अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८
अष्टाङ्गहृदये
बाहरी रोगमार्ग—इस प्रसंग में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा का नाम भी 'शाखा' है, यह बाह्य रोगमार्ग है। इस रोगमार्ग में आश्रित मष (मषक, मत्से, तिल आदि), व्यंग (झाई), गण्ड (घेचा), अलजी, अर्बुद आदि रोग और शरीर के बाह्यमार्ग में अर्श, गुल्म, ब्रण तथा शोथ आदि भी होते हैं ॥ ४४-४५ ॥
अन्तःकोष्ठो महास्रोत आमपक्वाशयाश्रयः। तत्स्थानाः ज्वरतीतीसारकासश्चासोदरज्वराः ॥ अन्तर्भागं च शोफाशौगुल्मबीसर्पविद्रधिः।
आभ्यन्तर रोगमार्ग—आभ्यन्तर (भीतरी) रोगमार्ग के पर्यायवाचक शब्द इस प्रकार हैं—अन्तः, कोष्ठ, महास्रोतस, आमाशय तथा पक्वाशय (इन दोनों के बीच में स्थित क्षुद्रान्त भी)। ये छर्दि (वमन), अतिसार, कास, श्वास, उदररोग तथा ज्वर आदि रोगों की उत्पत्ति के स्थान हैं। भीतरी शोथ, अर्श, गुल्म, विसर्प और विद्रधि का भी स्थान है। इसे आभ्यन्तर रोगमार्ग कहते हैं ॥ ४६ ॥
शिरोहृदयबस्त्यादिमर्माण्यस्त्यां च सन्ध्यः ॥ ४७ ॥
तन्निबद्धाः शिरान्त्यायुक्कण्डराद्याश्च मध्यमः। रोगमार्गः स्थितास्तत्र यक्षमपक्षवर्धारिताः ॥ ४८ ॥
मूध्ादिरोगाः सन्ध्यस्थित्रिकशूलग्रहादयः।
मध्यम रोगमार्ग—सिर, हृदय, बस्ति आदि मर्म और अस्थियों की सन्धियाँ एवं इनसे सम्बन्धित सिरा, स्नायु और कण्डराएँ आदि ये सभी 'मध्यम रोगमार्ग' हैं। इनमें होने वाले रोग राजयक्ष्मा, पक्षाघात, अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) आदि वातविकार, शिरोरोग, हृदयरोग आदि, सन्धिशूल, अस्थिशूल, त्रिकशूल तथा ग्रह (जकड़न) आदि रोग हैं ॥ ४७-४८ ॥
संसव्यासन्व्यहस्वापसादरुक्तोदभेदनम् ॥ ४९ ॥
सङ्गाङ्गभङ्गसङ्कोचवर्तहर्षणतर्पणम् । कम्पपारुष्यसौषिष्यशोघस्पन्दनवेष्टनम् ॥ ५० ॥
स्तम्भः कषायरस्ता वर्णः श्यावोऽरुणोऽपि वा। कर्माणि वायोः—
वातदोष के कर्म—स्रम (शरीर के किसी अंग का अपने स्थान से खिसक जाना), व्यास ( फैल जाना), व्यध (बिघने की जैसी पीड़ा का होना), स्वाप (अंग-विशेष का सुख हो जाना), साद (अवसाद), रुक् (पीड़ा), तोद (सूर्द चुभने की-सी पीड़ा), भेदन (फटने की-सी पीड़ा), संग (हकावट), अंगों का टूटना या टूटने की-सी पीड़ा का होना, संकोच (सिकुड़ जाना), वर्त (घूमना या ऐटना—आवर्त, परिवर्त, विवर्त आदि इसी के रूप हैं), हर्षण (रोमांच), तर्पण (तृषा या प्यास का लगना), कम्प (कैंपकैपी), पारुष्य (खुरदरापन), सौषिष्य (खोखलापन), शोष (सूखना), स्पन्दन (फड़कना), वेष्टन (लपेटना), स्तम्भ (जकड़ जाना), मुख में कसैलेपन का अनुभव होना और उस स्थान का वर्ण श्याव (काला) या अरुण वर्ण का हो जाना—ये सभी वातदोष के कर्म हैं ॥ ४९-५० ॥
—पित्तस्य दाहरागोष्मपाकिताः ॥ ५१ ॥
स्वेदः क्लेदः सूतिः कोथः सदनं मूर्च्छनं मदः। कटुकाम्लो रसो वर्णः पाण्डुरारुणवर्जितः ॥ ५२ ॥
पित्तदोष के कर्म—दाह, लालिमा, उष्णता का अनुभव, पकना या पकाना, स्वेद (पसीना), क्लेद (सड़न), स्राव, कोथ (दुर्गन्धित सड़न), सदन (अवसाद), मूर्च्छा, मद (नशा की स्थिति), मुख में कटु तथा अम्ल रस का अनुभव होना तथा पित्तदोष से युक्त स्थान का वर्ण पाण्डु तथा अरुण से रहित अतएव अन्य वर्णों वाला होना—ये लक्षण होते हैं ॥ ५१-५२ ॥
श्लेष्मणः स्नेहकाठिन्यकण्डूशीतत्वगौरवम्। बन्धोपलेपस्तैमित्यशोफापकल्पतिनिद्रताः ॥ ५३ ॥
वर्णः श्वेतो रसो स्वादुलवणो चिरकारिता।
कफदोष के कर्म—स्निग्धता (चिकनापन), कठोरता, खजुली का होना, हाथ-पैरों में शीत का अनुभव होना, भारीपन, बन्ध (स्रोतों में हकावट), उपलेप (जीभ के ऊपर मैल की पत का जमनः),