अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदोषभेदीयाध्यायः १२ ]
सूत्रस्थानम्
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चिपचिपाहट्, सूजन, पाक का न होना, नींद का अधिक आना (यही कारण है कि कफप्रकृति के प्राणी अधिक मोते हैं; जैसे—भैंस), वर्ण सफेद, रस मधुर एवं नमकीन और किसी भी कार्य को देर से करना ॥५३॥
इत्यशेषामयव्यापि यदुक्तं दोषलक्षणम् ॥५४॥
दर्शनाचैरवहितस्तत्सम्भूगुपलक्षयेत् । व्याध्यवस्थाविभागजः पश्यन्त्रार्तन् प्रतिक्षणम् ॥५५॥
दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु—यहाँ तक बात-पित्त-कफदोषों के लक्षण कहे गये हैं, जो उन-उन के सभी रोगों में पाये जाते हैं। शास्त्रनिर्देशानुसार रोगों की अवस्था के विभागों (भेदों) को जानने वाला चिकित्सक प्रतिक्षण देखता हुआ सावधान होकर उक्त दोषों का परीक्षण—दर्शन, स्पर्शन आदि विधियों से रोगी के शरीर में करे ॥५४-५५॥
अभ्यासात्प्राप्यते दृष्टिः कर्मसिद्धिप्रकाशिनी । रत्नाविदसदस्ज्जनं न शास्त्रादेव जायते ॥५६॥
चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व—चिकित्साविधि को तथा बात आदि दोषों के लक्षणों को बार-बार ध्यानपूर्वक देखने से चिकित्सा में सफलता दिलाने वाली दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इसी दृष्टि से कर्म (चिकित्सा) में सिद्धि मिलती है। यह वह दृष्टि है जिससे जीहरी देखते ही पहचान लेता है कि यह रत्न ठीक है या दोषयुक्त। यह ज्ञान केवल शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त नहीं होता ॥५६॥
वक्तव्य—शास्त्रकार का यह पारम्परिक निर्देश चिकित्सक होने की इच्छा वाले व्यक्ति के लिए कहा गया है। महर्षि सुश्रुत का भी यही मत है—‘अधिगत’ ‘प्रवेष्टव्या’। (सु.सू. १०।३) अर्थात् बार-बार शास्त्रों तथा चिकित्सा-कर्मों का अभ्यास करने के बाद ही चिकित्सक को विशिखा (कर्मभूमि) में प्रवेश करना चाहिए। और भी देखें—‘उभयजो हि भिषग् राजाहं भवति’। (सु.सू. ३।४७) तथा ‘यस्तुभयजो मतिमान् स समर्थोऽर्थसाधने। आहवे कर्म निर्वाह् द्विचक्रः स्यन्दनो यथा’ ॥ (सु.सू. ३।५३) दोनों ही उद्धरणों के अर्थ स्पष्ट हैं। वे सभी लक्षण सुव्यय चिकित्सक के हैं।
दृष्टापचारजः कश्चित्कश्चिस्तूषपिपराधजः । तत्सङ्ग्राहवत्यन्तो व्याधिरिव त्रिधा स्मृतः ॥५७॥
रोगों के तीन भेद—रोगों के भेदों की चर्चा प्रस्तुत है—१. जो देखकर मिथ्या आहार-विहार के सेवन करने से होता है, वह प्रथम, २. जो पूर्वजन्म के अपराधों से होता है, वह दूसरा और ३. जो उक्त दोनों कारणों के संयोग से होता है, वह तीसरा भेद है ॥५७॥
यथानिदानं दोषोत्पत्तः कर्मजो हेतुभिर्विना । महारम्भोऽल्पके हेतावातङ्गो दोषकर्मजः ॥५८॥
रोगों का परिचय—प्रथम प्रकार के रोग को ‘दोषोत्पत्त’ (बात आदि दोषों से उत्पन्न) कहते हैं। यह रोग अपने निदान के अनुसार होता है। दूसरे प्रकार का रोग ‘कर्मज’ होता है। इसमें दोषज रोग की भांति कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता। तीसरे प्रकार के रोग का नाम है—‘कर्मदोषज’। यह रोग थोड़ा-सा भी कारण होने पर बहुत कष्टदायक होता है ॥५८॥
विपक्षशीलनात्पूर्वः कर्मजः कर्मसङ्ख्यात् । गच्छत्युभयजन्मा तु दोषकर्मक्षयात्म्यम् ॥५९॥
त्रिविध रोग-चिकित्सा—प्रथम ‘दोषोत्पत्त रोग’ विपक्षशीलन से अर्थात् जिन आहार-विहारों का सेवन करने से रोग की उत्पत्ति हुई हो, उनके विपरीत पदार्थों का सेवन करने से तथा तदनुरूप चिकित्सा करने से शान्त हो जाता है। दूसरा ‘कर्मज रोग’ कर्मों के क्षीण हो जाने पर शान्त हो जाता है और तीसरा ‘कर्मदोषज रोग’ दोष तथा कर्म का क्षय होने पर शान्त हो जाता है ॥५९॥
वक्तव्य—शास्त्रानुकूल विधिवत् चिकित्सा करने से भी जो रोगी रोगमूक्त न हो रहा हो, उस समय उक्त दृष्टिकोण को ध्यान में रखना चाहिए और रोगी के परिजनों को भी समझाना चाहिए कि इसके ठीक न होने में यह प्रधान कारण है।
द्विधा स्वपरतन्त्रत्वाद्ब्याधयोऽल्प्याः पुनर्द्विधा ।