भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

रोगों के दो भेद—स्वतन्त्र तथा परतन्त्र भेद से रोग पुनः दो प्रकार के होते हैं। इनमें परतन्त्र रोग भी दो प्रकार के होते हैं।

पूर्वजाः पूर्वरूपाख्या, जाताः पश्चादुपद्रवाः ॥ ६० ॥

रोगभेदों के नाम—परतन्त्र रोग के दो भेद—१. पूर्वज और २. पश्चात्जात। पूर्वरूपों को ही पूर्वज रोग कहते हैं और जो रोग के अन्त में उत्पन्न होते हैं, उन्हें 'उपद्रव' (पश्चात्जात) नाम से कहा जाता है। ॥ ६० ॥

यथास्वजन्मोपशयाः स्वतन्त्राः स्पष्टलक्षणयाः ।

स्वतन्त्र रोग—स्वतन्त्र रोग वे हैं, जो अपने-अपने निदानोक्त कारणों से पैदा होते हैं और तदनुकूल चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार के रोगों के लक्षण भी स्पष्ट होते हैं।

विपरीतास्ततोऽन्ये तु—

परतन्त्र रोग—परतन्त्र रोग स्वतन्त्र कहे जाने वाले रोगों से विपरीत होते हैं।

—विद्यादेवं मलानपि ॥ ६१ ॥

मलों का विचार—इसी प्रकार प्रत्येक रोग में विकारों को पैदा करने वाले मलों (दोषों) को भी समझ लेना चाहिए ॥ ६१ ॥

तांलक्षयेदबहिर्तो विकुर्वाणान् प्रतिज्वरम् ।

दोषों का विचार—इसी प्रकार दोषों का भी स्वतन्त्र-परतन्त्र भेद से 'प्रतिज्वरम्' अर्थात् प्रत्येक रोग में सावधानी से विचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।

बक्तव्य—जिसे महर्षि वामभट ने स्वतन्त्र तथा परतन्त्र की संज्ञा दे रखी है, उसे भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ६।११ में अनुबन्ध (प्रधान) तथा परतन्त्र रोग को अनुबन्ध (अप्रधान) कहा है। देखा जाता है कि कहीं कोई दोष प्रधान होता है और दूसरा अप्रधान। यह रोग की प्रकृति के अनुसार सर्वत्र होता रहता है। यथा—'न रोगोऽप्येकदोषजः'।

तेषां प्रधानप्रशमे प्रशमोऽशाम्यतस्तथा ॥ ६२ ॥

पश्चाच्चिकित्सेतूर्णं वा बलबन्तमुपद्रवम् ।

चिकित्सा-सूत्र—इनमें प्रधान दोष अथवा प्रधान रोग की शान्ति हो जाने पर अप्रधान (गौण) की शान्ति स्वयं ही हो जाती है। यदि किसी कारण दोष या रोग की शान्ति न हुई हो तो उसकी शीघ्र चिकित्सा करे अथवा कोई बलवान् उपद्रव (रोगोत्तरकालीन रोग) की भी चिकित्सा करे ॥ ६२ ॥

व्याधिकिल्पशरीरस्य पीडाकरतरो हि सः ॥ ६३ ॥

उपद्रवचिकित्सा-निर्देश—प्रधान रोग के अन्त में जो रोग उत्पन्न होता है, उसे 'उपद्रव' कहते हैं। यह 'उपद्रव' प्रधान रोग से पीड़ित हुए शरीर वाले रोगी को और भी अधिक पीड़ित कर देता है ॥ ६३ ॥

बक्तव्य—उपद्रवों एवं उपसर्गों के परिचय के लिए देखें—च.चि. २१।४० तथा सु.सू. ३५।१८।

विकारनामाकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥

रोगनामनिर्धारण-विचार—वर्तमान रोग को किस नाम से कहा जाय, इस विषय में अनजान चिकित्सक को लज्जित नहीं होना चाहिए। क्योंकि सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना तत्त्वकार के लिए सम्भव नहीं है ॥ ६४ ॥

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