड्डियों के भीतर जो स्निग्ध पदार्थ पाया जाता है वही मज्जा है, उसके अभाव में अस्थियों तथा अस्थिसन्धियों में पीड़ा का अनुभव होने लगता है) तथा ७. शुक्र का गर्भोत्पादन कर्म होता है ॥ ४ ॥
दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]
सूत्रस्थानम्
१६१
वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार—१. रस—शरीर का प्रीणन तथा रक्त का पोषण करता है। २. रक्त—वर्ण की निर्मलता, मांस का पोषण तथा जीवन प्रदान करता है। ३. मांस—शरीर एवं मेदस् का पोषण करता है। ४. मेदस्—स्नेह-स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर में दृढ़ता उत्पन्न कर अस्थियों का पोषण करता है। ५. अस्थियाँ—शरीर को धारण करती हैं। ६. मज्जा—प्रीति, स्नेह, बल, शुक्र का पोषण कर अस्थियों का भी पोषण करती है। ७. शुक्र—धैर्य, व्युति, प्रीति, देहबल, हर्षवीज ( स्त्रियों में ) तथा गर्भधारण कार्य में उपयोगी होता है। देखें—सु.सू. १५।४।
अवष्टम्भः पुरीपस्य मूत्रस्य क्लेदवाहनम्। स्वेदस्य क्लेदविधृतिः—
मलों के प्रमुख कर्म—पुरीप का कर्म—अवष्टम्भ ( बल की रक्षा करना, मलाशय को स्वस्थ रखना, वायु तथा अग्नि का धारण करना )। मूत्र का कर्म—क्लेद को बहा देना। स्वेद का कर्म—शरीर में गीलापन बनाये रखना। इसी के कारण त्वचा का स्पर्श सुकोमल होता है।
वक्तव्य—इनका शरीर में रहना और यथासमय मात्रानुसार निकलना शरीर के लिए उपकारक होता है। कहा भी है—‘मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रायत्तं तु जीवितम्’। सुश्रुत ने कहा है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’। ( सु.सू. १५।३ ) अर्थात् प्रकृतिस्थ वात आदि दोषों का, रस आदि धातुओं का तथा पुरीप आदि मलों का शरीर में रहना ही शरीर का मूल ( आधार ) है। इसका सांगोपांग व्याख्यान सुश्रुत में यथास्थान देखें। संयोगवश गुण भी दोष हो जाते हैं और दोष भी गुण हो जाते हैं। शास्त्र एवं लोक का परिशीलन करें। एक सुभाषित—‘तात वाग्भट ! कि ब्रूयं विचित्रा कर्मणो गतिः । दुषधातुरिवात्यर्थ गुणो दोषाय कल्पते’ ॥
—बृद्धस्तु कुत्तेऽनिलः ॥ ५ ॥
कार्यकाण्योष्णकामत्वकम्पानाहशकुदुग्धान् । बलनिद्रेन्द्रियप्रश्रप्रापप्रमदीनताः ॥ ६ ॥
वातवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ वातदोष कुशता, नख-नेत्र आदि में कालापन, उष्ण आहार-विहार की इच्छा का होना, कैंपकंपी का होना, आनाह, पुरीप की स्वाभाविक गति में रुकावट, बलनाश, निद्रानाश, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय या ह्रास, प्रलाप ( अंत-संत बकना ), चक्करों का आना तथा दीनता—इन लक्षणों को उत्पन्न करता है ॥ ५-६ ॥
पीतविष्मूत्रनेत्रत्वकक्षुतुइदाहाल्पनिद्रताः । पित्त—
पित्तवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ पित्तदोष मल, मूत्र, नेत्र तथा त्वचा में पीलापन, भूख-प्यास की अधिकता, जलन का होना, नींद का कम आना—इन लक्षणों को पैदा कर देता है।
—श्लेष्माऽप्रिसदनप्रतेकालस्यगीरवम् ॥ ७ ॥
श्वेतशैत्यश्ल्याङ्गत्वं श्वासकासातिनिद्रताः ।
कफवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ कफदोष मन्दाग्नि, लालास्राव, आलस्य, गुरुता, पुरीप आदि में सफेदी, शीतता ( जाड़ा लगना या शीतस्पर्श का अनुभव होना ), अंगों में शिथिलता ( ढीलापन ), श्वास, कास तथा निद्रा की अधिकता होना—इन लक्षणों को उत्पन्न कर देता है ॥ ७ ॥
वक्तव्य—यहाँ तक वात-पित्त-कफ के जिन लक्षणों का ऊपर वर्णन किया गया है, वे वात आदि दोषों के वृद्धि या प्रकोप के लक्षण हैं। इन्हें आप अ.हृ.नि. १।१४ से २२ तक देखें।
रसोऽपि श्लेष्मवत्—
रसवृद्धि के लक्षण—अनेक कारणों से बढ़ा हुआ रसधातु ऊपर कहे गये कफदोष की भाँति विकारों को उत्पन्न करता है।
—रक्तं विसर्पल्लीहविद्रधीन् ॥ ८ ॥
कुष्ठवाताम्रपिताम्रगुल्मोपकुशकामलाः । व्यङ्गप्रिनाशसम्भोरक्तत्वद्भेनमूत्रताः ॥ ९ ॥
११ अ० हू०
१९२
अष्टाङ्गहृदये
रक्तवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ रक्तधातु विसर्पयोग, प्लीहारोग, विद्रधिरोग, कुष्ठ, वातरक्त, पित्तज्वरोग, रक्तपित्तसोग, गुल्मरोग, उपकुश ( दन्तवेष्टगत ) रोग, कामलारोग, व्यङ्ग ( श्रुद्वरोग ), अग्रिनाश ( मन्दाग्नि ), मूर्च्छा, त्वचा, नेत्र एवं मूत्र में लालिमा का होना—इन लक्षणों को उत्पन्न कर देता है ॥ ८-९ ॥
मांसं गण्डार्बुदग्रन्थिगण्डोरस्वरवृद्धिताः । कण्ठादिष्वधिमांसं च—
मांसवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ मांसधातु गण्डमाला या गल्मण्ड, अर्बुद तथा ग्रन्थिभोग को उत्पन्न करता है; गण्डों ( गालों ), ऊरुओं तथा उदरप्रदेश में वृद्धि कर देता है; इसके अतिरिक्त गले एवं गुद में अधिमांसों को उत्पन्न कर देता है।
—तद्गन्धेदस्तथा श्रमम् ॥ १० ॥
अल्पेऽपि चेट्टिते श्वासं स्फिकस्तनोदरलम्बनम् ।
मेदोवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ मेदोधातु मांसवृद्धि के समान विकारों को उत्पन्न करता है। थोड़ा-सा भी परिश्रम करने पर श्वास ( मांस ) फूलने लगता है। स्फिक ( चूतड़ ), स्तन तथा उदर इन अवयवों को लटक देता है ॥ १० ॥
अस्थ्यध्यस्थ्यधिदन्ताश्च—
अस्थिवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ अस्थिधातु अस्थि की वृद्धि करता है और संख्या से अधिक दांतों को उत्पन्न कर देता है।
—मज्जा नेत्राङ्गगौरवम् ॥ ११ ॥
पर्वसु स्थूलमूलनि कुर्पात्कुञ्चण्यरूपि च ।
मज्जावृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ मज्जाधातु नेत्रों तथा शरीर में भारीपन पैदा कर देता है। शरीरसन्धियों ( जोड़ों ) में स्थूल मूल वाली तथा कष्टसाध्य फुसलियों को पैदा कर देता है ॥ ११ ॥
अतिस्रीकामतां वृद्धं शुक्लं शुक्राश्रमरीमपि ॥ १२ ॥
शुक्रवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ शुक्रधातु इस स्थिति में पुरुष स्त्री-सहवास की अत्यन्त इच्छा करता है और इससे शुक्राश्रमी की भी उत्पत्ति हो जाती है ॥ १२ ॥
बक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार रस आदि धातुओं की वृद्धि होने पर निम्न लक्षण होते हैं—रसधातु के अधिक बढ़ने पर मिचली, लालाग्रहा होता है। रक्तधातु के अधिक बढ़ने पर अंगों तथा आँखों में लालिमा का आना एवं सिराओं का रक्त से भर जाना होता है। मांस के अधिक बढ़ने पर नितम्बों, गण्डस्थलों, ओष्ठों, जीर्घों, बाहुओं, ऊरुओं तथा योनि में वृद्धि, शरीर में भारीपन आ जाता है। मेदोधातु के बढ़ने पर अंगों में चिकनापन, पेट तथा पसलियों में वृद्धि, काम, श्वास, हिचकी आदि रोगों का होना तथा शरीर से दुर्गन्ध का आना—ये लक्षण होते हैं। अस्थिधातु के बढ़ने पर चणकास्थियों तथा अधिदन्तों में वृद्धि हो जाती है। मज्जाधातु के बढ़ने पर सभी अंगों में विशेषकर आँखों में भारीपन आ जाता है। शुक्रधातु के बढ़ने पर शुक्राश्रमी हो जाती है तथा शुक्र की अतिप्रवृत्ति होती है। देखें—सु.सू. १५।१४। सुश्रुत के इस वर्णन को देखकर ऐसा लग रहा है कि महर्षि वामदेव ने रक्तवृद्धि का वर्णन करने के प्रवाह में आकर रक्तवृद्धि का भी वर्णन कर डाला है। देखें—विसर्प, कुष्ठ, व्यंग आदि रोग के दूषित होने पर ये लक्षण देखे जाते हैं, न कि रक्तवृद्धि होने पर।
कुशावाधानमाटोपं गौरवं वेदनां शकुतु ।
पुरीषवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बढ़ा हुआ पुरीष ( मल ) कुधि ( मलाशय ) में आधमान ( अफरा ), आटोप ( गुड़गुड़ाहट ), शरीर में भारीपन तथा वेदना को उत्पन्न करता है।