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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

वोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

१६३

मूत्रं तु बस्तिनिस्तोदं कृतेऽप्यकृतसंज्ञताम् ॥ १३ ॥

मूत्रवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बड़ा हुआ मूत्र बस्तिप्रदेश (मूत्राशय, मूत्रवहस्रोतस् तथा वृक्कों) में निस्तोद (जुभने की-सी पीड़ा) करता है। पेशाब (मूत्रत्याग) कर लेने पर भी ऐसा लगता है, मानो पेशाब नहीं किया हो। १३ ॥

स्वेदोऽतिस्वेदवर्गन्यकण्डूः—

स्वेदवृद्धि के लक्षण—विविध कारणों से बड़ा हुआ स्वेद (पसीना) शरीरभर में दुर्गन्ध तथा कण्डू (खुजली) पैदा कर देता है।

—एवं च लक्षयेत्। दूषिकादीनपि मलान् बाहुल्यगुरुतादिभिः ॥ १४ ॥

अन्य मलवृद्धि के लक्षण—इसी प्रकार अन्य शारीरिक मलों की वृद्धि के लक्षण भी होते हैं—दूषिका (नेत्रमल), आदि शब्द से नासिकामल, कर्णमल का ग्रहण भी कर लेना चाहिए। इन मलों के बड़ जाने से उन-उन मलमार्गों में भारीपन प्रतीत होता है। इस लक्षण को देखकर उनकी वृद्धि समझनी चाहिए ॥ १४ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने ऊपर कहे गये मलों के अतिरिक्त आर्तव (मासिकधर्म), गर्भ तथा स्तन्य (स्तनों में होने वाले दूध) की भी गणना की है। देखें—सू.सू. १५।५। इनकी वृद्धि होने पर जो लक्षण होते हैं, उन्हें देखें—सू.सू. १५।१६। इसी के आगे इन बड़े हुए दोष, धातु तथा मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए संशोधन, संशमन आदि चिकित्साविधियों का निर्देश किया है। उक्त दोष, धातु एवं मलों की वृद्धि किस प्रकार होती है, इसका उत्तर देते हुए सुश्रुत कहते हैं—‘अपने कारणों को बढ़ाने वाले द्रव्यों का निरन्तर अधिक उपयोग करते रहने से’ और इन बड़े हुए दोष, धातु एवं मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए इनके प्रतिकूल द्रव्यों का क्रमशः सेवन करना चाहिए, क्योंकि ‘सामान्यतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम्’। यह सूत्र रूप में इनकी चिकित्सा का वर्णन है।

लिङ्गं क्षोण्डनिलेऽङ्गुल्यं सादोऽल्पं भाषितेहितम्। संज्ञामोहस्तथा स्लेष्मवृद्ध्युक्तामयसम्भवः ॥

वातदोष के क्षय-लक्षण—वातदोष के क्षीण होने पर अर्थात् उसके सम अवस्था से क्षीण होने पर शरीरावयवों में थोड़ी शिथिलता, बोलने तथा शारीरिक चेष्टाओं में कमी, संज्ञामोह (ठीक न समझ पाना) तथा कफदोष के बढ़ने से होने वाले रोगों की उत्पत्ति का होना—ये लक्षण होते हैं ॥ १५ ॥

पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः—

पित्तदोष के क्षय-लक्षण—पित्तदोष के क्षीण होने पर जठराग्नि की मन्दता, शीतता का अनुभव होना अथवा शरीर का शीतस्पर्श युक्त हो जाना तथा प्रभा (कान्ति) की कमी का होना—ये लक्षण होते हैं।

—कफे भ्रमः। स्लेष्माशयानां शून्यत्वं हृद्वद्वः शलथसन्धिता ॥ १६ ॥

कफदोष के क्षय-लक्षण—कफदोष के क्षीण होने पर भ्रम (चक्करों का आना), श्लेष्माशयों (सिर तथा उरसू आदि) में खालीपन का अनुभव होना, हृदय में कैपकैपी; पाठभेद—‘हृद्वादः’ के अनुसार हृदय सम्बन्धी रोग तथा सन्धियों में डीलापन—ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥

रसे रौक्ष्यं श्रमः शोषो ग्लानिः शब्दासहिष्णुता।

रसधातु के क्षय-लक्षण—रसधातु के क्षीण होने पर शरीर में रूखापन, थकावट, शोष (सूखना), ग्लानि (हर्षक्षय) तथा शब्द के प्रति असहनशीलता (किसी की बात-चीत सुनने तथा सहने की इच्छा का न होना)—ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥

रक्तेऽम्लशिशिप्रीतिशिराशैथिल्यरूक्षताः ॥ १७ ॥

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अष्टाङ्गहृदय

रक्तधातु के क्षय-लक्षण—रक्तधातु के क्षीण होने पर खट्टे पदार्थों तथा शीतल पदार्थों के सेवन करने की इच्छा, सिराओं में शिथिलता का हो जाना तथा शरीर में रूक्षता की प्रतीति होना—ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥

मांसेऽक्षग्लानिगण्डस्फिकशुष्कतासन्धिवेदनाः ।

मांसधातु के क्षय-लक्षण—मांसधातु के क्षीण होने पर इन्द्रियों में दुर्बलता ( निरुत्साहता ), गालों तथा चूतड़ों का पिचक या सूख जाना और सन्धियों में पीड़ा का होना—ये लक्षण होते हैं।

मेदसि स्वपनं कट्याः प्लीहो वृद्धिः कृशाङ्गता ॥ १८ ॥

मेदोधातु के क्षय-लक्षण—मेदोधातु के क्षीण होने पर कमर में संज्ञाशून्यता, प्लीहा का बढ़ जाना तथा शरीर का दुबला हो जाना—ये लक्षण होते हैं ॥ १८ ॥

अस्थ्यस्थितोदः शदनं दन्तकेशनखादिषु ।

अस्थिधातु के क्षय-लक्षण—अस्थिधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में पीड़ा, दांत, बाल एवं नखों का गिरना तथा टूटना—ये लक्षण होते हैं।

अस्थ्नां मज्जननि सौषिर्ष्यं भ्रमस्तिमिरदर्शनम् ॥ १९ ॥

मज्जाधातु के क्षय-लक्षण—मज्जाधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में सुषिरता ( खोखलापन ), चक्करों का आना, आँखों के सामने अँधेरा छा जाना—ये लक्षण होते हैं ॥ १९ ॥

शुक्ले चिरात् प्रसिच्यते शुक्लं शोणितमेव वा । तोदोऽत्यर्थं वृषणयोर्मधू धूम्यातीव च ॥ २० ॥

शुक्रधातु के क्षय-लक्षण—शुक्रधातु के क्षीण होने पर स्त्री-सहवास काल में देर से शुक्र का निकल पाना अथवा शुक्र के स्थान में रक्तधातु का निकलना, वृषणों ( अण्डकोषों ) में अत्यन्त पीड़ा का होना, लिंग में से धुआँ-सा निकलना—ये लक्षण होते हैं ॥ २० ॥

पुरीये वायुरन्वाणि सशब्दो वेद्ययन्त्रिव । कुक्षीं भ्रमति यात्यूर्ध्वं हृत्पाश्चं पीडयन् भृशम् ॥ २१ ॥

पुरीषक्षय के लक्षण—पुरीष के क्षीण होने पर वातदोष गुड़गुड़ाहट शब्द करता हुआ मानो अंतर्द्वियों को लपेटता हुआ पेट भर में घूमता है, हृदय एवं पसलियों में अत्यन्त पीड़ा करता हुआ ऊपर की ओर जाता है ॥ २१ ॥

मूत्रेऽल्पं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विर्णं साध्रमेव वा ।

मूत्रक्षय के लक्षण—मूत्र के क्षीण होने पर मूत्र बहुत कम मात्रा में कष्ट के साथ निकलता है। उसका वर्ण विकारयुक्त होता है अथवा उसमें रक्त मिल जाता है।

स्वेदे रोमच्युतिः स्तब्धरोमता स्फुटनं त्वचः ॥ २२ ॥

स्वेदक्षय के लक्षण—स्वेद के क्षीण होने पर रोम ( रोये ) झड़ने लगते हैं अथवा सूअर के बालों े कड़े हो जाते हैं, त्वचा फटने लग जाती है ॥ २२ ॥

मलानामतिसूक्ष्माणां दुर्लक्ष्यं लक्ष्येतु क्षयम् । स्वमलायनसंशोषतोदशून्यत्वलाघवैः ॥ २३ ॥

अन्य मलों के क्षय-लक्षण—कान आदि के मलों के क्षीण होने पर ये कान आदि के मल अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, अतः इनका क्षय सरलता से मालूम नहीं किया जा सकता। फिर भी उनके क्षयों को कान, आँख आदि, जिनसे वे निकला करते हैं, के सूख जाने से तथा उनमें होने वाले तोद ( चुभन ) से, शून्यता से तथा लाघव ( हलकापन की प्रतीति ) से जान लेना चाहिए ॥ २३ ॥

दोषादीनां यथास्वं च विद्याद्वृद्धिक्षयीं भिषक् । क्षयेण विपरीतानां गुणानां वर्धनेन च ॥ २४ ॥

वृद्धिं मलानां सङ्गान्व्यं क्षयं चाति विसर्गतः ।

दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

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वृद्धि एवं क्षय निर्देश—वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की वृद्धि एवं क्षय को चिकित्सक इस प्रकार जानें—दोष आदि के विपरीत गुणों एवं कर्मों के क्षय से उनकी वृद्धि समझे और उनके विपरीत गुणों को बढ़ता हुआ देखकर उनका क्षय समझे। मलों के संग ( भीतर रुक जाने ) से मलों की वृद्धि समझे और मलों के अधिक निकल जाने से उन ( मलों ) का क्षय समझे ॥ २४ ॥

मलोचितत्वाद्देहस्य क्षयो वृद्धेस्तु पीडनः ॥ २५ ॥

पुरीषादि मलों का महत्त्व—पुरीष आदि मल शरीर के लिए उचित ( उपयोगी ) होते हैं। अतएव उन ( मलों ) के क्षय अथवा वृद्धि होने से अधिक कष्ट होता है ॥ २५ ॥

वक्तव्य—आप अतिसाररोग में देखें—इसमें मल का क्षय होना आरम्भ होते ही हट्टा-कट्टा पुरुष भी देखते-देखते धराशायी हो जाता है। अतएव सुश्रुत ने कहा है—‘दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्’ ( सु.सू. १५।३ ) इसका व्याख्यान वहीं देख लें।

तत्रास्थनि स्थितो वायुः, पित्तं तु स्वेदरक्तयोः । श्लेष्मा शेषेषु, तेनैषामाश्रयाश्रयिणां मिथः ॥

यदेकस्य तदन्यस्य वर्धनक्षपणौषधम् । अस्थिमास्तयोर्नैवं, प्रायो वृद्धिं तर्पणात् ॥ २७ ॥

श्लेष्मणाऽनुता तस्मात् सङ्घस्तद्विपर्ययात् । वायुनाऽनुताऽस्मान्च वृद्धिक्षयसमुद्भवान् ॥

विकारात् साधयेच्छीघ्रं क्रमाल्लङ्घनबृंहणैः ।

वात आदि के विशिष्ट स्थान—अस्थियों में वातदोष, स्वेद एवं रक्त में पित्तदोष और शेष रस तथा मांस आदि धातुओं में कफदोष रहता है। अतएव वात आदि दोषों तथा रस आदि धातुओं में आश्रय एवं आश्रयी सम्बन्ध है। यही कारण है कि आश्रय ( अस्थि आदि ) एवं आश्रयी ( वात आदि ) की आपस में जो औषधि एक ( आश्रय ) को बढ़ाती है, वह दूसरे आश्रयी ( वातदोष ) को भी बढ़ाती है। इसी प्रकार जो औषधि या आहार-विहार एक को क्षीण करती है, वह दूसरे को भी क्षीण करती है। परन्तु अस्थि आश्रय और वायु आश्रयी में उक्त लक्षण चरितार्थ नहीं होता, क्योंकि वृद्धि में तर्पण ( तृप्ति ) क्रिया की प्रधानता रहती है, वह क्रिया कफदोष के अनुकूल होती है। इसलिए वृद्धि के कारण होने वाले रोगों में लंघन अर्थात् अपतर्पण से और क्षय से उत्पन्न होने वाले रोगों में रोगशान्ति के लिए बृंहणक्रिया करनी चाहिए, जिससे शीघ्र ही विकारों की शान्ति हो सके ॥ २६-२८ ॥

वायोरन्यत्र, तज्जास्तु तैरबोक्त्रमयोजितैः ॥ २९ ॥

वातजरोग-प्रतिकार—वायुजनित विकारों में उक्त परिभाषा अनुकूल नहीं होती है। वातज रोगों अर्थात् वातवृद्धि से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा लंघन ( अपतर्पण ) से करनी चाहिए ॥ २९ ॥

वक्तव्य—उक्त २६ से २८ तक के पद्यों का भाव स्पष्ट करने की दृष्टि से च.सू. २२ तथा २३ अध्यायों का अध्ययन करें। कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तर्पणविधि से शरीर एवं रस आदि धातुओं की वृद्धि होती है। साथ ही वातदोष का क्षय होता है और अपतर्पण ( लंघन ) से सभी का क्षय होता है, किन्तु वातदोष की वृद्धि होती है। यही कारण है कि अस्थि आश्रय और वातदोष आश्रयी की चिकित्सा समान नहीं होती है। आगे चलकर श्रीवाग्भट ने अ.हू.सू.१४।७ में इसी विषय की व्याख्या की है, उसे अवश्य देखें।

विशेषाद्वक्तवृद्धयुत्थानं रक्तसूतिविरचनैः । मांसवृद्धिभवान् रोगान् शत्रुक्षारारित्रिकर्मभिः ॥ ३० ॥

स्थौल्यकाशयंपचारणे मेदोजानस्थिसङ्घयात् । जातान्क्षीरघृतेस्तित्कसंयुतेर्वस्तिभित्तया ॥ ३१ ॥

विद्ववृद्धिजनतीसारक्रियया, विट्क्षयोद्भवान् । मेपाजमध्यकुल्माषयवमाषद्वयादिभिः ॥ ३२ ॥

मूत्रवृद्धिक्षयोत्थांश्च मेहकृच्छ्रचिकित्सया । व्यायामाभ्यजन्नस्वेदमद्यैः स्वेक्षयोद्भवान् ॥ ३३ ॥

वृद्धरक्तादि की चिकित्सा—विशेष कर के रक्तधातु की वृद्धि होने से उत्पन्न रोगों को रक्तप्रावण तथा विरचन योगों से शान्त करें। मांसधातु की वृद्धि से होने वाले रोगों की चिकित्सा शत्रुकर्म, क्षारकर्म तथा अत्रिकर्म है। मेदोधातु की वृद्धि से उत्पन्न हुए रोगों की चिकित्सा कुशताकारक योगों से करनी चाहिए।

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अष्टाङ्गहृदये

(देखें—अ.हृ.सू.१४)। अस्थिधातु के क्षय होने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा दूध-धी के निरन्तर सेवन से तथा तित्तरसयुक्त बस्तियों के प्रयोग से करनी चाहिए।

मलों की वृद्धि एवं क्षय की चिकित्सा—पुरीष के बढ़ने से पैदा हुए रोगों की चिकित्सा अतिसार की भाँति करें। पुरीषक्षय से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा भेड़ा तथा बकरा के मध्य काय के मांसभक्षण से अथवा कुल्माष (अध उबले जी आदि धान्य) या माषद्वयों (माष तथा राजमाष) का अधिक सेवन करने से करें, क्योंकि ये सभी पुरीष को बढ़ाते हैं।

मूत्रवृद्धि के कारण उत्पन्न हुए रोगों को प्रेमहचिकित्सा-विधि से ठीक करें और मूत्रक्षय से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा के अनुसार करें।

स्वेदक्षय से पैदा हुए रोगों को व्यायाम, अभ्यंग, स्वेदन तथा मद्यपान आदि विधियों द्वारा ठीक करें। स्वेदवृद्धि के कारण उत्पन्न विकारों की चिकित्सा अ.हृ.अ. ३ ग्रीष्मऋतुचर्या में कहे गये शीतल उपचारों से ठीक करें॥ ३०-३३॥

वक्तव्य —ऊपर कहे गये पद्यों में प्रायः अनेक विषयों का समावेश कर दिया गया है, उनका विश्लेषण हम यहाँ करेंगे। ऊपर श्लोक ३१ के आगे कुछ संस्करणों में एक श्लोक और मिलता है। जिसका संग्रह निर्णयसागरीय प्रति की टिप्पणी में इस प्रकार किया गया है—‘मज्जशुक्रोद्भवान् रोगान् भोजनैः स्वादुतिक्तकैः। वृद्धं शुक्रं व्यायाद्यैर्यन्त्राच्चक्रशोषिकम्’॥ यहाँ ‘शुक्रशोषिकम्’ के स्थान पर ‘शुक्रशोधनम्’ पाठ जो अन्यत्र मिलता है, अधिक हचिकर है। अर्थात् मज्जा एवं शुक्र वृद्धि सम्बन्धी रोगों में मधुर तथा शीतल भोजन और वमन-विरचन रूपी शोधन दें। बड़े हुए शुक्र को व्यायाम, मैथुन तथा शुक्रशोधक औषधोपचार से ठीक करें। इसी प्रकरण में किसी संस्करण में एक पंक्ति और इस प्रकार मिलती है—‘प्रत्यनीकीषधं मज्जाशुक्रवृद्धिक्षये हितम्’। अर्थात् मज्जा तथा शुक्र की विशेष वृद्धि हो जाने पर इनकी चिकित्सा के लिए इनके विपरीत आहारविहार तथा औषधद्वयों का प्रयोग करना चाहिए। पाठक ध्यान दें—इतना पाठ बढ़ा देने पर सम्पूर्ण वृद्धि तथा क्षयों का परिगणन हो गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, अस्तु। इसका समाधान तो महर्षि वामभट द्वारा ३०वें पद्य के आरम्भ में प्रयुक्त ‘विशेषात्’ पद से ही हो जाता है—‘क्योंकि ऊपर विशेष वृद्धियों की चिकित्सा का वर्णन कर दिया गया है, सामान्य वृद्धियों की चिकित्सा उसी विधि से की जा सकती है। सुश्रुत ने सूत्ररूप में धातुक्षयों की चिकित्सा का निर्देश इस प्रकार किया है—‘क्षय होने पर उस-उस धातु को बढ़ाने वाले द्रव्यों का उपयोग करे और धातुवृद्धि होने पर उनका यथोचित संशोधन करना चाहिए, जिससे उस धातु का अवश्य ही ह्रास हो सके। विशेष देखें—च.सू. २८।२४ से ३० तक तथा च.शा. ६।९ से ११ तक।

स्वस्थानस्थस्य कायाग्रेरशा धातुषु संश्रिताः। तेषां सादातिदीप्तिभ्यां धातुवृद्धिक्षयोद्भवः॥ ३४॥

पूर्वो धातुः परं कुर्याद्बद्धः क्षीणश्च तद्धिधम्।

धातुओं की वृद्धि-क्षय —अपने स्थान में स्थित रहने पर भी पाचकार्मात्र के वे अंश, जो धातुओं में रहते हैं, उनके मन्द रहने से धातुओं की वृद्धि हो जाती है तथा उनके प्रदीप्त (प्रखर) रहने से धातुओं का क्षय हो जाता है।

वृद्धि-क्षय का कारण —इनमें पहला धातु अपनी सीमा से बढ़कर वह परधातु (अपने से बाद वाली धातु) को भी बढ़ा देता है और यदि वह (पूर्वधातु) क्षीण हो जाता है तो परधातु को भी क्षीण कर देता है॥३४॥

वक्तव्य —रस आदि धातुओं में स्थित अग्निस्तत्त्व जब मन्द हो जाता है तो उस धातु का समुचित पाक नहीं हो पाता, इस कारण से वह धातु बढ़ जाता है। जब धातुगत अग्निस्तत्त्व तेज हो जाता है तो उस धातु का अधिक पाक हो जाता है, अतः वह धातु घट जाता है। यह भी धातुओं की वृद्धि-क्षय का एक प्रमुख कारण होता है।

दोषादिविज्ञानायाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

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वृद्धि-क्षय का दूसरा स्वरूप—बढ़ा हुआ रसधातु रक्तधातु को बढ़ा सकता है या बढ़ा देता है, इसी प्रकार अन्य धातुओं को भी समझें। ऐसे ही क्षीण रसधातु रक्त को भी क्षीण कर सकता है या कर देता है। इसी क्रम से अन्य धातुओं को भी समझें। इन सभी धातुओं को तुष्ट करने वाला 'अन्नपानरस' होता है। अतएव आगे कहा गया है—'तेषां क्षयवृद्धौ शोणितनिमित्ते'। (सु.सू.—१४२१) अर्थात् रक्त से लेकर शुक्ल तक के धातुओं की क्षय-वृद्धि का निमित्त कारण रक्त है।

दोषा दुष्टा रसेर्धातून् दूषयन्त्युभये मलान्॥ ३५॥

अधो द्वे, सप्त शिरसि, खानि स्वेदबहानि च। मला मलायनानि स्युर्थयास्व तेष्वतो गदाः॥ ३६॥

दोष, धातु, मल एवं द्रोतों की दुष्टि—वात आदि दोष मधुर आदि छः रसों द्वारा दुष्ट होकर रस आदि सात धातुओं को दूषित कर देते हैं और वे दोनों (दोष एवं धातु) पुरीष आदि मलों को दूषित कर देते हैं। वे मल अपने-अपने मलमार्गों को दूषित कर देते हैं, जिनके फलस्वरूप उन स्थानों में विविध प्रकार के रोग हो जाते हैं।

मलायनो न्ना परिचय—नीचे के भाग में दो (१. मल एवं २. मूलमार्ग), शिरःप्रदेश में सात (कानों के द्रोत २, नासारन्ध्र २, नेत्र २ तथा मुख १) तथा स्वेदवाही असंख्य रोमकूप॥ ३५-३६॥

वक्तव्य—'यथास्व' अर्थात् जो जिसका स्थान है, उस-उस में उससे सम्बन्धित रोग होते हैं। वातज रोग वायु के, पित्तज रोग पित्त के तथा कफज रोग कफ के स्थानों (आशयों) में। रस आदि धातुओं के रोग उन-उन धातुओं में होते हैं। मलों के रोग अपने मलायनो में होते हैं।

ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम्। हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम्॥ ३७॥ स्निग्धं सोमात्मकं शुद्धमीषल्लोहितपीतकम्। यत्राशे नियतं नाशो यस्मिंस्तिष्ठति तिष्ठति॥ निष्पद्यन्ते यतोः भावा विविधा देहसंश्रयाः।

ओजस् का वर्णन—रस से शुक्र-पर्यन्त समस्त धातुओं का सर्वश्रेष्ठ तेजस् 'ओजस्' है। वह हृदय में स्थित रहने पर भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है। वह शरीर-स्थिति का आधार है। वह स्निग्ध, सोमगुणयुक्त, शुद्ध तथा लाल-पीला वर्ण वाला है। जिसका नाश होने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है और जिसके रहने पर मनुष्य जीवित रहता है। जिसके रहने के कारण विविध प्रकार के कान्ति, पराक्रम आदि भाव मनुष्य में देखे जाते हैं॥ ३७-३८॥

ओजः क्षीयेत कोपशुद्ध्यानशोकश्रमादिभिः॥ ३९॥

विभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः। दुःच्छायो दुर्भना रूक्षो भवेत्क्षामश्च तत्क्षये॥ जीवनीयोपधक्षीररसाद्यास्तत्र भेषजम्।

ओजःक्षय के कारण—क्रोध, भूख, चिन्ता, शोक तथा परिश्रम आदि कष्टों से ओजस् का क्षय हो जाता है।

ओजःक्षय के लक्षण—इसके क्षीण होने पर मनुष्य दूसरों से डरता है, दुर्बल हो जाता है, बार-बार अधिक चिन्ता करने लगता है, उसकी इन्द्रियाँ दुःखित हो जाती हैं, वह कान्ति रहित हो जाता है, उसका मन दुःखी हो जाता है, शरीर रूक्ष हो जाता है और वह कुश (दुबला) हो जाता है।

ओजःक्षय की चिकित्सा—इसमें जीवनीय गण में परिगणित द्रव्यों का सेवन, दूध का सेवन, मांसरस आदि बलवर्धक द्रव्यों का निरन्तर सेवन करते रहना चाहिए; यही इसकी उत्तम चिकित्सा है॥ ३९-४०॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने इसका वर्णन विस्तार से किया है। देखें—सु.सू.१५।१९ से ३१ तक तथा च.सू.१७।७३-७७। आगे चलकर सुश्रुत ने ओजस् को 'बल' संज्ञा दी है। देखें—'त्रयो दोषा बलस्योक्ताः'। (सु.सू. १५।२५) इसके पहले २०वें गद्य में भी इसे 'बल' कहा गया है।

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अष्टाङ्गहृदये

‘यन्नाशे नियतं नाशो’—जिस ओजस् के नाश से निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है। ‘ओजस्’ तत्त्व के न रहने पर जीवित पुरुष को ‘जीवनमृत’ कहा जा सकता है, क्योंकि ओजस् के बिना उसमें पुरुषत्व का अभाव हो जाता है। यदि मर गया तो फिर कहना ही क्या है। आज का जिज्ञासु छात्र शबन्धेद के समय उस मृत देह में यदि ओजोघातु को खोजता है तो उसकी भूल है, क्योंकि वह केवल ओजस्वी पुरुष में ही रहता है, दूसरों में नहीं। ओजस् के गुणों का वर्णन सुश्रुत-सू. १५११ में देखें।

ओजोवृद्धौ हि देहस्य तुष्टिपुष्टिबलोदयः ॥ ४१ ॥

ओजोवृद्धि के लक्षण—जीवनीय द्रव्य आदि के सेवन करने से ओजस् की वृद्धि होने पर देह स्थित मन या देही प्रसन्न (सन्तुष्ट) रहता है, शरीर पुष्ट होकर बल (ओजस्) का उदय होता है ॥ ४१ ॥

वक्तव्य—आचार्य शाङ्कधर ने ओजस् को शुक्र का उपघातु स्वीकार किया है। यही कारण है कि ऊपर ४१वें श्लोक में ओजःक्षय-चिकित्सा में जिन द्रव्यों के सेवन करने का महर्षि वाग्भट ने निर्देश दिया है, उनसे पहले शुक्रघातु की पुष्टि होती है, उसके साथ-ही-साथ ओजस् की भी पुष्टि होती है।

यदत्रं द्वेष्टि यदपि प्रार्थयेताविरोधि तु। तत्तत्पजन् समश्रनंश्च तौ तौ वृद्धिक्षयो जयेत् ॥ ४२ ॥

वृद्धि-क्षय का चिकित्सासूत्र—जिस विरोधी अन्न (आहार) से मनुष्य द्वेष करता है अर्थात् जिस आहार का वह सेवन करना नहीं चाहता है, उसको छोड़ता हुआ उस-उस दोष, घातु एवं मल की वृद्धि को जीत लेता है अर्थात् उसे बढ़ने नहीं देता। जिस अविरोधी आहार का वह सेवन करना चाहता है और उसका सेवन करता हुआ मनुष्य उस-उस दोष, घातु, मल के क्षय पर वह विजय प्राप्त कर लेता है ॥ ४२ ॥

कुर्वते हि रुचिं दोषा विपरीतसमानयोः। वृद्धाः क्षीणाश्च भूयिष्ठं लक्षयन्त्यबुधास्तु न ॥ ४३ ॥

द्वेष एवं प्रार्थना का कारण—बढ़े हुए दोष प्रायः अपने से विपरीत गुणवाले आहारों के सेवन की इच्छा को प्रकट करते हैं और क्षीणता को प्राप्त हुए दोष प्रायः समान गुण वाले आहारों का सेवन करने की इच्छा रखते हैं। इस वास्तविकता को शास्त्र को न जानने वाले पुरुष नहीं समझ पाते, बुद्धिमान् इसे समझ जाते हैं ॥ ४३ ॥

वक्तव्य—उक्त परिभाषा के अन्तर्गत न केवल दोषों का ही समावेश होता है अपितु रस आदि घातुओं तथा पुरीष आदि मलों का भी समावेश कर लेना चाहिए। इस प्रसंग में च.शा. ६१ गद्य को देखें। अर्थात् शरीरस्थ घातुएँ समान गुण अथवा समान गुणबहुल आहार-विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ती हैं और इसके विपरीत अथवा विपरीत गुणबहुल आहार-विहार से क्षीण होती हैं। दूसरा कारण यह भी है—‘सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। ह्लासहेतुविशेषश्च, प्रवृत्तिरुभयस्य च’ ॥ (च.सू. १।४४) अर्थ स्पष्ट है। आप उक्त ४३वें पद्य का भाव इस प्रकार समझें—जब मानव भरपेट भोजन किया रहता है तब वह भोजन से द्वेष करता है और जब भोजन का क्षय हो जाता है, तब वह भोजन करने की इच्छा प्रकट करता है इत्यादि।

यथाबलं यथास्वं च दोषा वृद्धा वितन्वते। रूपाणि, जहति क्षीणाः, समाः स्वं कर्म कुर्वन्ते ॥ ४४ ॥

अवस्थानुसार दोषों के कर्म—बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने रूपों (लक्षणों) का विस्तार करते हैं। घटे हुए अर्थात् क्षीण दोष अपने लक्षणों (गुण-कर्मों) का त्याग करते हैं और सम दोष (इसी अध्याय के ४थे श्लोक के अनुसार) अपना-अपना कर्म करते रहते हैं ॥ ४४ ॥

य एव देहस्य समा विवृद्ध्यै त एव दोषा विषमा वधाय।

यस्मादतस्ते हितचर्यैव क्षयाद्विवृद्धेरिव रक्षणियाः ॥ ४५ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुतुभ्रिमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने दोषादिविज्ञानीयो नामकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

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दोषों को सम रखना—जो वात आदि दोष सम स्थिति पर रहने से शरीर की वृद्धि का कारण होते हैं, वे ही दोष विषम होने पर शरीर के विनाश के कारण होते हैं। अतएव हितकर आहार-विहार द्वारा दोषों की वृद्धि के समान ही दोषों के क्षय से भी रक्षा करनी चाहिए ॥ ४५ ॥

वक्तव्य—समदोष की स्थिति ही उत्तम स्वास्थ्य के लिए हितकर होती है। अतः उत्तम स्वास्थ्य की इच्छा करने वाले पुरुष को ऐसा आहार-विहार करना चाहिए जिससे वात आदि दोष, रस आदि धातु तथा पुरीष आदि मल न बढें और न घटें।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा रचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में दोषादिविज्ञानीय नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११ ॥

— * * * —

द्वादशोऽध्यायः

अथातो दोषभेदीयाध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से दोषभेदीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —दोषविज्ञानीय अध्याय के बाद अब यहाँ दोषभेदीय अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। क्योंकि बात आदि दोषों के भेदों का वर्णन किये बिना दोषों के सम्बन्ध में उनकी विशेष चर्चा नहीं की जा सकती। ग्यारहवें अध्याय में दोषों के बारे में अनेक विषयों की चर्चा करनी थी, अतः वहाँ हमने दोषभेदों का वर्णन नहीं किया। अन्य संहिताओं में इस विषय का वर्णन कहीं-कहीं है, देखें।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ११, १७, १९, २०, २८; च.शा. १ तथा च.चि. २८; सु.सू. २१, २४; सु.नि. १, ३; सु.उ. ६६ एवं अ.सं.सू. २०, २२ में देखें।

पक्वाशयकटीसकियश्रोत्रास्थिस्यर्शनेन्द्रियम्। स्थानं वातस्य, तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ १ ॥

वात के प्रमुख स्थान —पक्वाशय (मलाशय), कमर, दोनों टॉगें, दोनों कान, अस्थियाँ तथा त्वचा ये वात के स्थान कहे गये हैं। इन सबमें पक्वाधान अर्थात् जठराग्नि द्वारा पुनः पके हुए आहार का स्थान मलाशय इसका प्रमुख स्थान है ॥ १ ॥

वक्तव्य —यद्यपि शरीरस्थ वातदोष सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण करता है, फिर भी सामान्य-विशेष की दृष्टि से ऊपर वात के स्थानों का परिचय दिया गया है। अन्त्य यह भी वर्णन मिलता है—‘हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः’ ॥ ये सब भेद प्राचीन आचार्यों के विचार-भेद हैं और सभी तथ्यपूर्ण हैं। उक्त स्थानों पर वातदोष की विकृति का प्रभाव विशेषरूप से देखा जाता है।

नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः। दूकं स्पर्शनं च पित्तस्य, नाभिरत्र विशेषतः ॥ २ ॥

पित्त के प्रमुख स्थान —नाभि, आमाशय, स्वेद (पसीना), लसीका, रुधिर, रस, दूष्टि तथा त्वचा सामान्य रूप से ये पित्त के स्थान हैं। इन सबमें पित्त का प्रमुख स्थान नाभि है ॥ २ ॥

वक्तव्य —यहाँ ‘नाभि’ शब्द से ढोंढी या धुन्नी का ग्रहण नहीं किया गया है, जो उदर के बाहर देखी जाती है। सुश्रुत में नाभि का परिचय इस प्रकार है—‘पक्वामाशययोर्मध्ये सिराप्रभवा नाभिः’। (सु.शा. ६।२५) अर्थात् पक्वाशय एवं आमाशय के बीच में सिराओं का उत्पत्तिस्थान नाभि नामक मर्म है। इसी को ‘धुद्वान्त्र’ भी कहते हैं। लसीका —‘यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते’। (च.शा. ७।१५) अर्थात् लसीका की स्थिति त्वचा के भीतर मानी है। यही कारण है कि त्वचा के रगड़ जाने से उससे जो लसीका द्रव पदार्थ निकलता है, उसे लसीका कहते हैं।

स्पर्शनम् —यहाँ त्वचा को केवल पित्त का स्थान कहा गया है। आप ध्यान दें—सुश्रुत ने ‘सप्त त्वचो भवन्ति’ (सु.शा. ४।४) अर्थात् सात त्वचाएँ होती हैं कहा है और चरक ने ‘शरीरे षट् त्वचः’ (च.शा. ७।४) अर्थात् छः त्वचाएँ होती हैं, स्वीकार किया है। इन दोनों आचार्यों के मतभेद की चर्चा हम शारीरस्थान में करेंगे। सुश्रुत ने पहली त्वचा का नाम अवभासिनी रखा है, इसमें ब्राजक नामक पित्त

वोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

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रहता है और पाँचवीं त्वचा का नाम 'वेदनी' है, इसी को स्पर्शनेन्द्रिय भी कहते हैं। वास्तव में बात का स्थान यही है, इसी से शीत-उष्ण स्पर्श का ज्ञान होता है।

उरःकण्ठशिरःक्लोमपर्वण्यामाशयो रसः । मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य, सुतरामुरः ॥ ३ ॥

कफ के प्रमुख स्थान—उरु ( छाती ), कण्ठ, सिर, क्लोम, पर्व ( सन्धियों ), आमाशय, रसधातु, मेदोधातु, घ्राण ( नासिका ) तथा जीभ ये सब कफ के स्थान हैं। प्रमुख रूप से कफ का स्थान उरुस् है ॥ ३ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने शरीरसंख्याव्याकरण नामक ५वें अध्याय के ५वें गद्य में जो त्वचा से स्रोतों तक के अवयवों की गणना की है, उसमें हृदय तथा फुफ्फुस आदि का समावेश किया गया है। अष्टाङ्गहृदय में इसका वर्णन शारीरस्थान अध्याय ३ में देखें। ये सब कफ के स्थान हैं।

प्राणदिभेदात्पञ्चात्मा वायुः—

बात के पाँच भेद—प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान भेद से यह बात पाँच प्रकार का होता है।

—प्राणोऽत्र मूर्धगः । उरःकण्ठचरो बुद्धिहृदयेन्द्रियचित्तधृक् ॥ ४ ॥

छीवनक्षत्रयुद्धारनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ।

पाँच बातों का वर्णन—उक्त पाँच बातों में प्राण नामक वायु शिरःप्रदेश में गतिशील रहता है। कण्ठ तथा उरःप्रदेश में उदानवायु विचरण करता हुआ बुद्धि, हृदय, सभी इन्द्रियों एवं मन को धारण करता है। यह छीवन ( थूकना तथा लालासाव ), छींक, उद्गार, निःश्वास तथा अन्नप्रवेश ( मुख से अन्न को भीतर ) की ओर ढकैलना कर्मों को करता है ॥ ४ ॥

वक्तव्य—चरक ने 'उत्तमाङ्ग' शिरःप्रदेश का वर्णन इस प्रकार किया है—'प्राणाः प्राणभूता यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते' ॥ ( च.सू. १७।१२ ) अर्थात् जहाँ प्राणियों के प्राण तथा सभी इन्द्रियाँ आश्रित रहती हैं और जो सभी अंगों में उत्तम अंग है, उसे सिर कहते हैं। सुश्रुत ने जबु के ऊपरी भाग में स्थित गरदन सहित अंगों को सिर कहा है और यह ३७ मर्मा का अधिष्ठान है। देखें—'जबुण'***अधिपतिरिति' । ( सु.शा. ६।६ )

उरःस्थानमुदानस्य नासानाभिंगलांश्चरेत् ॥ ५ ॥

वाक्प्रवृत्तिप्रयत्नोर्जाबलवर्णस्मृतिक्रियः ।

उदानवायु का वर्णन—उदानवायु का प्रमुख स्थान उरुस् ( छाती ) है। वह वायु नासिका ( नाक ), नाभि ( इसका परिचय श्लोक २ के वक्तव्य में ऊपर दिया गया है ) तथा गल ( कण्ठ ) प्रदेश में विचरण करता रहता है। वाक्प्रवृत्ति ( वाणी का निकलना ), प्रयत्न ( कर्म करने के प्रति उत्साह ), ऊर्जा ( शक्ति ), बल, वर्ण और स्मृति ये सब क्रियाएँ उसी वायु के अधीन हैं ॥ ५ ॥

व्यानो हृदि स्थितः कृत्स्नदेहचारी महाजवः ॥ ६ ॥

गत्यपक्षेपणोत्क्षेपनिमेषोन्मेषणादिकाः । प्रायः सर्वाः क्रियास्तस्मिन् प्रतिबद्धाः शरीरिणाम् ॥

व्यानवायु का वर्णन—व्यानवायु का प्रमुख स्थान हृदय है। यह वायु सम्पूर्ण शरीर में विचरण करता रहता है, क्योंकि यह अत्यन्त वेगवान् होता है। गति ( घूमते रहना ), अपक्षेपण ( अंगों को नीचे की ओर ले जाना ), उत्क्षेपण ( ऊपर की ओर ले जाना ), निमेष ( आँख बन्द करना ), उन्मेष ( आँख खोलना ), आदि शब्द से जैभाई आदि का ग्रहण—ये सभी क्रियाएँ व्यानवायु के अधीन होती हैं ॥ ६-७ ॥

वक्तव्य—व्यानवायु के जिन कर्मों की यहाँ चर्चा की गयी है, उनसे भी महत्त्वपूर्ण वर्णन शारीरस्थान ३।६८ में इनका किया है, उसका अवलोकन अवश्य कर लें।

समानोऽग्रिमसौपस्यः कोष्ठे चरति सर्वतः । अन्नं गृह्णाति पचति विवेचयति मुञ्चति ॥ ८ ॥

१७२

अष्टाङ्गहृदये

समानवायु का वर्णन—समानवायु पाचकाग्नि के समीप रहता है। यह कोष्ठप्रदेश में चारों ओर घूमता रहता है। यह आमाशय से अन्न को लेता है, फिर उसे पचाता है, उसकी विवेचना करता है और उस पके हुए आहार में से रस, मल तथा मूत्र को अलग-अलग करके उन्हें वयास्थान छोड़ देता है ॥८॥

अपानोऽपानगः श्रोणिबस्तिमेद्वोरुगोचरः । शुकार्तवशकृन्मूत्रगर्भनिष्क्रमणक्रियः ॥९॥

अपानवायु का वर्णन—अपानवायु प्रधानरूप से अपान (गुद) प्रदेश में रहता है। सामान्य रूप से कमर, बस्ति (मूत्राशय एवं मूत्रवाही श्रोतों), मेहन (मूत्रमार्ग) तथा ऊरुओं में पाया जाता है और यही शुक्र, आर्तव, मल, मूत्र, गर्भाशय से गर्भ को समय पर बाहर निकालना भी इसी का कार्य है ॥९॥

पित्तं पञ्चवात्सकं—

पित्त के पाँच भेद—पित्त के पाँच भेद इस प्रकार हैं—१. पाचक, २. रंजक, ३. साधक, ४. आलोचक तथा ५. भ्राजक।

—तत्र पञ्चमाशयमध्यगम्। पञ्चभूतात्सकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयात् ॥१०॥

त्यक्तद्रवत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम्। पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा ॥११॥

तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम्। करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्समूतम् ॥१२॥

पाचक पित्त का वर्णन—उक्त पाँच पित्तों में जो पित्त पञ्चमाशय तथा आमाशय के मध्यभाग (क्षुद्रान्न) में गतिशील होता है और जो पञ्चमहाभूतात्सक होने पर भी तैजस् (आग्नेय) गुण की प्रधानता के कारण जिसने अपना द्रव स्वरूप छोड़ कर कठिन (अग्नि) रूप धारण कर लिया है और पाचन आदि कर्मों को करने के कारण जो अग्नि संज्ञा को धारण कर लिया है। जो खाये हुए आहार को पचाता है तथा सार (रस) एवं किट्ट (मल-मूत्र) को विभाजित करता है। वही रहकर रंजक आदि पित्तों को जो शक्ति प्रदान करके उनके ऊपर कृपा करता है, उसे 'पाचक पित्त' कहते हैं ॥१०-१२॥

आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं रसरंजनात्।

रंजक पित्त का वर्णन—जो पित्त आमाशय में रहता है, वह रस को रंग देने के कारण रंजक पित्त कहा जाता है।

वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार—'स खलु आप्यो रसो यकृत्-प्लीहानी प्राप्य रागमुपैति'। (सु.सू. १४४) अर्थात् शरीर का पोषक रसघातु ही यकृत-प्लीहा में पहुँचकर ललिमा को प्राप्त हो जाता है। और भी देखें—'यत्तु यकृत्प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा'। (सु.सू. २१॥१०) अर्थात् जो पित्त यकृत-प्लीहा में रहता है, उसका नाम 'रंजक पित्त' है। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट का यह पाठ 'आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं' समुचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ वाग्भट का उक्त कथन आधुनिक विचारों से प्रभावित है, ऐसा लगता है। देखें—यह आमाशयाश्रय पित्त 'हाइड्रोक्लोरिक अम्ल' नामक वह आमाशयिक रस है जो पित्त की भाँति खाये हुए आहार को पचाने में सहायक होता है और उसके मिश्रण से यकृत-प्लीहा में पहुँचने पर वही रस राग को पाकर रक्त का रूप धारण कर लेता है। यही चरितार्थता है वाग्भट के उक्त वचनों की।

बुद्धिमेधाभिमानाद्यैरभिप्रेतार्थसाधनात् ॥१३॥

साधकं हृन्नतं पित्तं—

साधक पित्त का वर्णन—जो पित्त हृदय में रहता है, उसे 'साधक पित्त' कहते हैं। यह पित्त बुद्धि, मेधा, अभिमान (अहंकार) आदि द्वारा इच्छित पदार्थों की सिद्धि करता है ॥१३॥

—रूपालोचनतः स्मृतम्। दूकस्थमालोचकं—

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७३

आलोचक पित्त का वर्णन—जो पित्त दृष्टिगण्डल में रहता है, उसे आलोचक पित्त कहते हैं। यह पित्त रूप (स्वरूप, आकार या वर्ण) को देखने में उपयोगी (सहायक) होता है।

—त्वकस्यं भ्राजकं भ्राजनात्त्वचः ॥ १४ ॥

भ्राजक पित्त का वर्णन—जो पित्त सबसे बाहरी अतएव प्रथम (अवभासिनी) त्वचा में रहता है वह त्वचा को कान्तियुक्त करता है, इसीलिए इसे 'भ्राजक पित्त' कहते हैं ॥ १४ ॥

वक्तव्य—त्वचागत द्रव में जो पीलापन दिखलायी देता है, यही भ्राजक पित्त है। इसी से त्वचा में चमकीलापन दिखलायी देता है।

श्लेष्मा तु पञ्चधा—

कफ का वर्णन—शरीर में कफ भी पाँच प्रकार का होता है—१. अवलम्बक, २. क्लेदक, ३. बोधक, ४. तर्पक तथा ५. श्लेषक—ये उसके नाम हैं।

—उरस्यः स त्रिकस्य स्ववीर्यतः । हृदयस्यान्नवीर्याच्च तत्स्य एवाम्बुक्कर्मणा ॥ १५ ॥

कफधात्मां च शेषाणां यत्करोत्यवलम्बनम् । अतोऽबलम्बकः श्लेष्मा—

अवलम्बक कफ का वर्णन—जो कफ उरःप्रदेश में रहता है वह अपनी शक्ति से त्रिकास्थि का तथा आहार से हृदय का अवलम्बन (सहारा) करता है और वहाँ (हृदय में) रहकर जलकर्म द्वारा आमाशय आदि दूसरे कफस्थानों की भी सहायता (अवलम्बन) करता है, अतएव इसे 'अवलम्बक' कहा जाता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य—'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' । (सु.सू. १।२२) के अनुसार शरीर में स्थित जल तत्त्व 'कफ' की संज्ञा है। इसी को श्लेष्मा भी कहते हैं। देखें—सु.सू. २१।१४। इस प्रकार ये वात-पित्त-कफ क्रमशः यहाँ वायु, अग्नि एवं जल तत्त्वों के प्रतिनिधि हैं; इन्हीं से शरीर की उत्पत्ति होती है। देखें—'वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भव हेतवः' । (सु.सू. २१।३) ध्यान रहे, जलतत्व में कुछ अंश पृथिवी तत्व का भी होता है, अतएव इसमें स्थिरता तथा गुठ्ठा बनी रहती है।

—यत्स्वामाशयसंस्थितः ॥ १६ ॥

क्लेदकः सोऽन्नसङ्गतक्लेदनात्—

क्लेदक कफ का वर्णन—जो कफ आमाशय में रहकर अपना कार्य करता है वह अन्न (आहार-समूह) को गीला करता है, अतः इसे 'क्लेदक' कहते हैं ॥ १६ ॥

—रसबोधनात् । बोधको रसनास्थायी—

बोधक कफ का वर्णन—जो कफ रसना (जीभ) में रहता है वह वहाँ रहकर मधुर आदि रसों का बोध कराता है, अतएव उसे 'बोधक' कहते हैं।

—शिरःसंस्थोऽक्षतर्पणात् ॥ १७ ॥

तर्पकः—

तर्पक कफ का वर्णन—जो कफ सिर (मस्तिष्क) में रहता है वह सभी ज्ञानेन्द्रियों का तर्पण करता है अर्थात् इन्द्रियों को अपने सहयोग से नुप्त करता है, अतएव इसे 'तर्पक' कहते हैं ॥ १७ ॥

—सन्धिंसंश्लेषाच्छ्लेषकः सन्धिषु स्थितः ।

श्लेषक कफ का वर्णन—जो कफ शरीर के सन्धिस्थलों में रहता है वह सन्धियों को सटाता है, अतः उसे 'श्लेषक' कहते हैं।

वक्तव्य—यहाँ एक-एक वात, पित्त, कफ के पाँच-पाँच नाम रखकर जो उनका परिचय दिया गया है, वह उनके कार्यक्षेत्रों के नाम हैं। जैसे एक ही व्यक्ति सम्बन्ध-विशेष से पिता, चाचा, मामा, भाई

१७४

अष्टाङ्गहृदये

आदि कहा जाता है; ऐसे ही कार्यभेद से उसके भिन्न-भिन्न नाम हो जाते हैं, वैसी ही उक्त संज्ञाएँ बात आदि दोषों की भी निर्धारित की गयी हैं।

इति प्रायेण दोषाणां स्थानान्यविकृतात्मनाम् ॥ १८ ॥

व्यापिनासपि जानीयात्कर्मणि च पृथक्पृथक् ।

उपसंहार—यहाँ तक अविकृत अर्थात् प्रकृतिस्थ बात, पित्त तथा कफ नामक दोषों और उनके पाँच-पाँच भेदों के प्रमुख स्थानों एवं उनके कार्यो का वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि उक्त बात आदि दोष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं, फिर भी उनके उक्त कर्मों के कारण उनके मानवशरीर में भिन्न-भिन्न स्थानों को समझ लेना चाहिए ॥ १८ ॥

उष्णेन युक्ता रुक्षाद्या वायोः कुर्वन्ति सञ्चयम् ॥ १९ ॥

शीतेन कोपमुष्णेन शमं स्निग्धादयो गुणाः ।

बात के चय, कोप, शम का वर्णन—उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष का संचय करते हैं, शीतवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष को प्रकृपित करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वातदोष का शमन करते हैं ॥ १९ ॥

वक्तव्य—रुक्ष आदि गुण—रुक्ष, शीत, खर, सूक्ष्म, चल तथा विशद इत गुणों वाले पदार्थों का सेवन करने से वातदोष की वृद्धि होती है, क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम्' अथवा 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' आदि अनेक प्रमाण हैं। यह वृद्धि संचय तथा प्रकोप रूप से दो प्रकार की होती है। ध्यान दें—यदि रुक्ष आदि (उपर्युक्त) गुणों वाले द्रव्यों का सेवन उष्णवीर्य वाले द्रव्यों के साथ किया जायेगा तो उसका संचय तो होगा किन्तु प्रकोप नहीं होगा, इसका ध्यान सर्वत्र रखें।

शीतेन युक्तास्तीक्ष्णाद्याश्रयं पित्तस्य कुर्वते ॥ २० ॥

उष्णेन कोपं, मन्दाद्याः शमं शीतोपसंहिताः ।

पित्त के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का संचय करते हैं, उष्णवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष को प्रकृपित करते हैं और शीतवीर्य से युक्त मन्द आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का शमन करते हैं ॥ २० ॥

वक्तव्य—तीक्ष्ण आदि गुण—तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्ण, लघु, विन्न, सर तथा द्रव गुण वाले अम्ल, लवण तथा कटु रस वाले। उक्त गुणों वाले पदार्थों का सेवन यदि शीतवीर्य पदार्थों के साथ किया जाता है, तो पित्त का संचय होता है, किन्तु शीतवीर्य पदार्थों के कारण पित्त का प्रकोप नहीं होने पाता।

शीतेन युक्ताः स्निग्धाद्याः कुर्वते श्लेष्मणश्रयम् ॥ २१ ॥

उष्णेन कोपं, तेनेव गुणा रुक्षादयः शमम् ।

कफ के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुणवाले पदार्थ कफदोष का संचय करते हैं। उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का प्रकोप करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का शमन करते हैं ॥ २१ ॥

वक्तव्य—स्निग्ध आदि गुण—स्निग्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मुक्तन, स्थिर, मुदु, मधुर तथा पिच्छिल गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष का संचय तो होता है, किन्तु उसका प्रकोप नहीं होता, क्योंकि शीतवीर्य द्रव्यों के प्रभाव से कफदोष जमा रहता है और इसके विपरीत उष्णवीर्य वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष पिघल कर कुपित हो जाता है।

चयो वृद्धिः स्वधान्येव प्रहेषो वृद्धिहेतुषु ॥ २२ ॥

दोषभेदीयाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

१७५

विपरीतगुणेच्छा च—

दोषों के चय का वर्णन—इसके पहले इसी अध्याय में बात आदि दोषों के स्थानों का वर्णन किया जा चुका है। जब बात आदि दोषों की वृद्धि अपने ही स्थानों में होती है, उसे आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार चय या संचय कहा जाता है। इस स्थिति में जिन कारणों से उक्त दोषों की वृद्धि हुई है, उन कारणों के प्रति विशेष करके द्वेष हो जाता है और उक्त कारणों के विपरीत कारणों (आहार-विहारों) के प्रति इच्छा अर्थात् उनके सेवन करने के प्रति रुचि बलवती होती है ॥ २२ ॥

—कोपस्तूष्मार्गागमिता । लिङ्गानां दर्शनं स्वेष्टामस्वास्थ्यं रोगसम्भवः ॥ २३ ॥ स्वस्थानस्थस्य समता विकारासम्भवः शमः ।

दोषों के प्रकोप का वर्णन—बात आदि दोषों का जो उन्मार्ग (विलोम) गमन होता है, उसे 'कोप' या 'प्रकोप' कहते हैं। दोषों का प्रकोप होने पर उन-उन के लक्षण दिखलाये देते हैं। मनुष्य को अस्वस्थता का अनुभव होने लगता है, फिर रोग-विशेष की उत्पत्ति हो जाती है और जब बात आदि दोष अपने-अपने स्थान में रहते हैं तब रोगों की उत्पत्ति नहीं होती। इसी को समता (साम्यावस्था) अथवा 'शम' कहते हैं ॥ २३ ॥

चयप्रकोपप्रशमा वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु ॥ २४ ॥ वर्षादिषु तु पित्तस्य, श्लेष्मणः शिशिरादिषु ।

चय, कोप, प्रशम का वर्णन—अब कालस्वभाव के अनुसार बात आदि दोषों के चय, प्रकोप और प्रशम का परिचय दिया जा रहा है—ग्रीष्म ऋतु में वातदोष का चय, वर्षा ऋतु में प्रकोप और शरद् ऋतु में प्रशम होता है। वर्षा ऋतु में पित्तदोष का चय, शरद् ऋतु में प्रकोप तथा हेमन्त ऋतु में प्रशम होता है। शिशिर ऋतु में कफदोष का चय, वसन्त ऋतु में प्रकोप एवं ग्रीष्म ऋतु में प्रशम होता है ॥ २४ ॥

चीयते लघुरुक्षामिरोषधीभिः समीरणः ॥ २५ ॥

तद्विधस्तद्विधे देहे कालस्यौष्यान्न कृष्यति । अद्विरस्त्वपिकाभिरोषधीभिश्च तादृशम् ॥ २६ ॥ पित्तं याति च्यं कोपं न तु कालस्य शैत्यतः । चीयते स्निग्धशीताभिरुदकीषधिभिः कफः ॥ तुल्येऽपि काले देहे च स्कन्तत्वात्र प्रकृतिः ।

चय आदि का विशेष वर्णन—ग्रीष्म ऋतु में लघु एवं रुक्ष गुणों वाली औषधियों के सेवन करने से लघु तथा रुक्ष गुण-प्रधान शरीर में लघु एवं रुक्ष गुण वाले वातदोष का संचय तो हो जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की उष्णता के कारण वह वातदोष प्रकृपित नहीं होता। वर्षा ऋतु में जल तथा औषधियों का विपाक अम्ल होता है, अतः अम्लविपाक वाले पित्त का संचय हो जाता है, किन्तु वर्षा काल की शीतता के कारण वह कुपित नहीं होता। हेमन्त ऋतु में स्निग्ध एवं शीतल जल तथा औषधियों से स्निग्ध तथा शीत गुण वाले कफ का संचय तो हो जाता है, किन्तु काल एवं शरीर के समान गुण वाला होने पर भी जमा हुआ कफदोष प्रकृपित नहीं हो पाता ॥ २५-२७ ॥

वक्तव्य—इस प्रसंग में 'औषधीभिः' पद का प्रयोग 'आहार' के अर्थ में हुआ है। आप देखें—'नानौषधि-भूतं जगति किञ्चिद् विद्यते' इस सूक्ति से सम्पूर्ण द्रव्य या पदार्थ औषधि हैं। यहाँ सूक्ष्म की निम्न सूक्ति का भी अवश्य स्मरण कर लेना चाहिए—'सञ्चयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंशयम्'। व्यक्ति भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद् भिषक् ॥ (सु.सु. २१।३६) अर्थात् जो दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रसर काल को, स्थानसंशय को तथा रोगव्यक्ति के भेदों (पूर्वक, रूप) को जानता है, वास्तव में वही चिकित्सक है।

इति कालस्वभावोऽयमाहारादिवशात् पुनः ॥ २८ ॥ चयादीन् यान्ति सद्योऽपि दोषाः कालेऽपि वा न तु ।

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अष्टाङ्गहृदये

कालस्वभाव का वर्णन—यह सब काल (ऋतु) का स्वभाव है अथवा उसका प्रभाव है और यह आहार-विहार के प्रभाव से तत्काल या असमय में भी बात आदि दोषों का चय (संचय), प्रकोप अथवा प्रशम हो जाता है और कभी उक्त कालों में बात आदि दोषों का चय, कोप, प्रशम नहीं भी होता॥ २८॥

वक्तव्य—इन विषयों का विस्तृत वर्णन—सु.सू. ६ सम्पूर्ण में देखें।

व्याप्नोति सहसा देहमापादतलमस्तकम्॥ २९॥

निवर्तते तु कुपितो मलोऽल्पान् जलोघवत्॥

दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति—कुपित हुआ दोष पैरों से लेकर चोटी तक अर्थात् सम्पूर्ण शरीर में सहसा (एकाएक) फैल जाता है, परन्तु जब वह शान्त होता है तो धीरे-धीरे पानी के बहाव की भाँति। वास्तव में यह स्थिति वातज विकारों की ही होती है, अन्य की नहीं॥ २९॥

नानारूपैरसङ्ख्येयैर्विकारैः कुपिता मलाः॥ ३०॥

तापयन्ति तन् तु तस्मात्तद्वेत्वाकृतिसाधनम्। शक्यं नैकैकशो वक्तुमतः सामान्यमुच्यते॥ ३१॥

निदान, रूप, चिकित्सा वर्णन—अपने प्रकोपक कारणों से कुपित हुए अनेक लक्षणों वाले वात आदि दोष अनशिनत रोगों द्वारा शरीर को पीड़ित कर देते हैं, अतएव प्रत्येक रोग के निदान, आकृति (पूर्वरूप तथा रूप) तथा साधन (चिकित्सा) का वर्णन यहाँ (सूत्रस्थान में) नहीं किया जा सकता, इसलिए यहाँ उनका सामान्य वर्णन कर दिया गया है॥ ३०-३१॥

दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्। यथा पक्षी परिपतन् सर्वतः सर्वमप्यहः॥ ३२॥

छायामत्येति नात्सीयां यथा वा कृत्स्नमप्यदः। विकारजातं विविधं त्रीन् गुणात्रातिवर्तते॥ ३३॥

तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्तमपि सर्वदा। विकारजातं त्रीन् दोषान्—

रोगों की उत्पत्ति के कारण—सभी प्रकार के रोगों की उत्पत्ति के एक मात्र कारण वात आदि दोष ही हैं। जैसे—पक्षी दिनभर चारों ओर उड़ता हुआ भी अपनी छाया का अतिक्रमण नहीं कर पाता, अथवा (नूसरा उदाहरण देते हैं—) यह विकार-समूह अनेक प्रकार का होता हुआ भी सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीनों गुणों का अतिक्रमण नहीं कर पाता; उसी प्रकार शरीर में स्थित वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरोष आदि मलों की विषमता से उत्पन्न यह विकार (रोग) समूह वात आदि दोषों का भी अतिक्रमण नहीं कर सकता॥ ३२-३३॥

—तेषां कोपे तु कारणम्॥ ३४॥

अयैरसात्यैः संयोगः कालः कर्म च दुष्कृतम्। हीनातिमिथ्यायोगेन भिद्यते तत्पुनस्त्रिधा॥ ३५॥

दोषों के प्रकोप का कारण—उक्त वात आदि दोषों के कारण हैं—असात्य (प्रतिकूल) अर्थों (विषयों) के साथ इन्द्रियों का संयोग, काल (शीत, उष्ण आदि का प्रभाव) तथा दुष्कृत कर्मों का प्रभाव। फिर इन कारणों के भी तीन भेद होते हैं—हीनयोग, अतियोग और मिथ्यायोग॥ ३४-३५॥

वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने इस सम्पूर्ण विषय को इस प्रकार कहा है—‘सर्वेषां’...‘व्याधिरिति’। (सु.सू. २४४) अर्थात् सब रोगों के मूल कारण वात, पित्त, कफ ही हैं। क्योंकि सभी रोगों में वात आदि दोषों के लक्षण दिखायी देते हैं तथा तदनुसार चिकित्सा करने से लाभ होता है। शास्त्र भी इस बात का समर्थन करता है। जिस प्रकार महत् आदि २४ तत्त्व जगत् रूप में स्थित होते हुए भी सत्त्व, रजस्, तमस् तत्वों से अलग नहीं होते, वैसे ही रोगों की भी स्थिति है। दोषों द्वारा रसादि धातुओं के दूषित होने से रस आदि की दूष्य संज्ञा हो जाती है। दोषज रोगों में यह रसज तथा यह रक्तज रोग है, इस प्रकार का व्यवहार होता ही है।

हीनोऽर्थेनन्दिश्यत्याल्पः संयोगः स्वेन नैव वा। अतियोगोऽतिसंसर्गः सूक्ष्मभासुरभैरवम्॥ ३६॥

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७७

अत्यासन्नातिदूरस्थं विप्रियं विकृतादि च । यदक्षणा बीक्ष्यते रूपं मिथ्यायोगः स दारुणः ॥ ३७ ॥ एवमत्युच्चपूत्यादीनिन्द्रियार्थान् यथाययम् । विद्यात्—

हीनयोग आदि का वर्णन—चक्षु ( नेत्र ) आदि इन्द्रियों का अपने रूप आदि विषयों के साथ थोड़ा संयोग अथवा संयोग का अभाव 'हीनयोग' कहा जाता है, अधिक योग को 'अतियोग' कहते हैं। चक्षुरिन्द्रिय द्वारा जो अतिसूक्ष्म, अधिक चमकीला, अतिभयानक, अतिसमीपस्थ, अतिदूरस्थ, अतिअप्रिय या अधिक विकार युक्त जो रूप देखा जाता है, वह चक्षुरिन्द्रिय का मिथ्यायोग कहा जाता है। यह अत्यन्त हानिकारक होता है। इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय, प्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और स्पर्शनेन्द्रिय के भी अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग की कल्पना कर लेनी चाहिए ॥ ३६-३७ ॥

—कालस्तु शीतोष्णवर्षाभेदात् त्रिधा मतः ॥ ३८ ॥

स हीनो हीनशीतादिरित्योगोऽतिलक्षणः । मिथ्यायोगस्तु निर्दिष्टो विपरीतस्त्वलक्षणः ॥ ३९ ॥

काल का वर्णन—काल तीन प्रकार का होता है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। जिस काल में उस ऋतु के थोड़े लक्षण दिखलायी पड़ते हैं, वह उस काल का हीनयोग है, जिसमें उस काल के अधिक लक्षण होते हैं, वह उस काल का अतियोग है और जिसमें उस काल के स्वाभाविक लक्षणों से विपरीत लक्षण होते हैं, वह उस काल का 'मिथ्यायोग' है ॥ ३८-३९ ॥

कायवाकृचित्भेदेन कर्मापि विभजते त्रिधा । कायादिकर्मणो हीना प्रवृत्तिर्हीनसंज्ञकः ॥ ४० ॥

अतियोगोऽतिवृत्तित्पु, वेगोदीरणधारणम् । विषमाङ्गक्रियारम्भपतनस्त्वलादिकम् ॥ ४१ ॥

भाषणं सामिभूक्तस्य रागद्वेषभयादि च । कर्म प्राणातिपातादि दशधा यच्च निन्दितम् ॥ ४२ ॥ मिथ्यायोगः समस्तोऽसाविह वाऽमुत्र वा कृतम् ।

कर्म का वर्णन—कर्म तीन प्रकार का होता है—१. कायकर्म, २. वाक्कर्म तथा ३. चित्तकर्म। कायकर्म आदि की स्वल्प वृत्ति का नाम 'हीनयोग', उसकी अत्यधिक वृत्ति का नाम 'अतियोग' एवं पूरीप आदि के वेगों को प्रेरित करना अथवा इनके वेगों को रोकना, हाथ-पैर आदि अंगों से विषम कर्म या कर्मों को करना, गिरना, फिसल जाना आदि कायकर्मों का मिथ्यायोग कहा गया है। आधा आहार निगला जा रहा हो, उस समय का बोलना वाक्कर्म का 'मिथ्यायोग' है। राग, द्वेष, भय तथा शोक आदि भाव 'चित्तकर्म' के 'मिथ्यायोग' हैं। प्राणातिपात ( आत्महत्या ) आदि कर्म, जिनका वर्णन अ.हू.सू. १।२२ में किया गया है, वे सब इस लोक अथवा उस लोक में किया गया काय, वाक् तथा चित्त के कर्मों का मिथ्यायोग है ॥ ४०-४२ ॥

वक्तव्य—इस विषय की चर्चा च.सू. ११, च.नि.१, च.शा. १।९८ में द्रष्टव्य है।

निदानमेतद्वोषाणां, कुपितास्तेन नैकधा ॥ ४३ ॥

कुर्वन्ति विविधान् व्याधीन् शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु ।

उपसंहार एवं रोगमार्ग—यह बात आदि दोषों के हीनयोग, अतियोग तथा मिथ्यायोग का निदान कह दिया गया है। ये बात आदि दोष कुपित हो जाने पर अनेक प्रकार के शाखागत, कोष्ठगत तथा अस्थिसन्धिगत रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ४३ ॥

वक्तव्य—'शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु'—इनको महर्षि पुनर्वसु ने रोगमार्ग कहा है। देखें—'त्रयो रोग-मार्गाः' 'मार्ग आभ्यन्तरः' । ( च.सू. ११।४८ ) अर्थात् ये तीन रोगमार्ग हैं, जिनसे विविध प्रकार के रोगों का शरीर के भीतर प्रवेश होता है। इस प्रकरण में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा को भी शाखा संज्ञा प्रदान की गयी है।

शाखा रक्तादयस्त्वक् च बाहुरोगेनायनं हि तत् ॥ ४४ ॥

तदाश्रया मषव्यङ्गण्डालज्यर्बुदादयः । बहिर्भागाश्च दुर्निमगुलमशोफादयो गवाः ॥ ४५ ॥

१२ अ० ह०

१७८

अष्टाङ्गहृदये

बाहरी रोगमार्ग—इस प्रसंग में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा का नाम भी 'शाखा' है, यह बाह्य रोगमार्ग है। इस रोगमार्ग में आश्रित मष (मषक, मत्से, तिल आदि), व्यंग (झाई), गण्ड (घेचा), अलजी, अर्बुद आदि रोग और शरीर के बाह्यमार्ग में अर्श, गुल्म, ब्रण तथा शोथ आदि भी होते हैं ॥ ४४-४५ ॥

अन्तःकोष्ठो महास्रोत आमपक्वाशयाश्रयः। तत्स्थानाः ज्वरतीतीसारकासश्चासोदरज्वराः ॥ अन्तर्भागं च शोफाशौगुल्मबीसर्पविद्रधिः।

आभ्यन्तर रोगमार्ग—आभ्यन्तर (भीतरी) रोगमार्ग के पर्यायवाचक शब्द इस प्रकार हैं—अन्तः, कोष्ठ, महास्रोतस, आमाशय तथा पक्वाशय (इन दोनों के बीच में स्थित क्षुद्रान्त भी)। ये छर्दि (वमन), अतिसार, कास, श्वास, उदररोग तथा ज्वर आदि रोगों की उत्पत्ति के स्थान हैं। भीतरी शोथ, अर्श, गुल्म, विसर्प और विद्रधि का भी स्थान है। इसे आभ्यन्तर रोगमार्ग कहते हैं ॥ ४६ ॥

शिरोहृदयबस्त्यादिमर्माण्यस्त्यां च सन्ध्यः ॥ ४७ ॥

तन्निबद्धाः शिरान्त्यायुक्कण्डराद्याश्च मध्यमः। रोगमार्गः स्थितास्तत्र यक्षमपक्षवर्धारिताः ॥ ४८ ॥

मूध्ादिरोगाः सन्ध्यस्थित्रिकशूलग्रहादयः।

मध्यम रोगमार्ग—सिर, हृदय, बस्ति आदि मर्म और अस्थियों की सन्धियाँ एवं इनसे सम्बन्धित सिरा, स्नायु और कण्डराएँ आदि ये सभी 'मध्यम रोगमार्ग' हैं। इनमें होने वाले रोग राजयक्ष्मा, पक्षाघात, अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) आदि वातविकार, शिरोरोग, हृदयरोग आदि, सन्धिशूल, अस्थिशूल, त्रिकशूल तथा ग्रह (जकड़न) आदि रोग हैं ॥ ४७-४८ ॥

संसव्यासन्व्यहस्वापसादरुक्तोदभेदनम् ॥ ४९ ॥

सङ्गाङ्गभङ्गसङ्कोचवर्तहर्षणतर्पणम् । कम्पपारुष्यसौषिष्यशोघस्पन्दनवेष्टनम् ॥ ५० ॥

स्तम्भः कषायरस्ता वर्णः श्यावोऽरुणोऽपि वा। कर्माणि वायोः—

वातदोष के कर्म—स्रम (शरीर के किसी अंग का अपने स्थान से खिसक जाना), व्यास ( फैल जाना), व्यध (बिघने की जैसी पीड़ा का होना), स्वाप (अंग-विशेष का सुख हो जाना), साद (अवसाद), रुक् (पीड़ा), तोद (सूर्द चुभने की-सी पीड़ा), भेदन (फटने की-सी पीड़ा), संग (हकावट), अंगों का टूटना या टूटने की-सी पीड़ा का होना, संकोच (सिकुड़ जाना), वर्त (घूमना या ऐटना—आवर्त, परिवर्त, विवर्त आदि इसी के रूप हैं), हर्षण (रोमांच), तर्पण (तृषा या प्यास का लगना), कम्प (कैंपकैपी), पारुष्य (खुरदरापन), सौषिष्य (खोखलापन), शोष (सूखना), स्पन्दन (फड़कना), वेष्टन (लपेटना), स्तम्भ (जकड़ जाना), मुख में कसैलेपन का अनुभव होना और उस स्थान का वर्ण श्याव (काला) या अरुण वर्ण का हो जाना—ये सभी वातदोष के कर्म हैं ॥ ४९-५० ॥

—पित्तस्य दाहरागोष्मपाकिताः ॥ ५१ ॥

स्वेदः क्लेदः सूतिः कोथः सदनं मूर्च्छनं मदः। कटुकाम्लो रसो वर्णः पाण्डुरारुणवर्जितः ॥ ५२ ॥

पित्तदोष के कर्म—दाह, लालिमा, उष्णता का अनुभव, पकना या पकाना, स्वेद (पसीना), क्लेद (सड़न), स्राव, कोथ (दुर्गन्धित सड़न), सदन (अवसाद), मूर्च्छा, मद (नशा की स्थिति), मुख में कटु तथा अम्ल रस का अनुभव होना तथा पित्तदोष से युक्त स्थान का वर्ण पाण्डु तथा अरुण से रहित अतएव अन्य वर्णों वाला होना—ये लक्षण होते हैं ॥ ५१-५२ ॥

श्लेष्मणः स्नेहकाठिन्यकण्डूशीतत्वगौरवम्। बन्धोपलेपस्तैमित्यशोफापकल्पतिनिद्रताः ॥ ५३ ॥

वर्णः श्वेतो रसो स्वादुलवणो चिरकारिता।

कफदोष के कर्म—स्निग्धता (चिकनापन), कठोरता, खजुली का होना, हाथ-पैरों में शीत का अनुभव होना, भारीपन, बन्ध (स्रोतों में हकावट), उपलेप (जीभ के ऊपर मैल की पत का जमनः),

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७९

चिपचिपाहट्, सूजन, पाक का न होना, नींद का अधिक आना (यही कारण है कि कफप्रकृति के प्राणी अधिक मोते हैं; जैसे—भैंस), वर्ण सफेद, रस मधुर एवं नमकीन और किसी भी कार्य को देर से करना ॥५३॥

इत्यशेषामयव्यापि यदुक्तं दोषलक्षणम् ॥५४॥

दर्शनाचैरवहितस्तत्सम्भूगुपलक्षयेत् । व्याध्यवस्थाविभागजः पश्यन्त्रार्तन् प्रतिक्षणम् ॥५५॥

दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु—यहाँ तक बात-पित्त-कफदोषों के लक्षण कहे गये हैं, जो उन-उन के सभी रोगों में पाये जाते हैं। शास्त्रनिर्देशानुसार रोगों की अवस्था के विभागों (भेदों) को जानने वाला चिकित्सक प्रतिक्षण देखता हुआ सावधान होकर उक्त दोषों का परीक्षण—दर्शन, स्पर्शन आदि विधियों से रोगी के शरीर में करे ॥५४-५५॥

अभ्यासात्प्राप्यते दृष्टिः कर्मसिद्धिप्रकाशिनी । रत्नाविदसदस्ज्जनं न शास्त्रादेव जायते ॥५६॥

चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व—चिकित्साविधि को तथा बात आदि दोषों के लक्षणों को बार-बार ध्यानपूर्वक देखने से चिकित्सा में सफलता दिलाने वाली दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इसी दृष्टि से कर्म (चिकित्सा) में सिद्धि मिलती है। यह वह दृष्टि है जिससे जीहरी देखते ही पहचान लेता है कि यह रत्न ठीक है या दोषयुक्त। यह ज्ञान केवल शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त नहीं होता ॥५६॥

वक्तव्य—शास्त्रकार का यह पारम्परिक निर्देश चिकित्सक होने की इच्छा वाले व्यक्ति के लिए कहा गया है। महर्षि सुश्रुत का भी यही मत है—‘अधिगत’ ‘प्रवेष्टव्या’। (सु.सू. १०।३) अर्थात् बार-बार शास्त्रों तथा चिकित्सा-कर्मों का अभ्यास करने के बाद ही चिकित्सक को विशिखा (कर्मभूमि) में प्रवेश करना चाहिए। और भी देखें—‘उभयजो हि भिषग् राजाहं भवति’। (सु.सू. ३।४७) तथा ‘यस्तुभयजो मतिमान् स समर्थोऽर्थसाधने। आहवे कर्म निर्वाह् द्विचक्रः स्यन्दनो यथा’ ॥ (सु.सू. ३।५३) दोनों ही उद्धरणों के अर्थ स्पष्ट हैं। वे सभी लक्षण सुव्यय चिकित्सक के हैं।

दृष्टापचारजः कश्चित्कश्चिस्तूषपिपराधजः । तत्सङ्ग्राहवत्यन्तो व्याधिरिव त्रिधा स्मृतः ॥५७॥

रोगों के तीन भेद—रोगों के भेदों की चर्चा प्रस्तुत है—१. जो देखकर मिथ्या आहार-विहार के सेवन करने से होता है, वह प्रथम, २. जो पूर्वजन्म के अपराधों से होता है, वह दूसरा और ३. जो उक्त दोनों कारणों के संयोग से होता है, वह तीसरा भेद है ॥५७॥

यथानिदानं दोषोत्पत्तः कर्मजो हेतुभिर्विना । महारम्भोऽल्पके हेतावातङ्गो दोषकर्मजः ॥५८॥

रोगों का परिचय—प्रथम प्रकार के रोग को ‘दोषोत्पत्त’ (बात आदि दोषों से उत्पन्न) कहते हैं। यह रोग अपने निदान के अनुसार होता है। दूसरे प्रकार का रोग ‘कर्मज’ होता है। इसमें दोषज रोग की भांति कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता। तीसरे प्रकार के रोग का नाम है—‘कर्मदोषज’। यह रोग थोड़ा-सा भी कारण होने पर बहुत कष्टदायक होता है ॥५८॥

विपक्षशीलनात्पूर्वः कर्मजः कर्मसङ्ख्यात् । गच्छत्युभयजन्मा तु दोषकर्मक्षयात्म्यम् ॥५९॥

त्रिविध रोग-चिकित्सा—प्रथम ‘दोषोत्पत्त रोग’ विपक्षशीलन से अर्थात् जिन आहार-विहारों का सेवन करने से रोग की उत्पत्ति हुई हो, उनके विपरीत पदार्थों का सेवन करने से तथा तदनुरूप चिकित्सा करने से शान्त हो जाता है। दूसरा ‘कर्मज रोग’ कर्मों के क्षीण हो जाने पर शान्त हो जाता है और तीसरा ‘कर्मदोषज रोग’ दोष तथा कर्म का क्षय होने पर शान्त हो जाता है ॥५९॥

वक्तव्य—शास्त्रानुकूल विधिवत् चिकित्सा करने से भी जो रोगी रोगमूक्त न हो रहा हो, उस समय उक्त दृष्टिकोण को ध्यान में रखना चाहिए और रोगी के परिजनों को भी समझाना चाहिए कि इसके ठीक न होने में यह प्रधान कारण है।

द्विधा स्वपरतन्त्रत्वाद्ब्याधयोऽल्प्याः पुनर्द्विधा ।

१८०

अष्टाङ्गहृदये

रोगों के दो भेद—स्वतन्त्र तथा परतन्त्र भेद से रोग पुनः दो प्रकार के होते हैं। इनमें परतन्त्र रोग भी दो प्रकार के होते हैं।

पूर्वजाः पूर्वरूपाख्या, जाताः पश्चादुपद्रवाः ॥ ६० ॥

रोगभेदों के नाम—परतन्त्र रोग के दो भेद—१. पूर्वज और २. पश्चात्जात। पूर्वरूपों को ही पूर्वज रोग कहते हैं और जो रोग के अन्त में उत्पन्न होते हैं, उन्हें 'उपद्रव' (पश्चात्जात) नाम से कहा जाता है। ॥ ६० ॥

यथास्वजन्मोपशयाः स्वतन्त्राः स्पष्टलक्षणयाः ।

स्वतन्त्र रोग—स्वतन्त्र रोग वे हैं, जो अपने-अपने निदानोक्त कारणों से पैदा होते हैं और तदनुकूल चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार के रोगों के लक्षण भी स्पष्ट होते हैं।

विपरीतास्ततोऽन्ये तु—

परतन्त्र रोग—परतन्त्र रोग स्वतन्त्र कहे जाने वाले रोगों से विपरीत होते हैं।

—विद्यादेवं मलानपि ॥ ६१ ॥

मलों का विचार—इसी प्रकार प्रत्येक रोग में विकारों को पैदा करने वाले मलों (दोषों) को भी समझ लेना चाहिए ॥ ६१ ॥

तांलक्षयेदबहिर्तो विकुर्वाणान् प्रतिज्वरम् ।

दोषों का विचार—इसी प्रकार दोषों का भी स्वतन्त्र-परतन्त्र भेद से 'प्रतिज्वरम्' अर्थात् प्रत्येक रोग में सावधानी से विचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।

बक्तव्य—जिसे महर्षि वामभट ने स्वतन्त्र तथा परतन्त्र की संज्ञा दे रखी है, उसे भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ६।११ में अनुबन्ध (प्रधान) तथा परतन्त्र रोग को अनुबन्ध (अप्रधान) कहा है। देखा जाता है कि कहीं कोई दोष प्रधान होता है और दूसरा अप्रधान। यह रोग की प्रकृति के अनुसार सर्वत्र होता रहता है। यथा—'न रोगोऽप्येकदोषजः'।

तेषां प्रधानप्रशमे प्रशमोऽशाम्यतस्तथा ॥ ६२ ॥

पश्चाच्चिकित्सेतूर्णं वा बलबन्तमुपद्रवम् ।

चिकित्सा-सूत्र—इनमें प्रधान दोष अथवा प्रधान रोग की शान्ति हो जाने पर अप्रधान (गौण) की शान्ति स्वयं ही हो जाती है। यदि किसी कारण दोष या रोग की शान्ति न हुई हो तो उसकी शीघ्र चिकित्सा करे अथवा कोई बलवान् उपद्रव (रोगोत्तरकालीन रोग) की भी चिकित्सा करे ॥ ६२ ॥

व्याधिकिल्पशरीरस्य पीडाकरतरो हि सः ॥ ६३ ॥

उपद्रवचिकित्सा-निर्देश—प्रधान रोग के अन्त में जो रोग उत्पन्न होता है, उसे 'उपद्रव' कहते हैं। यह 'उपद्रव' प्रधान रोग से पीड़ित हुए शरीर वाले रोगी को और भी अधिक पीड़ित कर देता है ॥ ६३ ॥

बक्तव्य—उपद्रवों एवं उपसर्गों के परिचय के लिए देखें—च.चि. २१।४० तथा सु.सू. ३५।१८।

विकारनामाकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥

रोगनामनिर्धारण-विचार—वर्तमान रोग को किस नाम से कहा जाय, इस विषय में अनजान चिकित्सक को लज्जित नहीं होना चाहिए। क्योंकि सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना तत्त्वकार के लिए सम्भव नहीं है ॥ ६४ ॥

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१८१

बक्तव्य—ऐसे अवसरों पर त्रिदोष-सिद्धान्त को आधार मानकर चिकित्सा करनी चाहिए।

स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः। स्थानान्तराणि च प्राप्य विकारान् कुरुते बहुम् ॥ ६५ ॥

दोषों का रोगकर्तृत्व—वही दोष ( वात आदि में से कोई एक ) निदान ( कारण ) भेद से तथा शरीर के अलग-अलग अवयवों में आश्रित होकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है ॥ ६५ ॥

तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च। बुद्ध्वा हेतुविशेषांश्च शीघ्रं कुर्यादुपक्रमम् ॥ ६६ ॥

चिकित्साविधि-निर्देश—इसलिए रोग की प्रकृति ( वात आदि मूल कारण ), स्थान-विशेषों तथा विशेष कारणों ( आहार-विहार ) आदि को भलीभाँति समझकर तदनुसार शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ६६ ॥

बक्तव्य—यहाँ दिये गये ६४ से ६६ तक के ये तीन पद्य अविकलरूप से च.सू. १८।४४-४६ से लिये गये हैं। इसके आगे ४७वें श्लोक में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—जो चिकित्सक रोग के मूल कारणों को समझकर बुद्धिपूर्वक तथा शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि से चिकित्सा करता है, वह कभी असफल नहीं होता है। वास्तव में इन निर्देशों का स्मरण चिकित्साकाल में अवश्य कर लेना चाहिए। 'विकारनामाऽकुशलो' ( ऊपर श्लोक ६४ ) का युक्तिसंगत समाधान करते हुए भगवान् पुनर्वसु कहते हैं—'तत्र व्याधयोऽपरिसङ्क्षेया भवन्ति, अतिबहुलात्; दोषास्तु खलु परिसङ्क्षेया भवन्ति, अनतिबहुलात्'। ( च.वि. ६।५ ) अतएव सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अतः दोषानुसार तथा लक्षणानुसार चिकित्सा करने से अवश्य स्वास्थ्यलाभ होता है।

दूष्यं देशं बलं कालमनलं प्रकृतिं वयः। सत्त्वं सात्त्व्यं तथाऽऽहारमवस्थाश्च पृथग्विद्याः ॥ ६७ ॥

सूक्ष्मसूक्ष्माः समीक्ष्यैषां दोषौषधनिरूपणे। यो वर्तते चिकित्सायां न स स्वस्वति जातुचित् ॥

दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश—जो चिकित्सक रस-रक्त आदि धातुओं तथा मल-मूत्र आदि दूष्यों, अनूप, जांगल आदि देशों और आमाशय, पक्वाशय आदि शरीर सम्बन्धी देशों, रोगबल तथा रोगी का बल, शीत, उष्ण आदि काल, लंघन, बमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण आदि का काल, मन्द, तीक्ष्ण, विषम आदि अनल ( अग्नि ) की स्थिति, वात आदि प्रकृति, बाल, यौवन आदि वयस, सत्त्व ( मनसु ), सात्त्व्य ( अनुकूलता ) तथा आहार और अनेक प्रकार की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवस्थाओं का समुचित विचार कर दोषों के अनुसार औषध का प्रयोग करता है, वह चिकित्सक कभी भी चिकित्सा-कार्य में चूकता नहीं है ॥ ६७-६८ ॥

गुर्वल्पव्याधिसंस्थानं सत्त्वेहेबलाबलात्। दृश्यतेऽप्यन्यथाकारं तस्मिन्नभवितो भवेत् ॥ ६९ ॥

रोग की गुरुता-लघुता का विचार—कभी-कभी रोगी के सत्त्व ( मनसु ) तथा शरीर के सबल अथवा निर्बल होने के कारण गुरु अथवा लघु रोग के लक्षण विपरीत ( उल्टे-पुल्टे ) दिखलायी पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सक को सावधान रहना चाहिए ॥ ६९ ॥

गुरुं लघुमिति व्याधिं कल्पयन्तु भिषग्बुवः। अल्पदोषाकलनया पथ्ये विप्रतिपद्यते ॥ ७० ॥

भिषग्बुव की निन्दा—भिषग्बुव ( जो भिषक् न होते हुए भी अपने को भिषक् कहा करता है, वह चिकित्सक ) गुरु रोग को लघु समझकर अर्थात् इसमें अधिक दोष नहीं है, अतः वह चिकित्सा करते समय भूल कर बैठता है ॥ ७० ॥

बक्तव्य—उक्त ६९ तथा ७० श्लोकों के विषय को समझने के लिए आप च.वि. ७।५-७ पद्यों का आशय समझने का प्रयत्न करें। वहाँ यह स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उक्त प्रकार की भूल मूर्ख चिकित्सक ही कर सकता है, न कि विद्वान् चिकित्सक।

ततोऽल्पमल्पवीर्यं वा गुरुव्याघौ प्रयोजितम्। उदीर्येतत्रां रोगान् संशोधनमयोगतः ॥ ७१ ॥

शोधनं त्वतियोगेन विपरीतं विपर्यये। क्षिणुयान्न मलानेव केवलं वपुरस्यति ॥ ७२ ॥

१८९

अष्टाङ्गहृदये

भूल का दुष्परिणाम —उक्त चिकित्सकीय प्रमाद से गुरु (महान्) रोग में थोड़ी मात्रा में अथवा अल्पशक्तिशाली दी गयी संशोधन औषधि पूर्णरूप से संशोधन नहीं करा सकती अथवा अल्पमात्रा में संशोधन करने के कारण रोग को और अधिक बढ़ा देती है। इसके विपरीत लघु लक्षणों वाले रोग में अधिक मात्रा में उग्र बीर्य वाली संशोधन (वमन-विरचनकारक) औषधि का प्रयोग करा देने के कारण उसका अतियोग हो जाता है। इससे न केवल कफ एवं पुरीष आदि मलों का ही क्षय नहीं होता, अपितु ये औषधियाँ रोगों के शरीर को भी क्षीण कर देती हैं ॥७१-७२॥

अतोऽभियुक्तः सततं सर्वमालोच्य सर्वथा । तथा युञ्जीत भैषज्यमारोग्याय यथा ध्रुवम् ॥७३॥

चिकित्सक का कर्तव्य —अतः चिकित्सा-कर्म में लगे हुए चिकित्सक को चाहिए कि वह पूर्वापर (आगे-पीछे) का भलीभाँति विचार कर औषध (विशेषकर संशोधन औषध) का प्रयोग उस प्रकार करें, जिससे औषधप्रयोग लाभदायक हो ॥७३॥

वक्तव्य —इस विषय पर चरक के विचार इस प्रकार हैं—‘ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽविशति योगिवत्। आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगान् चिकित्सति’ ॥ (च.वि. ४।१२) अर्थात् जो चिकित्सक अपने शास्त्रीय ज्ञान से प्रज्वलित बुद्धि रूपी दीपक को लेकर योगी की भाँति रोगी के अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं कर जाता वह रोगी के रोगों की चिकित्सा नहीं कर सकता। यह सत्य है।

वक्ष्यन्तेऽतःपरं दोषा बुद्धिभयविभेदतः ।

दोषभेदों का वर्णन —अब इसके आगे बात आदि दोषों के वृद्धि तथा क्षय भेदों का सहारा लेकर वर्णन किया जायेगा।

पृथक् त्रीन् विद्धि—

दोषवृद्धि के तीन भेद —१. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध तथा ३. कफवृद्ध।

—संसर्गस्त्रिधा, तत्र तु तात्रव ॥७४॥

संसर्ग के तीन भेद —१. वातपित्तवृद्ध, २. वातकफवृद्ध तथा ३. पित्तकफवृद्ध। इस प्रकार संसर्ग के तीन भेद कहे गये हैं। इस संसर्ग में नौ दोषभेदों को अपने प्रमाण से अधिक समझें ॥७४॥

त्रोनेव समया वृद्ध्या षडेकस्यातिशायने ।

संसर्ग के छः भेद —एक दोष की अधिक वृद्धि के छः भेद—१. वातवृद्ध पित्तवृद्धतर, २. पित्तवृद्ध वातवृद्धतर, ३. वातवृद्ध कफवृद्धतर, ४. कफवृद्ध वातवृद्धतर, ५. पित्तवृद्ध कफवृद्धतर, ६. कफवृद्ध पित्तवृद्धतर। उक्त संसर्ग ३ तथा ६ भेदों को मिला देने से ये ९ भेद हो जाते हैं।

त्रयोदश समस्तेषु—

समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद —इनके भेदों में दो-दो दोषों की वृद्धि तथा १-१ की अतिवृद्धि होने पर ६ भेद, तुल्यवृद्धि तथा तर-तम भेद से ६ और १ भेद के जोड़ने से ये १३ भेद होते हैं, जिन्हें आगे कहा जायेगा। उनका क्रम यह है।

—षड् दृष्टेकातिशयेन तु ॥७५॥

१३ भेदों के उदाहरण —इस दृष्टि से दो दोषों के अतिशय से तीन भेद और एक दोष के अतिशय से भी तीन भेद होते हैं, इस प्रकार ६ भेद हुए—१. कफवृद्ध, वात-पित्त अधिक वृद्ध; २. पित्तवृद्ध, वात-कफ अधिक वृद्ध; ३. वातवृद्ध, पित्त-कफ अधिक वृद्ध; ४. पित्त-कफवृद्ध, वात अधिक वृद्ध; ५. वात-कफवृद्ध, पित्त अधिक वृद्ध; ६. वात-पित्तवृद्ध, कफ अधिक वृद्ध ॥७५॥

एकं तुल्याधिकेः—